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दीपक दीक्षित का आलेख - लकीर के फ़कीर

dípak díkhchit


लकीर के फ़कीर

अंगरेजी कवियत्री डोरोथी हेमंस की लगभग 100 साल पहले लिखी एक प्रसिद्द मार्मिक कविता का बालक पात्र केसबियंका धीरे धीरे अपने जहाज पर लगी आग में झुलस कर मर जाता है क्योंकि उसके पिता जो मर चुके थे उससे कह कर गए थे कि वह उनके आदेश के बिना अपनी जगह से न हिले और उसे उसके मरे हुए पिता का आदेश कभी मिल ही नहीं सका।

जब मैं किसी धार्मिक अतिवादी (वो चाहे किसी भी धर्म का हो )से मिलता हूँ या उसके बारे में सुनता हूँ तो अक्सर मुझे यह कविता याद आती है और साथ ही उस पर दया भी आती है ।

ये लोग अक्सर हज़ारों साल पहले लिखी गयी अपनी किसी धार्मिक किताब के कुछ जुमले (जो अक्सर अप्रसंगिक और कांट - छाँट कर निकाले गए होते हैं) या फिर एक अरसे से चली आई परम्पराओं की दुहाई देकर अपने कृत्यों को उचित ठहराते हैं और उन लोगों से भिड़ जाते हैं जो आधुनिकीकरण की दौड़ में इनको समझाने की कोशिश करते हैं कि उन्हें इन प्रथाओं को छोड़ देना चाहिए या उस सूत्र /व्याख्यान को नए परिप्रेक्ष्य में समझने का प्रयास करना चाहिए। ये लोक बिल्कुल अंग्रेजी कविता के चरित्र ,छोटे बच्चे केसबियंका की तरह ही हैं जो जल कर मर भी जायेंगे पर अपनी जगह से टस से मस नहीं होंगे। अत: इनसे विवाद करना बेमानी है।

कई बार ऐसी स्थिति में इन पर बल प्रयोग नितांत आवश्यक और न्याय संगत हो जाता है। ऐसी विशेष स्तिथियों में इनके लिए मानवाधिकारों की चिंता करने वाले लोगों और संस्थाओं को बृहतर परिप्रेक्ष्य में देखते हुए इन पर उचित मात्रा में बल प्रयोग की स्वीकृत सरकार या सामाजिक संस्थाओं को दे देनी चाहिए।

धार्मिक पुस्तकों में शताब्दियों पहले गूढ़ बातें अक्सर सांकेतिक रूप से कहीं गईं थी और ऐसे उदाहरण दिए गए थे जो उस समय जब ये लिखी जा रही थीं लोगों या समुदाय के लिए जिनके लिए ये लिखी जा रही थी बिलकुल सटीक थे। इसी तरह प्राचीन परम्पराएं जब ये किसी समझदार व्यक्ति द्वारा आरम्भ की गयी होंगी तब एक स्वस्थ सामाजिक पहल रही होंगी ,पर अब हज़ारों साल बाद और परिवर्तित जीवन शैली के चलते धार्मिक पुस्तकों और की पूजा करने और परम्पराओं को लकीर के फ़कीर की तरह अंधानुकरण करने के बजाय उन पर अनुसन्धान और विवेचना की आवश्यकता है।

दीपक दीक्षित

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