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बेटी पर विशेष गीत-संग्रह - रतन लाल जाट

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(1) गीत-ओ बेटी


   पापा तेरे जिन्दगी अपनी, वार देंगे ओ बेटी
सपने उनके करना पूरे, तू है गुडिया प्यारी


दिल ना तोड़ना, जान चली जायेगी
आहें ना भरना, चाहे मुश्किल हो कोई
जान की बाजी लगा देंगे, जरूरत जब हुई 
अमर तू रहे हम मर जाये, तो भी गम नहीं


आसमां है तुझको पाना
काँटों पर भी है चलना
सोना तपने से निखरता
मंजिल मुमकिन है नहीं आसां


आँखों के आँसू जैसे, कोई मोती
लहू अपना अमृत से, कम तो नहीं


जिसने भी हाथ बढ़ा के
देखा ऊपर आसमां में
चाँद नहीं तो तारे
एकदिन तोड़ ही लाये


फिर क्यों ना, जीत हो अपनी
बूंद-बूंद, सागर भर देती 


- रतन लाल जाट


(2) गीत- जब से मैंने एक बेटी पायी


              
मेरे जीवन में खुशहाली छायी
जब से मैंने एक बेटी पायी
सूरत उसकी प्यारी, जैसे मूरत भगवान की
हर दुआ है उसकी, जीवन वरदान बनी


बेटी के लिए दुःख तो क्या सहेंगे
इस दुनिया से भी अब हम लड़ लेंगे
जब लिखने वाले ने तकदीर यही लिखी
इस रिश्ते में उसने उमंग नयी जगायी


हमने भी ये सोचा है कि- बेटी को खूब पढ़ायेंगे
हँसना-खिलना उसका खुशियों के फूल खिलायेंगे
लेकिन रस्में दुनिया की कैसी-कैसी है अजब बनायी 
जो अपने को ना समझे फिर भी है रिश्तों की परछाई


एक तरफ प्यार-समर्पण है
एक तरफ बन्धन की दरार है
साथ रहकर भी कोई ना साथ अपने
बोलो फिर क्या है इस जिन्दगी में


दिल में बसे अरमान सारे टूटे ना कभी
एक ना एकदिन होगी पूर्ण ये कहानी


- रतन लाल जाट


(3) गीत- बेटी को ना समझो


           
बेटी को ना समझो बोझ दुनियावालों।
इसके जन्म को देवी-अवतार तुम मानो॥


जिस घर में होती है बेटी।
उस घर में गूँजती है किलकारी॥
बेटी का हँसना बेटे से प्यारा।
बेटी का पढ़ना बेटे से अच्छा॥
बेटा जब दूर हमसे होके
पिलाये ना पानी कभी वो।
तब दौड़ आती है बेटी
साथ अपना देने को॥


बेटी से करना ना भेदभाव तुम कोई।
कोख में ही मार देना अच्छी बात नहीं॥
बेटी तो अपनी फूल जैसी है।
बेटी अपनी कोयल-सी है॥
फूल की खुशबू
देगी आनन्द तन-मन को।
कोयल की कूक
बनायेगी बसंत जीवन को॥


फूल बिना तो गुलशन भी गुलशन है ना।
संगीत बिना कोई सुर भी सुर है ना॥
घर-आँगन में जब बेटी फिरती है।
तो शोभा घर की सौ गुनी बढ़ जाती है॥
झूला झूलते देखो
नन्ही-सी प्यारी बेटी को।
जैसे परी कोई
घर अपने आ पहुँची हो॥
गीत है गाती दुख में भी हँसाती।
परायों में अपना कोई वो बनाती॥
जिन्दगी जब मुश्किलों में भरती है आहें।
रस्ता दूर तक नजर ना हमको कोई आये॥
उस वक्त अपनी खुशियाँ
कुर्बान कर देती है वो।
और चली आती है
गम अपना बाँटने को॥


बेटी का कोई मोल नहीं।
बेटी तो अनमोल होती॥
सौ-सौ जन्मों का फल बेटी।
एक ही जन्म में दे देती॥
कभी ना समझेंगे पराया बेटी को।
टूटने ना देंगे दिल के टुकड़े को॥


बेटी हम मर जायेंगे तेरे बिना।
तेरे लिए ही है हमको अब जीना॥
अपना दिल-पंछी तू तेरा घर में है बसेरा।
उड़के ना जा तू दिल टूट के उजड़ जायेगा॥
बेटे के पीछे
मरते देखा है लोगों को।
बेटे के तानों से
रोते देखा है माँ-बाप को॥


सारी दौलत नाम बेटे के कर देते हैं।
बेचकर बेटी और अपना घर भरते हैं॥
माँ-बेटी की कमाई है पाप की कमाई।
धनवान को भी कंगाल ये कर जाती॥
माता का कर्ज
चुकाना है लोगों।
बाप का फर्ज
निभाना सीखो॥


एक की रक्षा खातिर जान गँवाना।
और एक की सुरक्षा में सब भूल जाना॥
बेटी है आँखों का तारा।
बेटी है जन्मों का नाता॥
बेटी को हम पढ़ायेंगे तो।
बेटे से बड़ा बन जायेगी वो॥


पराये घर से अपने घर हम लायेंगे।
बेटे से ज्यादा बेटी को प्यार बाँटेंगे॥
बेटी अपनी दुर्गा है।
करनी इसकी पूजा है॥
वरदान बनेगी वो।
नाश करेगी दुष्टों॥


सब बेटी-बेटी पुकारो।
जिन्दगी इसकी सँवारो॥
सूखने ना दो
रोशन बगिया से कली को।
वरना मिलेंगे ना
फूल कोई देखने को॥


- रतन लाल जाट


(4) गीत- गम तू दे देना भगवन!


                
मुझको सौ-सौ गम, तू दे देना भगवन!
बेटी को हो ना गम, यही कहता दिल॥


हर सपना उसका पूरा हो।
विश्वास की किरण खत्म ना हो॥
कभी टूटे ना दिल, तू देना शक्ति-बल।


काँटों की डगर पे भी कदम ना रूके कभी।
हिम्मत हार के कभी बैठ ना जाये बेटी॥
हासिल हो मंजिल, तू देना धीर-संयम।


- रतन लाल जाट


(5) गीत- बेटी


           
बेटी तू अपने दिल से कभी दूर ना जाना।
बिन तेरे मर जायेंगे एक पल भी जीना ना॥
दूर हो के दिल अपना कहीं लगता ना………


देखने को तरसती है अपनी प्यासी आँखें।
ऐसा लगता है जैसे तू ही अपनी दुनिया है॥
चैन मिलता है दिल को तुमसे।
हँसी-खुशी है जीवन में अपने॥
बस, अपना हर सपना है तू और कुछ ना।
रब जैसी प्यारी मूरत है यही बस मैंने माना………


कहेंगे हम रब से।
कभी ना गम दे॥
चाहे जो सजा दे।
सजा वो कबूल है॥
दिल और अपनी जान है तू हमेशा।
जन्नत भी तेरे बिना नहीं मैं चाहता………


- रतन लाल जाट


(6) गीत- बेटी तो है मेरे जिगर का टुकड़ा


                 
बेटी तो है मेरे जिगर का टुकड़ा
चाँद-सा है उसका प्यारा मुखड़ा
दूर होगा दिल का सारा दुखड़ा
अँधेरा होगा फिर यहाँ उजला
बेटे से बढ़कर प्यार हमरा
रोशन करेगी नाम सबका


जैसे हो सूरज की किरण कोई मेरी बेटी
या हो फूल की सौरभ कहीं मीठी-मीठी
मंदिर में जलते एक दीपक-सी है बेटी
जीवन में बहार बसंत सौ-सौ रूप गुड़िया


आँखों में सपने हैं अधूरे थे ख्वाब मेरे जो
करेगी इनको पूरे यकीन है बस मुझको
कुछ भी नहीं नामुमकिन है उसको
लाखों में बस एक ही सुख है बिटिया


अन्त समय तक बेटी साथ रहे
कोई ना उसको कभी दूर करे
सदा सुख ही सुख मिलता रहे
आये ना कभी गम खिलती रहे मुनिया


- रतन लाल जाट


(7) गीत- मेरी बिटिया है एक संजीवन-सी


               
मेरी बिटिया है, एक संजीवन-सी।
लगती है वो जीवन में, किरण-सी॥
जगमग करती, वो दीप बन रहती।
और महकती, फूल कमल के जैसी॥


कलियों-सी नाजुक है, फिर भी एक दवा।
दिन-रात बरसती है, बनकर वो बदलियाँ॥
उसकी मुस्कान हमको, दुख में भी हँसाती।
जब वो हँसती तो, लगती है एक परी-सी॥


चलना-फिरना उसका है अजब-सा।
लहर की तरह महक बनकर रहना॥
मेरा है वो एक सहारा।
और प्यार सभी का॥
जब कभी यहाँ-वहाँ वो जाती।
तो चाहने लगते सब उसको ही॥


हर एक दिल में राज उसका है।
बिन उसके सब कुछ लगता अधूरा है॥
मानो तो वो एक देवी है।
और पावन शक्ति है सब में॥
जीना मुश्किल हाल ऐसा कि-
बिन पानी के हो जैसे कोई मछली।
ऐसी वीणा है और वो रागिनी,
जो नहीं तो नीरवता है छायी॥


- रतन लाल जाट


(8) गीत- नन्ही-सी बिटिया


      
नन्ही-सी बिटिया को,
मैया अपनी कोख में रखती।
फिर जन्म देती है वो,
एक मासूम फूल-सी बच्ची॥


नन्ही-सी बिटिया को,
रखती है बड़े दुलार से वो।
गोद में सुलाकर,
दूध अपना पिलाकर।


कली से बन जाती है,
एक दिन वो फूल-सी।
जब घर-आँगन में वो,
धीरे-धीरे चलने लग जाती॥


नन्ही-सी बिटिया को,
कितना लाड करते हैं दादाजी?
पीठ पर उसको, बैठाकर घुमाती है दादी॥


वो आँखों का तारा है,
अपनी माँ के वास्ते।
पिता के बुढ़ापे में एक सहारा,
जो अपने मन की बातें उसको बताते हैं॥
वो नन्ही-सी बिटिया,
जैसे खिलता एक फूल।
घर-आँगन में छा जाये,
खुशियाँ ही खुशियाँ चारों ओर॥


उसकी खुशबू सब के दिलों को भाती है।
बिन उसके सूख जाते हैं खिलते चेहरे॥


फिर एक दिन होती है शादी।
धूम-धाम से नन्ही-सी बिटिया की॥
गाते-नाचते आती है बारात उसकी।
सज-धज कर दुल्हा आये घोड़े की सवारी॥


सब के जिगर का टुकड़ा,
वो नन्ही-सी बिटिया।
जाती है दूर, घर अपना छोड़कर।
भीगे नयनों से देखती है आँगन॥


गाँव का मंदिर है, वहाँ जाकर वो आशीष पाये।
फिर अपनी प्यारी सखियों को छोड़कर चली जाये॥
बिन उसके बहारें भी आकर चली जाती।
लगता है सूना-सूना आँगन और गली॥


नन्ही-सी बिटिया, बन के एक दुल्हन।
जगमगाती है किरण-सी पराये-घर॥
नन्ही-सी बिटिया,
मानती है सास को अपनी माँ।
ससुर को मानती है,
अपने पिताजी के जैसा॥


भाई-बहिनों की यादें,
बार-बार उसको आती है।
कहीं अकेले में जाकर वो,
छिप-छिपकर रोती है॥


नन्ही-सी बिटिया, देखती है रस्ता।
जो अपने गाँव जाता है,
वो प्यारा-सा लगता है॥


करती हैं बातें अपने गाँव की।
जब कोई मिलने आता है कभी॥
भाई हो या भतीजा, चाहे काका या दादा।
पूछती है वो हाल अपने मम्मी-पापा का॥


जब तीज-त्योहार आते हैं,
इंतजार के बाद नजदीक अपने।
तब दिन-रात वो देखती है राहें,
किसी के आने की अपने पीहर से॥



रहती है वो उदास,
नहीं लगता मन आज।
आने को तैयार है,
अपने गाँव मिलने।


बच्ची से बनकर दिवानी।
फिर हो जाती है रानी॥
माँ के बाद वो,
बन जाती है दादी॥


मगर आज भी लगती है।
नन्ही-सी बिटिया अपने गाँव में॥
नन्ही-सी बिटिया को,
मैया अपनी कोख में रखती।
फिर जन्म देती है वो,
एक मासूम फूल-सी बच्ची॥


- रतन लाल जाट


(9) गीत- रानी बिटिया


             
रानी बिटिया मेरी सबसे प्यारी है।
सारी दुनिया में वो सबसे निराली है॥
  बेटी तू जिगर का एक टूकड़ा है।
तेरे बिना जीवन मेरा अधूरा है॥


दिल मेरा है महकता, देख के तुमको सदा।
जैसे उपवन में खिला, फूल कोई नया॥
पग-पग पर साया है।
जैसे बादल की छाया है॥
अरमान मेरा तू आरजू सारी है।
विश्वास मेरा तू अभिमान भी है॥


दूर ना जाऊँ, बस तुम्हारे पास रहूँ।
मर के भी ना हारूँ, बस मैं याद करूँ॥
कोयल-सा बोलना, धीरे-से चलना।
हँसना और कभी रोके भी है हँसना॥
खुशियाँ अपनी नाम बिटिया के कर दी है।
दुख-गम उसके ना सह सकते कभी है॥


- रतन लाल जाट


(10) गीत- मैंने तुझको बेटी माना


                 
मैंने तुझको बेटी माना
दुनिया ने कभी ना जाना
एक दिन तू इनको बताना
क्या रिश्ता है पापा-बिटिया का


कोई तुझको रूलाये
सह ना पाऊं मैं
जान से तू प्यारी है
कैसे भूल जाऊं मैं
बोलो, ऐसा कभी होगा ना
क्या रिश्ता है पापा-बिटिया का


जिनके दिल में ममता ना होगी
उनके आंगन खुशियाँ कब होगी
बेटी लेकर आती है कुछ ना ले जाती
हँसी-खुशी और प्यार जन्नत का लुटाती
बस, थोड़ा-सा रहम कर लो ना
क्या रिश्ता है पापा-बिटिया का


दिल सब के जानते हैं
बातें भी हम करते हैं
फिर ना जाने क्यों इनसे
नफरत हम करते मरते हैं
खुदा खुद बेटी को पालता
क्या रिश्ता है पापा-बिटिया का
 
- रतन लाल जाट



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