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आज आवश्यकता है गांधी के सैनिकों की और गांधी के प्रहरियों की - डॉ. हंसा व्यास


     यह सुनकर और पढ़कर अजीब सा लग सकता हैं अहिंसा का पुजारी और रखता हैं सैनिक और प्रहरी। सच मायने में तो आज देश को ही नहीं संपूर्ण विश्व कि इन सैनिकों और प्रहरियों की जरूरत हैं। गांधी के कौन से सैनिक हैं जिन्हें आज इस देश में और हर घर घर में रखना जरूरी हैं। हर घर घर में उन्हें शिक्षित करना जरूरी हैं। देखते हैं उन प्रहरियों को जिन्हें रक्षा की जिम्मेदारी देना बहुत जरूरी है। हम बात करते हैं सैनिकों की गांधी जी हमेशा प्रेम सद्भाव, भाईचारा, विश्वास और सत्य अहिंसा की बात करते थे। आज के इस युग में और उपभोक्तावादी संस्कृति ने हमारे समाज से गांधी के सैनिकों हत्या कर दी हैं। प्रेम परिवार में ही नहीं बचा तो समाज में कहां से होगा और जब समाज में नहीं होगा तो देश में कैसे होगा और देश में नहीं ंतो विश्व में कैसे होगा। घर से लेकर वैश्विक धरातल पर यदि हम बात करें तो आज लोगों में आपस में विश्वास खत्म हो गया, व्यक्ति निजी और व्यक्तिगत स्वार्थों में लगा हुआ है। स्वार्थ की अंधी दौड़ ऐसी शुरू हुई कि उसे केवल और केवल स्वयं दिखाई देता है।

स्वयं केंद्रित व्यक्ति ने आज समाज के रिश्तो के ताने-बाने को खत्म कर दिया केंद्रित व्यक्ति ने केवल और केवल अपने लिए अपने विकास के लिए अपनी भौतिक सुख-सुविधाओं के लिए ऐसे ताने-बाने बुने कि समाज केवल और केवल भौतिक वस्तुओं की आरामगाह बन गया। घर में रिश्तों ने मोबाइल को अपना आत्मीय बना लिया। वह यह भी भूल गया कि मोबाइल में डाली गई व्यक्तिगत जानकारी घर ही नहीं देश की सीमाओं को तोड़कर सार्वजनिक हो गई। परिवार के आत्मीय सदस्यों से उसके रिश्ते टेक्नो फ्रेन्डली हो गये। पूंजी की अंधी दौड़ ने सुनियोजित तरीके से भारत में सबसे पहले संयुक्त परिवार का स्वरूप ध्वस्त किया फिर बच्चों से दूरी बनवाई और अब विवाह के पवित्र बंधन को लिवइन रिलेशनशिप में बदल कर पारिवारिक धरातल के टुकड़े टुकड़े कर दिये। इसलिए गांधी के प्रेम रूपी सिपाही की देश को ही नहीं विश्व को सख्त जरूरत हैं। साथियों जब रिश्तों में प्रेम होगा, मर्यादा होगी, गरिमा होगी, अनुशासन होगा तो विश्वास और भाईचारा होगा। गांधी अपने इन सिपाहियों के बिना घर, समाज देश और विश्व की बात ही नहीं करते। गांधी के इन सैनिकों को और उनके अस्त्र-शस्त्र को न तो हम ऑनलाइन खरीद सकते हैं और न ही खुले बाजार में। इनके लिए तो प्रायोगिक बुनियादी शिक्षा की जरूरत हैं। हाथ में चाक, डस्टर लिए शिक्षक की जरूरत है, भागमभाग भरी जिन्दगी में जिन्दा रहने के लिए मशीन नहीं भावनात्मक ऑक्सीजन की जरूरत है।


     आज इस गरिमापूर्ण भाव के सैनिक की अनुपस्थिति के कारण सब अकेले हैं। बच्चे, माता-पिता, पति-पत्नि सब ढूंढ रहे हैं घर की देहरी को छोड़कर किसी ओर कंधा। समाज में हनी ट्रेप की बात करे, जिस्म फरोशी की बात करे या अभी आई नई पिक्चर ड्रीम गर्ल की बात करें। क्या ये सब यथार्थ में भारतीय जीवन पद्धति का जीवन दर्शन है। एक स्वर में इसका जवाब होगा नहीं केवल नहीं। यह वही भारत है जहाँ मोहल्ले, समाज, गाँव की बेटी-बहू सबकी बेटी-बहू होती थी इसलिए वह सुरक्षित थी पर जेब में रखे छोटे से परदे की नीली रोशनी ने मस्तिष्क के सभी न्यूरान को जहरीला बना दिया और आँखों में मोतियाबिन्द और कांचबिंद का परदा डॉल दिया। क्या पिता क्या दादा, क्या नाना, सबसे हमारी बच्ची असुरक्षित हो गई। इसलिए गांधी के हर उस सैनिक की देश को जरूरत है जो प्रेम, सद्भाव, अनुशासन, मर्यादा, भाईचारे के साथ सत्य-अहिंसा जैसे अस्त्र-शस्त्र को लेकर समाज की रक्षा करे। विश्व बंधुत्व का भाव शास्त्र से निकल कर हकीकत बने।
     गाँधी अपनी सेना के लिए हमेशा दो प्रहरी साथ लेकर चलते थे। साथियों यदि ये दो प्रहरी उनके साथ नहीं होते तो सत्तर वर्ष के शरीर में वो ताकत नहीं होती कि वो अंग्रेजों से लोहा ले पाते। उनके ये प्रहरी थे जागरूकता और सावधान। यदि जागरूकता और सावधान सदैव हमारे साथ रहें तो दुर्घटना कभी नहीं घट सकती। गांधी जी जिदंगी भर राजनीति से जुड़े रहें लेकिन फिर भी उन्हें जॉर्ज वाशिंगटन, अब्राहम लिंकन, जोजफ मैजिनी, डीवेलेरा आदि विश्वख्यित राजनीतिज्ञों की पंक्ति में नहीं बिठाया जा सकता क्योंकि मूलतया वे गौतम बुद्ध ज्ञानेश्वर, कबीर आदि धर्मात्माओं के रसायन से बने थे। आत्मानुभूमि, प्रभु-दर्शन, सत्य की खोज को उन्होंने अपना अंतिम लक्ष्य बनाया था। राजनीति को वे अपनी अध्यात्म साधना और सत्य के परीक्षणों का एक अंग मानते थे। इसीलिए राजनीतिक आन्दोलन में उन्होंने तत्वनिष्ठा ओर साधन-शुचिता पर अधिक बल दिया। गीता, बाइबिल, तुलसी, रामायण आदि धर्मग्रन्थों के संस्कार उनके दिल में गहरे बैठ गये थे, तथापि किसी भी प्राचीन और मध्ययुगीन संप्रदायों की चहारदीवारी में उन्होंने अपनी धर्म-भावनाओं को कैद नहीं होने दिया, बल्कि धर्म-विचारों में आधुनिक भौतिकतावादी उदारता की छाप यदा-कदा दिखाई पड़ती हैं।


     आदमी कितना ही बड़ा क्यों न हो, वह अपनी कल्पना को यथार्थ रूप से समविष्ट में पूर्णरूपेण रोपित नहीं कर पाता। समष्टि जीवन की अपनी एक गति होती हैं। समाज के विभिन्न तबकों के हित सम्बन्ध, चित्तवृति और विभिन्न समस्याओं के सम्बन्ध में उनकी भूमिका आदि से वह नियंत्रित होती है। गांधी जी ने एक विशिष्ट कालखंड में भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन का नेतृत्व किया, लेकिन आजादी के बाद के अपेक्षित भारत और मौजूदा भारत में बहुत बड़ा अन्तर आ गया हैं। गांधी जी के विचारों का मूल्यमापन करते समय इस अन्तर की उपेक्षा नहीं की जानी चाहिए, तथापि इस पराजय के लिए गांधी जी के नेतृत्व और विचारधारा के साथ ही भारतीय समाज का विशिष्ट गठन, राष्ट्रसंघ और संघटन और कार्यपद्धति तथा भारत जैसे पिछड़े देश में मौजूद संसदीय राजनीति की सीमा-रेखा किस हद तक जिम्मेदार है, इस बात का जायजा लिया जाना चाहिए, तभी यह विश्लेषण सार्थक और संतुलित हो सकेगा।


गांधी जी ने सदैव सत्य के प्रयोग पर जोर दिया है, वे एक जगह लिखते है कि ‘‘सत्य की अपनी खोज में‘‘, मैं अनेक विचारों को त्यागता गया हूँ और नयी-नयी बातें सीखता रहा हूं। हालॅंकि मैं अब बू़ढ़ा हो चला हूं, पर मुझे यह अनुभव नहीं होता कि मेरा आंतरिक विकास रूक गया है अथवा मेरे पार्थिव शरीर के अवसान के साथ मेरी आंतरिक वृद्धि रूक जाएगी।
     मेरा सरोकार सिर्फ इस बात से है कि मैं अपने ईश्वर अर्थात सत्य, के आदेश का प्रतिक्षण पालन करने के लिए तत्पर रहूं, और इसलिए यदि किसी को मेरी लिखी किन्हीं दो बातो में असंगति दिखायी दे, और उसे फिर भी मेरी विवेकशीलता में विश्वास हो, तो उसे उसी विषय पर मेरी बात की तारीख में लिखी बात को मेरा मंतव्य मानना चाहिए। इसी लिए सत्य सदैव गतिशील रहता है और ऐसे गतिशील सैनिक का समाज में रहना जरूरी है।

गांधी जी ने जिन निष्ठाओं को संयोजा था, उनका नयी, बदलती हुई परिस्थितियो की पृष्ठभूमि पर नूतन पद्धति से मूल्यांकन करना होगा। उनके सत्याग्रही जीवनदर्शन अप्रकट एवं अलक्षित पहलुओं का उद्घाटन कर गांधी जी की जीवनदृष्टि के परिप्रेक्ष्य के विभिन्न पहलुओं से उसका समुचित तालमेल भी बिठाना होगा। उनकी मृत्यु के बाद भारतीय सामाजिक जीवन में उत्पन्न नयी समस्याओं के बारे में पहले यह पता लगाना होगा कि कौन-सी भूमिका उनकी तत्व प्रणाली के अनुरूप होगी, उसके बाद ही गांधी जी के सत्याग्राही जीवन-प्रणाली की सामर्थ्य, आधुनिक भारतीय तत्व-चिन्तन के क्षेत्र में उसका योगदान और उसकी सीमाओं का स्पष्ट एहसास हो सकेगा।

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डॉ. हंसा व्यास
प्रा. इतिहास विभाग

hansa.vyas@rediffmail.com

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