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देश की आधी आबादी का जीवन आज भी अभिशप्त-सुधा जुगरान -सुरेश सौरभ (साक्षात्कार)

पारिवारिक और सामाजिक जिम्मेदारियों को कुशलता से निभाते हुए सुधा जुगरान पिछले 25 सालों से कहानी लेखन में सक्रिय हैं। उनकी कहानियां सरिता, गृहशोभा, मेरी सहेली,वनिता, नारी शोभा, जैसी विभिन्न देश की अग्रणी पत्र-पत्रिकाओं में प्रमुखता से प्रकाशित होती रहतीं हैं। उनकी कहानियां सामाजिक सरोकारों की गहरी पड़ताल करतीं हैं। इसके अलावा आकाशवाणी और मंचों से, वे अपनी रचनात्मकता को दूर-दूर तक निरन्तर पहुंचा रहीं हैं। पिछले दिनों उनसे साहित्यिक-सामाजिक मुद्दों को लेकर लंबी बातचीत हुई। यहां प्रस्तुत है उसके मुख्य अंश ।

*आपकी लेखन यात्रा कब शुरू हुई।

*मेरी लेखन यात्रा 13 साल की उम्र से ही शुरू हो गई थी। तब स्कूल की पत्रिका में मेरी पहली कहानी "कोई ऐसा घर "प्रकाशित हुई थी।

*आपके लेखन में मुख्य विषय क्या होते हैं ।

*मेरे लेखन के विषय मुख्यतः पारिवारिक व सामाजिक विसंगतियों के होते हैं । इसके अलावा प्रेम कहानियाँ भी लिखतीं हूँ ।

*आप की पहली कहानी कौन सी है।

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* स्कूल के समय की मेरे जीवन की पहली कहानी "कोई ऐसा घर " है और राष्ट्रीय स्तर की पत्रिका में मेरी पहली कहानी 21 साल की उम्र में प्रकाशित हुई थी जिसका शीर्षक था "बस अब और नहीं " जो दिल्ली प्रेस की पत्रिका 'सरिता' में 2 अंकों में प्रमुखता से प्रकाशित हुई थी । तभी से मेरी लेखन यात्रा को नई उड़ान मिली।

*आपको लेखन की प्रेरणा किस-किस से मिली।

* मुझे लेखन की प्रेरणा पिता श्री प्रेम दत्त कोठियाल से मिली । उन दिनों कॉलेज की एक पत्रिका में रचनाएं मांगी गई थीं ।उन्होंने कहा-तुम लोगों को कुछ नहीं करना,तुम चाहो तो कुछ लिख सकतीं हो, तब उनकी प्रेरणा से मैंने कलम उठाई और मेरी पहली कहानी कॉलेज की पत्रिका में १३ साल की आयु में प्रकाशित हुई । विद्यार्थी जीवन में ही स्कूल काॅलेज की पत्रिकाओं के अतिरिक्त मेरी कहानियाँ स्थानीय पत्रों में धारावाहिक के रूप में प्रकाशित हो गई थी। पिताजी लिखने पढ़ने के शौकीन थे। उनके व्यक्तित्व का मुझ पर बहुत गहरा असर पड़ा । आज वे नहीं है पर मेरी लेखनी के रूप में वे हर वक्त मेरे साथ हैं । दूसरा नाम मैं अपनी स्वर्गीय सासू माँ दिब्येश्वरी जुगरान का लेना चाहूँगी , जो विवाह के बाद मुझे हमेशा लिखने के लिए प्रोत्साहित करती रहीं । अपनी कहानी के प्रकाशित होने पर उनकी खुशी देखना मुझे बहुत पसंद था। फिर पति का सहयोग तो हर समय का होता है । लेखन में व्यस्त देखकर वे अपनी जरूरतें बहुत सीमित कर लेतें हैं यही उनका सबसे बड़ा सहयोग है।

*आपके पसंदीदा लेखक कौन है। *मेरे कोई 1 या 2 पसंदीदा लेखक या लेखिका नहीं है। 14, 15 साल की उम्र ही मैंने पिताजी की लाइब्रेरी से प्रेमचंद जी की 'गोदान' 'रंग भूमि ' आदि भारी भरकम उपन्यास पढ़ डाले थे... इसके अलावा आचार्य चतुरसेन, मन्नु भंडारी, मोहन राकेश, शशी प्रभा शास्त्री, आदि की किताबें पढ़ डाली थी। तब इतनी समझ में नहीं आईं, बाद में दोबारा पढ़ी। शिवानी का पूरा साहित्य पढ़ा। प्रतिभा राॅय की 'द्रौपदी' पढ़ी। इसके अलावा तस्लीमा नसरीन, निर्मल वर्मा ,अमृता प्रीतम आदि बहुत से नाम हैं जिनकीं किताबें पढ़ी हैं । कुछ बहुत पसंद आता था कुछ कम पसंद आता था । मुझे बहुत भारी भरकम व जटिल लेखन पसंद नहीं आता। प्रेमचंद जी इसीलिए शायद जनमानस के लेखक बने क्योंकि उनकी लेखन शैली बहुत सरल थी। आज भी मुझे जो अच्छा लगता है वही पढ़ती हूँ । आज के लेखकों में संजीव जायसवाल 'संजय' की कहानियाँ व खासकर उनकी व्यंग्य लेखन शैली मुझे बहुत पसंद है ।

*अपनी कुछ पारिवारिक पृष्ठभूमि के बारे में बताएं।

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*मेरे पति श्री विनोद चंद्र जुगरान कारपोरेट वर्ड में सीनियर पोस्ट से रिटायर्ड हैं । एक ही बेटा है जो विवाहित है । बेटा बहू दोनों दुबई में जाब करते हैं । मेरे ससुर जी, पी. सी. एस. एलाइड सर्विस से थे। मेरे जेठ जी व ननद के पति आई. पी. एस. अफसर. है। मुझे बचपन से ही बहुत शैक्षिक वातावरण मिला। पिताजी व माँ दोनों ही पढ़ने के बहुत शौकीन थे। पिताजी तो लिखते भी थे। पिताजी सरकारी नौकरी में थे। तबादलों से परेशान होकर उन्होंने  50 साल की उम्र में नौकरी से इस्तीफा देकर ला की पढ़ाई की थी । 75 साल की उम्र में उन्होंने "उत्तराखंड में ग्राम्य विकास की योजनाओं का गवेषणात्मक विवेचना " विषय पर पी. एच. डी. की थी। मेरा एक भाई है। जो एफ. आर. आई. देहरादून में डिप्टी डायरेक्टर की पोस्ट पर कार्यरत है । भाभी देहरादून में गुरु रामराय युनिवर्सिटी की प्रो वाइस चांसलर है। मैंने खुद भी रसायन विज्ञान में एम. एस. सी. प्रथम श्रेणी में बहुत अच्छे अंको से किया है । लेकिन मेरी रूचि हमेशा से हिंदी साहित्य में ही रही।

*आपने हिंदी साहित्य लेखन कब से प्रारंभ किया। साहित्य की किन-किन विधाओं पर लिखतीं हैं।

*मैंने हिंदी साहित्य में 13 साल की उम्र से ही लिखना शुरू कर दिया था। मुख्य रूप से तो मैंने कहानियाँ ही लिखीं हैं । लेकिन कुछ लेख भी लिखें हैं जिनके विषय पारिवारिक व सामाजिक ही रहे हैं । इसके अलावा पर्यटन पर आधारित लेख भी लिखें हैं । मुझे समीक्षात्मक लिखना बहुत पसंद है। दिल्ली प्रेस की पत्रिकाओं में मेरे इस तरह के पत्र निरंतर प्रकाशित होते हैं ।

*क्या आप किसी सामाजिक संगठन से भी जुड़ी हैं

*मैं किसी विशेष सामाजिक संगठन से नहीं जुड़ी हूँ । मेरे छोटे भाई की मृत्यु 23, 24 साल में ही हो गई थी । मेरे पिताजी ने उसके नाम पर कुछ पैसा जमा कर एक ट्रस्ट बनाया हुआ है । जिसमें मेरा नाम भी है। उस जमा किए धन से जो ब्याज आता है उससे किसी अनाथालय , नारी निकेतन या फिर गरीब बच्चे की पढ़ाई में मदद की जाती है । 4 महीने पहले पिताजी का स्वर्गवास हो गया । फिर भी ये सामाजिक कार्य जारी रहेंगे।

*आप की प्रमुख रचनाएं कौन सी हैं।

* यूँ तो लेखक को अपनी सभी रचनाएँ प्रमुख ही लगतीं हैं। मेरी रचनाएँ स्थानीय पत्र-पत्रिकाओं के अतिरिक्त राष्ट्रीय स्तर की पत्रिकाओं , सरिता, गृहशोभा, मुक्ता, मेरी सहेली, वनिता, नारी शोभा आदि में प्रकाशित होती रहतीं हैं । उनमें  "फलक तक" "प्रश्न चिन्ह" "अधिकार " "खोटा सिक्का" "एक फूल दो माली "हम तुम" "गली आगे मुड़ती है " "खोखली होती जड़ें " "परिवर्तन" आदि बहुत से ऐसे नाम हैं जो पाठकों द्वारा काफी सराही गईं । जल्दी ही मेरा एक कहानी संग्रह भी प्रकाशित होने जा रहा है ।

*आपकी कहानियों में अधिकतर हाई-फाई सोसायटी की समस्याओं के विमर्श को लेकर कथानक बुना होता है। क्या समाज के निचले तबके के लिए भी आप कहानियां लिखतीं हैं।

* ऐसा नहीं है। मैं समाज के हर वर्ग के लिए लिखतीं हूं। हां कई बार पत्रिकाओं के अनुकूल लिखना होता है। समाज के निचले तबके के लिए मैंने कई कहानियां लिखीं हैं।

*आज के समय में स्त्री विमर्श को लेकर तरह-तरह की अलग-अलग बातें हो रही हैं इस विषय पर आपका क्या मत है ‌।

*सही कहा आपने कि स्त्री विमर्श, नारी सशक्तिकरण की चर्चा आज जोरों पर है, पर आवश्यकता इस बात की है कि यह चर्चा सिर्फ किताबों, टीवी चैनलों या कुछ महिला संगठनों के खोखले नारों में नहीं, बल्कि प्रत्येक मनुष्य के मानस पटल पर जन्म लेनीं चाहिए । क्योंकि वास्तविकता में देश की इस आधी आबादी का जीवन आज भी अभिशप्त ही है। चाहे फिर घरेलू हिंसा को लेकर हो या पिता की संपत्ति में बराबरी के अधिकार को लेकर । अभी तो वह पारिवारिक स्तर पर ही सशक्त नहीं है । हम जब महिला सशक्तिकरण की बात करतें हैं तो हमारे ध्यान में कुछ मुट्ठी भर सबल स्त्रियाँ ही कौंधती हैं जो इसका हिस्सा बन पा रही हैं । हालाँकि वे भी कितनी 'ग्लास सीलिंगस ' को तोड़ कर यहाँ तक पहुँची हैं,ये तो वही जानती हैं । हम अगर दुनिया के देशों के इतिहास , समाज या धर्म पर नज़र डालें तो तरक्की उसी देश ने है जहाँ स्त्रियों के लिए सफलता के दरवाजे खोले गये। जहाँ के धर्म या समाज ने उस पर बेवजह के पहरे नहीं बिठाये । जहाँ का धर्म स्त्रियों के लिए सहिष्णु रहा है । जहाँ वह पुरुष के बराबर ही परिवार व समाज व देश के कल्याण में मुख्य धारा में शामिल रही है । इसलिए जरूरी है कि हमारे देश में, उस आखिरी लड़की को भी हर वह अधिकार मिले जिसकी वह हकदार है । सिर्फ किताबी बातें न हो।

* कुछ साहित्यिक सम्मानों के बारे में बताइए।

*दिल्ली प्रेस की वार्षिक प्रतियोगिताओं में मेरी कहानियाँ "परिवर्तन " व "आशियाना" पुरस्कृत हुईं थीं। वनिता पत्रिका की कहानी प्रतियोगिता 2018 में कहानी "रिटर्न गिफ्ट " पुरस्कृत हो चुकी है । इसके अलावा अन्य कई सम्मान मिलें हैं।

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लेखक-सुरेश सौरभ

निर्मल नगर लखीमपुर खीरी पिन-262701

उत्तर प्रदेश

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