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काँच-सा दिल ये कैसे सँभालूँ भला, कैसे पत्थर से इसको बचा लूँ भला। - मनीषा शिखर की ग़ज़लें

ग़ज़लें

1.

काँच-सा दिल ये कैसे सँभालूँ भला
कैसे पत्थर से इसको बचा लूँ भला

मेरी आँखों में आकर समुंदर बसे
ख़्वाब कैसे मैं कोई सजा लूँ भला

लेके ख़ंजर जो आया है घर में मेरे
कैसे उसको गले से लगा लूँ भला

आँधियाँ आ बसी हैं नगर में मेरे
किस तरह से मैं दीपक जला लूँ भला

बस गया है 'शिखर' रूह में जो मेरी
कैसे उसको मैं दिल से निकालूँ भला

-मनीषा शिखर
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2.

आइने से कभी हम निखरते नहीं
प्यार होता न तो हम सँवरते नहीं

गुल न खिलते मुहब्बत के गर ऐ सनम !
ख़ुशबुओं-से कभी हम बिखरते नहीं

घाव दिल के दिखाऊँ उन्हें किस तरह
जो गली से भी मेरी गुज़रते नहीं

दीप उल्फ़त के जलने न देती हवा
पर हवा के अगर हम कतरते नहीं

ख़ूबसूरत न होतीं ये ग़ज़लें 'शिखर'
अश्क शे'रों में गर रंग भरते नहीं

-मनीषा शिखर
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3.

आँखों से मेरी नींद उड़ाकर चली गई
आई जो तेरी याद रुलाकर चली गई

ख़ुशियों को सारी ले गई उल्फ़त समेटकर
ग़म को पता वो दिल का बताकर चली गई

दिल में हैं गुनगुनाहटें उस ही ग़ज़ल की आज
उल्फ़त जो तेरी मुझको सुनाकर चली गई

कैसी तुम्हारी याद की आई लहर थी वो
सहरा में मुझको दूर बहाकर चली गई

बैठी जला रही है 'शिखर' वो चिराग़ बस
जिसको इक आँधी पल में बुझाकर चली गई

-मनीषा शिखर
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4.

लग रहा जैसे उजाले भी अँधेरे हो गए
थे जो ख़ुशियों के महल, अब ग़म के डेरे हो गए

क्या हुआ दुनिया को जाने देख जो जलने लगी
बात है इतनी-सी बस इक हम जो तेरे हो गए

ये किरण कैसी भला जो आँख को घायल करे
लग रहा मुझको कि अब क़ातिल सवेरे हो गए

अब ग़ज़ल की आँख से होने लगी बरसात है
कह रहे अश्आर घायल शे'र मेरे हो गए

अब करें किस पर भरोसा ऐ 'शिखर' तू ये बता
कल थे पहरेदार जो वो भी लुटेरे हो गए

-मनीषा शिखर
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5.

सितारों की जहाँ महफ़िल सजी है
उसी घर में छिपी इक तीरगी है

लबों पर प्यास क्यों बैठी है जाने
छिपी आँखों में जबकि इक नदी है

फ़िदा ये दिल है इक पत्थर पे मेरा
मुहब्बत की ये कैसी बेबसी है

गये तुम छोड़कर जबसे मुझे यूँ
हर इक पल हो गया जैसे सदी है

दिखाया मौत का रस्ता भी उसने
वही जो इस 'शिखर' की ज़िन्दगी है

-मनीषा शिखर
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गोविंदपुरी, मोदीनगर, जिला- गाज़ियाबाद (यू.पी) 201201

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