कहानी- ** एक रोटी ** - डॉ आर बी भण्डारकर

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कहानी- ** एक रोटी ** - डॉ आर बी भण्डारकर आज दद्दा रोटी नहीं लाये। " यह बात मन मसोस कर धन्नो को अपने पुत्र से कहनी ही पड़ी। रोटी न लाने क...

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कहानी-

** एक रोटी **

- डॉ आर बी भण्डारकर

आज दद्दा रोटी नहीं लाये। " यह बात मन मसोस कर धन्नो को अपने पुत्र से कहनी ही पड़ी।

रोटी न लाने की बात सुनकर सुखू का चेहरा उतर गया। माँ की सलाह से वह लेट तो गया पर भूख तृप्त न होने से नींद कहाँ आने वाली थी।

गाँव के इन ठाकुर साहब का मकान बहुत बड़ा है। रास्ते की तरफ पूर्वाभिमुखी दो द्वार है-मकान की तरफ मुंह करके इस लंबे चौड़े बरामदे में खड़ा हुआ जाए तो दाएँ हाथ की तरफ एक द्वार चौंपयारी बखरी का है, इसमें अंदर चार कच्चे बड़े बड़े घर(कमरे) हैं जिनमें गाय, बैल, भैंस आदि पशु बंधते हैं । सभी नौकर-चाकर इसी द्वार से चौंपयारी बखरी में जाते हैं और अपने अपने जिम्मे का काम करते हैं;सामान धरते-उठाते हैं। इस बखरी का एक द्वार अंदर की ओर यानी पश्चिम दिशा भी मुख्य आवास के आँगन में खुलता है पर हरखू के अलावा किसी अन्य को इस या किसी अन्य द्वार से अंदर जाने की अनुमति नहीं होती है। हरखू भी केवल इसी द्वार से एक निश्चित सीमा तक ही अंदर जा सकता है।

दूसरा द्वार बाँयी तरफ है जो मुख्य आवास के लिए है। दरवाजे की ठीक सीध में अंदर आंगन नुमा खुली जगह है । बाँये हाथ की तरफ पूर्व से पश्चिम की ओर लगभग 19-20 फुट लम्बी और उत्तर से दक्षिण की ओर लगभग 13- 14 फुट चौंड़ी एक भव्य बैठक है, उससे सटा हुआ लगभग 8 गुणा 20 फुट का बरामदा है। ठाकुर साहब दिन भर इसी बरामदे में पड़े तख्त पर विराजमान रहते हैं। किसी खास अभ्यागत के आने पर ही अंदर बैठक में जाते हैं।

चौंपयारी बखरी के पीछे और बैठक से पश्चिम की ओर एक बड़ा आँगन है। इसमें बाहर के दोनों दरवाजों से जाया जा सकता है। इस आँगन में बैठक और चौंपयारी बखरी जैसा विभाजन नहीं है। इस आँगन के पश्चिम में उत्तर से दक्षिण की ओर लगभग 48- 50 फुट लम्बा तथा पूर्व से पश्चिम की ओर लगभग 9- 10 फुट चौड़ा विशाल खुला बरामदा है। इस बरामदे की पश्चिम तरफ की दीवाल में मुख्य रहवास में जाने के लिए एक बड़ा दरवाजा है। शेष दीवाल में तथा उत्तर व दक्षिण तरफ की दीवालों में विभिन्न आकार प्रकार की खुली और लकड़ी के डिजाइन दार किबाड़ों वाली अलमारियाँ हैं। बरामदे में पूर्व की तरफ दीवाल न होकर सम्भवतः दस गोलाकार खम्बे हैं। हरखू की पहुँच इसी बरामदे तक है। बरामदे के पीछे ठाकुर साहब का मुख्य रहवास है जिसे हरखू ने कभी नहीं देखा है, ऐसा अनुमान लगता है कि पूर्व से पश्चिम की तरफ मकान की लंबाई 100 फुट से कम न होगी।

हरखू इन्ही ठाकुर साहब के हलवाहे हैं। हरखू की ज़िंदगी का पूरा स्वर्ण-काल बीत गया है, इन्हीं ठाकुर साहब की हलवाही करते करते। सो ठकुराइन की नज़र में इनकी पर्याप्त विश्वसनीयता है, उम्र और हेंसियत के हिसाब से मान भी है। हरखू का काम है-सुबह चौंपयारी बखरी से बैल खोलना, हलासोत लेकर खेत पर जाना, दिन भर जुताई करना, शाम को हलासोत सहित घर लौटना। हलासोत खोलकर बैलों को खूँटों से बाँधना फिर हल या बखल, जुआँ हलासोत की रस्सी, पनैठी आदि यथास्थान रखना।

हरखू सुबह कलेबा और शाम ब्यालू ठाकुर साहब के ही घर अंदर के बरामदे में बैठकर करता है। अपने भोजन की इस व्यवस्था के तहत हरखू ने अपने घर से पीतल की एक थाली और एक लोटा लाकर ठाकुर साहब के अंदर के बरामदे की एक अलमारी में रख छोड़ा है। प्रतिदिन कलेबा करने या ब्यालू करने से पहले हरखू अपना थाली-लोटा उठाता है। चौंपयारी बखरी में लगे हैंड पम्प पर जाकर उन्हें माँजता-धोता है, बरामदे में बैठकर उनमें भोजन करता है। भोजनोपरांत पुनः हैंड पम्प पर बर्तनों को माँजता-धोता है और फिर अलमारी में यथास्थान रख देता है। प्रतिदिन हरखू को भोजन परोसने का जिम्मा परिवार की कुक लक्ष्मी का होता है।

हरखू का दोपहर का कलेऊ ठाकुर साहब का दूसरा नौकर खेत पर ही पहुँचाता है। हरखू बरसात में बँधा और मोरियों में भरा हुआ पानी पीता है, केवल हरखू ही नहीं आसपास के सब हलवाहे और चौंपिया पीते हैं। सर्दियों और गर्मियों में हरखू अपनी पुतिलिया(एक प्रकार की सुराही)में ठाकुर साहब की चौंपयारी बखरी के हैंड पम्प से सवेरे ही पानी भर ले जाता है। जुताई, बुआई का काम पूरा होने पर हरखू का जिम्मा खेत की रखवाली, फिर कटाई और फिर फसल गहाई करना होता है। वह बारहमासी नौकर है। हरखू कभी-कभार(जब खेत या खलिहान की रखवाली पर जाना पड़ जाता है, तब को )छोड़कर रोज रात को अपने घर ही सोता है।

इस सांसारिक मनुष्य ने ज्ञान, विज्ञान और इनसे प्राप्त शक्तियों के माध्यम से सुख के तमाम साधन ढूंढे हैं। बहुतेरे उनमें, उनसे सुख का अनुभव भी करते हैं पर फिर भी पूर्ण सुखानुभूति नहीं हो पाती, अशांति पीछा नहीं छोड़ती है। इसलिए ज्ञानी कह गए हैं-संतोषः परम् सुखम्। संतोष को परम सुख कहा तो गया है पर संतोष आता ही नहीं है। तृष्णा उसे पास तक नहीं फटकने देती। जिधर देखो उधर असंतोष का ही साम्राज्य दिखता है। तो क्या कहीं भी संतोष नहीं है? है न ! वह गरीबों में, अभाव-ग्रस्तों में छिपा रहता है।

हरखू का परिवार सुखी परिवार है। सिर ढकने के लिए खपरैल वाला घर है। गाय बाँधने के लिए उसने एक छप्पर डाल रखा है। नन्हीं बछिया भी उसी छप्पर में बंधती है। दोनों बेटियों के ब्याह कर दिए हैं। वे अपनी अपनी गृहस्थी में रम गयी हैं। छोटा बेटा बड़ा हो गया है, कुछ कमाने लायक;अपनी गाय तो चराता ही है, गाँव के अन्य लोगों की दो गायें भी घेर ली हैं, जिनसे कुछ तो कमाई हो ही जाती है। बड़ा बेटा कुछ अरसे से बीमार रह रहा है। वैद्य जी कहते हैं कि उसे विषम ज्वर हुआ है, यह महीनों चलता है। पडौसी ठुनू कक्का कह रहे थे कि हरखू कहीं इसको टी बी न हो गयी हो, अक्सरा करा लो उसी से लड़का ठीक हो पाएगा।

यह बात सही है , आंखों देखी, कानों सुनी भी है, कि पहले गाँव के लोग एक्सरे फोटो कराने को एक जाँच नहीं, इलाज समझते थे। उनका विश्वास था कि "डाकधर मशीन सें ऐसौ उजेरो फेंकत है कि वो मरीज की देव में घुस कें सिब रोग दुख ठीक कर देत है। "

अब हरखू बेचारा एक्सरे कराने कहाँ जाए, उसने तो अपने गाँव और मिडोपन के दो चार गॉंवों को छोड़कर कुछ भी देखा ही नहीं था, कहीं गया आया ही नहीं था। उसे तो अपने वैद्य जी पर विश्वास है। सो वह अपने बड़े बेटे सुखू को सुबह शाम उनका बताया हुआ काढ़ा पिलाता है। काढ़ा वह खुद बनाता है- एक लीटर पानी में दरदरी कुटी हुई सौंठ, तुलसी की पत्तियां, गिलोय का गूदा, चिरायता डालकर उबालता है। जब पानी एक चौथाई रह जाता है तो उतार कर साफ कपड़े से छानकर हल्का गुनगुना ही सुखू को पिला देता है।

हरखू के पास बीघा भर का एक खेत है जिसमें वह ठाकुर साहब की बैल जोड़ी से ही जुताई-बुआई करके फसल पैदा कर लेता है। आम तौर पर वह शुरुआती बरसात में सांवा, ककुनी, कुरी जैसे मोटे अनाज उगाता है फिर साल साल में पलट कर कभी खरीफ कभी रबी की फसलें उगा लेता है। यह उपज (अनाज, दालें आदि) उसकी पत्नी और दोनों बेटों के लिए पर्याप्त हो जाती है। वह स्वयं तो ठाकुर साहब के यहाँ ही खाता है। अपनी इतनी सी , कम आवश्यकताओं वाली गृहस्थी से हरखू संतुष्ट है। संतोष है , इसलिए परम् सुख है।

इस साल पानी कम बरसा। कम क्या बरसा आषाढ़ , सावन में तो पानी बरसा उसके बाद बादल ऐसे रूठे कि इस तरफ झाँके तक नहीं। लिहाजा मोटे अनाज- सांवा, ककुनी, कुरी , कचरिया की फसलें तो हो गईं पर न खरीफ की फसल बोई जा सकी और न ही रबी की। बड़े खेतिहर लोगों ने अपने अपने कुओं से परोहा चलाकर सिंचाई करके फसलें पैदा कर लीं। गरीब क्या करता, उनकी कौन सुनता;सबको अपनी अपनी जो पड़ी थी।

सूखा की इस स्थिति में हरखू तो ठाकुर साहब के यहाँ पूर्व की तरह भोजन करता, पत्नी और दोनों बेटों के भोजन के लिए उसके पास मोटे अनाज पर्याप्त मात्रा में थे ही , सो कोई असुविधा नहीं लगी। पर एक दिन उसे उसकी पत्नी ने बताया कि मुझे और छोटे बेटे को मोटे अनाज का भात या रोटी खाने में कोई असविधा नही है पर इस मोटे अनाज से बड़े बीमार बेटे का सही ढंग से पेट नहीं भरता है। मैं कई दिनों से यह दशा देख रही हूँ, आपसे कहा नहीं क्योंकि आप भी आखिर क्या करेंगे। पर आज हृदय ने धीर नही धरा सो यह व्यथा आज आपके सामने रखनी ही पड़ी है।

इस जीव-जगत में हर प्राणी को अपनी संतान के प्रति अनन्य स्नेह होता है। उसमें अपनी संतान के प्रति अपार वात्सल्य भरा होता है। उसके हृदय में असीम अपनापन, स्नेह, प्यार दुलार सदैव हिलोरें मारता रहता है। इच्छाओं और आकांक्षाओं के मामले में उसका मन आकाश के समान विशाल अंतःकरण सागर समान गम्भीर रहता है। इसलिए इसे संतान-मोह भी कह दिया जाता है। एक पिता अपने पुत्र के लिए कुछ भी करने को उद्यत रहता है। पुत्र के लिए कितना ही त्याग करना पड़े वह सहर्ष तैयार हो जाता है। उसके अंतर्मन में सदैव पुत्र के उज्जवल भविष्य की कामना भरी रहती है तो उसके चिंतन में सदैव उसके भविष्य निर्माण की चिंता घुली रहती है।

पत्नी की बात सुनकर हरखू ने मन ही मन कुछ निर्णय कर लिया। हरखू शाम के भोजन में ठाकुर साहब के यहाँ दाल या सब्जी या दाल और सब्जी के साथ छः रोटियाँ खाता था। उस दिन के बाद से वह लक्ष्मी से हर दिन की तरह 6 रोटियाँ ही परसवाता था पर केवल 5 रोटियाँ ही खाता , एक रोटी बचाकर अपने बड़े बेटे के लिए घर लाता। ऐसा वह नियमित रूप से करने लगा। बीमार बेटा भी खुश;पिता के आते ही उनसे रोटी लेता, जो प्रायः बाजरे की हुआ करती, उसे गाय के दूध में मिथता और प्रेम से खाता। इससे उसका पेट तो भरता ही , उसे बड़ी आत्मिक संतुष्टि भी मिलती।

अब स्थिति यह हुई कि बेटा रोज पिता द्वारा एक रोटी लाने का बेसब्री से इंतज़ार करता रहता। उसे दूध रोटी खा लेने के बाद ही नींद आती।

कुक लक्ष्मी बुजुर्ग नेक महिला थीं। ठाकुर साहब के यहाँ वर्षों से भोजन व्यवस्था सम्हाल रही थीं। हालांकि अब तो उनकी पुत्रवधू भोजन व्यवस्था सम्हालती है पर पुराने प्रेम और वर्षों की आत्मीयता के कारण ठकुराइन उन्हें भोजनालय में अब भी रखे हुए हैं। अब लक्ष्मी अनाज, दालों की बीना-छूनी, सब्जियों को धोना, काटना , भोजन परोसना आदि कार्य किया करती है।

कुक लक्ष्मी ने जब देखा कि हरखू अब रोज केवल पाँच रोटी ही खाता है और एक रोटी बचाकर घर ले जाता है तो उनके हृदय में अजीब हलचल हुई। सोचा कि क्या हरखू के मन में कोई खोट आ गयी है?जब इसे पाँच रोटियाँ ही खानी हैं तो छै क्यों परसवाता है, पाँच के बाद मना क्यों नहीं कर देता। फिर सोचा, यह एक रोटी बचाकर क्यों ले जाता है?हो सकता है इसके घर में कोई परेशानी हो। इसलिए यह भी हो सकता है कि इसको भूख तो 6 रोटी की ही लगती हो पर वह अपना पेट काट कर एक रोटी अपने घर ले जाता हो। सब सोच विचार कर कुक लक्ष्मी ने यह स्थिति ठकुराइन को बताना उचित समझा।

एक तो ठकुराइन सहृदय महिला थीं;दूसरा यह कि हरखू उनका पुराना नौकर था, विश्वसनीय भी था। लंबे समय से कार्य करते रहने से उनकी और परिवार के बहुतेरे सदस्यों की उसके प्रति आत्मीयता भी थी। सो ठकुराइन ने एक शाम हरखू से कारण पूछ ही लिया। हरखू के मन में कोई चोर तो था नहीं, वह तो अपना पेट काट कर रोटी बचा रहा था। सो उसने अपने बड़े बेटे की सारी असली स्थिति और एक रोटी ले जाने की असलियत ठकुराइन को बता थी। ठकुराइन ने कहा-"हरखू तुम यह बहुत गलत काम कर रहे हो। माना कि तुम्हें बेटा प्यारा है, तुम उसका कष्ट नहीं देख सकते। पर इसका मतलब यह तो नहीं कि तुम अपना पेट काटो। तुम्हारी ढलती उम्र है तिस पर तुम्हारे ऊपर खेती-किसानी का मेहनत वाला काम भी है। तुम्हारे द्वारा ऐसा किये जाने से तुम्हारा शरीर कमजोर पड़ जायेगा। तुम मेहनत करने लायक नहीं रहोगे तब तुम्हारा घर कौन देखेगा?...आज से तुम भरपेट रोटी खाया करो। बेटे के लिए लक्ष्मी रोज तुम्हें अलग से एक रोटी दिया करेंगी। "

ठकुराइन की सदाशयता से हरखू भावुक हो गया। उसके अश्रु बह निकले।

अब वही होने लगा जैसा ठकुराइन ने कहा था। महीने भर का समय बीत गया निर्विघ्न।

आज खुशनुमा माहौल है। आठ बजते बजते आकाश में उज्ज्वल, धवल चाँदनी छिटक गयी है। हरखू ब्यालू करके आँगन में पहुँचते हैं। दाँयी ओर निगाह जाने पर ठाकुर साहब के बेटा-बेटी चिड़िया-बल्ला (बैडमिंटन)खेलते हुए दिखते हैं। बेटी 16, 17 साल की होगी। गौरवर्ण, चेहरा गोल आकर्षक, सफेद शर्ट और गहरा गुलाबी लांग स्कर्ट पहने है। बेटा लगभग 14, 15 वर्ष का होगा। वह भी सफेद शर्ट, गहरा स्लेटी निकर और पी टी शू पहने है। हरखू का मन मुग्ध हो जाता है। मंत्र-मुग्ध हरखू रोज की तरह चौंपयारी बखरी से होकर बाहर निकलते हैं। बाहर बरामदे में ठाकुर साहब से सामना हो जाता है। "हुज़ूर" कह कर हरखू आगे बढ़ ही रहे थे कि ठाकुर साहब ने टोका-हरखू गमछे में क्या बाँधे हो? "हुज़ूर".....कहते हुए हरखू ने एक रोटी की पूरी जानकारी दे दी।

ठाकुर साहब आग बबूला हो गए। आँखे लाल, पीली करते हुए बोले-हरखुआ तुम मेरे नौकर हो;तुम्हें खाना खिलाने की जिम्मेदारी मेरी है। तेरे पूरे घर का ठेका नहीं ले रखा है, मैंने। ....जा अंदर! यह रोटी गाय को खिलाकर आ।

हरखू डगमगाते कदम बढ़ाते हुए चौंपयारी बखरी में जाता है। एक गाय को रोटी खिलाकर वापस आता है और सिर झुका कर ठाकुर के सामने खड़ा हो जाता है।

"हाँ, अब जा अपने घर। "

हरखू के पैर मन मन भर भारी हो जाते हैं। अपने घर की ओर कदम बढ़ाता है पर लगता है कि पैर उठ ही नहीं रहे हैं। किसी तरह एक कदम चलता है तो लगता है कि कोस भर चल लिया है।

जैसे-तैसे हरखू घर पहुँचता है। प्रतिदिन उत्साह-पूर्वक आँगन में पहुँचने वाला हरखू आज पौर में पड़ी खटिया पर ही निढाल हो जाता है। पत्नी आती है हरखू की दशा पर चिंतित होती है। कारण पूछती है फिर गमछा टटोलती है। कुछ कुछ समझ तो जाती है फिर भी मन कड़ा कर पूछती है-आज रोटी नहीं लाये, रोटी का क्या हुआ?

हरखू की अश्रुधारा बह निकलती है। ....फिर उच्छवास लेते हुए आज का पूरा बाकया सुना देता है।

हरखू को ढाढस बंधा पत्नी अंदर चली जाती है।

हरखू सोने का उपक्रम करता है पर आज नींद कहाँ आने वाली है ।

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रचनाकार: कहानी- ** एक रोटी ** - डॉ आर बी भण्डारकर
कहानी- ** एक रोटी ** - डॉ आर बी भण्डारकर
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