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अब आदमी हो जाएगा चुआ। कविताएँ व ग़ज़लें - अविनाश ब्यौहार

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हिंदी गजल

समय निगोड़ा हो जाएगा।
घोड़ा घास नहीं खाएगा।।

उनके आगे टुकड़े डालो,
देखो कितना मुँह बाएगा।

जिन पर हमें भरोसा होगा,
देखो  वही  कहर  ढाएगा।

नफरत की जो आग लगी है,
दमकल  उसे  बुझा पाएगा।

वे कितना भी जोर लगा लें,
डिगा  न  नेकी  को पाएगा।


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हिंदी ग़ज़ल

अहिंसा  आचरण  हो  जाए।
शीलता  बशर  में  बो जाए।।

इस  तरह  गमों  की परछाँई,
हर्ष  उल्लास  में  खो  जाए।

जाग रहा चहल पहल में दिन,
हुई   यामिनी   तो  सो  जाए।

लगते  हैं  हर  पहर  साँप से,
अब दिवस  सँपेरा  हो  जाए।

भादों  आज  झूमकर  बरसे,
जो तपता चित्त भिगो जाए।
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दोहा

प्यार बिकाऊ हो गया, लज्जित रांझा हीर।
इतने पर भी दिख रहे, लोग यहाँ बेपीर।।

चाचा चाची कुछ नहीं, पैसा सबका बाप।
मानवता कितनी बची, नाप सके तो नाप।।

रिश्वत ऐसी चीज है, निर्दोषों को जेल।
अपराधी खेला करें, ज्यों फरेब का खेल।।

आल्हा गाना भूलता, अपना गांव समाज।
रूठ गया संगीत है, दरक गई आवाज।।

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नवगीत

कैसे उड़ता
उम्मीद का सुआ।

नशेमन उजड़ा
कतरे हैं पर।
मांगलिक क्षण
हो गए बेघर।।

कौन दे रहा है
आज बद्दुआ।

है कोपभवन
में नौबहार।
जुड़ेंगे बदगोई
के तार।।

अब आदमी
हो जाएगा चुआ।

टूटती है
पुरवा की सांस।
गम के मेले
न कोई खास।।

सगा नहीँ होगा
देह का रुआ।


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दोहा

वक्त बुरा हो अगर तो, कैसे कोई पास।
देखकर मुँह फेर ले, कितना भी हो खास।।

दीवाली के हाँथ में, दीपों का है थाल।
इक इक दीपक काटता, अंधकार की चाल।।

सावन भादों खोलते, हैं पानी का कोष।
ऐसी वर्षा से मिले, बादल को परितोष।।

गदरायी है धान अब, खेत रह गए दंग।
लग हरीतिमा रही है, मुझको आज अनंग।।

हरियाली ने कर दिया, हरा हरा संसार।
सूखा रोए फफक कर, पानी जीवन सार।।

मेघ गरजे इस तरह, जैसे गरजे शेर।
गर्मी में सूखा पडा़, पावस में है फेर।।

पैसा जीवन से बडा़, पैसे बिन सब सून।
मुद्रा का अभाव है तो, है अपंग कानून।।

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नवगीत

जलमग्र हो गए हैं
नदिया के घाट सभी!

भयावह लगता है
नदी का उफान!
बारिश भी ऐसी है
मानो तूफान!!

बदहवास लगते हैं
पगडण्डी बाट सभी!

आशंका में
डूबा उतराया मन!
खींच लिए किसी ने
फूलों के वसन!!

कैसा वक्त आया
वीरान हैं हाट सभी!
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हिंदी ग़ज़ल

ख्वाहिश का उठे जनाजा है।
खबर अखबार की ताजा है।।

मूल सूद चुकता है फिर भी,
बेजा  है  चूंकि  तकाजा  है।

हम समझे उन्हे बेअदब थे,
नेमत  ने  जिन्हे  नवाजा है।

एक कफन भी जुटा न पाया,
दुनिया  में  खूब  अवाजा है।

लुप्त बन्धु बांधव औ रिश्ते,
लोगों  से  दूर  तवाजा  है।

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नवगीत

हिंदी सुघड़
सलोनी है!

इसमें
लालित्य भरा!
मीठा
साहित्य भरा!!

हिंदी हुई
मघोनी है!

है संस्कृति
का गहना!
निर्झरिणी
सा बहना!!

बोलचाल में
नोनी है!

अरबी-तुर्की-
फारसी!
है भाषा में
आरसी!!

उर्दू बिना
अलोनी है!

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मैने  एक  जमाना  देखा।
इंसा  को तड़पाना देखा।।

जो अपनों से छला गया हो,
वह   कोई   बेगाना   देखा।

चारों ओर भुखमरी फैली,
यों गिद्धों का खाना देखा।

उड़ता  पंछी  मार  गिराए,
गुलेला का निशाना देखा।

जो छाती को छलनी कर दे,
भौजी  का  वो  ताना देखा।

अविनाश ब्यौहार
रायल एस्टेट कटंगी रोड
जबलपुर

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