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अंतराष्ट्रीय वृद्ध दिवस 01 अक्टूबर पर - बुढापा श्रद्धा, सम्मान का धवल पुंज है - डॉ. सूर्यकांत मिश्रा

अंतराष्ट्रीय वृद्ध दिवस 01 अक्टूबर पर

   बुढापा श्रद्धा, सम्मान का धवल पुंज है

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   " कोई कहता है अच्छे कर्म करोगे तो,

     मरने के बाद स्वर्ग मिलेगा,

     मैं कहता हूं बूढ़े माँ- बाप की सेवा करोगे

     तो, जीते जी स्वर्ग मिलेगा।।"

                वृद्धावस्था हर प्राणी के जीवन की सच्चाई है। एक समय आता है जब हमें इस आयु वर्ग में जाना ही होता है । यह एक ऐसी अवस्था है जब मनुष्य का शरीर शिथिल होकर कमजोर पड़ जाता है ।शारीरिक चेतना पूरी तरह से कम करना बन्द कर देती हसि ।वृद्धजनों को अन्य लोगों पर निर्भर होना पड़ता है । इस स्थिति में यदि परिवार के सदस्यों से प्रेम और स्नेह के बदले उपेक्षा और उपहास मिले तो वृद्ध जीवन नरक लगने लगता है ।वास्तव में देखा जाए तो बुजुर्ग व्यक्ति घर- परिवार की मुख्य धुरी होते हैं । वे ही घर- परिवार की मजबूत रीढ़ होते हैं । घर के आंगन में उनकी उपस्थिति ही हमारी ताकत होती है ।अब हमारे देश की सांस्कृतिक विरासत में तेजी से यूरोपियन संस्कृति की छाया पड़ने से बुजुर्गों की अनदेखी आमबात हो गई है ।यह स्थिति परिवार और समाज के लिए अच्छी नही कही जा सकती। बुजुर्गों में बढ़ता अकेलापन ,उनके जीवन में बढ़ती नीरसता -इस बात का प्रमाण है कि हम दिनोंदिन उन्हें अपनी जिंदगी से दूर करते जा रहे हैं । इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि बुजुर्गों का " आशीर्वाद" प्राप्त करना हिन्दू धर्म में बड़े सौभाग्य की बात होने के साथ ही विजय का सूचक माना जाता है । यह एक मनोवैज्ञानिक तथ्य है कि अपने से बड़ों , बुजुर्गों, माता-पिता एवम गुरुजनों से आशीर्वाद मिलने से मनुष्य का मनोबल ऊंचाई पर पहुंच जाता है । जिन लोगों द्वारा बुजुर्गों का सम्मान नहीं किया जाता उनके लिए वाल्मीकि रामायण में कहा गया है---

      मातरं, पितरं विप्रमाचार्य चावमान्य वै,

      स पश्यति फलं तस्य प्रेत राजवंशगत:।।

अर्थात जो माता-पिता ,ब्राह्मण तथा गुरुदेव का सम्मान नहीं करता वह यमराज के वश में पड़कर पाप का भागी होता है ।

              बुढापा अथवा वृद्धावस्था उम्र का वह हिस्सा है जब पुराने पत्ते नई कोपलों को रास्ता देने की तैयारी शुरू कर देते हैं । उम्र के आखरी लम्हों में जिस्म और उससे जुड़ी दुनिया में सूरज के ढलने जैसा समां होता है ।प्रसिद्ध समाजशास्त्री डॉ. साहेबलाल कहते हैं कि बाजारवाद और उदारीकरण के बाद बदले हुए समाज में बुजुर्गों का सम्मान गिरा है । आज के उपभोक्तावादी समाज में बुजुर्ग "खोटा- सिक्का" समझे जाने लगे हैं । वे मानते हैं कि आपसी सामंजस्य हो तो आज भी बुजुर्ग परिवार और समाज के लिए "पारस-पत्थर" का काम कर सकते हैं ।बुजुर्गों के प्रति सम्मान का नजरिया रखना तथा अनुशासित होना पारिवारिक संगठन का मूल आधार है । पितरों को पूजने की प्रथा बड़ों के प्रति आस्था का ही परिणाम है । वास्तव में बुजुर्ग व्यक्तियों की परिवार में अनदेखी करना अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसा है । जिस डाल पर हम बैठे हैं अथवा जिस पेड़ के हम फल हैं , उसे ही काटने के समान है । वर्तमान समय में बुजुर्ग व्यक्तियों के साथ जिस उपेक्षा अथवा तिरस्कार से भरा व्यवहार किया जा रहा है , उसे करते समय परिवार के सदस्य यह भूल जाते हैं कि एक दिन उन्हें भी जीवन की इसी संध्या में आराम करना है। इसी सच्चाई को जानते हुए किसी ने बड़े ही सुंदर शब्दों में लिखा है--

   "मत करना नजर अंदाज माँ- बाप की

    तकलीफों को,

    ऐ मेरे प्यारे,जब ये बिछुड़े जाते हैं तो

     रेशम के तकिए पर भी नींद नहीं आती।।

              जीवन के इस अंतिम पड़ाव के मनोविज्ञान को यदि हम समझ लें तो यह उम्र भी आनंददायक बन सकती है । सबसे पहले इस उम्र के लोगों को यह मान लेना चाहिए कि वे बूढ़े नहीं बल्कि वृद्ध हैं। बड़ा सूक्ष्म सा अंतर है इन दोनों समानार्थी शब्दों में। बुढापा कष्टप्रद है तो वृद्धत्व सुख-शांति का सागर है,पूर्णता और तृप्ति की अनुभूति है। यही अनुभवों का आगाज है। वृद्ध वह है जिसने अनुभवों एवम विकास के चरम को पा लिया है । उसके ज्ञान, विज्ञान, विवेक तथा बुद्धि का दुनिया सम्मान करती है। उसे प्रेम करती है और फिर उसे सिर-आंखों पर बिठाती है । बुढापा और वृद्धावस्था दोनों जीवन की एक ही अवस्था की ओर संकेत करते हैं ,लेकिन दोनों के प्रति हमारा दृष्टिकोण अलग हो जाता है ।बुढापा एक तरह से जीवन का नरक है,जबकि वृद्धावस्था में तकलीफों के हर लक्षण के बावजूद व्यक्ति जीवन का विशेषज्ञ माना जाता है । अपने अनुभवों से ,अपनी सलाह से वह दूसरों के लिए अमूल्य बन जाता है । देखा जाए तो वृद्धावस्था को सृजनात्मकता से सम्बद्ध किया जा सकता है। जीवन का यह काल सुकून का होता है ,जिसमें कोई हस्तक्षेप करने वाला नहीं होता। वृद्ध व्यक्ति कार्य करे या न करे ,उन पर कोई दबाव नहीं होता । जीवन के इस समर में यदि कोई कर्ज ,पारिवारिक जिम्मेदारियां न हों तो आराम से नए सृजन की ओर ध्यान लगाया जा सकता है। वह सृजन लेखन अथवा किसी अन्य कला से संबंधित हो सकता है ।पशु-पक्षियों की सेवा ,बागवानी, सलाह केंद्र का संचालन करने के साथ ही साथ आज के युग की ऑन-लाइन सेवा में भी खुद को व्यस्त रखा जा सकता है । इतिहास गवाह है कि आज तक किसी भी देश के डॉक्टर,वकील, वैद्य अथवा लेखक बूढ़े नहीं हुए। कारण यह कि उनके काम करने के जुनून ने उन्हें शांत बैठने की ओर ध्यान ही नहीं लगाने दिया। वृद्ध माता-पिता का तिरस्कार करने वालों की स्मृति ताजा करने के लिए कुछ यूं कहा जा सकता है---

      "कभी दिया था आपको बचपन में

       अतुलनीय वात्सल्य,

       आज थोड़ा-थोड़ा कर्ज समझकर

       लौटा दो ।।"

                वृद्धावस्था अपने आप में इतनी नीरस और कटु नहीं है,जितना इसे मान लिया गया है या बना दिया गया है अथवा लोग समझ बैठते हैं। इसे जीवन का अभिशाप मान लेना गलत धारणा का ही प्रतीक है। बुढ़ापे को अतीत की स्मृतियों और भविष्य की चिंता का अखाड़ा नहीं बनाया जाना चाहिए। वृद्धावस्था का सबसे उत्तम एवम सार्थक उपयोग इसी में है कि इसे जन-कल्याणकारी कार्यों में लगाया जाए । यह उम्र जीवन का स्वर्णिम अवसर सिद्ध हो सकती है। बुढापा और यौवन की स्थिति का संबंध मनुष्य के मन से है , शरीर से नहीं । बुढ़ापे में भी कई लोग जवानों से अधिक फुर्तीले और सक्षम दिखाई पड़ते हैं ,तो कई लोग जवानी में ही वृद्धजनों से भी गए बीते हो जाया करते हैं । बुढापा जीवन- विद्या का परिपक्व फल है, जिसके रस की एक - एक बूंद असंख्य लोगों को नव- जीवन प्रदान कर सकती है। बुढापा --श्रद्धा, सम्मान  का धवल पुंज है ,जिसकी छाया में बैठकर नई पीढ़ी नई राह पा सकती है । थोड़ा बचपन की ओर झांककर याद करते हुए कहा जा सकता है--

    " क्यूँ बोझ हो जाते हैं, झुके हुए कंधे,   जिन पर चढ़कर कभी, मेला देखा करते थे।।

                        डॉ. सूर्यकांत मिश्रा

             न्यू खंडेलवाल कॉलोनी,ममता नगर

             प्रिंसेस प्लैटिनम,हाउस नंबर 05,

             राजनांदगाँव, (छ. ग.)

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