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डॉ. बलदेव की कविताएं

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सिसरिंगा की घाटियाँ -------------------------- बीजा - साजा साल की   छाँव में चितकबरे शशक शावक - सी लुक - छिप कई मोड़ माँद नदी तक छलांगती ...

20190918_154116

सिसरिंगा की घाटियाँ


--------------------------
बीजा - साजा साल की
  छाँव में चितकबरे शशक शावक - सी लुक - छिप कई मोड़
माँद नदी तक छलांगती
  नील गाय सी बग टूट कहीं पर भागती
  चढ़ती  ऊँची चट्टानों पर उतरती
नीची ढलानों पर
  सिसरिंगा की घाटियाँ

सूर्य - मुखी जूड़े में घोंसे इठलाती आती
  चमचमाती सिसरिंगा की घाटियाँ कभी आगे कभी पीछे से
लहरा क़र तेजी से लिपट जाती पथिक  के पाँव में

मनुहार करती क्षणभर विलम जाने को
  करील - कुंज की छाँव में
  इसे रूक जरा बाँह में गह लो/ इसे आँख में भर लो/ इसे गाओ / इसे जिओ
  यह तुम्हें भी उरावों की गंध भीगी बालियों में गाएगी़
तलहटियों के गाँव में ले जाएगी। पलाशों की सिन्दुरिया माला पहिनाएगी
  हँस- हँसकर बतराएंगी/इसकी सहेलियाँ
  गोंड़ महकूल और बैगा की बिटियाँ दोनों भर मधु में पगे चिरोंजी तुम्हें खिलाएंगी
जी भर अंजुरियों से प्यास बुझाएगी वह तुमसे एक बार मिलने का वादा लेकर ही
नन्दन झरिया या स्वप्निल झरने का पता बताएगी ।

सिंघनपुर की आदिम गुफाएँ
या कबरा की पहाड़ियों के पाषाण चित्रों तक
सहर्ष ले जाएगी, पहाड़ियों पर उतरते बादलों को देखकर इस उन्मत्त मयूरी के कर्मा नृत्य की लय में तुम जरा झूमो / इनकी सतरंगी गहराइयों में उतरो / डूब- तिरो / इसे साँस से छुओ
  यह हमेशा के लिए याद में महुए की गंध सी बसन्त सी छा जाएगी।

यदि तुम कहीं ठुकराओगे
  आहत प्यार इसका झूमकर डस लेगा तुम्हें
यदि कहीं दोगे धोखा / चूड़ियाँ तोड़कर मर्दाना
  कलाइयाँ इसकी बेधड़क गंडासा गर्दन पर ले जाएगी
  जरा चूको हजारों फीट गहरी दलदली खाइयों में बेहिचक धकेल देगी
  और उलझोगे तो
शेरनी सी  गुर्राएगी । जब यह उमड़ती है
  दहाड़ इसकी मीलों फैल जाती है / जर्रा ज़र्रा चौंधियाता चीखकर भड़क उठता है
बस या बुलेट पर हो ........ रूको , जरा हुजूर को पहले सलामी दो
  तब बढ़ो आगे
दबे पाँव पीछा कर रही है जबड़ा खोलेे
  लार टपकाती मादा रीछ सी
रूमाल हिलाकर बुलाती मखमली वादियाँ
  मदमाती सिसरिंगा की घाटियाँ ।  
                           
      *

लैंड स्केप


-------------

अब तो बिस्तर छोड़ना ही होगा

इस प्रगाढ़ अन्धकार के
निष्कम्प जल
और अन्तहीन शून्य के बीचों-बीच
  हाँ, अब मैंने
मिट्टी का एक सुनहरा ढेला
रख दिया है

इस छोटे से कैनवास पर
एक बहुत बड़ा लैंड स्केप
आँखें खोल रहा है।

खुले आकाश के नीचे
एक ही पेड़ है
एक ही घर
और उसकी मुंडेर पर
एक ही चिड़िया
बाकी लहराते हरे भरे खेत
काम पर जाते हुए लोग
रहट से पानी खींचती ग्राम वधुएं
स्लेट पट्टी से खेलते बच्चे

गहरी नींद के जंगल में
एक नदी चमकने लगी है

अब तो बिस्तर छोड़
कैनवास के सामने जाना ही होगा
सूर्य-नमन के लिए।

    
           *

संगीत


---------

तुम्हारी भाषा कलेजे में मीठी छुरी
क्यों उतिर जाती है बेगम

आधी रात जब तुम कूकती हो
टीस भरी आम्रमंजरियों की
मधु सी मादक गंधमई भाषा
प्राणों में बहने लगती है
वह भाषा मेरी कविता में
न उतर कर
तुम्हारे उजले संगीत में
क्यों उतरती है भला?

जब दूर देश में
खिडकियाँ खोलकर सोई
किसी मुगध के आनन्द में सुबकने की आवाज
परिजात की उज्जवलता में खिलने लगती है
उस समय खास तौर से तुम
चुप क्यों हो जाती हो कोयल?

यही तो वह भाषा है
जो मुझे-तुम्हें
फूल और पत्तियों को
यहाँ तक कि
तारों को जोड़ती है
फिर क्यों नहीं रचती वह भाषा मुझे
मेरी कविता में?
        *

घोषणा-पत्र


---------------

हमें दुःख है आप मत लड़िये
हमारी नंगी पीठ पर पोस्टर लगाने के लिए
ले जाइये ये घोषणा-पत्र
यें हमें दो जून का खाना भी नहीं परोस सकते
हमें तो पाँच-पाँच आरे वाले समय-चक्र ही रोटी देगें
जो इतिहास को गतिशील बनाये हुए हैं।

आप दोनों की बातें सही हैं दलील की क्या जरूरत, जी
हमें दुःख है, हमारे पास एक ही मत-पत्र है
अन्यथा दोनों को खुश करते
चाहे आप गद्दार हों या तानाशाह
इससे हमें क्या मतलब?

आप झूठ मत बोलिए, गरीब देश के नाम पर
कुर्सी के सामने पार्टियों या देश क्या चीज़ है जी
आप दीर्घायु हों,पन्द्रह चुनाव जीतें
पर हमारी सेवा के नाम पर झूठ मत बोलिए।

आप में से चाहे कोई जीते पर यह मानना गलत होगा
कि  हमने आपमें से किसी को चुना है।
क्योंकि हमनें जिसे चाहा
उसके पास आदमी होने की तमीज नहीं है।

हमने अँधेरे में एक कागज का टुकड़ा छोड़ा है
यह आपके लिए घोड़़ा है
इसका इस्तेमाल जैसा चाहो , करो किन्तु रहम करके
हमारी नंगी पीठ का ख्याल करो
ख्याल करो, ख्याल करो, ख्याल करो
क्योंकि यह राजपथ या युध्द का मैदान नहीं हो सकती
नहीं हो सकती...........जी..........।

                 *

नदी


------

अरी ओ केलो
मुझे अपनी बाहों में ले लो

जब भी देखा तुमको
बौराया मन
सोनतरी से टकराकर
दरक गया दरपन
हँसी फूटती चट्टानों से
कहा पवन ने
        संग हमें भी ले लो

जब भी देखा
खिलने लगी देह में सरसों
सारंगी बना कछार
दिशि दिशि से अवश
लगा उमड़ने प्यार
मुट्ठी में भरा गुलाल
कहा गगन ने
           तनिक हमसे भी खेलो

कब से तकता मैं
प्यासा का प्यासा
तुम बनी रही अनजान
या कि मान बैठी हो
नश्वरता से कैसा प्यार
टूट कर कहा नखत ने
निष्ठुर:
         चट्टानों से ही खेलो
             *


  शीशे की दीवार


-----------------------

शीशे के दायरे में कैद हम तुम
एक-दूसरे को देखते हैं छू नहीं पाते
व्यर्थ की हँसी हँसते हैं
मर्म कुछ समझ नहीं पाते
उत्तेजना बीच की ठंडी दीवार में
शांत हो जाती है
इसलिए
हथेलियों का गर्म स्पर्श छू नहीं पाते
और न ही
पारदर्शी यह तोड़ ही पाते
             *
       

चेहरा माटी का


------------------

चेहरा, चेहरा माटी का
खुशियों में तो गाए ही गाए
दर्द में भी जो इतना मीठा गाए
कि पतझर का गहरा सन्नाटा टूटे
ऋतु बसन्त की लाल लाल टहनी पर
हरे हरे ललछौंहे कोंपलें फूटे
ऐसा ही कंठ , ऐसा ही दर्द दो
कंठ कोयल का, दर्द माटी का।

चेहरा, वह इतना काला
इतना काला , स्वयं विधाता
समझ न पाये जिसकी भाषा
गढ़ देना , गढ़ देना माँ
ऐसा ही चेहरा
चेहरा माटी का।
      *

घोटुल


---------
फूल पत्तियों का रस पीकर
हम चिड़ियाओं में तब्दील हुए
रंगों-गंधों-ध्वनियों में परिवर्तित
हम असीम नभ नील हुए।
             *

कोरबा


--------

मौजूदा सरकार ने उन्हें मकान दिए
कांकरीट की ऊंची दीवारें , हवादार खिड़कियां
और रंगीन पर्दे दिये
लेकिन रास नहीं आया इन्हें प्रेमनगर
हमने पूछा क्यों छोड़ दिए प्रेमनगर
एक ने सकुचाते से कहा-
पक्के मकानों में नंग-धड़ंग जाने से कैसा लगता था
जंगल के बिना मन कहीं नहीं लगता था
हम जंगल के साथ उगे
जंगल के साथ बढ़े
पेड़ पौधे, नदी -झरने, हिरना -साँभर
चिड़ियाओं के संग पले
नीले आकाश तले
          *

वृक्ष में तब्दील हो गयी औरत


-----------------------------------
अभी अभी तो मैं, अपनी बीवी और बच्चों के साथ
शहर से लगे , इस जंगल में घूम रहा था
कि सहसा ही, बरगद की एक डाली हिली,
            और फिर कई पेड़ काँपने लगे

हम उधर ही देख रहे थे उधर
डगाल में बैठे जटायु की ओर , कि सहसा ही
हमारा आसपास , जैसे खौफनाक हो गया
मैंने देखा मेरी बीवी नहीं है
बच्चे ने देखा उसकी माँ नहीं है
अभी अभी वह जहाँ खड़ी थी वहाँ एक पेड़ है

पेड़ छायादार, पेड़ों की संख्या में एक पेड़ और
बच्चा पूछ रहा-माँ कहाँ है?
वृक्ष में तब्दील ह़ो गयीं,औरत के बारे में
मैं क्या कहूँ, कैसे कहूँ , वह कहाँ है
                   *

चाबी


-------

दरअसल
समूची सृष्टि किसी शरारती बच्चे
का खेल है
जब तक चाहो
खेल जारी रहेगा
चाबी तुम्हारे हाथ में है।
     *

जाते जाते


-------------

अरी ! वो केलो
मुझे अपनी बाह में ले लो
कब तक खेलती रहेगी
बेजान पत्थरों से
उन्हें हटाओं
मुझसे खेलों
अरी!ओ केलो
तुम वही
बुढ़ा गया मैं अवश
लो बाहों में ले लो
     *

शून्य


------

सुख और दुख से परे
सत्य का अनुभव
निराकार होता है
विवेक शून्य में नहीं
वृहत्तर जीवन में जागता है
इसीलिए तो आस्था जरूरी है
इसके बिना
आनंद
निराधार होता है
      *

आसाढ़ सा प्रथम दिन से


-------------------------------

धरती के उतप्त तवे पर
छम छम नाच रहीं बूँदें
भींज रहा मैं
बाहर-भीतर
एक बीज
आँखें मूँदें
     *

इंतजार


---------

धरती
हरी सूटर बुन रही है
और मौसम
टहनी में
अग्नि फूल
आने का
इंतजार कर रहा है।
         *

पंचतंत्र


---------

चमकते उजले पानी को देखकर
वह चौंका फिर एक तरफा दौड़ा
उसकी पूंछ तनकर एकदम सीधी हो गयी थी
और लपलपाती काँटेदार जीभ से
वह लार टपका रहा था।

मैं समझ  गया, स्याला काटेगा किसी को
और सचमुच!सचमुच!

घास चरते गधे को काट खाया
परम आश्चर्य!रेंकने के बजाय
वह तुरन्त जबड़ा फेंक-फेंककर भौंकने लगा
इसे देख/सुन लिया धोबी ने
और पहुँचता पास कि वह दुल्लत्तियाने लगा
और धोबी कुटेला उठाता
कि दोनों जोर -जोर से भौंकने लगे
वह घबराकर पत्थर के पर खड़ा हो
हवा में कुटेला भाँजता रहा
उसकी छिली हुई छाती
और थोथने से खून रिस रहा था
और वे उसे चैंलेंज के स्वर में
भौंकते रहे, भौंकते रहे

मरघट से लौटे शव यात्री, यह तमाशा देख
ताली पीट-पीट हँस रहे थे, कई-कई घाट में
धोबी कमजोर नहीं था,
परन्तु गधे की बड़ी -बड़ी सींग
उग आने के दहशत से
और कुत्ते को सवा शेर की मार्चेबन्दी में देख
वह बुरी तरह डर गया था
और घाट के बाहर नहीं हो पा रहा था
खिसिया कर असहाय
उसने एक बुध्दिजीवी को देखा
जो झाड़ियों की ओट से
जंगली बत्तखों पर कोण बना रहा था।

मुझे आश्चर्य हो रहा था
कि धोबी का कुत्ता
धोबी के गधे को क्यों काट खाया
और दोनों क्यों उसके खिलाफ भौंक रहे हैं
और वह कुछ भी करने की स्थिति में नहीं है
फिर यह सोच कि पागलों पर
गोलियाँ क्यों खराब करूँ
बुध्दिजीवी की हैसियत से
पुनःकोण बनाने में लग गया
सम्भावित हत्या से आँखें चुराकर
उधर घाट में खमखमाए लोग
ताली पीट-पीट
ठठाकर अट्टहास कर रहे थे
बुध्दिजीवी की असम्पृक्तता पर
या धोबी की नपुंसकता पर
या कुत्ते को पागल बना देने की सफलता पर।
         *

समुद्र


--------

लौट चुके सब/ एक एक कर
लहरें गिनते सिर्फ हमीं दो /रुके
हुए क्यों?
कांकरिट की/इस छतरी के नीचे
बाहें भींचे मौन
देख रहे समुद्र /अनन्त नीलिमा
विजन बालु का मीलों फैला/विस्तार दृष्टि भर
देख रहे एक एक कर
लहरों को चूम चूम विदा ले रही/साँझ

घुमड़ रहे बादल / बरस रहे तमचूर्ण
चमत्कृत हैं/तड़ित लताएँ
सुन रहे/असंख्य शंख-सीपियों का सुनील उद्घोष
लहरों का आकुल -व्याकुल शोर
देखते ही देखते / हवा में ठहरी

"त्रकततान त्रकत तान
धरत मीन धेत धड़न्न धा
तिटकत गदिगन "उड़ी टिटहरी
लाल चोंच की / झाऊ बननि की ओर

यहीं कहीं विजन बालु पर
किस सीपी में बन्द
गड़ी पड़ी है ग्रन्थि हमारी।
           *

कोढ़


-------

अचानक ऐसा एहसास होते ही
कि तेजाब से झुलस रहा हूँ
मैं समझ गया
यह उसी की छिपकली छाया है
जो नीचे से ऊपर की ओर धीरे-धीरे खिसक रही है
और सचमुच
मेरी आँखों में
दूसरे ही क्षण वह खिसियानी-हँसी हँस रही है
फिर सहसा महसूस हुआ
कि  हम दोनों ही असहाय हैं इस लंबी यातना -शिविर में
और किसी अनाम-अनाम
व्यक्त शक्ति के दबाव में
गहरे डूब रहे हैं
मैं पिघल रहा हूँ
उसके चेहरे पर बरहठ
उग आए हैं
उसके होठ और अँगुलियों से
खून रिसरिसा रहा है
सख्त जमीन गीली हो रही है
           *

स्वप्निल -कविताएं


-----------------------
                                              

पेंचदार सुरंगवत
मीलों गहरा  कुँआ
खींच लेती है अकस्मात्
चुम्बकीय गहराइयों
अन्तहीन तल में, नजर आते हैं तारे
साफ-साफ
निःशब्द चेतना को रौंदती
अन्तहीन सी लगती काली रात
फिर भी सूर्य से बड़ा है कौन सा वह सत्य
जो किरणों से बाँधकर उपर
उठाता, पेंचदार गहराइयों
से घुमाकर बाहर निकाल लेता
खोया हुआ जीवन

सामने ही मीलों लम्बी खड़ी
शीशे की उध्र्वर्मुखी नलिका
पारे सा चमकदार जीवन
धूप में चढ़ने लगा है
लेकिन कब तक चढ़ता रहेगा?
सूर्यास्त तो होगा ही
कल के लिए

2

नरक यातना भोगते हुए
जलन्नुम को बहिश्त में बदलते हुए
ओ खुदा
मैं चला, अलविदा

पिघलती हुई धरती
राख हुए शेषनाग
पाँव पड़ते ही चिनगारियाँ
छोड़ती है चट्टानें
प्रभु तुम कैसे चल रहे हो

मैंने लोगों को बताया
ईसा ने धरती को रहने लायक बनाया
लोगों को विश्वास ही नहीं हुआ
बोला उनमें से किसी एक फौलादी इन्सान ने
तुम्हारा खुदा बेईमान है
और तुम उसके गवाह हो
फिर दूसरे बिना सिर के वर्दी ने
कड़ककर गढ्ढेनुमा जलती आँखों से कहा
बताओं हम उसे दण्ड. देगें
वे मुझे पकड़कर घसीटने लगे
बोले-बोलो तुम्हारा ईश्वर कहा है
मैंने मृत ज्वालामुखी को जोतते हुए
आदमीनुमा एक लौहयंत्र की ओर इशारा किया
उनको विश्वास नहीं हुआ
दंड इनका मुझको मिला
ओ खुदा
बताओं मैंने तुम्हारे विरुद्ध क्या किया


: पचमढ़ी : दो कविताएं


-----------------------------
                                                    डाँ.बलदेव

1
यहाँ जितने लोग नहीं उससे ज्यादा मकान हैं
अधिंकाश खाली हैं बाहर पेड़ो के नीचे / सर्द अंधेरे में
हवाई पट्टी साफ करने वाले लोग ठिठुर रहे हैं
अँगीठी आग / जलती आँखें इन्हें जिलाए रक्खी हैं
इस आग को आदमी ने अपनी हड्डियाँ रगड़कर पैदा किया
जब ये लोग नहीं थे, ये मकान नहीं थे, वह शहर नहीं था
तब भी यह आग थी यह आग पहले पहाड़ों की सन्ध में
अंधी गुफाओं में सुलगती थी
और नीचे तलहटी में बाघ घूमता था
ताजे रक्त की गन्ध आती थी।

जब भी आदमी गुफा से बाहर होना चाहता
बाघ गरज उठता
आँधी आती और बिजलियाँ टूट पड़ती
बारिश घमासान हो जाती

सर्द अंधेरे की कुण्डली कसने लगती
और आग कंझाने लगती
अपना ताप अपनी चमक खोने लगती
और आदमी अपना लहू निचोड़कर / फूँक मार कर
फिर उसे प्रज्जवलित कर देता।

इसी आग के सहारे एक दिन यहाँ तक चला आया था
और बाघ ताकता ही रह गया था

दुनिया इसी आग के सहारे नक्षत्रों की सैर कर आयी
लेकिन आग पैदा करने वाला आदमी
सर्द अंधेरे में सिकुड़ रहा है/ठिठुर रहा है
यह आदमी जब जलती अंगीठी लेकर उठ खड़ा होगा
तब इन आलीशान मकानों का क्या होगा?

2

गुलेल से मार खायी खून से लथपथ रागगिलहरी
जिन्दगी और मौत से किस कदर खेलती है
तेज धार चट्टान से डगाल की ओर फँलागने के बीच
एक हरी पत्ती खून से लथपथ हाण्डी
खोह में कैसे गिरती है?

शरण्य की खोज में
दिन को बिलकुल नजर नहीं आने वाले
किन्तु साँझ को उभर आने वाले शिखरों
गहरी घाटियों में लुकता -छिपता
आहत सूर्य गिरि श्रृंगों से
किस कदर लुढ़कता है लोहूलुहान?
दुःखकातर किरणें सर्द अन्धेरे में
कैसे मुंह छिपा लेती है निःशन्द
राज भवन में ठहरे लोग
यह बात नहीं कि नहीं जानते है
          *

उस आदिवासी लड़की के भीतर का संगीत


-------------------------------------------------------
कार्ड पोस्ट करती, उस आदिवासी लड़की के भीतर
का संगीत
शायद, जाग उठा है, और ठिठककर वह
लाल डिब्बे के पास ही, रुक गयी है

हल्के बैंगनी रंग की अमेरिकन जार्जेट की साड़ी में
लिपटी वह लड़की और वह लाल डिब्बा
काले रंग के बीच लाल लाल
लाल डिब्बा और वह काली लड़की  कैसी मैंचिंग है
वाकई , माडर्न पेन्टिंग है
इसे, इसके भीतर के संगीत को, आदिम संगीत को
फ्लेशगन से शाँट कर सकते हो?

उससे तो ट्रैफिक ही कैच हो सकती
गगन-चुम्बी इमारतें , कंचन जंघा सी सड़कें
पेट्रोल और डीजल की गंध ,और यह नदी

जंगल का संगीत, अंधेरे की कुंडली से छूटकर
उन्मुक्त कंठों में चहचहाता हुआ
सख्त से भी सख्त जमीन से रस खींचकर
दरख्तों में धड़कता हुआ, लता-पुष्पों से
हवा को गंधवाह करता  हुआ
जंगल का संगीत  हरीतिमा की जगमगाती रोशनी में
चौकड़ी भरता हुआ, मांद नदी सी झिलमिलाती

लहरों में
अपने आपको रचता हुआ
दोस्त तुम्हीं बताओ, उस लड़की के भीतर के जंगल को
शाँट कर पाओगे, शारदा चौक में
खड़े होकर ट्रेफिक ही कैच कर पावोगे
लड़की यह नहीं सोचती
काश!चिड़िया होती, और उड़कर
बनजारिन माँ को देख आती, लड़की सोचती है
काश!मन्त्राणी होती और चहक कर
गेंदे से भरे आँगन में हेलीकॉप्टर उतार देती।


समय का केंचुल


----------------------

समय का केचुल अभी अभी उतरा

उजला धुला दिन हुआ बिषहरा
भरी दोपहरी अंध कूप में सूरज डूब मरा

धुँधवाने लगी दिशाएँ लगी आग झोपड़ों में
झुलस गया नन्दन कानन हरा भरा

हवाएं मन्तर मार गई
             बदलियाँ फसलें चाट गई
ऊपर से स्वतंत्र देश का भटका भविष्य
              बोझिल डैने फैलाए कंधे पर उतरा

           *

चौहत्तर पंखुरियों वाले गुलाब

  के प्रति एक और गीत


-----------------------------

कितना जाना है
पथ यह अनजाना है

जंगलों के पार जंगल
              लहराता नीला समुंदर
हरीतिमा की वादियों में
                खो गया दिन का कलेन्डर

चाँद लटका ठूँठ पर है
जुगनुओं का क्या भरोसा
                 फिर भी तो जाना है।
            **


पहाड़


---------   
                                                

स्खलित वसना घाटियों
मत लजाओं
            पास आओ

मैं हूँ धूपगढ़★का
धूप का टुकड़ा
मत जलाओ
            पास आओ

               बजने दो अन्धेरे को
                झिलमिलाती लहरों पर
                चढ़ने दो आग की नदी
                                 गिरि शिखरों पर

                उतरने दो
                 बहने दो
                 अपनी गहराइयों में
                 अतल गहराइयों में

★धूपगढ़ -विश्व प्रसिद्ध पचमढ़ी का चौरस गिरिखंड

                    *

समुद्र


--------
वो खड़ी थी किनारे
था हँसता समन्दर
गिन न सकी लहरों को
तो रोने लगी
                अपने से ही लिपटकर
वो मंजर
वो दूधिया समन्दर
आते हैं याद
रह रह
अन्दर ही अन्दर
अन्दर ही अन्दर
          *

समुद्र


--------

लौट चुके सब/ एक एक कर
लहरें गिनते सिर्फ हमी दो /रुके
हुए क्यों?
कांकरिट की/इस छतरी के नीचे
बाहें भींचे मौन
देख रहे समुद्र /अनन्त नीलिमा
विजन बालु का मीलों फैला/विस्तार दृष्टि भर
देख रहे एक एक कर
लहरों को चूम चूम विदा ले रही/साँझ

घुमड़ रहे बादल / बरस रहे तमचूर्ण
चमत्कृत हैं/तड़ित लताएँ
सुन रहे/असंख्य शंख-सीपियों का सुनील उद्घोष
लहरों का आकुल -व्याकुल शोर
देखते ही देखते / हवा में ठहरी

"त्रकततान त्रकत तान
धरत मीन धेत धड़न्न धा
तिटकत गदिगन "उड़ी टिटहरी
लाल चोंच की / झाऊ बननि की ओर

यहीं कहीं विजन बालु पर
किस सीपी में बन्द
गड़ी पड़ी है ग्रन्थि हमारी।    
        **


संगिनी के प्रति


-----------------

जिनको आकार दिया है तुमने
वे नदी बने, पहाड़ बने
नदी सदा-नीरा

पहाड़
               सदावर्त हरा-भरा
अविराम , घाटियों से गूंजती हो

                  *
जीवन का गान
-----------------

नदी - पिलाएं शीतल जल
और पहाड़
पहाड़ खिलाते मीठे फल
                           (मद्रास से लोटते वक्त)

                *

बच्चों से


----------

मेरे बच्चों भूल भी जाओ मुझको
अच्छा नहीं सोते वक्त मुझे याद करना
मैं हूं भूत याद करोगे तो आऊंगा
कुछ असंभव नहीं मुझको
हर कहीं गति है मेरी

अपने कंधे कर बैठा
सैर परी देश की कराऊंगा
पल में नया सूट पहनाऊंगा
तुम्हारी मुट्ठी में पैसे भर जाऊंगा
फूलों का गुच्छा
सिरहाने रख जाऊंगा
कुछ नहीं असंभव मुझको

लेकिन सोचो
सपने भी कहीं सच होंगे
सोचो नींद टूटेगी
और मैं पकड़ नहीं आऊंगा
स्मृतियों में लहराऊंगा
झूठा ही कहलाऊंगा
इसलिए भूखें रहकर भी
सोने की आदत डालो
दुनिया बहुत बड़ी है
जहां से मेरी यात्रा खत्म हुई
वहीं से तुम्हें शुरू करना है।
             *
कवि: डॉ.बलदेव :- प्रस्तुति: बसन्त राघव साव , पंचवटी नगर, बोईरदादर, रायगढ़, छत्तीसगढ़

टिप्पणियाँ

ब्लॉगर: 1
  1. टाईप मिस्टेक , कृपया डाँ. बलदेव की "संगिनी" एवं "जीवन का गान' कविता को इस रूप में पढ़े
    संगिनी के प्रति
    -----------------
    (डाॅ.बलदेव)

    जिनको आकार दिया है तुमने
    वे नदी बने, पहाड़ बने
    नदी सदा-नीरा

    पहाड़
    सदावर्त हरा-भरा
    अविराम , घाटियों से गूंजता हो

    *
    जीवन का गान
    -----------------

    नदी - पिलाएं शीतल जल
    और पहाड़
    पहाड़ खिलाये मीठे फल
    (मद्रास से लोटते वक्त)

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रचनाकार: डॉ. बलदेव की कविताएं
डॉ. बलदेव की कविताएं
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