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चंदा सूरज धरती अंबर लिखने वालों ने लिख डाला - नाथ गोरखपुरी की कविताएँ

01

झूठों की इस बस्ती में ही
मुझको सत्य सिखा जाता है
मन है मेरा सत्य खाल में
मुझको झूठ दिखा जाता है

कवि कल्पित मन ने देखो
सुखिया है संसार लिखा है
सत्य लिखा है झूठ लिखा है
पागल प्रेमी प्यार लिखा है

पर मैं जब भी कलम उठाता
मुझसे भूख लिखा जाता है
झूठों की इस बस्ती में ही
मुझको सत्य सिखा जाता है

चंदा सूरज धरती अंबर
लिखने वालों ने लिख डाला
बरसा बूंदे नदिया सागर
अंबर पनघट है लिख डाला

पर मैं जब भी कलम उठाता
मुझसे प्यास लिखा जाता है
झूठों की इस बस्ती में ही
मुझको सत्य सिखा जाता है

चंचल चितवन नैन नशीले
मीठे-मीठे बैन जोशीले
चलती कमर को वह बलखाती
लेखनी ऐसी है मिल जाती

पर मुझसे कल्पित सुंदरता
ऐसे नहीं लिखा जाता है
झूठों की इस बस्ती में ही
मुझको सत्य सिखा जाता है

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02

जी ले दुनिया दानव बनके ,
नहीं तो अरमान बदल दी जाएगी
जीवन भर तू दुष्ट रहेगा ,
मरने पर पहचान बदल दी जाएगी

दुनिया का बस नियम यही है,
जीते जी वह शैतान कहलायेगा
प्राण पखेरू जहां उड़ेंगे,
बस वह महान बन जाएगा

जिसको दुनिया थूक रही थी ,
उसको गले लगाएगी
लाख बुरा हो जन अच्छा था ,
बस यही बात दोहराएगी

मन में इक जिज्ञासा है
पर 'नाथ' समझ ना आता है,
क्रूर से क्रूर इंसां मरने पर
सज्जन कैसे बन जाता है?

03
हर सुबह इक नई जंग है...
जिंदगी का बस यही रंग है...

मुश्किलों की रेल चल पड़ी है
बस यही रास्ता है सामना कर

तैयार हो जा समाधान ढूंढ ले
देर होगी सुबह से शाम ना कर

जन्म ले लिया है तो बाधाएं मिलेंगी
बाधाओं को दूर करने की कामना कर

सफलता का तो बस यही राज है
लक्ष्य मिलने से पहले आराम ना कर

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04

जब जब इश्क में मातम होगा
दुनिया मुझको याद करेगी
जग के गूंगों बहरों से
मेरी कविता फरियाद करेगी

प्रेम का परिभाषा जब जग के
पैमानों से गढ़ा जाएगा
हवस प्रेम का चोला ओढ़े
अपना कुनबा फैलाएगा

प्रेम दीवाने दुनिया की
जब गलियों में ही खो जायेंगे
सज्जन इस धरती के सारे
आंख मूंद कर सो जाएंगे

स्वार्थ प्रेम की अभिलाषा ही
फिर जग को बर्बाद करेगी
जब जब इश्क में मातम होगा
दुनिया मुझको याद करेगी

05

उसको रखना जरा, और भी प्यार से
आया पंखों को जो, अपने खुद हार के

उस परिन्दे को तेरी जरुरत है सुन
जो है घायल हुआ इस संसार से

जो परिंदा उड़ा ख्वाब को बांध के
अपने पंखों को जो आजमाने लगा

ओ उड़ा ओ उड़ा पुरी शिद्दत से
क्यूं अचानक उसे डर सताने लगा

उसको जाकर कि  हौसला देना तुम
छोड़ देना कहीं जग को मन मार के
उसको रखना जरा, और भी प्यार से
आया पंखों को जो, अपने खुद हार के

-  नाथ गोरखपुरी

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