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डॉ आर बी भण्डारकर की रचनाएँ

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कविताएँ-


(1) * सब दिन एक समान *


        -  डॉ आर बी भण्डारकर.

होता रहा होता रहेगा वह सब
जिसके लिए ये चिल्ल-पों है।
मन में बसा  तो   वही    सब
निकालने वाला कहो कौन है।

नेक  भी नेकी  यों  करै कि
मत बताना तुम  कौन   हो।
संकट का है   हल      यही
कि  साथी तुम्हारा  मौन है।

फुंकार की किंचित अहि ने
कुचला गया  सब      जानते।
सब नहीं विषधर जगत में
जबकि सब   हैं       मानते।

सर्वज्ञात, स्वीकार   सबको
जन्म  लेना    बस में न था।
देव -दुर्लभ तन ये    कैसा
जो कि उसके मन में न  था।

तब भी कहाये जगतनायक
आज भी कहाते विश्व नायक।
बाण भी    वैसे ही     नुकीले
वैसा ही बना है आज शायक।
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             (2) * कविता *


                       - डॉ आर बी भण्डारकर.

सुनो अमीरों बेढंगी--सी चाल तुम्हारी लगती है,
तुमने तान रखी है, पतली ढाल तुम्हारी लगती है।
नाना बिध चटखारे लेकर तुम जो गाने गाते हो
तुमको और तुम्हारो को भी  सुन मितली-सी लगती है।
आपन मुँह तुम आपन करनी रंग भर भर कर कहते हो
सच मानो तो उनसे ही तो पोल तुम्हारी खुलती है।
बड़ा न होता कोई गुनन बिन,भाड़े की प्रशंसा से
गाल बजाने से सच मानो चूल तुम्हारी हिलती है।
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बाल कविताएँ-

    (1)    ** हम अच्छे तो सब हैं अच्छे **


                      - डॉ. आर.बी.भण्डारकर.


सुनो बात यह चिड़िया रानी
मैं जाती हूँ  पापा     के घर।
तुम तो रहना यहीं मजे से
बब्बा का घर है अपना घर।

दादी दाना देंगी हर दिन
पानी भी वे देंगी नियमित।
मैं भी जल्दी ही लौटूँगी
क्योंकि छुट्टियाँ मेरी सीमित।

याद भी मेरी तुम मत करना
मन में दुख बिल्कुल मत लाना।
मैं तो मस्त रहूँगी सुन लो
तुम भी गाती रहना गाना।

यहाँ फूल हैं ये बहुतेरे
फूल वहाँ भी हैं  कहते पापा।
वहाँ मिलेगी तुमसी चिड़िया
यह भी कहते रहते पापा।

जाकर ही मैं देख सकूँगी
यहाँ वहाँ में है कितना अंतर।
मुझ अनजाने के कारण से
वह चिड़िया,हो न जाय छू मंतर।

बात तुम्हारी उसे कहूँगी
समझा कर मित्रता करूँगी।
हाल वहाँ के मैं लाऊँगी।
आने पर  फिर बता  सकूँगी।

मेरी समझ यही आता है
सभी जगह सब ही हैं अच्छे।
शर्त यही मन में रखनी है
हम अच्छे तो सब हैं अच्छे।
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(2)**  आलू **


                  - डॉ आर बी भण्डारकर।

मैं हूँ मित्र तुम्हारा,आलू।

सीधा-सादा, भोला-भाला,
फितरत नहीं जरा भी चालू।
मुझे उबालो फिर तुम खाओ
स्वाद अनौखा,बलि बलि जाओ।

मुझे भूनकर भी खा सकते
स्वाद और बढ़िया पा सकते।
किस्म किस्म की सब्जी बनती
कितनी?जरा कठिन है गिनती।

सबका मुझ पर लाड़ घनेरा
सबके कहते यह साथी मेरा।
बैंगन,परबल, लाल टमाटर
पालक,गोभी अहा ये मटर।

मित्र सभी हैं मधुर सब्जियां
फेहरिश्त लम्बी है इनकी ।
हाँ किंचित दूरी रखता हूँ
तासीर कड़वी है जिनकी।

चना काबुली या हो देशी
हम मिल बनते स्वाद निराला।
यदि पनीर का साथ मिले तो
तुम लोगे चटखारे लाला।

बनती कढ़ी मठा के आलू
आलू भुजिया औ दम-आलू।
मन चाहे तुम वहाँ मिला लो
तरह तरह की चाट बना लो।

चिप्स और पापड़ बनते हैं
भजिया,भुजिया का क्या कहना।
नहीं मौसमी सब्जी हूँ मैं
हर मौसम में है मेरा रहना।

संग मसालों  को ले करके
चाट, समौसे में मैं  रहता ।
स्वाद और सेहत मैं  देता
कुछ भी गलत नहीं मैं कहता।

सोडियम और पोटेशियम मुझमें
76  प्रतिशत  है मुझमें     पानी।
प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट है मुझमें
विटामिन्स,फाइबर्स हैं सुन ज्ञानी।

बच्चे,युवा, वृद्ध भी खाएँ
पतलू खाएँ ,मोटू खाएँ।
मैं तो सबको ही भाता हूँ
स्वाद सलौना दे पाता हूँ।

मुझको गेंद बनाकर खेलो
उपज कहीं भी मेरी ले लो।
दोमट,बलुही, काली मिट्टी
रहे न उसमें कंकड़-गिट्टी।

तनिक सिंचाई, गुड़ाई कर लो
पैदावार अधिक,घर भर लो।
शीत गृह में मुझको रख लो
टिकूँ बहुत दिन निश्चित कर लो।


पहचाना जाता दुनिया भर में
मैं ऐसा प्यारा, न्यारा आलू।
मेरे बिना किचिन है फीका
फितरत नहीं जरा भी चालू।
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         (3)  ** शेरू **


                 -डॉ आर बी भण्डारकर

बब्बा जी ऐसा क्यों होता
लगता शेरू कभी न सोता।
वह हरदम चौकन्ना रहता
शायद रहता निशि-दिन जगता।

बब्बा जी ऐसा क्यों होता
समझ नहीं कुछ मेरी आता।
अपना शेरू सदा भौंकता
जब कोई अपने घर आता।

मैं नित शाला पढ़ने जाती
पढ़कर फिर वापस घर आती।
आते-जाते वह हमें देखता
पर बिल्कुल भी नहीं भौंकता।

मिट्ठू ! शेरू चतुर  सुजान
तुमसे उसकी है पहचान।
तुमको तो वह सदा देखता
इसीलिए तो नहीं भौंकता।

बाहर से कोई जब भी आता
शेरू का उससे क्या नाता ?
भौंक,भौंक वह तुम्हें बताता
देखो मिट्ठू! ये कोई क्यों आता।

अनजाना कोई घर में आये
तब शेरू यदि चुप रह जाये,
तो कुछ अनर्थ हो सकता है
जो शेरू क्यों सह सकता है।

वह अपना कर्त्तव्य निभाता है
तुमको भी यही सिखाता है।
आलस छोड़ों कर्त्तव्य करो
यश,कीर्ति मिले शुभ-कार्य करो।
..................
बब्बा जी=दादा जी
शेरू=प्यारा पालतू कुत्ता
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    बाल कहानी-

       (1) ** शाकाहारी **

  
                       - डॉ आर बी भण्डारकर।
               हीरक पुर नामक एक गाँव था। गाँव के पूरब में यानी सामने की ओर एक बड़ा और घना जंगल था। इस जंगल में एक शेर साहब रहते थे और उनके पास ही एक बिल में एक चूहा जी भी रहते थे। गाँव के पश्चिम की ओर यानी गाँव के पीठ पीछे की दिशा समतल थी, यहाँ की मिट्टी उपजाऊ थी। इसलिए गाँव वाले इसी में खेती , बागवानी करते और पशु चराते थे। गाँव के उत्तर की ओर यानी गाँव के बाँये हाथ की तरफ छुटपुट जंगल यानी बीहड़ था;उसके पार एक बड़ा कस्बा था। गाँव के लोग इसी कस्बे से अपनी जरूरत के अनुसार सामानों की खरीद-फरोख्त करते थे। गाँव के दक्षिण में यानी गाँव के दाँये हाथ की ओर एक बड़ी नदी थी,जो पश्चिम से पूरब की ओर बहती थी। किसी को मालूम नहीं था कि नदी कहाँ से आती है और कहाँ जाती है।              
          पूरब के जंगल में रहने वाले शेर साहब और चूहा जी सहित सभी जानवर कुछ तो अपने आस-पास से ही,कुछ उत्तर के बीहड़ को पार कर पश्चिम वाले किसानों के खेतों से अपना भोजन जुटाते और दक्षिण में बहने वाली नदी से पानी पीते।
         गर्मियाँ आ गईं। किसानों के खेत सूने हो गए। शाकाहारी जानवर  घास,पेड़-पौधों की पत्तियों को खाकर अपना पेट भरते और अपनी खोहों में दुबक कर आराम फरमाते। माँसाहारी शेर साहब को बड़ी दिक्कत हुई, पहले उन्हें खेतों में चरते, बीहड़ और जंगल में घूमते हिरन आदि आसानी से मिल जाते जो उनका भोजन बनते, पर अब गर्मी के मारे यह जानवर उन्हें ढूँढे भी न मिलते।
         चूहा जी बड़े तेज; समय रहते उन्होंने किसानों की फसलों में से ढेर सारा अन्न लेकर अपने बिलों में इकट्ठा कर लिया था सो अब उन्हें भोजन की कोई चिंता नहीं; बिल में ही कुतर कुतर अन्न खाते और मौज करते।
        शेर साहब की समझ में अब आया कि भई शाकाहारी होने के तो बड़े फायदे हैं।
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