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भारतीय संस्कृति का सांस्कृतिक प्रवाह - डॉ. हंसा व्यास

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निष्काम भाव से मनुष्य का पूर्णता के लिए सतत प्रयत्न ही संस्कृति है। और संस्कृति का स्वरूप मानवता के विकास का उच्चतम स्तर हैं। कहा गया है-

''सम्यक करणं संस्कृति''

प्रकृति की दी हुई कुदरती चीज को संवार कर, तराश कर, संभाल कर श्रेष्ठ बनाना ही संस्कृति हैं। बहुमूल्य हीरे, मोती, माणिक आदि को शुद्ध करना पड़ता है, उन्हें तराशना पड़ता हैं तब उनका सौन्दर्य निखर उठता और उनकी कीमत बढ़ जाती है। इसी प्रकार सुसंस्कृत होने से मानव का अंतर और वाह्य जीवन सुंदर हो जाता है।

अंतरात्मा में छिपे हुए सद्भाव को दूसरों के साथ अधिकाधिक विकसित एवं चरितार्थ करना भारतीय संस्कृति का मूल तत्व हैं। भारतीय संस्कृति ने कभी मानव को मानव से घृणा करना नहीं सिखाया। उसने सदैव मानवीय संवेदनाओं का पाठ ही पढ़ाया हैं। भारतीय संस्कृति कहती हैं-

तीर्थानां हृदयं तीर्थं शुचीनां हृदयं शुचिः

(महाभारत शान्ति पर्व 193/18)


अथार्थ सब तीर्थों में हृदय (अंतरात्मा) ही परमतीर्थं हैं। सब पवित्रताओं में अंतरात्मा की पवित्रता ही मुख्य हैं। इसलिये सदैव अन्तरआत्मा की आवाज पर जोर दिया जाता है।

भारतीय संस्कृति संस्कारों का अक्षय कोश हैं जो विभिन्न रूपों में परिवर्तित होकर भी नष्ट नहीं होती हैं। भारतीय संस्कृति एक आध्यात्मिक संस्कृति हैं। तभी तो हमारे उपनिषद कहते हैं-

असतो मा सदगमय

तमसो मा ज्योर्तिगमय

मृत्युर्मा अमृतम गमय!

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जो संस्कृति अन्धकार से प्रकाश की और ले जाये, जो अज्ञान से ज्ञान की ओर ले जाये, जो मृत्यु से अमरता की ओर ले जाये उस भारतीय संस्कृति के सांस्कृतिक प्रवाह में कभी अवरोध आ ही नहीं सकता। क्योंकि उस भारतीय संस्कृति के एक एक संस्कार में युगानुरूप चलने की क्षमता हैं। हम चाहे दया, करूणा, ममता की बात करें, चाहे वसुधैवं कुटुम्बकम की बात करें।

वैश्विक धरातल पर तो आज भूमण्डली करण की बात की जा रही है पर भारतीय संस्कृति की तो मूल सनातनी विचारधारा ही वसुधैव कुटुम्बकम की है।

अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्।

उदार चरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्।।

(महोपनिषद्, अध्याय-4 श्लोक 71)

वृहदारण्यक उननिषद सबके कल्याण की बात करते हैं-

सर्वें भवन्तु सुखीनः सर्वे सन्तु निरामयाः

सर्वें भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःख भाग भवेत्

अर्थात् सभी सुखी हों, सभी निरोगी हों, सभी भद्रता का दर्शन करें और कोई भी दुखी न हो, दुख का भागी ना हो।

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विश्व संस्कृति के सन्दर्भ में भारतीय संस्कृति पर विचार करते समय एक बात विशेष ध्यान देने योग्य यह हैं कि भारतीय जन जीवन के कुछ आदर्श ऐसे हैं, जो विश्व के किसी भी जातीय इतिहास में देखने को नहीं मिलते हैं। वे आदर्श हैं- सहिष्णुता, उदारता, महानता बार-बार के बाहरी तथा भीतरी युद्धों तथा शासन सत्ता के परिवर्तनों के बावजूद उसकी सांस्कृतिक परम्परा अवरूद्ध नहीं हुई अपितु विभिन्न धर्मों और जातियों के विश्वासों को अपने भीतर समाहित कर उसने अपने को परिपुष्ट और समृद्ध किया है।

धर्म और दर्शन के धरातल पर भारत ने अध्यात्म के सहारे असमानताओं, विभिन्नताओं के बीच एकता, समन्वय का समाधान स्वयं ही खोज निकाला। कदचित, पूजा, भक्ति, श्रद्धा, उपसर्ग, उदारता और सहिष्णुता की सहज प्रवृत्ति के कारण ही भारतवासियों का आत्मबल इतिहास में विपरीत परिस्थितियों के बीच भी बना रहा। झेलम, चीनाब, व्यास नदियों ने अपना विश्वास नहीं खोया। बैक्ट्रीयन, पर्शियन, खुरासानी, फारसी, यूनानी, अफगानी, तुर्क, अरेबियन उच्च, पुर्तगाली, फ्रंासीसी, अंग्रेज आये और चले गये पर भारतीय वसुन्धरा पर वेदों की ऋचाओं की ध्वनियाँ कभी मन्द नहीं हुई।

भारतीय संस्कृति के समन्वयात्मक दृष्टिकोण ने ही उसे सबल बनाया। अनेक प्रकार की भाषाओं, रीति रिवाजों, और परम्पराओं के बीच समन्वय स्थापित कर भारतीय संस्कृति ने उच्च आदर्श स्थापित किया है।

सोचिये जो संस्कृति प्राणि मात्र के कल्याण की कामना करती हो उसका प्रवाह कैसे बाधित हो सकता है।

हाँ ऊपरी तौर पर कुछ वाह्य कारक व्यवधान उत्पन्न जरूर कर सकते हैं, बहाव धीमा हो सकता पर रूक नहीं सकता। भौतिकता वादी संस्कृति और पाश्चात्य संस्कृति का प्रभाव ऊपरी तौर पर प्रदूषित अवश्य कर सकता पर जड़ों पर कुठाराघात नहीं कर सकता। यदि ऐसा होता तो प्रतिवर्ष मनाई जाने वाली हरतालिका तीज इतनी आस्था और उत्साह से जीन्स टाप पहनने वाली हमारी बेटी-बहू नहीं मनाती। हाँ आज गणेश चतुर्थी का उत्सव का स्वरूप बदल गया पर गणेश जी का रूप नहीं बदला।

''हमेशा आलोचना से काम नहीं चलता''

कुंभ, सिंहस्थ की परम्परा अनवरत जारी हैं। नर्मदा परिक्रमा, रथ यात्रा, पंचकोशी यात्रा, गोवर्धन परिक्रमा, ऊंकार पर्वत परिक्रमा, मानसरोवर यात्रा की समृद्ध परम्परा आज भी जारी है।

सांस्कृतिक मानव शास्त्र की बात करें, भौगोलिक प्रवाह की बात करें, भारतीय पर्व, त्यौहारों, उत्सवों की बात करें सब कुछ पूरी आस्था और उल्लास के साथ जनमानस में विद्यमान है। स्वरूप बदला है पर आत्मा नहीं।

''क्योंकि आत्मा अजर है अमर है''

जिस भूमि का इतिहास वेदों में मिलता है

जहाँ सदियों पहले पुष्पक विमान उड़ता है

जहाँ ब्रह्यास्त्र के नाम पर परमाणु बम चले थे

जहाँ श्लोकों में विज्ञान के आधार मिले थे

जहाँ योग का जन्म हुआ था

जहाँ भाषा का उद्गम हुआ था

उस भारत के विविध आयामों की यात्रा अनवरत जारी रहे।

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डॉ. हंसा व्यास

प्राध्यापक इतिहास

शा. नर्मदा महाविद्यालय होशंगाबाद

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