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** प्रेम को सार्थक करते गीत ** - डॉ आर बी भण्डारकर।


डॉ शिवदास पाण्डेय जी से मेरा निकट परिचय तो 4 वर्ष का ही रहा है पर वह परिचय,परिचय कम  यह भ्रातृत्व-भाव अधिक रहा।मेरे व्यक्तिगत जीवन में भी और साहित्यिक जीवन में उनकी भूमिका बड़े भाई सह मार्गदर्शक की रही। परिचय, प्रेम,आत्मीयता ऐसी कि आज लगभग हजार किलोमीटर दूर होने के बाद भी वह जस की तस है।

मैंने डॉ पाण्डेय को मूलतः गीतकार जाना और माना है। यद्यपि उनके अनेक उपन्यास भी साहित्य जगत में अपना विशिष्ट स्थान रखते हैं,समान भाव से उनका आलोचना में भी उल्लेखनीय दखल है पर आज भी देश के साहित्य-जगत में उनका गीतकार ही अधिक दमदार उपस्थिति रखता है। मैंने डॉ पाण्डेय को अनेक बार मंच पर,उनके घर पर,अपने स्टूडियो में गीत पढ़ते सुना है,इसलिए अधिकार पूर्वक कहना चाहूँगा कि उनके गीत हमें लोक की सैर के साथ अलौकिक जगत की आनंदानुभूति कराते हैं।

उनके प्रेम गीतों के बारे में प्रख्यात प्राध्यापक और रस-कवि प्रो महेंद्र मधुकर का यह कथन यहाँ दुहराना समीचीन है- " ये प्रेमगीत विविध मनोदशाओं के गीत हैं। इनमें उत्फुल्लता है तो एक गहरा अवसाद भी,स्मृतियों का तानाबाना है तो मनुहार भी,आकांक्षाओं और ऐषणाओं का द्वद्व भी;पीड़ाओं का दंश है तो जिजीविषा का अमृत- स्पर्श भी। ये आत्म मंथन से आत्मबोध तक पहुँचने के सोपान बन जाते हैं।" मुझे इस स्थिति को लौकिक से अलौकिक की यात्रा  मानने में किंचित भी संकोच नहीं है।
पहले के आचार्यों ने पुरुषार्थ चतुष्टय को, काव्य प्रयोजन के केंद्र में रखा।इसके अलावे काव्य सृजन में महत्त्वपूर्ण केंद्र बना-
"व्यवहारविदे शिवेतरक्षतये।" और भी कि "सद्यः परनिर्वृतये कान्तासम्मिततयोपदेशयुजे।"(मम्मट) इस लौकिक संसार में
  व्यवहार-ज्ञान,अमंगल का नाश,दुख दूर रहें और सदैव आनंद ही आनन्द बरसता रहे;ऐसा कौन नहीं चाहता ?यह चाहता है तभी तो मनुष्य लोक का प्राणी है। इस बात से भी असहमत नहीं हुआ जा सकता कि काव्य मधुर भाषिणी पत्नी की तरह हित अनहित का ज्ञान कराने वाला होना चाहिए।डॉ पाण्डेय के ग्रंथ "मैंने यों प्यार किया"में यत्र-तंत्र इन सबकी उपस्थिति दृश्यमान है।


पुस्तक के रूप में मैंने पहले पहल उनका गीत संग्रह " सागर मथा कितनी बार" पढ़ा। उन्हीं के शब्दों में-" जब सत और असत शक्तियों के स्वार्थ किसी प्रकार एक साधन से सधने की स्थिति में हो जाते हैं तो क्षार सागर नहीं क्षीरसागर ही मथा ही जाता है।"यह लोक की सच्चाई है। सच्चा कवि इसको ही उदघाटित करता है। हित अनहित का नीर-क्षीर विवेक करता है-
"कभी कभी जब राह भूल जाता है कोई पंछी
अंधेरी रात के घटाटोप में
सागर के लहराते वक्ष पर पंख फड़फड़ाता
कभी उड़ता, कभी थकता,कभी लड़खड़ाता।
या कभी कभी जब गिर जाता कोई मेमना
किसी सर्द रात को किसी अंधेरे कूप में
कभी उछलता,कभी फिसलता
कभी थरथराता,कभी छटपटाता।
जब सर्द में न बह पाना अवशता होती है
और दर्द में न रह पाना विवशता होती है,
तो भूल जाता है वह पंछी और वह मेमना
रोने,हँसने या चिल्लाने की भाषा।
फिर भी न जाने क्यों दूर-बहुत दूर
आवाज गूँजती है
उसकी ओर टिमटिमाती दीखती है
प्रतीक्षा में जलती उसके अंतर की आशा।"
एक प्रेम-आश में जग की हक़ीक़त बयाँ है। पाठक से स्थितियों का अनिर्वचनीय तादात्म्य बनता है।

आहार,निद्रा,काम और भय यह चार मूल मनोभाव कहे जाते हैं। प्रेम काम का ही एक तत्त्व-रूप है। अस्तु प्रेम सदैव कविता का एक प्रिय विषय रहा है। हिंदी काव्य में प्रेम के स्थूल और अलौकिक दोनों रूप विद्यमान हैं। दैहिक काम केंद्रित कविता का अपना सौंदर्य है तो लौकिक से अलौकिक का साक्षात्कार कराने वाला काव्य शाश्वत काव्य बना।"मैंने यों प्यार किया " गीत संग्रह में पाण्डेय जी ने लौकिक प्रेम के बिबिध आयाम प्रस्तुत किये हैं पर वे निर्मल प्रेम की धवल छबि हैं। एक बात यह भी ध्यातव्य है कि  डॉ पांडेय के इन गीतों में कहीं कहीं  आज की व्यवस्था में जीवन यापन कर रहे आम आदमी का दर्द भी उभर आया है-
"तुम्हें चाहने  की सजा मिली
न खुदा मिला न खुदी मिली।
तुम्हें चाह कर यूँ लगा मुझे
कि खुदा से खुद का प्यार था।
+  +  +  +  +  +  +   +  +
तुम्हे देखकर उस पार मैं
रुक खड़ा रहा न किनार पर
मैंने ज़िंदगी की नाव को
लहरा दिया मंझधार पर।"

हृदय निर्मल होना कठिन होता है लेकिन जब वह निर्मल हो जाता है तो उसमें वह मन अवस्थित हो जाता है जो कर्त्ता को प्रेय रहा है। डॉ शिवदास पांडेय के गीत निश्छल,तरल,भाव विभोर और पारदर्शी मन की स्वाभाविक उपज हैं। यह सीधे उस मन से उद्भूत हैं परम् पावन है, जो कामना सहित होकर भी  निष्काम हो गया है। कवि के बहुआयामी गीत पुस्तक के शीर्षक को सार्थक करते हैं। इस संग्रह के गीतों का चयन,संकलन और सम्पादन निष्णात प्राध्यापक और हिंदी-जगत के विख्यात आलोचक प्रो रेवतीरमण द्वारा किया जाना स्तुत्य है। उनका सम्पादकीय वक्तव्य गीतों को निर्मल आईना है। संकलित गीतों का उनके द्वारा किया तार्किक विवेचन पठनीय है।
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समीक्षित कृति-
मैंने यों प्यार किया(प्रेम गीत)
गीतकार-डॉ शिवदास पाण्डेय
चयन,संकलन,सम्पादन-प्रो.(डॉ)रेवतीरमण
प्रकाशन-अभिधा प्रकाशन मुजफ्फरपुर
संस्करण 2018

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