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हाशिए पर प्रेम लिखना - डॉ. कविता भट्ट की कविताएँ

1-चाँद हथेली पर

डॉ. कविता भट्ट

चाँद हथेली पर उग नहीं सका
सपनों वाली निशा से थी आशा

अश्रु-जल से बहुत सींची धरा
रेखाओं की मिट्टी न थी उर्वरा

खोद डाली बीहड़ की बाधा
मरु में परिश्रम अथाह बोया

रानियों के कारागृह में है या
मेरी हथेली सच में बंजर क्या

समय से संघर्ष है रेखाओं का
स्वप्न- निशा न आएगी है पता

किन्तु जाने क्यों मन नहीं मानता
हथेली पर चाँद उगाना ही चाहता

शुभकामनाएँ- सपने देखते रहना
निष्ठा से चाँद उगेगा- चाँदनी देगा

कल्पना पर तो वश है ही तुम्हारा
ओह! चाँद असीम चाँदनी लाया
-0-


2-हाशिए पर प्रेम लिखना
डॉ. कविता भट्ट

एक शाम;
आँखें नम
दिल की ज़मीं भीगी हुई,
महसूस की मेरे ग़मों की गन्ध
और उसने बोया- 
प्रेमबीज।
प्रतिदिन स्वप्नजल से सींचकर,
चुम्बनों से उर्वरा करता रहा
बिन अपेक्षा ही मरुधरा को।
आज मेरी आँखों में-
वही शख़्स खोजता है-
प्रेम का वटवृक्ष, हाँ।
ऊसरों में बीज बोना
गुनाह है क्या ?
हाशिए पर प्रेम लिखना
बुरा है क्या?

-0-

3-चुप ही है लड़की

डॉ. कविता भट्ट

स्वयंप्रभा थी
सुरम्या थी ,जो कभी
दीपशिखा-सी
मौन है ओढ़े हुए
बुझी रात्रि के
यों शीत तिमिर से
कुछ नमी है
मन के भीतर ही
आँखों की छत
अब भी न टपकी
-0-
mrs.kavitabhatt@gmail.com

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