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कहानी - मेरी अधूरी कहानी - शोभा गोस्वामी

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   [  अधूरी कहानी ]

एकटक सामने निहारते हुए तृप्ति की आँखें सामने ट्रेन की खिड़की से कुछ सोचते हुए क्षण भर तो उसमें खो सी गईं। अब ना तो ट्रेन की गड़गड़ाहट सुनाई दे रही थी और ना ही गुजरते हुए दृश्य दिखाई दे रहे थे तृप्ति खो सी गई थी। आधी उम्र के पड़ाव पर होकर उसको अपना अतीत चलचित्र की भांति नजर आ रहा था।

एक रईस खानदान पिताजी जमींदार थे गांव और शहर में अनगिनत कोठी और दुकान थी। सोने चांदी का थोक व्यापार था संपन्नता से परिपूर्ण थे। छोटी थी लाड़ प्यार से पल रही थी। मां कम पड़ी लिखी थी एक दिन पिताजी को एक दूसरी लड़की पसंद आ गई और उन्होंने दूसरा विवाह कर लिया अपनी मां के आंखों में आंसू देख कर यह तो समझती थी कि मां जरूर परेशान हैं पर उम्र छोटी थी इसलिए सौतन का दर्द नहीं समझ पाती थी ।

धीरे धीरे दूसरी मां ने पिताजी को वश में कर लिया मेरी उम्र सात साल थी। कुछ समझती थी कुछ समझ में नहीं आता था।

एक दिन पिताजी की तबीयत ज्यादा खराब हो गई डॉक्टर के पास गए जांच हुई तो पता चला पिताजी को तपेदिक हो गया है और बीमारी लाइलाज है।छह महीने में पिताजी का स्वर्गवास हो गया दूसरी मां पिताजी की चहेती थीं सारे पैसों का हिसाब किताब उन्हीं के पास था। मां अंदर ही अंदर मायूस रहती थी दूसरी मां ने जायदाद का बटवारा नहीं होने दिया । मैंने बारहवें साल में प्रवेश किया मां मेरी शादी के लिए चिंतित रहने लगी।

मैंने आठवीं तक पढ़ाई की तभी गांव में रिश्ता देखा जमींदार घर में रिश्ता तय कर दिया। मैं गांव में शादी करना नहीं चाहती थी। एक दिन मेरी मां ने कोई काम कहा मैंने मना कर दिया। मां ने कहा-

"जब ससुराल जाओगे तब पता चलेगा"

मैंने कहा-"तुम ही जाना मैं गांव नहीं जाऊंगी।

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मां को बात चुभ गई मुनीम को बुला कर बोली लड़का दूसरा देखो पहली सगाई तोड़ दो मुनीम ने शहर में लड़का देखा निम्न मध्यमवर्गीय परिवार लड़का सरकारी नौकरी में था। मैं साधारण शक्ल सूरत की सांवली लड़की थी। मेरे लिए जो वर देखा काफी सुंदर आकर्षक व्यक्तित्व था। मेरा कद छोटा लड़के का कद काफी ज्यादा था।

मां ने मुनीम के साथ जाकर मेरा रिश्ता तय कर दिया काफी धूम धाम से मेरी शादी कर दी व्यापार सोने चांदी का था। इसलिए खूब सोना चांदी और दहेज दिया शादी के कुछ सालों बाद गौना किया। बाल जीवन जा रहा था नवयौवन आ रहा था। मां के घर नौकर चाकर थे काम करना नहीं आता था ससुराल में बड़ा परिवार दादीसास सास ससुर, बुआ सास तीन नंद दो देवर थे दादी सास का कट्टर रवैया मुझे सहमा देता था। सब के गुस्से से डरती थी। इसलिए काम बिगड़ जाते थे सहमी सी रहती पति का गुस्सा सातवें आसमान पर रहता था। रूढ़ीवादी परिवार था सबको खाना खिलाकर फिर खाया करती थी। कभी सब्जी खत्म तो कभी दाल खत्म हो जाती थी।

एक दिन खाना बनाते वक्त साड़ी के पल्लू पर चूल्हे की चिंगारी पड़ गई दादी सास ने कहा दूध से आंचल धो घर में दूध नहीं था रात के बारह बज रहे थे। पति ने कहा बकरी का दूध निकाल फिर आंचल धो मैं खड़ी रो रही थी किसी तरह सासु मां के समझाने पर पति ने दूध निकालकर दिया और मैंने आंचल धोया।

परिवार निम्न मध्यमवर्गीय था पैसों का अभाव था सासु मां दूसरे घर में खाना बनाने जाती थी मां के घर मेवे मिष्ठान के कमी नहीं थी।

एक बार रसोई में कुछ कमी होने पर दादी सास बोली कि तुझे केला खाने को नहीं दूंगी उसी समय मेरी मां का प्रवेश हुआ उन्होंने जवाब दिया-

     "मेरी बेटी ने जितना कुछ खाया है तुमने स्वप्न में भी नहीं देखा होगा। " मां समझ गई मेरी बेटी सुखी नहीं है।

छह महीने बीते मां का स्वर्गवास हो गया अब मैं बिल्कुल अकेली हो गई थी। मैंने मां का हिस्सा जायदाद में मांगा दूसरी मां ने मना कर दिया मैंने भी जिद ठान ली और कोर्ट द्वारा अपना हिस्सा प्राप्त किया।

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वर्ष बीत गए बच्चे बड़े हो गए दो पुत्री और दो पुत्र थे पति उग्र स्वभाव के थे। आए दिन क्लेस करते थे खुद पर संयम रखकर जिंदगी आंसू भरी थी। पिता का प्यार नहीं मिला पति के क्रोध के कारण परेशान रहती थी। बच्चे भी शायद ज्यादा समझना नहीं चाहते थे।

कैसी किस्मत न तो पिता के घर प्यार मिला ना पति के घर मुझको पता नहीं था सहानुभूति और संवेदना क्या होती है इसी आशा में जी रही थी कि शायद सब कुछ सही होगा पर अब उम्मीद टूट चौकी थी। आत्महत्या की सोच नहीं सकतीथी क्योंकि यह जघन्य पाप है। प्रौढ़ावस्था ने दस्तक दे दिया है आज मैं जीवन के उस सफर पर निकली हूं जिसका कोई अंत नहीं है मेरी कहानी पूरी हो कर भी अधूरी है बस सब कुछ था फिर भी कुछ नहीं मिला वह था नारी का सम्मान चाहे वह बेटी थी पत्नी थी या फिर मां एक नारी समझकर अवहेलना हुई। यह जो अधूरी कहानी है कब पूरी होगी शायद खुद को भी नहीं पता यह सफर कहां ले जाएगा नहीं मालूम मेरा नाम वैसे तो तृप्ति है लेकिन फिर भी अतृप्त क्यों रही। यह है मेरी अधूरी कहानी।

शोभा गोस्वामी

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