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मतवाले बादल - अनुपमा रविंद्र सिंह ठाकुर की कविताएँ

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1.तरक्की तरक्की केबल शब्द नहीं है, एहसास है उन धोखों का जो आगे बढ़ने की फिराकत में अपनों ने ही अपनों को दिया।   तरक्की केवल शब्द नहीं, ...

20190828_225944

1.तरक्की

तरक्की केबल शब्द नहीं है,
एहसास है उन धोखों का
जो आगे बढ़ने की फिराकत में
अपनों ने ही अपनों को दिया।
 

तरक्की केवल शब्द नहीं,
एहसास है उनका क्षणों का
जो हँस कर अपनों ने ही
अपनों से निकलवाए।
 

तरक्की केवल शब्द नहीं है,
एहसास है उस मासूमियत का
जो केवल चेहरे पर थी,
जिसे हथियार बनाकर
अपनों ने ही पाश में बँधा।
 

तरक्की केवल शब्द नहीं,
तमन्ना है दूसरों को गिराकर
खुद ऊँचा उठने की,
जमीर से नहीं
सिर्फ ओहदे से,
शायद तरक्की इसी का नाम है।

2.मतवाले बादल

हे! मतवाले, नटखट, मनमौजी सलिल,
मैं मानती हूँ तुम हो बहुत चंचल,
इस बार रूठ कर कहीं मत जाना,
अब आए हो तो
मेरी नगरी में बरस कर जाना।

मेरा किसान चातक पक्षी की भांति
तुम्हारी ओर आशा से देख रहा है,
कभी तुम्हारी ओर तो,
कभी मरुस्थल बने भूमि को निहार रहा है।

देखो इस बार फिर से धोखा ना दे जाना,
अन्न उगाने वाला हमारा अन्नदाता
अन्न के लिए तरस रहा है,
खाली पड़ी अपनी भूमि को
शमशान ही समझ रहा है।

अगर तू इस बार भी नहीं बरसेगा
तो आत्महत्याओं का यह सिलसिला
फिर कैसे रुकेगा?
कुछ तो हमदर्दी इन पर भी बताना,
इस बार रूठ कर कहीं और न जाना।

3.शिक्षा

शिक्षा अब एक व्यापार हो गया,
धन कमाने का सबसे उत्तम
हथियार हो गया।

पूंजीपतियों के लिए
शिक्षा में निवेश
एक बाजार हो गया,
डिग्रियाँ खरीदना और बेचना
अब एक कारोबार हो गया।
 
गली, नुक्कड़ हर मोहल्ले में
शिक्षा के ठेकेदारों का
दरबार हो गया,
तरीका उचित हो या अनुचित
प्रशासक, डॉक्टर, इंजीनियर बनना
हर किसी का ख्वाब हो गया।

भारी-भरकम शुल्क देकर
डॉक्टर बनना
नोट छापने का व्यापार हो गया,
पाश्चात्य शिक्षा व्यवस्था का
अंधानुकरण करना
अपना रिवाज हो गया।

निजी विद्यालयों की
बाहरी चमक-दमक,
परंतु अदर का खोखलापन
ही शिक्षा का मंदिर हो गया,
केवल अधिक से अधिक
परीक्षा में अंक पाना
हर किसी का ध्येय हो गया।

अधिक धन लाभ कैसे,
किस से और आसानी से होगा
यही शिक्षा का उद्देश हो गया,
समर्पण भाव वाले
योग्यतम शिक्षकों का
अभाव हो गया।
शिक्षक अब
केवल वेतनभोगी नौकर हो गया,
संकुचित मनोवृत्ति का संक्रमण हो गया।
व्यापारिक मनोवृति सब पर
हावी हो गई,
शिक्षा अब केवल
कामचलाऊ वस्तु हो गई।

4.स्त्री ही स्त्री की बैरी

बहुत हुई है बातें
स्त्री के उत्थान की,
केवल जुलूस, मोर्चे
और मोमबत्तियाँ जलाने की।
नारी की आत्मोन्नति और
आत्म संस्कार के लिए
केवल भाषण बाजी करने की,
नारी को शक्ति स्वरूपा कह
फिर उसे ही दबाने की,
बहुत हुई हैं बातें
स्त्री के उत्थान की।
 

स्त्री ही स्त्री की वैरी है
ज़रुरत है यह बात
समझने और समझाने की।
देख लो घटना
कहीं बहू को जलाने की
तो कहीं
वृद्धा सास को तरसाने की,
बहुत हुई हैं बातें
स्त्री के उत्थान की।

ऑफिस में
महिला शासन अधिकारी की
पुरुषों की सराहना कर
उन्हें ऊँचा दर्जा देने की,
स्वयं नारी होकर भी
स्त्रियों को ही आँखें दिखाने की।
स्त्रियों को कठपुतली का नाच-नाचाकर
अपना रौब जमाने की,
बहुत हुई हैं बातें
स्त्री के उत्थान की।
 
परिधान तो हमने बदल दिया
चाँद पर भी पहुँच गए,
विकास भी हमने खूब किया
पर तजी नहीं बातें
पुरानी सोच और
रूढ़िवादी परंपराओं की।
मर्दवादी समाज में
स्त्री को अनुगामिनी बनाने की,
बहुत हुई हैं बातें
स्त्री के उत्थान की।
 

स्त्री की तरक्की देख
अहम् पुरुष का दुखता है,
कामकाजी महिला को भी
घर में दासी बन रहना पड़ता है।
उठ खड़ी हुई है वह
फिर भी हर कदम पर
आलोचना वह सहती रहती है,
कई बार मर कर भी
सभी के लिए जीती है,
बहुत हुई हैं बातें
स्त्री के उत्थान की।

5.ख्वाहिश

उम्र कट गई सारी बेकार की बातों में,
तू-तू, मैं-मैं कर
एक दूसरे के गुण-दोष निकालने में।
 

सुख-चैन सारा गँवा दिया है
पैसा, ज़रुरत से ज्यादा कमाने में,
तू बड़ा पर तुझसे मैं बड़ा
यह दुनिया को दिखाने में,
उम्र कट गई सारी बेकार की बातों में।
 

ना मेरा लेना-देना कुछ
ना ही ज़रुरत,
ना मेरा कोई वास्ता,
फिर भी दुनिया भर की खबरें जुटाने में
और लगे हैं खुद को मसरूफ बताने में,
उम्र कट गई सारी बेकार की बातों में।
 

अभी भी समय है संभलने का
दूसरों को संभालने का,
मुश्किलों में एक दूसरे का
हाथ थामने का,
छोड़कर बेकार की बातों को
दुनिया में मोहब्बत फैलाने का,
तब न कहना पड़ेगा
कि उम्र कट गई सारी बेकार की बातों में।

6.वर्षा

मेघ उमड़-घुमड़ चहुँ ओर से आए
काले -काले हो मतवाले से मंडराये,
गड़गड़ाहट की आवाज से आकाश को गुंजाए।
पर यह क्या बिना बरसे ही चले जाए
इनका तो यह नित्य का क्रम हो गया,
क्यों मौसम हमसे खिन्न हो गया?
जब हमने उनसे यह सवाल किया
उन्होंने भी हँसकर जवाब दिया,
और पेड़ों को कटवाओ
जनसंख्या भी खूब बढ़ाओ,
नए-नए बाँध बनाओ
प्रकृति को हर रोज दुखाओ।
फिर कैसे पर्यावरण में संतुलन होगा
कैसे सब कुछ सामान्य होगा?
अपने पैर पर कुल्हाड़ी मार
स्वयं तू क्यों रोता है ?
बिना पेड़ों के वर्षा हो
यह कैसे संभव हो सकता है?
अभी भी वक्त है जाग जाओ,
वृक्षारोपण को बढ़ाओ,
वृक्षारोपण को बढ़ाओ।

7.फितरत

किसी को इतना भी
मत सताओ
कि छोटी चिंगारी भी
ज्वालामुखी बन जाए।
विस्फोट को रोकना
बस में ना होगा,
अगर कोई
अपनी जलालत पर उतर आए।
जो बरसेंगे अंगारे शोला बनकर,
भरे बाजार में बेआबरू हो जाओगे,
दिल से सभी के उतर जाओगे
मुँह ना होगा कि
फिर से कुछ कह पाओगे।
 

किसी को इतना भी
ना सताओ कि
बेबसी में
केवल बद्दुआ ही निकले,
अगर दुआएँ असर करती हैं
तो बद्दुआओं
में भी ताकत होती है,
इसीलिए तो
पुख्ता मंज़िलों को भी
गिरते देखा है।
 

किसी को इतना भी
ना सताओ कि
आपके लिए सिर्फ
नफरत ही नफरत बचे,
कभी आपको भी
किसी की जरूरत पड़े
और कोई मदद ना मिले,
तब इंसानियत के खोने का
एहसास उस रूह को हो
जो दूसरों को तड़पाने में लगी है।

8.आराध्या


संसार पूजता है विद्या की देवी माँ सरस्वती को,
कुमकुम अक्षदा पुष्प चढ़ाकर
भजता है हर क्षण उनको,
धन की हो अगर कामना
तो माँ लक्ष्मी की करता है वह आराधना।
शक्ति की लालसा से
माँ दुर्गा की करता है उपासना,
परंतु अपने ही घर में
स्त्री की करता है वह अवहेलना।
 

निरर्थक है अदृश्य देवियों को पूजना,
इस धरातल पर हर घर में है
वास्तविक देवियों का आशियना,
प्रत्येक स्त्री को लक्ष्मी समझकर
शक्तिशाली उसे है बनाना।
प्रत्येक स्त्री को सरस्वती जानकर
शिक्षा उसे है दिलाना,
प्रत्येक स्त्री दुर्गा है
इसलिए कोख में ही उसे ना मारना,
रानी लक्ष्मी बाई के समान बहादुर है उन्हें बनाना।
रानी पद्मावती सी शूरवीर हैं
उन्हें बनाना शिक्षा का आभूषण,
पहना कर समाज में रुतबा है उसका बढ़ाना।
 

वह केवल भोग्या है
इस दुर्भावना को है हटाना,
राष्ट्र की प्रगति की सूत्रधार है स्त्री,
हम सबको है यह स्वीकारना।
बलात्कार, उत्पीड़न, मानसिक शोषण
जैसे दुष्कर्मों को भारत से है हटाना,
करुणा, प्रज्ञा, तेजस्विता, स्नेहमयी,
जीवनदायिनी, धनवान, ज्ञानवान
कोई और अदृश्य देवी नहीं,
पर घर को सँजोने वाली बहू,
बेटी, माता, कन्या इन्हीं को हमें है पूजना

9.अस्तित्व


कैसे कह दूँ कि तुम नहीं हो?
पूर्व में उषा की पहली किरण
छाई हुई लालिमा में
तुम्हारे होने का
एहसास जगाती है,
चिड़ियों की चहचहाट में
उनका कोई रक्षक होने का
प्रमाण दे जाती है।
पथ पर भटक रहे पशुओं को
जब कोई रोटी मिल जाती है
तब कैसे कह दूँ कि तुम नहीं हो ?
 

सुबह की आजान और मंदिर की घंटी
यूँ ही नहीं बजती है,
यह ऋतु चक्र यूँ ही नहीं बदलता है,
यों कड़कड़ाती धूप में भी जब कोई
पंछियों हेतु दाना-पानी रखता है
तब तेरे होने का एहसास दे जाता है,
तब कैसे कह दूँ कि तुम नहीं हो ?
 

जब चिलचिलाती गर्मी के बाद
सुखद वर्षा होती है,
दहकती वसुंधरा से भी
सौंधी खुशबू आती है,
जब कोई बेसहारा शिशु भी
बिना माँ के पलता है,
भयंकर तपती गर्मी में भी
जब कोई रास्तों पर
मुसाफिरों के लिए
ठंडा पानी
मटकों में भर जाता है,
तब आपके होने का एहसास दे जाता है,
तब कैसे कह दूँ कि तुम नहीं हो?

10.प्रार्थना


हे! प्रभु मुझको इतना बलवान बनाओ
संकट में भी हँंस मुख रह पाऊँ,
रात्री मे जब नेत्र खुलें
तब हर ओर आपको ही पाऊँ।
 

अभिमान, दंभ, इर्श्या का सर्वनाश हो
क्योंकि तू मुझमें समा जाए,
और मैं तुझमें समा जाऊँ।
 

सब छोड़ मोह-माया
तुझ से एकाकार हो जाऊँ,
हे! प्रभु मुझको इतना बलवान बनाओ।

सब कुछ है तेरा
सब कुछ तू ही है करने वाला,
फिर क्यों मैं चिंताग्रस्त बन जियूँ,
सारी चिंताएँ तेरे चरणों में छोड़
मैं निश्चिंत हो तेरी धूनी रमाऊँ,
हे! प्रभु मुझको इतना बलवान बनाओ।
 

न मैं देखूँ उस ओर
जहाँ सुख ही सुख है चहूँ ओर,
अभावों में भी जीवन जीकर
संतुष्ट हैं नारी-नर
देख उनको, संकटों का सामना करूँ,
तेरे हर क्षण को निर्भय होकर
खुशी से जियूँ,
हे! प्रभु मुझको इतना बलवान बनाओ।
 

जीवन के इस अनमोल उपहार को पहचानूँ
नित उठ स्वयं को भाग्यवान मानूँ,
अंध, बधीर, न विकलांग तूने मुझे बनाया
स्वस्थ शरीर को ही अपनी सबसे बड़ी
पूंजी मानूँ।
हे! कृपानिधान स्वयं को मैं सौभाग्यशाली मानूं,
हे! प्रभु मुझको इतना बलवान बनाओ
संकट में भी हँस मुख रह पाऊँ।


अनुपमा रविंद्र सिंह ठाकुर

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नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,4039,आलोक कुमार,2,आलोक कुमार सातपुते,1,आवश्यक सूचना!,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,338,ईबुक,193,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,262,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,112,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,3001,कहानी,2254,कहानी संग्रह,245,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,541,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,130,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,31,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक 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तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,1,बाल कथा,345,बाल कलम,25,बाल दिवस,4,बालकथा,67,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,16,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान 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रचनाकार: मतवाले बादल - अनुपमा रविंद्र सिंह ठाकुर की कविताएँ
मतवाले बादल - अनुपमा रविंद्र सिंह ठाकुर की कविताएँ
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https://www.rachanakar.org/2019/08/blog-post_94.html
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