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कविता डॉ॰बल्देव स्मृति शेष (पुण्य तिथि 26 सितंबर हेतु विशेष)

sao ji

डॉ० बल्देव स्मृति शेष
( साहित्यकार स्व० डॉ बल्देव की कविताओं के स्मरण के साथ उन्हें आदरांजलि )

स्मृतियाँ यूं ही  नहीं आ जातीं अचानक
इसमें छुपा होता है मानव के भीतर का चित्रकार,
जो  बनाता है जीवन के “लैंड स्केप”
रचता है जीवन के गीत,
खोलता है ज्ञान की “चाभी” से मूढ़ता के ताले। 
मिट्टी  में मिल जाने के  लिए बनाता है
“चेहरा माटी का”,
एक “शून्य” में भीतर का
“संगीत” जगाने के लिए
उसमें छुपी होती हैं
जीवन  की विभिन्न कलाएं
उसके “समय  का केंचुल”
जो  साल दर साल
अपने आप को नया  करते जाता है,
ढहा जाता है उन “शीशे की दीवारों” को,
जो खींचीं होती है आपस में।
स्मृतियाँ  दे जाती है “पंचतंत्र” की भाँति सीख
समुद्र  सा विशाल हृदय  रखने की सीख,
“पहाड़” से भी ऊंचे हों “स्वप्निल” इरादे।
स्मृतियाँ ऐसी ही होती हैं, जो आ जातीहैं
साहित्य के देव डॉ बल्देव
के माध्यम से और हमें दे जातीं है
जमाने भर की सीख
पावन कर जाती है और साहित्य  की धारा को
और “जाते -जाते” समा जाती हैं
केलो नदी की धारा मे,
पुनः “आषाढ़ सा प्रथम दिन” का बोध कराने के लिए।
स्मृतियाँ यूं ही नहीं आ जातीं अचानक।

- दयानन्द अवस्थी

डॉ॰ बल्देव स्मृति शेष

( साहित्यकार स्व॰ डॉ बल्देव की कविताओं के स्मरण के साथ उन्हें आदरांजलि )

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