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कहानी - गाँव की एक प्रेम कथा - धर्मेन्द्र कुमार


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लड़का—“क्या कहती हो‚ भाग लिया जाए ?”

लड़की—“गाँव में बहुत बदनामी होगी। माँ—बाबूजी कही मुँह दिखाने लायक नहीं रहेंगे। बैरियों को अंगुली उठाने का अवसर मिल जाएगा।”

लड़का चिंतित भाव से सिर हिलाकर—“हाँ‚ ये तो है। पर हमारे पास दूसरा रास्ता ही क्या है ? अगर ये लोग अपनी मर्ज़ी से हमारी शादी कर देते तो यह नौबत ही क्यों आती ? एक घंटे में गाड़ी आ जाएगी।”

लड़की विचलित होकर—“मुझे डर लग रहा है‚ मेरा जी बहुत घबड़ा रहा है।”

“तो यहाँ आने को तैयार क्यों हुई ? मैंने तुम्हारी सहमति से ही यहाँ बुलाया था। कोई ज़ोर दबाव से तो बुलाया नहीं।”

“तब न सोची थी दृश्य इतना भयावह होगा‚ चित्त की दशा इतनी विचित्र होगी। लोक‚ समाज‚ घर—परिवार के बारे में न सोची थी।”

“देखो‚ मिस नीलम मिश्रा मुझे अधर में न डालों। हम आगे बढ़ गये हैं और अब घर लौटना नामुमकिन है। घरवाले मार ही डालेंगे !”

“मगर जायेंगे कहाँ‚ कुछ सोचा है ? या यों ही भटकते रहेंगे।”

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“दुनिया बहुत बड़ी है‚ कही भी रहने खाने का ठिकाना मिल जाएगा। बस एक बार यहाँ से निकल चलो। आदमी जब चल देता है तो रास्ते ख़ुद नज़र आने लगते हैं; न भी आये तो आदमी ढूँढ लेता है। मगर बैठे रहने से तो कुछ नहीं होगा। मैं तुम्हारे लिए अपनी जान भी दांव पर लगा सकता हूँ। किसी क़ीमत पर मैं तुम्हें खोना नहीं चाहता। पिता के कोप या गाँव वालों की निन्दा की मुझे तनिक भी परवाह नहीं है। पिता की सम्पत्ति से भी मुझे कुछ नहीं चाहिए। मैं जो अपने बाहुबल से अर्जित करूँ वहीं मेरा है‚ और उसी पर मुझे पूर्ण अधिकार है। केवल तुम्हारा साथ‚ तुम्हारा विशुद्ध प्रेम‚ तुम्हारी उत्साहपूर्ण बातें मिलती रहे‚ फिर मेरे सामने बड़ा से बड़ा तूफान और चट्टान भी टिक न पायेगा‚ तो फिर ये छोटी—मोटी बाधायें क्या चीज़ है।”

“देखिये मिस्टर सुनील मौर्य‚ कवित्व कहना अलग बात है और ज़िन्दगी की परिस्थितियों से जूझना दूसरी बात। माना कि कॉलेज में कई मौकों पर आप जोशपूर्ण कविता कह चुके हैं। कवियों को मैं असमर्थ और निकम्मा समझती हूँ। जो अपने लक्ष्यों को अप्राप्त होने पर अथवा परिस्थितियों का सामना न कर पाने की स्थिति में या जीवन से टूट कर अपना ग़ुस्सा कोरे काग़ज़ पर उतारते हैं। हाँ‚ यह ज़रूर है कि उससे औरों को प्रेरणा मिलती हो‚ पर इससे उनके जीवन की सार्थकता सिद्ध नहीं हो जाती। अपना काम औरों से कराने के लिए अपनी असमर्थता सार्थक करने के लिए अथवा वाहवाही लूटने के लिए कवित्व का सृजन करते हैं। इससे उनके हृदय को संतोष और शांति मिलती है। आप इस समय कवित्व को बिल्कुल ही भूल जाइये और इस वर्तमान भीषण परिस्थिति से निबटने का कोई उचित मार्ग सोचिए।”

“मार्ग तो यही है कि हम दोनों यहाँ से कही दूर जाकर अपनी एक प्रेम की दुनिया बसाये। दिल्ली में मेरा एक दोस्त है‚ एक मुम्बई में भी है। दोनों का पता और फोन नम्बर भी मेरे पास है। तुम कहो तो उन्हीं के पास चला जाए। अभी कुछ दिन पहले उनसे बात हुई थी वो काम भी दिला देगा। मैं कमाकर लाऊँगा और तुम घर का संचालन करना। साल—दो साल में हमारे एक—दो बच्चे होंगे।” यह कहते हुए नीलम का हाथ पकड़कर अपनी ओर खींचना चाहा किन्तु नीलम उसके हाथ को झटक कर एक क़दम पीछे हट गयी। और झुंझलाकर बोली—“मौर्या जी‚ इस समय अपने उतावलेपन को धैर्य बंधाइये। हम ज़िन्दगी के दोराहे पर खड़े किसी गम्भीर विषय पर ज़ज़बाती हो रहे हैं। यह कॉलेज नहीं है। आने वाले विकट दशाओं के बारे में सोचो।”

सुनील कुछ लज्जित हुआ‚ अपने आप को सम्भाला और गम्भीरता से बोला—“प्रिय‚ मैंने इस विषय पर पहले ही ख़ूब सोच—विचार कर लिया है। एक ही विषय पर सोच—सोचकर स्थिति को और दारुण बनाना नहीं चाहता। भगवान का नाम लेकर चलो‚ जो होगा देखा जाएगा। तुम तो ऐसे घबड़ा रही हो गोया अकेली हो। मैं हूँ न तुम्हारे साथ ! अंतिम सांस तक तुम्हारी रक्षा करूँगा।”

नीलम गम्भीर भाव से—“तुम्हारी और मेरी बात बिल्कुल अलग है। मैं लड़की हूँ‚ किसी कारण लौट आने की दशा में मेरे लिए कही मुँह दिखाने की जगह न रहेगी। चारों तरफ़ बदनामी और ताने सुनने को मिलेगा। जो मेरे शुभचिंतक है वे भी मेरा मुँह देखना नागवार करेंगे। घर वाले यही सोचेंगे कि इससे तो अच्छा था कि कही कट—मर गयी होती‚ क्या गंगा और गोमती इसका देखा हुआ न था‚ या रेलवे लाइन यहाँ से दूर था ? मेरे साथ घर वाले भी बदनामी उठाते फिरेंगे। सखियाँ और माता आएँगी दिलासा देने किन्तु उनके मन में क्या होगा यह किसी से छुपा नहीं होगा। शादी के लिए कोई तैयार न होगा। जीवन भर का कलंक लग जाएगा। पूरी ज़िन्दगी सिर न उठा पाऊँगी। मान लो कोई सहृदय पुरूष मुझसे शादी भी कर लिया तो मन में एक बोझ लेकर जीना पड़ेगा। यह शरीर एक भार हो जाएगा। पति के सामने यह कलंकित शरीर लेकर क्या जा पाऊँगी ? सोचो‚ मेरी स्थिति कितनी दारूण हो जाएगी। दूसरी ओर‚ तुम्हारा वही मान और सम्मान रहेगा। तुम्हारे साथ घरवालों‚ पड़ोसियों और गाँववालों का‚ दोस्तों का व्यवहार वहीं रहेगा। बल्कि दोस्तों में तुम्हारा मान और बढ़ जाएगा। वे तुमसे गुरु शिक्षा लेने आयेंगे‚ तुम्हें एक ही गुरुघंटाल समझेंगे। तुम पहले जैसा सर उठा के चलोगे‚ उसी शान से निकलोगे‚ शादी में या अन्य किसी कार्य में कोई बाधा न रहेगी। जहाँ जीवन—मरण की‚ मान—सम्मान की‚ इज़्ज़त—प्रतिष्ठा की बात हो ऐसी स्थिति में घबड़ाऊं न तो और क्या करूँ ?”

सुनील ऐसे सुनता रहा‚ मानों उसे बनाया जा रहा हो। नीलम के चुप होते ही बोला—“तुम क्या समझती हो मैं तुम्हें मझधार में छोड़कर भाग जाऊँगा ? चाहो तो लिखित ले लो‚ जबतक इस शरीर में एक बूँद भी रक्त रहेगा। अपनी मान—मर्यादा की परवाह किये बिना तुम्हारी रक्षा करूँगा‚ हर घड़ी‚ कैसी भी दशा हो‚ तुम्हारे साथ खड़ा रहूँगा।”

“कहने और करने में बहुत अंतर है। अभी प्रेम के उमंग में चाहे जो कह लो‚ पर बुरी परिस्थितियों से टकराकर कितने लोग स्थिर रह पाते हैं। सुनीता और राकेश••••••••।”

सुनील बीच में बात काटकर झुंझलाता हुआ—“उनकी बात न करो नीलम‚ राकेश को मैं पहले ही जानता था कि वह सुनीता को केवल झांसा दे रहा है। वह उसके प्रेम का नहीं‚ हुस्न का दीवाना था। दोनों भागकर मुम्बई गये। वहाँ महीना दिन मज़े किये और लौट आये। क्या तुम मुझे इतना नीच और कपटी समझती हो प्रिय ! मैंने अपना सारा अरमान‚ सारी ख़ुशियाँ जिस देवी पर अर्पण कर दिया‚ वह मुझे धोखेबाज़ और बेग़ैरत समझती है। शायद यह भाव तुम पहले व्यक्त कर दी होती।” नीलम सम्भल गयी उसके साथ ही ज़रा लज़्ज़ित होकर बोली—“मैं तो केवल उपमा दे रही हूँ कि अगर ऐसा मेरे साथ हुआ तो मैं कहाँ जाऊँगी ? सनम‚ इसे आप अपने ऊपर न लें। मैंने केवल सम्भवनाएँ व्यक्त की थी। क्या मैं तुमसे प्यार नहीं करती ? तुम एक इशारा करो तो इस आती मालगाड़ी के नीचे कूद जाऊँ‚ एकपल भी आगा—पीछा न सोचूँगी। तुम्हारे लिए मैं भी सब कुछ न्यौछावर कर सकती हूँ। किन्तु हम किसी काम में हाथ लगाने से पहले उसके अच्छे बुरे परिणाम के बारे में ख़ूब समझ लिया करते हैं। यह तो हमारे जीवन की सबसे अहम् संवेदी घड़ी है‚ तो क्या हम आँखें बंद कर निर्णय ले लें। सुनीता तो फिर भी लौट आई और ताने सुन—सुन कर जी रही है। मैं एक बार जाने के बाद लौटने की अपेक्षा मर जाना अच्छा समझूँगी।”

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सुनील ज़रा झुंझलाकर बोला-“यह सब पहले सोच लेना था। यह वक्त यहाँ से निकल भागने का है। ट्रेन आने में अब ज़्यादा समय नहीं है। एक बार ट्रेन पकड़ ले फिर हम और हमारा प्यार रहेगा। जात—पाँत‚ ऊँच—नीच‚ मान—अपमान सब पीछे छूट जाएगा। हमारे प्रेम के बीच कोई दीवार न रहेगी। सुनन्दा और प्रेम याद है। हमारे गाँव से चौथा गाँव है। अरे पगली ! उग्रसेनपुर‚ जहाँ मकरसक्रांति में मेला लगता है। उनके भागने की चर्चा महीनों होती रही। पूरे दो साल बाद दोनों लौटे थे। शादी कर लिये थे। एक बच्चा भी हो गया था। आते ही घरवालों ने ख़ुशी से स्वीकार कर लिया। अब उनकी गृहस्थी ख़ुशहाल है। तुम बेकार की चिंता करती हो‚ साल—दो—साल में यहाँ का माहौल पता कर हम भी लौट आयेंगे। ।”

“भागना जितना आसान समझते हो‚ है नहीं। घर से निकलने के बाद पता चलता है कि इस सभ्य समाजरूपी जंगल में कैसे—कैसे ख़ूनी भेड़िया और दरिन्दे घूमते हैं। भलमानस भी मिलेंगे मगर मिल ही जाए यह ज़रूरी नहीं। घर से कॉलेज जाने में हमें कैसी—कैसी बातें सुनने को मिलती है‚ कैसे—कैसे नज़रों और कटाक्षों का सामना करना पड़ता है‚ कैसी अश्लील हरकतों‚ और व्यवहारों को देखना और सुनना पड़ता है‚ हम ही जानती है।”

“किसने तुम्हें तंग किया ! कभी मुझसे बताया नहीं। उस कमीने का ख़ून कर देता‚ चाहे मुझे फाँसी ही क्यों न हो जाती।”

“इससे क्या होता ? तुम्हें जेल हो जाती‚ मैं अलग बदनाम होती। तब तो घर से निकलना भी शाइत बंद हो जाता और कभी निकलती भी तो फिर वही दुर्व्यवहारों और कुबातों का सामना करना पड़ता। किस—किस से और कब तक तुम मेरी रक्षा करोगे। पूरे समाज का सोच और बुद्धि तो नहीं बदल सकते। क्या तुम्हें नहीं पता है कि प्रधान का लड़का बाइक से मेरा पीछा करता है ? मेरी तरफ़ कैसे—कैसे इसारे करता है‚ मुझसे बात करने के लिए और किसी बहाने से मेरे पास आने के लिए कितना बेचैन और बेताब रहता है। मेरी ज़रा—सी सह पर वो क्या कुछ उत्पात नहीं कर देगा। किन्तु ऐसे लफंगे को अपनी जूती दिखाना भी अपमान समझती हूँ। आप उसे एक बार भी नहीं बोले‚ इसलिए न कि वह आपसे बलवान है‚ धनवान है‚ ख़्याति तथा प्रसिद्धि में भी आपसे आगे है। दस—पाँच रईसों को अपने आगे—पीछे लिए चलता है। आप उससे किसी भी तरीके से पार न पा सकोगे। यही हाल हमारे घरवालों और शुभचिंतकों की होती है और तब वह एक ही बात कहते हैं कि तुम अपनी इज़्ज़त—प्रतिष्ठा बचा के रखो। अपने काम से काम रखो। कोई कुछ ग़लत कहता भी है‚ तो एक कान से सुनो और दूसरे से निकाल दो। जो ग़रीब‚ बेबस‚ लाचार‚ कमज़ोर‚ और इज़्ज़तदार है‚ झगड़ा—फ़साद से दूर रहना चाहता है उनके लिए यह उक्ति चरितार्थ है। यही न या और कुछ ?”

नीलम ने अपने मन की सत्य भावनाओं को उजागर किया था। आये दिन उसके साथ‚ बल्कि सभी लड़कियों के साथ यही हुआ करता है। कई बार तो शिक्षक की दृष्टि भी उसे कंपा देती थी। यौवनावस्था किसी के सामने झुकना या हारना नहीं जानता। वह कल्पनाओं की दुनिया में सर्वथा विजित होता आता है। और व्यवहारिक दुनिया को भी अपनी नीति‚ कार्यों और सिद्धान्तों के बल पर झुकाना चाहता है‚ ऊँगलियों पर नचाना चाहता है। किन्तु जिस तरह एक नया पहलवान अखाड़े का दाव—पेंच नहीं जानता और पटकनी खा जाता है। उसी तरह नवयुवक व्यवहारिकता से अनजान धोखा खा जाते हैं किन्तु डींग मारना नहीं छोड़ते। यही वह शस्त्र है जिससे वह अपनी हार छुपाते हैं। सुनील छाती चौड़ी करके डींग मारते हुए बोला—“सच प्रिय‚ मुझे इस बात की तनिक भी भनक न थी। अन्यथा वह प्रधान का लौंडा अस्पताल में हड्डियाँ जोड़वा रहा होता। क़द में उससे छोटा ज़रूर हूँ‚ किन्तु उसे सबक सिखाना मेरे बाँए हाथ का खेल है। रोज़ दो सौ दण्ड पेलता हूँ‚ ढाई सौ उठक—बैठक करता हूँ। उतना ही बार मुगदर घूमाता हूँ‚ दौड़ में तो मैं अपना जोड़ ही नहीं रखता। ये कुदाल चलाये हाथ है। देखो इसके घट्ठे‚ ठीक से एक थप्पड़ भी बर्दाश्त नहीं कर सकेगा। तुम्हें एक बार मुझे बताना चाहिए था कि नहीं ?”

नीलम उसके बाहुबल पर मुग्ध होकर—“क्या बताऊं‚ और किस—किस को बताऊं ? मुझे झगड़ा—फ़साद अच्छा नहीं लगता। पिछले माह इसी बात को लेकर कॉलेज में ख़ूब ख़ून—खच्चर हुआ शायद तुम उस दिन नहीं आये थे। बाद को पुलिस आयी और दोनों तरफ़ के लड़के को पकड़ कर ले गयीं। लड़की का भी ब्यान लिया गया। इसके बाद कई बार उस लड़की को थाने पर भी जाना पड़ा। उसके घर वालों ने कॉलेज आना छोड़ा दिया। उन्हें डर है कि लड़की के साथ कुछ अनहोनी न हो जाए। अख़बारों में रोज़ ही पढ़ने को मिलता है कि लड़की पर तेज़ाब फेंक दिया गया या रास्ते में आते—जाते वक्त दुष्कर्म कर दिया गया या गोली मार दी गयी। अकेली लड़की के लिए बाहर की दुनिया और भी ख़तरनाक हो जाती है।”

“अनहोनी के डर से कबतक घरों में बैठी रहोगी। कुत्ते तभी तक भौंकते और हमारा पीछा करते हैं जब तक हम भागते और डरते हैं। हमने ज़रा भी साहस दिखाया कि वे दुम दबाकर भाग खड़े होते हैं। अब तुम अकेली नहीं हो‚ तुम्हारे साथ मैं हूँ। तुम्हारे हर दुःख और सुख में मैं तुम्हारे साथ खड़ा हूँ। बस एक बार तुम चलने की हिम्मत जुटा लो।”

“मैं हिम्मत लेकर तुम्हारी हो जाने को‚ और तुम्हारे साथ भाग जाने के लिए ही यहाँ तक आयी हूँ। हमारे पास कितने पैसे हैं‚ यह भी देख लो। बाहर में पैसे ही जीने का आधार‚ अवलम्ब‚ तथा अपना साथी होता है। पैसा ख़त्म हुआ‚ कि मुसीबत टूट पड़ेगी। मान लो‚ तुम्हें कोई काम मिल जाए। सारा दिन तुम कम्पनी में रहोगे‚ मैं अकेले चिंता में घुला करूँगी। धनाभाव में अच्छे मनुष्य भी अनैतिक कार्य को मज़बूर हो जाता है। यहाँ माता—पिता की छत्रछाया में निश्चिन्त‚ निडर‚ स्वतंत्र विचरण करती हूँ। वहाँ पग—पग पर नई मुसीबतों का आभास होता रहेगा।”

“पैसें क्यों नहीं है‚ पिताजी ने धान बेचा था। चुपके से वो पैसे उठा लाया हूँ। अगर तुम्हें मुझपर संदेह हो तो एक बार आज़मा कर देख लो‚ किसी पर तोहमत लगाना कहाँ का न्याय है !”

“यह स्कूल या कॉलेज की परीक्षा नहीं है कि एक बार फेल होकर दोबारा पास हो जाएंगे। मात्र एक वर्ष की अवधी और कुछ रुपये का नुक़्सान होगा। यह जीवन संग्राम है यहाँ एक ही मौक़ा है।”

“तो फिर यहाँ आयी क्यों ? न आती तो प्रतीक्षा कर के चला जाता। मैं अपना सारा समान इस बैग में पैक कर के लाया हूँ। पहले तो बड़ी—बड़ी बातें करते थकती न थी। परीक्षा होने से पहले ही असफल मान लेती हो। मैं न जानता था अहम् वक्त पर ऐसे मुकर जाओगी।”

“मुकरता कौन है जी ? मुकरना होता तो घर से भागकर इतनी दूर स्टेशन तक न आती। तुम्हारा प्रेम मुझे यहाँ खींच लाया है। किन्तु मेरी अंतरात्मा मुझे धिक्कार रही है। मेरे अंदर से आवाज़ आ रही है—नीलम क्या तुम माता—पिता के प्रेम और स्नेह को भूल गयी ? जिसने तुम्हें नौ महीना कोख में रखा‚ कष्ट सहकर पाला‚ तुम्हारी हर एक ज़रूरत के लिए जिसने अपनी छोटी बड़ी ख़ुशियाँ न्योछावर कर दी। उसी के साथ यह धोखा ! क्या तुम्हें ऊँची तालीम देना‚ तुम्हें स्वतंत्र छोड़ना उनकी ग़लती थी ? उनके विश्वास का यह कैसा पुरस्कार दे रही हो ! सुनील‚ आज मुझे माता—पिता की जितनी याद आ रही है‚ उतना कभी न आया था। उन्होंने मेरे लिए कैसे—कैसे कष्ट सहे एक—एक कर मेरे आँखों के सामने धूम रहा है। आते समय अपने टेबल पर एक पत्र रखकर आई हूँ। कही वो पत्र माता को मिल गया तो ग़ज़ब हो जाएगा। चारों तरफ़ हल्ला हो जाएगा। सभी ढ़ूँढने निकल पड़ेंगे। नहीं‚ वो इस सदमें को बर्दाश्त न कर पायेंगे। अपनी पूरी ज़िन्दगी में पिताजी धन न इक्ट्ठा कर सके पर इज़्ज़त ख़ूब कमाये। उसे खोता देख वे जीवित न बचेंगे।” यह कहते—कहते उसके आँखों से अश्रुधारा बहने लगीं।

सुनील भी नम हो गया—“प्रिय‚ मैं आपकी भावनाओं की कद्र करता हूँ। मेरे पिताजी ने कर्ज़ लेकर कितनी मुश्किलों और मुसीबतों से मुझे पढ़ाया है‚ मैं ही जानता हूँ। पिताजी को उम्मीद है कि मैं उनके बुढ़ापे का सहारा बनूंगा। माता को मुझपर नाज़ है। बहन मेरी वियोग में रो—रोकर प्राण त्याग देगी। वो केवल मेरी बहन ही नहीं है‚ दया और त्याग का दूसरा रूप है। पिताजी के ग़ुस्सा को ढाल बनकर रोक लेती है। वह अपने हिस्से ही वस्तुएँ भी मुझे दे देती है। सहर्ष‚ ख़ुशी के साथ‚ मानों ऐसा करने से उसके मन को संतोष मिलता हो। मेरे साथ भी वहीं स्थिति है‚ जो तुम्हारे साथ है। अगर समाज‚ धर्म से‚ जात—पाँत से‚ ऊँच—नीच से‚ उठकर कार्य करे‚ न्याय करे‚ तो हमें यह नीच कर्म क्यों करना पड़ता ? इसका दोषी स्वयं समाज और समाज के वे लोग है जो इस बुरी प्रथा को सह देते हैं अथवा इस प्रथा में लिप्त है। हम तो अपने प्रेम की रक्षा कर रहे हैं। हमारे बालिग होने में छः महीना शेष है वरन् किसी दिन यही कोर्ट मैरेज कर लेते। किन्तु परिस्थिति तक भी यही बनी रहती। आपके घरवाले आपका मुँह न देखते‚ मेरे घरवाले मेरा। बदनामी और बेइज़्ज़ती इतनी ही होती। तब यहाँ रहना और जीना भी दूभर हो जाता। यह कैसा समाज है‚ जहाँ हम अपनी मर्ज़ी से अपना जीवन साथी भी नहीं चुन सकते। इससे अच्छा तो प्राचीन का स्वयंवर था। जी तो यही चाहता है कि जिन सालों ने धर्म‚ जाति‚ और यह ऊँच—नीच‚ भेद—भाव तथा दुनिया भर के आडम्बर उत्पन्न किया‚ उन कमीनों को गोलियों से भून दूँ। वे मेरे सामने आ जाये तो उन्हें जीता न छोड़ूंगा। हमारी जाति समान होती तो मैं कैसे भी करके पिताजी को मना लेता। इस धर्म और जाति ने हमारी आत्माओं को भी बाँध रखा है। हमारे पर कतर दिये है‚ हम केवल फड़फड़ सकते हैं उड़ नहीं सकते।”

उसी समय गाड़ी आने की सूचना हुई। गाड़ी पकड़ने वाले सवारी इकट्ठा होने लगे थें। नीलम दुपट्टा से और सुनील रुमाल से अपना मुँह बांध लिया और दोनों एक पेड़ की ओट में बैठ गयें। कोई पहचान न ले‚ यह डर भी उन्हें खाये जा रही थी। दोनों की छाती ज़ोर—ज़ोर से धड़क रही थी। मन में एक प्रकार की अशांति और व्याकुलता व्याप्त थी। पेड़ की ओट में आकर नीलम बोली—“जानते हो सुनील‚ जब मैं बीमार होती हूँ। मेरी माँ मेरे पास से एक पल नहीं हटती। बाबूजी डॉक्टर बुलाने दौड़ते‚ दवा लाते‚ पल—पल आकर पूछते अब तबीयत कैसी है ? बाबूजी और माँ को जितना विश्वास मुझपर है उतना भैया पर भी नहीं। पैसा‚ महत्वपूर्ण काग़ज़ या कोई चीज़ मुझे देकर वे एकदम निश्चिंत हो जाते हैं। आज जीवन में पहली बार बिना पूछे उनके पाँच हजार रुपये निकाल लायी हूँ। इन पैसों को वो मेरी शादी के लिए इक्ट्ठा कर रहे हैं। जबतक मैं अपने हाथों से उन्हें खाना न परोस दूँ‚ उनका खाया नहीं होता। इस थोड़ी—सी आमदनी में उन्होंने मुझे कभी अभाव महसूस नहीं होने दिया। भागने के बाद लोग यही सोचेंगे सोलह साल माता—पिता के प्यार को ठुकरा कर दो साल से परिचित युवक के साथ भाग गयी। प्रिय सोचो‚ क्या यह सही है ? माता—पिता का संतान से विश्वास न उठ जाएगा ?”

नीलम पेड़ से ऐसे लिपटी जा रही थी‚ मानों पूरे गाँव का परिवेश‚ माता—पिता का आशीर्वाद‚ यहाँ का हवा‚ पानी सब सम्पूर्णता में एकत्रित होकर इसी वृक्ष में समाहित हो गया हो। उससे लिपट के अंतःमन और इंन्द्रिय स्पर्श से आत्मक्षात कर रही हो। ऐसी ही परिस्थितियों में हमारे अंदर आध्यात्मिक उपज होती है। तब हम एक अनजानी‚ रहस्यमयी सत्ता में विश्वास करने लगते हैं।

“तो हम क्या करे नीलम‚ तुम्हीं बताओ ? मेरे पिताजी मेरी शादी कही और ठीक करना चाहते हैं। मेरी बातें सुनकर उन्हें ऐसा ग़ुस्सा आता है। गोया‚ मुझे ज़िन्दा चबा जाएंगे। मैं तुम्हें चाहता हूँ। मेरा रोम—रोम तुम्हें पाने को उतावला है। यह व्यग्रता सिर्फ़ वासना और लालसा की नहीं बल्कि प्रेम और समर्पण का है।”

“तो क्या हम अपने—आप को अपने प्रतिपालकों पर समर्पित नहीं कर सकते। जिसने अपनी आधी जीवन हमारे तृष्णाओं के ऊपर अर्पण कर दिया हो‚ उनके ख़ातिर हमारा कोई कर्त्तव्य नहीं बनता ? हमारे जीवन का उनसे बड़ा दूसरा कोई शुभचिंतक नहीं हो सकता। हम दोनों एक—दूसरे के प्रेम में इस तरह लीन हो गये है कि किसी के व्यथा‚ दुःख‚ पीड़ा‚ सेवा‚ और उपकार को बंद आँखों से ठुकरा रहे हैं। यहाँ तक की माता और पिता के कर्ज़ और बलिदान को भी ठोकर मार कर भागे जा रहे हैं। हे माता ! मुझे माफ करना‚ मेरी ग़लतियों को क्षमा कर देना। बाबूजी‚ मेरे नसीब में आपकी इतनी ही सेवा लिखी थी।”यह कहती हुई वह अपनी आसुओं को पोंछने लगी। नयन सिंचित नेत्रों से आगे का दृश्य धुँधला दिखने लगा।

सुनील बलपूर्णक आंसुओं को रोककर पेड़ के छाल को नोचते हुए बोला—“इन बातों को रहने दो नीलम‚ अब और नहीं सुना जाता। ये बातें हमारे क़दम पीछे खींच लेंगी। हमें किसी तरह यहाँ से बच निकलना है। पाँच मिनट में गाड़ी आ जाएगी फिर यह गाँव‚ यहाँ की मिट्टी‚ हवा और पेड़ सब बेग़ाने हो जाएँगे। क्या पता फिर कब लौटना होगा‚ होगा भी या नहीं ?”

नीलम श्रद्धा भाव से दोनों कर जोड़कर—“वो दूर से दिखता हुआ शिवाले का गुम्बद और वो पेड़ के पास स्थित ब्रह्मबाबा को याद करके गोड़ लाग लो। माँ कहती है‚ वहाँ से सच्चे दिल से माँगी मुराद कभी खाली नहीं जाती। एक बार बचपन में मेरी तबीयत बहुत बिगड़ गयी थी। बचने की कोई उम्मीद न थी। डॉक्टरों ने जवाब दे दिया था। तब माँ ब्रह्मबाबा से मन्नत मांगी। धीरे—धीरे मेरी तबीयत सुधर गयी।” और फिर वह आँखें बंद करके अंतःमन से कुछ फ़रियाद करने लगी।

सुनील विज्ञान का छात्र था‚ उसके लिए ये सब चीज़ें बिल्कुल ही हास्यास्पद और बेतुकी थी। किसी दूसरे समय पर नीलम को ख़ूब बनाता। किन्तु इस समय उसके गर्दन स्वयं ही झुक गये। इसमें आडम्बर‚ मन का बहलावा या दिखावा बिल्कुल भी न था; सच्ची श्रद्धा‚ भक्ति और मन का सच्चा उद्गार था। सच्चे अर्थो में मुक भक्ति और शक्ति ही पूजा का मूल है।

सहसा ट्रेन की सीटी की आवाज़ सुनाई दी। दोनों के हृदय ज़ोर—ज़ोर से धड़कने लगा। भविष्य की चिंताओं और अंधकार में‚ स्थितियों के भय ने उन्हें मौन कर दिया। उनके मन के अंतः से ऐसा आभास होता था कि इस गाँव और गाँव के लोगों से‚ अपनों से‚ दोबारा दर्शन न होगा। एक मन आगे खींचता था‚ दूसरा मन पीछे। अनमने से दोनों अपने बैग सम्भाले और पास आती लौह पथ गामिनी यान पर चढ़ने के लिए तैयार हो गये।

यात्री चारों तरफ़ से भागकर ट्रेन के निकट आने लगें।

सुनील दुपट्टा से मुँह बांधे एक लड़की पर कुछ देर एकटक देखता रहा। कुछ देर देखने के बाद नीलम को दिखाकर बोला—“वो देखो नीलम‚ मुझे ऐसा क्यों लगता है कि उस लड़के के साथ मुँह बांधे जो लड़की खड़ी है वह दीपिका है।”

“आपको भ्रम हो रहा है‚ भला इस वक्त वे यहाँ क्या करने आएगी ? वो भी किसी अनजान के साथ ? जब आप घर से आए थे‚ वो उस वक्त कहाँ थी ?”

“घर पर ही थी। उसी ने मुझे मेरा जूता और कपड़ा लाकर दिया। पूछी भी‚ मैंने कह दिया एक दोस्त की शादी है। किन्तु यहाँ आने के बाद मैंने कपड़ा बदल लिया ताकि कोई पहचान न सके। वो देखो‚ शर्ट और पैंट वही है‚ जिसे मैंने और माँ ने चौक बाजार से ख़रीदा था।”

नीलम ने झुठलाया—“क्या बाजार में एक जैसा दूसरा कपड़ा नहीं होता है ! देखो‚ गाड़ी प्लेटफार्म पर आ गयी। लगता है काफी भीड़ है। अपना बैग ठीक से पकड़ लेना। दोनों टिकट तुम्हारे पास है न ?”

“टिकट मेरे पास है। तुम्हारे यहाँ आने से पहले ही दो टिकट ले लिया था।”

गाड़ी खड़ी होने वाली थी।

“नीलम मुझे क्यों लग रहा है कि वह दीपिका ही है‚ वही ऊँचाई‚ वही शरीर की बनावट‚ मुँह खुल जाता तो देख पाता।”

“अगर वो होती‚ तो तुम्हें यहाँ देख कर खड़ी रहती ?”

“मेरा मुँह बंधा हुआ है‚ पहचानेगी कैसे ? ये शर्ट जो मैंने पहना हुआ है। यह चुपके से ख़रीदा था‚ घर में कोई नहीं जानता है। अरे ! यह क्या‚ उसके कलाई के कंगन भी वहीं है। हाँ‚ बिल्कुल वहीं है। वो दीपिका ही है। मैं जाकर अभी देखता हूँ।”

“ट्रेन खड़ी हो गयी। जल्दी चलो चढ़ लिया जाए। देखो‚ वो लोग भी चढ़ने जा रहे हैं।”

इतने में ट्रेन खड़ी हो गयी। नीलम रोकती रही पर सुनील न माना चला गया। जनरल डब्बा था‚ जहाँ ये लोग खड़े थे वहाँ से दूसरे दरवाज़े पर वह जोड़ी चढ़ने जा रहा था। नीलम भी उनके पीछे चल दी। सुनील पीठ पर बैग लादे चला जा रहा था। उसने रास्ते में अपना मुँह खोल दिया। ट्रेन यहाँ एक मिनट रूकती थी। लड़का ट्रेन में चढ़ गया था। लड़की चढ़ने ही वाली थी कि सुनील उसका हाथ पकड़कर बाहर खींच लिया। लड़की इसे देखते ही घबड़ा गयी और इसी घबड़ाहट में मुँह से रुमाल हटा दी। ट्रेन सीटी देकर चलने के लिए तैयार थी। लड़की दौड़ कर ट्रेन को पकड़ना चाही; किन्तु दोबारा से सुनील ने उसका हाथ पकड़ लिया। वो अपने आप को छोड़ा न सकी। ट्रेन चलने लगी थी। उसके साथ का लड़का एक बार झांका और यह दृश्य देखकर डर से अंदर हो लिया। नीलम बगल में आकर खड़ी हो गयी थी। ट्रेन चला गया पर उसके छुटने का दुःख न तो सुनील को था और न ही नीलम को। दीपिका सिर झुकाये आंसू बहा रही थी। भाई को एकाएक सामने देखकर उसका दिमाग़ काम करना बंद कर दिया था। क्षोभ और ग्लानि से ज़मीन में गड़ी जा रही थी। इस समय धरती फट जाती तो कितना अच्छा होता। सुनील और नीलम को सारी परिस्थितियों का भान हो गया था । ट्रेन पूरी निकल गयी और आसपास के सभी लोग चले गये तो सुनील बोला—“तुम्हें पता है‚ कितना बड़ा अनर्थ करने जा रही थी। कल सुबह अख़बार में यही पढ़ती की लड़की के भागने के वियोग में माता—पिता ने आत्मदाह कर ली। मैं क्या यह दिन देखने के लिए ज़िन्दा रहता ! क्या तुम यही चाहती हो कि इस बदनामी को लेकर घर के सभी सदस्य अपना प्राण त्याग दे ?”

दीपिका भाई के पैरों पर गिर पड़ी और आंसुओं से पैरों को पखारती हुई बोली—“नहीं भैया‚ मुझे माफ कर दो‚ मुझसे बड़ी भारी ग़लती हुई है। मैं विनोद के बहकावे में आ गयी।”

वह उसे उठाकर क्रोध भरे शब्दों में बोला—“अब छोटी बच्ची नहीं हो कि किसी के बहकावे में आ जाओ। कह सकती हो कि तुम्हारे मन में पाप नहीं था। उसके दुराग्रह को ठुकराई क्यों नहीं ? तुम सोच नहीं सकती कि तुम्हारे इस क़दम से गाँव में हमारी कितनी बदनामी और बदगुमानी होती। माँ और पिताजी कही मुँह दिखाने लायक नहीं रहते‚ शायद जीवित भी न बचते। तुमसे इतनी दुस्साहस करने की हिम्मत कैसे हुई ? उन्होंने या मैंने कभी कोई कष्ट दिया है ? क्या हमलोग तुम्हारा बुरा सोचते हैं या तुम्हारे साथ कोई ज़्यादती की है ?”

दीपिका रोती हुई—“नहीं भैया‚ ऐसा कुछ भी नहीं है। घर के सभी लोग मुझसे बहुत स्नेह और प्रेम करते हैं। नहीं जानती‚ कौन—सा भूत सवार हो गया था कि मैं यह कुकर्म करने को राज़ी हो गयी।”

“सोचो‚ माँ-बाबूजी को पता चलेगा तो कितना दुखी होंगे।? क्या माता—पिता और परिवार से बढ़कर उसका प्रेम है ? तुम्हें याद है‚ एक बार तुम्हारी तबीयत ख़ूब ख़राब हुई थी। घर में पैसे न थे‚ तब माँ ने अपने सारे गहने बेच दिये। जिसे आजतक बनाने की गुंजाइश न हो पायी। पिताजी दिन को अपने खेत में काम करते और रात को साहू जी के मिल में‚ फिर भी कभी झुंझलाते और क्रोधित न होते। हम ज़रा खेतों में घंटे भर कुदाल चला देते हैं‚ तो सबपर ऐसे ग़ुस्सा निकालते हैं‚ मानों आसमान सर पर उठा रखें है। मैं जात—पाँत में विश्वास नहीं करता यदि दोनों तरफ़ के घरवाले तैयार हो जाये और तुम्हारा परिणय विनय से हो जाए तो मुझे हार्दिक ख़ुशी होगी। किन्तु धोखे से भागकर पूरे परिवार‚ मुहल्ले या गाँव को बदनाम करने का तुम्हें कोई अधिकार नहीं।”

विनय बगल के गाँव माधोपुर के ऊँचे कुल का प्रतिभा—सम्पन्न युवक था। दीपिका के दर्ज़े में पढ़ता था। उसे अक्सर अपने गलियों में घूमते देखा करता था‚ कई बार शंका भी हुआ; किन्तु अपनी बहन की तरफ़ से वह निश्चिन्त था। फिर बात यहाँ तक पहुँच जाएगी इसकी उसे लेशमात्र भी आशंका न थी। जिस रोग से वह और नीलम पीड़ित थे‚ उसी रोग का मरीज़ दीपिका और विनय भी थे।

इसी तरह सुनील बहुत देर तक बहन को समझाता और ग़ुस्सा निकालता रहा। मनुष्य की वृति देखिये‚ समझाने‚ समझाने में कितना फ़र्क है। अभी थोड़ी देर पहले नीलम को भागने‚ घर छोड़ने के लिए प्रेरित कर रहा था। और अब‚ उसी कार्य के लिए जो वह स्वयं भी करने जा रहा था। अपनी सगी बहन को डांट बता रहा है। भागने के‚ प्रेम करने के दुस्मरिणामों‚ भूत की विस्मृतियाँ और भविष्य के भयानक कष्टों‚ विपतियों और धोखे से उपमा सहित अवगत करा रहा है। अब वह अभिभावक बन के सोच रहा है। उनकी आतुरता‚ व्याकुलता‚ विषाद‚ दुःख‚ पीड़‚ क्रोध और मनोस्थिति को व्यक्त कर रहा है। जब भाई होकर इसे इतनी मानसिक वेदना हो रही है तो माता—पिता का क्या हाल होगा ? जिसने उनके लिए अपने को मिटा और खपा दिया है‚ अपने अस्तित्व को उनके कल्याण हेतू विलीन कर दिया है। जिसने अपने बच्चों से अपनी सारी उम्मीदें‚ आशायें और अभिलाषायें लगा रखी है‚ जो उनके जीवन के आधार और अवलम्ब है‚ जीवन निधि और पूरे जीवन का सार है। उनपर क्या बीतेगी‚ यह कोई उनसे पूछे।

जब सूर्य अपने घर को जाने लगे‚ पक्षियां अपने घोंसलों में लौटने लगीं। सुदूर गाँव के आटा मिल से आती पक—पक ही आवाज़ बंद हो गयी। तब सुनील अपनी बहन को लेकर घर को चला। अपनी इस ग़लतियों के भीषण परिणाम का स्वरूप दिखाकर और क्षमा मांगकर नीलम को घर लौटा दिया। अंधेरा होने लगा था। सुनील और दीपिका तेज़ क़दम तथा दुःखी‚ चिंतित और भारी मन से गाँव की तरफ़ बढ़े जा रहे हैं।

।।समाप्त।।


सम्पर्क सूत्र –

लेखक-धर्मेन्द्र कुमार

ग्राम-भवानीपुर (बढ़ैयाबाग) ‚ पोस्ट-बाजार समिति तकिया

थाना-सासाराम‚ जिला-रोहतास‚ राज्य-बिहार‚ भारत

पिन कोड- 82 11 15

bZesy&dharmendra.sasaram@gmail.com

शिक्षा-स्नातकोत्तर (दर्शन शास्त्र) ‚ नेट‚ लाइब्रेरी साइन्स‚ कई साल पत्रकारिता का अनुभव‚ कई कहानियाँ पत्र-पत्रिकायों में प्रकाशित हो चुका है। प्रकाशित कहानी संग्रह- ‘शराबी की बीबी’ (बिहार सरकार के अंशानुदान से)।

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