नाका - विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, लोकप्रिय ई-पत्रिका. 

विविध विधाओं में से चुनकर पढ़ें -

* कहानी  || * उपन्यास || * हास्य-व्यंग्य  || * कविता  || * आलेख  || * लोककथा  || * लघुकथा  || * ग़ज़ल  || * संस्मरण  || * साहित्य समाचार  || * कला जगत  || * पाक कला  || * हास-परिहास  || * नाटक  || * बाल कथा  || * विज्ञान कथा  ||  * समीक्षा  ||

---***---

यहाँ की विशाल ऑनलाइन लाइब्रेरी में मनपसंद रचनाकार अथवा रचनाएँ खोज कर पढ़ें -

 नाका में प्रकाशनार्थ  रचनाएं इस पते पर ईमेल करें : rachanakar@gmail.com  रचनाकार के वाट्सएप्प नंबर 8989162192 (कृपया कॉल नहीं करें, कॉल रिसीव नहीं होगी, तथा इसका उपयोग केवल प्रकाशनार्थ रचना भेजने के लिए ही करें) पर भी वाट्सएप्प से रचनाएँ अथवा रचना पाठ के वीडियो प्रकाशनार्थ भेजे जा सकते हैं. अधिक जानकारी के लिए यह पृष्ठ [लिंक] देखें.

--

डॉ.कविता भट्ट की कविताएँ

image

-0-

1-उम्मीद की नदी-डॉ.कविता भट्ट

क़ामयाबी भिखारन हुई; कि मुठ्ठियाँ भिंची हुई हैं।

खोजो न कोई हमदर्द, कि तलवारें खिंची हुई हैं।


हुनर सरेआम ठोकरें खाता यहाँ, फुटपाथ पर।

कौड़ियों का हुस्न हावी है, इश्को- जज़्बात पर।


महफिलें उठ चुकीं, पर्दा भी गिर गया साहब।

कौन किसकी बात कहे, जब है ज़ुबाँ गायब।


यह शहर हो चुका है-  अंधा, गूँगा और बहरा।

मन के राग गाना जुर्म, सपनों पर घोर पहरा।


मगर उम्मीद वह नदी है, जो सागर तक जाएगी।

घने  अँधियारे में भी, गरिमा सँवर कर दिखाएगी।

-0-

2- किंकर्त्तव्यविमूढ़- डॉ.कविता भट्ट

अब जमने लगा-

आँखों में ही खारा समंदर।

गुमसुम से हैं होंठ;

मुझे पता है, मैं विलग हो रही हूँ।

शब्दों से और हाँ अर्थों से भी;

सम्भवतः शब्दों ने गरिमा खो दी;

और अर्थ तो शब्द से ही हैं।

क्या कहें इसे?

वितृष्णा या दुर्बलता?

सांसारिकता या आध्यात्मिकता?

या केवल निष्ठुर कालचक्र।

अथवा मेरी हठधर्मिता?

किंकर्त्तव्यविमूढ़ हूँ।

-0-

mrs.kavitabhatt@gmail.com

0 टिप्पणियाँ

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.