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भूख की बेटी पलकर ज्यूँही जवान हुई, रोटी उसको बुरी नजर से ताक रही है । तेजपाल सिंह 'तेज' की कुछ ग़ज़लें

तेजपाल सिंह 'तेज' की कुछ ग़ज़लें


-एक-

स्मृति में हम पल-पल कटुता ढोते हैं,
कसकर गाँठ दुखों की जगते-सोते हैं ।

पीकर घूँट हताशा और निराशा का,
जीवन-भर मृत्यु का बोझा ढोते हैं ।

जाने वाला चला गया जाने कब का,
याद में उसकी मिथ्या हँसते-रोते हैं ।

महलों में हलचल है नई हवाओं की,
छप्पर बूढ़ी संस्कृति को ढोते हैं ।

उजियारों की 'तेज` गोद ही खाली है,
अँधियारों के अनहद नाती-पोते हैं ।


-दो-


क्या कहें कि कैसे पलते हैं,
हम हर पल भेस बदलते हैं ।

आग हुई चूल्हों की ठंडी,
अब दिल मानव के जलते हैं ।

प्रेम-अमृत की खोज में हरसू,
द्वेष का ज़हर उगलते हैं ।

कल आग पे चलना मुश्किल था,
अब नित्य आग पर चलते हैं ।

अब दीप दिलों के शून्य हुए,
नफरत के दीपक जलते हैं ।

-तीन-


मौसमों की तरह, आता-जाता है बरस,
जुगनुओं की तरह, जगता-सोता है बरस ।

दिन को तो अन्धेरों का गुमाँ देता है,
रातों को दिन का, राग सुनाता है बरस ।

अबकी बरस, तारे जमीं पे निकलेंगे,
कैसे-कैसे हसीं ख़्वाब, दिखाता है बरस ।

धरती को नित फलने की दुआ देता है,
आसमां को समन्दर में डुबोता है बरस ।

बच्चों को नये साल की टाफी देकर,
रिन्दों की गली घूमता फिरता है बरस ।
   

   -चार-


दिल अपना पाषाण किया है,
मानव-मन बलिदान किया है ।

अमृत की बून्दों को तरसे,
हारे-मन विषपान किया है ।

सोलह दूनी आठ किये पर,
पास हरेक इम्तिहान किया  है ।

काले दिन काली रातों में,
क़िस्मत का निर्माण किया है ।

गाँवों की पावन मिट्टी का,
शहरों ने अपमान किया है ।

-पाँच-


नए दौर में बन्धन सारे टूट गए,
रिश्ते-नाते सभी पुराने टूट गए ।

यूँ गुज़री तहज़ीब ज़माने से यारब,
मानवता के सभी किनारे टूट गए ।
 
  इतने तेज चले मंजिल की चाहत में,
सरे-राह सब  ठौर-ठिकाने छूट गए ।

बोकर बीज बाँझ धरती में सियासतदाँ,
ख़्वाब दिखाकर दोपहरी में लूट  गए ।

नहीं चहकती अब पीपल पर गौरैया,
'तेज` हवा में सभी घौंसले  टूट गए ।

-छ: -

राजनीति चूल्हे पर चढ़के नाच रही है,
और चूल्हे-वाली महँगाई से काँप रही है ।

चूल्हे तक जाने को उसको नमक चाहिए,
पर बेचारी भाषण खाकर नाच रही है ।

भरने का अभी प्रश्न कहाँ कि सदियों से,
सत्ता भूखे पेट की खाई नाप रही है ।

भूख की बेटी पलकर ज्यूँही जवान हुई,
रोटी उसको बुरी नजर से ताक रही है ।

झोंपड़ियों की चित्कारें  अब तेज़  हुई हैं,
कि परिवर्तन की कुछ जिज्ञासा जाग रही है ।


-सात-

काँव-काँव सुनकर कौओं की, कोयल गाना भूल गई,
गौरैया की जीभ कटी कि अलख जगाना भूल गई ।

उल्लू घर की छत पर उतरे, सूरज के उजियारे में,
दिन का दामन स्याह हुआ कि रात ठिकाना भूल गई ।

चिड़ीमार के कंधों पर हैं बाजों के परिवार बसे,
ओझल हुआ कबूतरा कि अब मैना गाना भूल गई ।

इतना ज़हर उड़ेला हमने, सागर तक न पचा सका,
परबत चढ़ी मछरिया, सारस  चोंच लड़ाना भूल गई ।

जैसे सब संताप मिटे यां 'तेज`धर्म के चक्कर में,
बच्चा भूल गया माँ को, माँ दूध पिलाना भूल गई ।


-आठ-


कोई बिचारा ख़त लिखता है,
ख़त में अपना क़द लिखता है ।

धरती को लिखता है अम्बर,
अम्बर को सरहद लिखता है ।

खेतों-खलिहानों को जंगल,
बस्ती को मरघट लिखता है ।

फूलों को कांटों का बिस्तर,
कांटों को मसनद लिखता है ।

मस्जिद को लिखता है मन्दिर,
मन्दिर को मस्जिद लिखता है ।

चंदा को लिखता है रोटी,
रोटी को मकसद लिखता है ।

-नौ-


अब भरता नहीं उड़ान कबूतर क्यों है,
आँखों में उसकी तल्ख़ समन्दर क्यों है?

सिर पर मिरी गागर नहीं, आकाश है,
फिर बता तिरे हाथ  में पत्थर क्यों है?

मैं ही तेरे शहर की बुनियाद हूँ लेकिन,
शहर से  मेरी झोंपड़ी हटकर क्यों है?

बादलों की गोद में सावन उदास है,
बरसात में भी घर मेरा बंजर क्यों है?

महलों में रहकर भी उन्हें शिकवा है, कि
घर मिरा धूप-छाँव का दफ्तर क्यों है?


-दस-

थाम आँधियाँ भीड़ खड़ी है सड़कों पर,
एक-दूजे की नज़र गढ़ी है सड़कों पर ।

बस्ती-बस्ती धुआँ-धुआँ है चौतरफ़ा,
नाक मूँदकर मौत खड़ी है सड़कों पर ।

शासन में आसन की खातिर रावण-सेना.
राम-पताका लिए खड़ी है सड़कों पर ।

आये दिन भूखे-नंगों से राजनीति,
करने दो-दो हाथ खड़ी है सड़कों पर ।

दिल्ली की सड़कें भी हैं आवारा 'तेज`
बटन खोल तहज़ीब खड़ी है सड़कों पर ।
 


(मेरे ग़ज़ल स्ंग्रह 'दृष्टिकोण' से उद्धृत)


  तेजपाल सिंह 'तेज’ (जन्म 1949) की गजल, कविता, और विचार-विमर्श की लगभग दो दर्जन किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं - दृष्टिकोण, ट्रैफिक जाम है, गुजरा हूँ जिधर से, हादसों के शहर में, तूंफ़ाँ की ज़द में ( गजल संग्रह), बेताल दृष्टि,  पुश्तैनी पीड़ा आदि  (कविता संग्रह),  रुन - झुन, खेल - खेल में,  धमाचौकड़ी आदि ( बालगीत), कहाँ गई वो दिल्ली वाली ( शब्द चित्र), पांच निबन्ध संग्रह  और अन्य। तेजपाल सिंह साप्ताहिक पत्र ग्रीन सत्ता का साहित्य संपादक, चर्चित पत्रिका अपेक्षा का उपसंपादक, आजीवक विजन का प्रधान संपादक तथा अधिकार दर्पण नामक त्रैमासिक का संपादक भी रहे हैं। स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त होकर आप इन दिनों स्वतंत्र लेखन के रत हैं। हिन्दी अकादमी (दिल्ली) द्वारा बाल साहित्य पुरस्कार ( 1995-96) तथा साहित्यकार सम्मान (2006-2007) से भी आप सम्मानित किए जा चुके हैं।

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