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त्रिशला पाठक की कविताएँ

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बहुत कुछ बोलना बोलना है तुमसे
पर छुपाना उससे ज्यादा है
शायद इसीलिए जो पेज बनाई थी तुम्हारे सामने बोलने को
वो पेज़ पूरा ही सादा है


(2) अगर वो जज़्बाती थे तो मैं भी नहीं सयानी थी
अगर वो सूरजमुखी थे तो हाँ मैं भी रातरानी थी
शायद इसीलिए हमारी अधूरी कहानी थी
क्योंकि वो आँखों के पानी थे और मैं बरसातों की पानी थी

(3) मैं चीखूं - चिल्लाऊं तू ऐसे सवाल किया कर
मेरा दिल भर जाए ऐसी नौबत बार बार किया कर
पर मैं सोऊं जागूँ तेरे ही नशे में
तू मुझे शराब के नशे सा प्यार किया कर

    संघर्ष

उठ गए कदम अब संघर्ष के वास्ते
मुसाफ़िर चलते जाना अब इसी रास्ते
कुछ कण भी  मिलेंगे कुछ कंकड़ भी मिलेंगे
शंखों वजन पत्थर भी मिलेंगे
चुपचाप इनसे तुम यूँ मुकर जाना
मानो जैसे वो कोई पराया ख़जाना
उन्हें शक भी मत कराना
की तू तशरीफ़ ला रहा है
इसी मोड़ से गुजर अपने मंज़िल जा रहा है
तेरे सफ़र की बस यही नीति हो
न विरह की गीत हो न कोई रस प्रीत हो
खोजना तसल्ली इत्मीनान से क्या होगा
जो नहीं मिला अभी तक उस सम्मान से क्या होगा
अपने सिग्नेचर को ऑटोग्राफ़ में बदल कर तो देख
जो लगता था अपमान उस अपमान से क्या होगा         

अभिलाषा

जब हो जाऊँगी आज़ाद ।
सिर पर रख जिगिषा की ताज ।।
साध्वी न्याय सत्य साकार ।
लेकर बल सहानुभूति अपार ।।
बदल दूंगी अनिष्ट समाज ।
यही रहेगी मेरी आवाज़ ।।।
कर समर्पण लोक सेवा में सार ।
उर में अवलोकित सत्  विचार ।।
जो अवैध करे कन्या पर अत्याचार ।
मिटा दूंगी उसका दनुज रूपी संसार ।।
यही रहेगी मेरी आवाज़  ।।।
जैसे मोती जड़ी ओस की डार ।I
हिला जाती चुप- चाप बयार ।।
जिसे समझते हो तुम अभिशाप ।
वो जगत ज्वालाओं की है आशीर्वाद ।।
यही रहेगी मेरी आवाज़।।।

        आज फिर से...!!

आज फिर से एक बार दिल पर वार हुआ है..
दिल टूटा और टुकड़े चार हुआ है...!!!
होठों पर क्रूरता हृदय में आस भरा है ..
महफ़िल फ़ना होने का एक निराश हरा है..!
मन पुकारता उन्हें बस होठों तक ही...
लफ़्ज़ों से उनकी जुदाई हुई..!
आँखें कई दफा गीली भी हो गई..
पर नजर में वही अंगड़ाई भरी. .!
बुलाने का मन तो बार बार हुआ है..
आज फिर एक बार दिल पर वार हुआ है...
दिल टूटा और दुकड़े चार हुआ है...!!!
दिल चाहता था जाकर उनसे मिले...
क़दम उठ भी जाता पर जमी थे हिले..!
दरवाजे पे उनके दर्द-ए-ख़ौफ़ की गहराई..
अपना आप रखकर भी पार न कर पायी..!
आखिर बेचती भी तो कैसे वजूदें वहाँ...
एक वही ही तो है मेरा अपना जहाँ...!
बस अस्तित्व के जीत में ये हार हुआ है....
आज फिर एक बार दिल पर वार हुआ है....
दिल टूटा और टुकड़े चार हुआ है...!!!
वहीं जब आ जाते थे  सामने वो मेरे..
ज़िस्म बेक़ाबू होता और प्यार भी हरे..!
पर उनका मग़रूर चेहरा सिकन भी नही...
रिश्ता खो देने का थोड़ा गम भी नही..!
फिर भी दिल बेवफ़ा ख़ुद को दगा दे रहा..
उनके ही प्यार में टूट कर वफ़ा कर रहा...!
उसने टकराने का नौबत हज़ारो बार हुआ है...
आज फिर से एक बार दिल पर वार हुआ है...
दिल टूटा और टुकड़े चार हुआ है...!!!
जुबाँ खुलने ही न देता कम्बख़त स्वाभिमान..
न बुलाने के वादे का भी इक ईमान...!
जब दर पे रोती रही मैं वो खड़े बेज़ान..
नसीहत भी नही तनिक देते मेरबान..!
बिखर कर मैं उन्हें प्यार देती रही ...
ठुकराते रहे वो और मैं रोती रही...!
शायद उन आँसू से ही उनको प्यार हुआ है...
आज फिर एक बार दिल पर वार हुआ है...
दिल टूटा और टुकड़े चार हुआ है...!!!!!!!

                                      

आज जिन्दादिली का सवालात है


तेरी किस्मत की कैसी अजीब ये हालात है
अब तू ही बता
जाना है कहाँ
क्या तेरी कोई जहाँ में कायनात है
तू इतनी मशहूर है
फिर ख़ुद में क्यूँ चूर है
क्या ज़िल्लत से इतनी तू मग़रूर है
तो आईने से पूछ...2
तेरा क्या क़सूर है
ख़ामोश सूरत का आज कैसा ये नूर है
तू क्यूँ इतनी हारी ...2
क्यूँ बनी है बेचारी
तू उठाई थी जब हौसलों की क़दम
क्या यही पाने की थी तेरी बेक़रारी
सोच..2कभी प्याले भर तेल का दीप थी जलाई
आज क्यूँ उनको तोड़ तू की बेवफ़ाई
क्या परवाह नही तुझे अपने अंदर के इंसान का
बस धधक रही एक ही लव
खौफ़ी जिस्मी शैतान का
जब शहादत से यहाँ कुछ नहीं होता
तो महफूज़ बैठ कर तू क्या कर लेगी
अगर जज़्बा ज़िद बना ही ली है तो
एक दिन तू भी रक्त और जिस्म का खेल खेलेगी
अरे तोड़ अब चुप्पी
छोड़ जमाने का सुनना
लिख दे क़लम से
मुनासिब हुआ जो न कहना....

1 टिप्पणियाँ

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