शिक्षा- प्रयोग बन्द हो पहले, फिर आयेंगी गुणवत्ता - डॉ. हंसा व्यास

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चारों तरफ से एक ही आवाज शिक्षा की गुणवत्ता का स्तर गिर रहा है। पर हैरान करने वाली बात यह है कि स्कूल से लेकर यहां विद्यालय और विश्वविद्यालय ...

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चारों तरफ से एक ही आवाज शिक्षा की गुणवत्ता का स्तर गिर रहा है। पर हैरान करने वाली बात यह है कि स्कूल से लेकर यहां विद्यालय और विश्वविद्यालय बारिश के कुकुरमुत्ते की तरह चारों ओर उग रहे हैं। जब गली-आंगन में स्कूल हैं, चौक-चौराहों पर महाविद्यालय हैं और अगगिनत विश्वविद्यालय हैं तो शिक्षा की गुणवत्ता कहाँ गुम हो रही है। चारों तरफ इंटरनेट का जाल बिछा हुआ है। मोबाइल, लैपटाप जेब में लेकर घूम रहे हैं। दुनिया के तमाम संसाधनों के बीच हम सांस ले रहे हैं, फिर आखिर कहाँ चूक हो रही है।

''गौतम बुद्व के अनुसार दुःख के कारण को तलाश कर उसका समूल नाश करने से समस्या का सकारात्मक समाधान होगा।''

शिक्षा व्यवस्था की गिरती गुणवत्ता के मूल को समझने के लिये यह कहानी समझनी पड़ेगी-कुछ नन्हीं चीटिंया रोज अपना काम बिना थकें बिना रूके कर रही थीं, खुश थी काम की प्रोडक्टिविटि और गुणवत्ता उच्च स्तरीय थी तभी जंगल के राजा ने देखा चीटिंया बिना किसी निरीक्षण के काम कर रही थी। उसने सोचा यदि इनके निरीक्षण के लिये सुपरवाईजर की नियुक्ति कर दी जाये तो काम और अधिक गुणवत्ता वाला होगा साथ ही प्रोडक्टिविटि दुगनी हो जायेगी। उसने सुपरवाईजर नियुक्त कर दिया। उसने आने का, लंच का जाने का समय और अटेडेंस का रजिस्टर बनाया, बायोमेट्रिक मशीन लगाई, मोबाइल पर एवं अपडेट किया और अपनी प्रतिदिन की रिपोर्ट बनाने के लिये कम्प्यूटर आपरेटर रखा, ब्राड बैंड कनेक्शन करवाया। फोन रिसिव करने और रिकार्ड मेंटन करने के लिये एक कर्मचारी नियुक्त किया। आई.टी. सेल के लिये अधिकारी नियुक्त किया। गुणवत्ता के लिये रोज मीटिंग्स होने लगी। मीटींग्स के लिये ए.सी, कार्पेट, गोल मेज, प्रोजेक्टर युक्त सर्व सुविधा वाला मीटिंग्स हाल बनाया गया। मीटिंग्स करने और उसके रिकार्ड के लिये फिर एक अधिकारी नियुक्त किया।

अब प्रोडक्टिविटी जानने के लिये तमाम आंकड़ो का तथा रजिस्टर में दर्ज रिकार्ड का एनालिसिस किया गया। पता चला गुणवत्ता निम्नतम स्तर पर पहुँच गई और प्रोडक्टिविटी का प्रतिशत पहले की तुलना में गिरकर दो प्रतिशत रह गया। अब राजा ने प्रायवेट कंसलटेंट को उत्पादकता बढ़ाने के लिये नियुक्त किया। उसने 6 महीने अध्ययन करने के बाद अपनी 1000 पृष्ठ की रिपोर्ट में उल्लेखित किया कि-

(1) चीटियों के विभाग में कर्मचारियाँ की संख्या अधिक है।

(2) मेहनत कश चीटिंयों में वर्क कल्चर समाप्त हो गया है और उनमें टीमवर्क, मोटी वेशन की कमी हैं। साथ ही उनका व्यवहार नकारात्मक

अतः चिटिंयो को निकाल दिया गया...............

इसका परिणाम हम बहुत अच्छे से समझ सकते हैं कि क्या हुआ होगा। क्योंकि वे चीटिंया जो लगातार काम कर रही थी उनका अधिकांश समय मीटिंग्स और रिकार्ड बनाने में लग रहा था। मूल काम का उनके पास समय ही नहीं था। अब जरा उस समय पर नजर दौड़ाइये जब 50-55 वर्ष के लोगों की पीढ़ी ने पढ़ाई की............क्या तब व्यक्तित्व विकास प्रकोष्ठ, कैरियर कांउसलिग प्रकोष्ठ, रोजगार प्रकोष्ठ, आनन्दम प्रकोष्ठ होते थे ? नहीं बिल्कुल नहीं होते थे। शिक्षकों की कोई अटेन्डेन्स नहीं होती थी। जनगणमन की एसेम्बली ही शिक्षक और विद्यार्थी की उपस्थिति का पैमाना होती थी। स्कूल का दरवाजा एसेम्बली के दस मिनट बाद बंद हो जाता था। चौकीदार काका ही आने-जाने वाले के लिये दरवाजा खोलते थे। प्रधान शिक्षक पूर्ण नैतिक जिम्मेदारी के साथ सम्पूर्ण संस्था को परिवार मानकर चलाते थे और एक टाइम टेबल होता था जिसके अनुसार पढ़ाई होती थी। शरारत करने पर मुर्गा बनते हुये, कुरसी बनते हुए, ऊठके-बैठक लगाते हुये और बेशरम की छड़ी से पिटते हुए अपने साथियों को सबने देखा होगा। टाटपट्टी बिछाना, बागवानी करना, व्यायाम करना शिक्षक की टेबल साफ करना पाठ्यक्रम का अनिवार्य हिस्सा होता था।

21वीं सदी में इस व्यवस्था की बात करना बिल्कुल भी बेमानी नहीं हैं क्योंकि तब हमारे पास काम करने की सृजनात्मक विचार धारा थी। आज बिना मेहनत के नेट खोला और सामग्री हमारे पास दिमाग को मेहनत ही नहीं करना है। न लिखने की न पढ़ने की।

आज हमारा शिक्षक यही तो कर रहा हैं, रजिस्टर में आंकड़े दर्ज कर रहा है। बैठक में इधर से उधर भाग रहा हैं। मध्यान्ह भोजन में लगा हुआ है। जन गणना, पशुगणना चुनाव, बाढ़, पोलियों, रैली और राजनैतिक कार्यक्रमों में बच्चों को ले जाना बस यही काम बचा है।

मैं हैरान हूँ जिस शिक्षक के हाथ में चाक-डस्टर होना चाहिये वो घर-घर जाकर जन गणना, पशु, गणना कर रहा है, पोलियो ड्राप पिला रहा हैं, आंकड़ों को मेन्टेन कर रहा है और वो समाज चुपचाप देख रहा है जो अपने बच्चों का भविष्य बनाने के लिये स्कूल, कॉलेज छोड़कर आ रहा हैं। बच्चों की क्लास में शिक्षक नहीं और समाज बेखबर। क्योंकि मुफ्त की आदत ने उसकी सोचने समझने की शक्ति को ही खत्म कर दिया और बची खुची कसर सोशल मीडिया ने पूरी कर दी।

मेरा सवाल उस पीढ़ी से हैं जो अभी शिक्षा व्यवस्था से जुड़े तमाम आयोगों के अध्यक्ष बने हुए हैं। क्या उनके पढ़ाई के समय में नैक का मूल्यांकन लाखों रूपये फीस चुकार कर होते हुए उन्होंने देखा ? क्या प्रति सप्ताह प्राथमिक कक्षा से लेकर हायर सेकन्ड्री तक उन्होंने टेस्ट/परीक्षा का दबाव झेला ? क्या उन्होंने सोशल मीडिया के मकड़ जाल से घिर कर पढ़ाई की ? क्या उनके समय में सूचनाओं का विस्फोट था ?

इन सब सवालों का जबाव केवल नहीं है। जितना इतिहास मैंने पढ़ा हैं उसमें कहीं भी नालन्दा, तक्षशिला, विक्रम शिला जैसे विश्वविद्यालयों में, सांदीपनी जैसे गुरूकुल में कभी इस तरह का मूल्यांकन किया गया हो सन्दर्भ नहीं मिलते पर यह सन्दर्भ जरूर मिलते हैं कि शिक्षा अनुशासित वातावरण में ज्ञान-विज्ञान के सन्दर्भों के साथ नैतिक मूल्यों को समाहित कर के दी जाती रही है।

आज शिक्षा आंकड़ों के जाल में फंसती जा रही हैं। शिक्षा ऐसी हो जो इन्सान को बांटे नहीं। शिक्षा मनुष्य की मानवता को जीवित रखे। शिक्षा मनुष्य को प्राणिमात्र के लिये संवेदन शील बनाये। शिक्षा एकता, समानता और बन्धुत्व का संदेश दे। ज्ञान मनुष्य का तीसरा नेत्र है। भारतीय दृष्टिकोण से शिक्षा का अर्थ है आत्म-साक्षात्कार, आत्मशुद्धि, आत्मखोज, बन्धनों से मुक्ति, सदुणों का विकास तथा मनुष्य के अन्दर छिपे देवत्व को प्राप्त करना। शिक्षा के द्वारा मनुष्य अपनी पाशविक प्रवृत्तियों को परिशुद्ध कर मानवीय गुणों को प्राप्त करता हैं। शिक्षा मनुष्य को देवत्व के स्तर तक ले जाने वाली प्रक्रिया है। भारतीय दृष्टि से शिक्षा में आध्यात्मिक विचारों, चरित्र-निर्माण तथा ज्ञान का प्रभाव झलकता है। भारतीय विचारधारा में शिक्षा के अन्तर्गत दार्शनिक चिन्तन का प्राधान्य है। शिक्षा मनुष्य के जीवन में रूपान्तरण कर उसे उदात्त गुणों से मण्डित करती हैं। शिक्षा का उद्देश्य अच्छे इन्सानों का निर्माण करना है। शिक्षा के माध्यम से हम अपने वैयक्तिक, भौतिक, सामाजिक तथा आध्यात्मिक जीवन का विकास कर सकते हैं और जीवन को मधुर एवं कलात्मक बना सकते हैं।

भारतीय दार्शनिकों तथा चिन्तकों के समान पाश्चात्य मनीषियों ने भी शिक्षा पर गम्भीर चिन्तन किया हैं। तथा शिक्षा सम्बन्धी विचारों को रूपायित किया है। अंग्रेजी में शिक्षा को Education कहते हैं। Education शब्द की व्युत्पत्ति लैटिन के तीन शब्दों से हुई है, वे शब्द हैं- Educatum Educare और Educere

Educatum शब्द E+Duco से मिलकर बना है। E का अर्थ अन्दर से तथा Duco का अर्थ है बाहर लाना। इस प्रकार Educatum का अर्थ है अन्दर से बाहर लाना। इस सन्दर्भ में शिक्षा का अर्थ है व्यक्ति की आन्तरिक शक्तियों को बाहर की ओर विकसित करना। मनुष्य जन्म से ही कुछ शक्तियों को लेकर पैदा होता है, उन शक्तियों को विकसित करना या सुधारना ही शिक्षा हैं।

Educatum का दूसरा अर्थ है ‘An act of teaching or training’ अर्थात् प्रशिक्षण का कार्य या विशिष्ट कलाओं का विकास करना।

Educatum के समान दूसरा शब्द है Educare जिसका अर्थ है to bring up, to nourish, to rear अर्थात् पालन-पोषण करना, संवर्धन करना या वृद्धि करना। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि शिक्षा व्यक्ति का संवर्धन करती हैं।

Educere का अर्थ हैं To lead out, to bring fourth, to draw out. इस व्यख्या से स्पष्ट होता है कि शिक्षा व्यक्ति के जन्मजात गुणों को जागृत कर उनका विकास करती हैं। प्लेटों के अनुसार शिक्षा-''व्यक्ति के शरीर और आत्मा को जागृत करना तथा उन्हें पूर्णता की ओर ले जाना ही शिक्षा है।''

''नहि ज्ञानने सदृशं पवित्रमिह विद्यते''

डॉ. हंसा व्यास

प्राध्यापक

शा. नर्मदा महाविद्यालय

होशंगाबाद

E-mail:-hansa.vyas@rediffgmail.com

नाम

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तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,2,बाल उपन्यास,6,बाल कथा,356,बाल कलम,26,बाल दिवस,4,बालकथा,80,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,20,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,31,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड फाइनमेन,1,रिलायंस इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,288,लघुकथा,1340,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,241,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,20,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,378,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,79,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,2075,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,730,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,847,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,21,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,98,साहित्यम्,6,साहित्यिक गतिविधियाँ,216,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,78,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi 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रचनाकार: शिक्षा- प्रयोग बन्द हो पहले, फिर आयेंगी गुणवत्ता - डॉ. हंसा व्यास
शिक्षा- प्रयोग बन्द हो पहले, फिर आयेंगी गुणवत्ता - डॉ. हंसा व्यास
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