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स्मरण : आलोचना में विनम्र उपस्थिति के साथ डा.बलदेव - विनोद साव

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यह वर्ष १९९३ के आसपास की बात होगी जब रायगढ़ में व्यंग्यकार कस्तूरी दिनेश ने अपने व्यंग्य-संग्रह ‘फ़ोकट का चन्दन लगा मेरे नंदन’ का विमोचन करवाया था और हम सब व्यंग्यकारों को आमंत्रित किया था. कार्यक्रम के मुख्य अतिथि कस्तूरी दिनेश के मित्र प्रसिद्ध पत्रकार एवं लेखक ललित सुरजन थे. व्यंग्यकार लतीफ़ घोंघी, त्रिभुवन पांडेय और प्रभाकर चौबे थे. वहां कवि आनंदी सहाय शुक्ल जी को पहली बार देखा और सुना था तब अपनी प्रसिद्ध कविता ‘बारहमासी’ का उन्होंने वहां पाठ किया था. उसके बाद उनका सम्मान हुआ. विमोचन कार्यक्रम संपन्न हुआ और हम सब रचनाकारों ने अपनी व्यंग्य रचनाओं का पाठ किया. रात में भोजन करने के बाद सारे अतिथि अपने अपने साधनों से लौट गए थे पर मैं और विनोद शंकर शुक्ल रुक गए थे दूसरे दिन की ट्रेन पकड़ने के लिए.

हम सुबह रायगढ़ स्टेशन पहुंचे सामने जे.डी पैसेंजर खड़ी थी उसमें बैठ गए इस विश्वास के साथ कि हमें बिलासपुर में छत्तीसगढ़ एक्सप्रेस मिल जाएगी रायपुर और दुर्ग जाने के लिए. ट्रेन में बैठे तो समय काटने के लिए कल संपन्न हुए कार्यक्रम की हम समीक्षा कर रहे थे तब हमारी बातचीत को सुनकर हमारे सामने बैठे हुए सज्जन ने मुस्कुराते हुए धीरे से हमें पूछा कि ‘आप लोग साहित्यकार हैं क्या?’ इससे हम लोगों को बड़ी प्रसन्नता हुई क्योंकि ट्रेन बस में साहित्यकार को पूछने वाले कम मिलते हैं.

प्रसन्न होकर विनोद शंकर शुक्ल ने कहा कि ‘हाँ!’

तब उन्होंने अपना परिचय दिया कि ‘मैं डा.बलदेव हूं.’

शुक्ल जी ने बताया कि ‘मैं विनोद शंकर शुक्ल हूं और ये विनोद साव हैं. हम लोग व्यंग्य लिखते हैं और कल कस्तूरी दिनेश के कार्यक्रम में यहाँ आए हुए थे.’

डा.बलदेव ने तब अपनी व्यस्तता के कारण उस कार्यक्रम में नहीं पहुँच पाना बताया था. विनोद शंकर जी ने उनसे कहा कि ‘बलदेव जी मैं आपको जानता हूं. आप अच्छे कला समीक्षक हैं.’ बलदेव जी के चेहरे पर खिल उठने वाली वही मुस्कान थी जो बाद में उनकी चिर-परिचित मुस्कान बन गई थी. उनकी मध्यम कदकाठी, सांवले रंग, सिर के फुरफुरे बालों और आंखों में झांकने वाली सहज आत्मीयता के बीच वह मुस्कान खिल उठती थी.

अब वे भी हमारी बातों में रस लेने लग गए थे और हम उनकी. प्रारंभिक परिचय में विनोदशंकर शुक्ल को उन्होंने कवि विनोद कुमार शुक्ल समझा था .. तब ऐसा विनोदशंकर जी के साथ साहित्य समारोहों में अक्सर हो जाता था. उन्हें संचालक भी प्रस्तुत करते समय कई बार विनोद कुमार शुक्ल कह उठते थे. कभी कभार विनोद कुमार शुक्ल को कोई विनोद शंकर शुक्ल कह उठता था तब उन्हें भी हिसाब बराबरी कर लेने का मौका मिल जाता था. इससे उन्हें सुकून मिलता था.

बलदेव जी को जब मेरे नाम में साव दिखा तब उन्होंने बताया कि ‘मैं भी साव हूं.’ परिचय के बाद यह जानकर कि मैं दुर्ग के वयोवृद्ध साहित्यकार व समाजसेवी पतिराम साव जी का पोता हूं तब उन्हें आत्मीय ख़ुशी हुई और कहा कि ‘पतिराम साव गुरूजी हमारे समाज के बड़े मुखिया और मार्गदर्शक रहे हैं.’ अब वे मुझसे ज्यादा अपनेपन के साथ बाते करने लग गए थे.

जब मैंने उन्हें पूछ दिया कि ‘आपकी विधा क्या है?’ उन्होंने कहा कि ‘आलोचना’. तब मैंने अपने अल्पज्ञान में पूछ दिया कि ‘आलोचना के अतिरिक आपकी कोई विधा होगी?’ तब मेरे भोलेपन पर मुस्कुराते हुए वे बोल उठे कि ‘अरे! आप आलोचना को विधा नहीं मानते क्या? यह भी साहित्य की एक विधा है.’ तब एक लेखक होने की प्रक्रिया में मुझे अपने संकुचित ज्ञान पर हंसी आ गई कि मैं आलोचना को एक विधा नहीं मान रहा हूं जैसे कि आलोचक व्यंग्य को एक विधा नहीं मानते.

ट्रेन की धीमी गति की तरह डा.बलदेव हमें अपने टिप्स देते रहे जिससे हम लोगों में साहित्यिक समझ बढ़ती जाती. बलदेव जी अपनी व्याख्या में ‘लाउड’ नहीं होते थे. वे आहिस्ते से अपनी उपस्थिति दर्ज करते थे. उनके व्यवहार और आलोचना दृष्टि में आक्रामकता नहीं थी. वे प्रमोद वर्मा से प्रभावित थे और उनके बारे में उन्होंने कहा कि ‘प्रमोद वर्मा जी आलोचना में आचार्य की पदवी प्राप्त कर चुके हैं.’ भिलाई बख्शी सृजन पीठ के अध्यक्ष के रूप में जब प्रमोद जी भिलाई में थे तब उन्होंने भी डा. बलदेव के काम की सराहना की थी. प्रमोद जी और बलदेव जी दोनों रायगढ़ से जुड़े हुए भी थे और उनमें एक समानता यह दिखी थी कि उन दोनों की आलोचना में ‘क्लैरिटी’ (स्पष्टता) थी. दूसरी एक मज़ेदार समानता यह थी कि प्रमोद जी व्यंग्यकार शरद जोशी के मित्र रहे और अशोक वाजपेयी से दूरी बनाए रखे. बलदेव जी ने भी एक बार हम लोगों के बीच यह मज़ेदार टिप्पणी की थी कि ‘अशोक वाजपेयी के दो बड़े विरोधी थे एक शरद जोशी और दूसरा मैं.’

मंचीय कवियों पर भी टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा था कि ‘छत्तीसगढ़ के मंचीय कवियों में लक्ष्मण मस्तुरिया और रामेश्वर वैष्णव अपनी विशेष छाप छोड़ते हैं.’

बलदेव जी के साथ इस सरस बातचीत में रायगढ़ से बिलासपुर तक की यात्रा आसानी से कट गई थी. मैं और विनोदशंकर जी जे.डी. से उतरकर छत्तीसगढ़ एक्सप्रेस में बैठ गए और डा.बलदेव बिलासपुर ही उतर गए थे.

एक लम्बे अरसे बाद वर्ष २००९ में बलदेव जी से दूसरी मुलाकात तब हुई जब हमने दुर्ग में ‘समाज रत्न पतिराम साव सम्मान’ से अलंकृत करने के लिए उन्हें आमंत्रित किया था. दादा जी पतिराम साव के नाम से हम लोग हर साल एक साहित्यकार, एक शिक्षक या समाजसेवी को समारोह में सम्मान अलंकरण दिया करते थे. यह आयोजन लगभग पंद्रह वर्षों तक चला.

बलदेव जी हम लोगों से मिलने के उत्साह में एक दिन पहले आ गए थे. मैं उन्हें अपनी कार में लेने स्टेशन गया. वे रात पास में ही हमारे छोटे भाई संतोष के घर में रुके थे. दूसरे दिन सबेरे हमारे चाचा जी प्रो.ललित कुमार साव के घर वे नाश्ते पर आमंत्रित हुए. दोपहर का भोजन हमारे घर किया तब पत्नी चन्द्रा की पाक कला को उन्होंने न केवल सराहा बल्कि तन्मयता से स्वाद लेकर उसके बनाए भोजन को खाया भी.

दूसरे दिन दुर्ग के भव्य आयोजन में उनके साथ रायपुर के प्राध्यापक डा. सुखदेव साहू ‘सरस’ को भी सम्मानित किया गया था. सम्मान समारोह के मुख्य अतिथि छत्तीसगढ़ प्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मलेन के अध्यक्ष ललित सुरजन थे और तत्कालीन विधायक ताम्रध्वज साहू ने अध्यक्षता की थी. सम्मान कार्यक्रम के बाद वे ललित जी के साथ ही रायपुर चले गए थे अपने साहित्यिक मित्र पुलिस महाधिवक्ता विश्वरंजन से मिलने. वही उनसे अंतिम मुलाकात थी.

फिर एक अरसे बाद फेसबुक में उनके पुत्र बसंत साव की यह पोस्ट दिखाई दी कि ‘डा.बलदेव नहीं रहे.’ इस तरह इस कला समीक्षक की मौन उपस्थिति उनकी मौन अनुपस्थिति में तब्दील हो गई थी. पर हमारी स्मृतियों में उनकी मध्यम कदकाठी, सांवले रंग, सिर के फुरफुरे बालों और आंखों में झांकने वाली सहज आत्मीयता के बीच उनकी वह मुस्कान अब भी खिल उठती है.

-    विनोद साव, मुक्तनगर, दुर्ग

परिचय - विनोद साव

20 सितंबर 1955 को दुर्ग में जनमे विनोद साव समाजशास्त्र विषय में एम.ए.हैं. मूलतः व्यंग्य लिखने वाले विनोद साव उपन्यास, कहानियां और यात्रा वृतांत लिखकर भी चर्चा में हैं. उनकी रचनाएं हंस, पहल, लहक, अक्षरपर्व, ज्ञानोदय, वागर्थ और समकालीन भारतीय साहित्य में छपी हैं. उनके दो उपन्यास, चार व्यंग्य संग्रह, दो यात्रावृत्तांत, दो संस्मरण, कहानी संग्रह व छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षामंडल के लिए मुक्तिबोध और दाऊ मंदराजी साव पर चित्र पुस्तिकाओं सहित सत्रह पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं.  तीन पत्रिकाओं के विशेषांक उन पर निकले हैं. उन पर शोध हुए हैं. उन्हें कई पुरस्कार मिल चुके हैं. उपन्यास के लिए डा. नामवर सिंह और व्यंग्य के लिए श्रीलाल शुक्ल से पुरस्कृत हुए हैं. विगत दिनों छत्तीसगढ़ प्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मलेन, रायपुर द्वारा उन्हें समग्र साहित्यिक योगदान के लिए ‘सप्तपर्णी सम्मान’ से नवाज़ा गया. उनकी यायावर प्रकृति उन्हें देश के अतिरिक्त विदेशों की यात्राओं में भी ले जाती हैं. वे भिलाई इस्पात संयंत्र में सहायक प्रबंधक(सी.एस.आर.) थे.

उनका पता है: मुक्तनगर, दुर्ग (छत्तीसगढ़) 491001,

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