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चोरी की मूंछ वाले ने, क्यों पकड़ा दाढ़ी वाले को ? लेखक दिनेश चन्द्र पुरोहित

एक बार एक गाँव में अकाल पड़ा, अन्न के एक-एक दाने के लिए लोग मोहताज़ होने लगे। अन्न के लिए दानी-धर्मी सेठों ने भंडारा खोल दिया, मगर गाँव में पीने का पानी कहाँ ? गाँव के कंजूस सेठ फ़कीर चंद के खेत के कुंए के सिवाय गाँव के किसी कुए में पानी नहीं रहा। सेठ फ़क़ीर चंद को यह वक़्त चांदी कूटने के लिए ठीक लगा। उसके दो नौकर थे, जिसमें एक नौकर दाढ़ी रखता था, तो दूसरे का चेहरा बांकड़ली मूंछों से रोबदार लगता था। रोबीला दिखाई देने के कारण उस मूंछों वाले नौकर को उसने खेत के कुंए पर तैनात कर दिया, और उसे हिदायत दे दी कि, ‘वह बिना दाम लिए कुंए से किसी को पानी नहीं लेने देगा।’ दूसरा नौकर सेठ के घर पर काम करता था। सेठ की हवेली में एक तहखाना था, वहां कई संदूकों में सेठ ने अपनी जमा रकम रख छोड़ी थी। इन संदूकों पर उसने घास के पूले बिछा रखे थे, ताकि किसी को रकम होने का संदेह न रहे। एक दिन सेठ तहखाने में दाख़िल हुआ, तभी उसकी नज़र एक खुली संदूक पर गिरी। उस पेटी को खाली देखते ही, उसका कलेज़ा हलक में आ गया। झट वह तहखाने का दरवाज़ा बंद करके दीवान खाने में चला आया, और वहां बैठे दाढ़ी वाले नौकर पर बरस पड़ा कि, उसने संदूक में रखी रकम की चोरी की है।

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बेचारा नौकर बोला “हुज़ूर। मैंने संदूक खोली नहीं, मैं तो सफ़ाई-कार्य में व्यस्त रहा। फिर, मैं कैसे संदूक खोलता ?” तभी सेठ को उसकी दाढ़ी में उलझा हुआ घास का एक छोटा तिनखा नज़र आया, फिर क्या ? वह उस पर हावी होता हुआ क्रोधित होकर बोला “तुम्हारी दाढ़ी में उसी घास का तिनका है, जो घास संदूक पर बिछाई गयी थी। इसलिए, चोर तुम ही हो। दूसरा कोई नहीं।”

तभी दरवाज़े पर दस्तक हुई, थोड़ी देर में दरवाज़ा खुला। गाँव के सरपंच और कई गाँव के सम्मानित सज्जन अन्दर दाख़िल हुए। उन सबके हाथ में पुष्प-हार थे, उन्होंने झट सेठ फ़क़ीर चंद को पुष्प-हारों से लाद दिया। बात यह थी कि, गाँव में ट्यूब-वेल जन-सहयोग से खुद रहा था और खुदाई का खर्च निर्धारित बज़ट से ज्यादा हो गया। शेष राशि का बंदोबस्त न होने की वज़ह से खुदाई का काम रुक गया। कहते हैं, अंधे के हाथ बटेर लग जाय..अचानक करिश्मा हो गया। उन लोगों को शेष रकम मिल गयी, यह रकम सेठ फ़क़ीर चंद का मूंछों वाला नौकर लाया था। लोगों को प्यासा मरता देखकर, उसका दिल पसीज गया था। उसने तहखाने में रखे संदूक से खर्च होने वाली शेष रकम लाकर सरपंच साहब को दे दी। फिर क्या ? सरपंच साहब और गाँव के सम्मानित सज्जनों ने सेठ फ़क़ीर चंद को महान दानी घोषित करके, उसे सर-आँखों पर बैठा दिया। अब तारीफ़ के बोझ से दबा बेचारा सेठ फ़क़ीर चंद अवाक होकर, उन सबको देखता रहा। वह अब यह भी नहीं कह सकता था कि, ‘उसने रकम नहीं दी, बल्कि इस मूंछों वाले नौकर ने चोरी की है।’ गाँव वालों से इतना सम्मान पाकर वह समझ गया कि, दान करने से कितना आनंद मिलता है ? बस, उसके दिल में अब एक ही विचार उठने लगा कि, चोरी की मूंछ वाले ने, क्यों पकड़ा दाढ़ी वाले को ?

तभी उसकी निग़ाह दरवाज़े पर गिरी, जहां मूंछों वाला नौकर मंद-मंद मुस्करा रहा था। अब सेठ फ़क़ीर चंद का दिल उसे सज़ा देने का विचार छोड़ चुका था, बल्कि उसके होंठ उसकी तारीफ़ करने के लिए फड़फड़ा रहे थे।

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