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डॉ पीरज़ादा क़ासिम की ग़ज़लें, नज़्म और शेर / मनीष कुमार सिंह


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Pic Credit - Google


मनीष कुमार सिंह का एक अन्य, संबंधित आलेख भी पढ़ें - मेराज फैज़ाबादी की ग़ज़लें , नज्म और शेर


सब जब्र-ए-वक़्त की नज्र हुआ जो पाया जो पाया भी नहीं
अब फुर्सत है तो याद आता है एक ख्व़ाब की जो देखा भी नहीं 
यह शेर है पाकिस्तान में रहने वाले शायर, या यूँ कहूँ की अपने आप में एक संस्थान, इंडो-पाक दोस्ती के पैरोकार और बेहद ही सादे और सरल डॉ पीरज़ादा क़ासिम साहब का !

दिल्ली में 08-फ़रवरी–1943 को जन्मे पीरज़ादा क़ासिम का परिवार विभाजन के दौरान पाकिस्तान चला गया ! वही कराची से स्नातक की डिग्री लेने के बाद आप इंग्लैंड के Newcastle Uni. से P.hd की डिग्री ली ! फ़िर वापस वतन पाकिस्तान लौट आये ! आप कई विश्वविद्यालय में एकेडमिक में जुड़े रहे ! और पाकिस्तान के कई प्रमुख विश्वविद्यालयों में वाईस- चांसलर और चांसलर के रूप  में सेवाएँ दी !

आज जब भाषा और संवेदनाओं की हीनता है ! लोग ज़रा – ज़रा सी बात पर मरने और मारने को उतारू हो जाते है तब इस दौर में पीरज़ादा क़ासिम साहब एक मिसाल है ! जिनसे दोनों देश को लोग और ख़ासकर भाषा से जुड़े लिखने – पढ़ने वाले लोग बहुत कुछ सीख सकते है ! पर शायद हम सीखना ही नहीं चाहते है डॉ साहब की एक ग़ज़ल का शेर है –
अपने ख़िलाफ़ फ़ैसला ख़ुद ही लिखा है आप ने
हाथ भी मल रहे हैं आप आप बहुत अजीब हैं


यह पूरी ग़ज़ल कुछ यूँ है –
ग़म से बहल रहे हैं आप आप बहुत अजीब हैं
दर्द में ढल रहे हैं आप आप बहुत अजीब हैं

साया-ए-वस्ल कब से है आप का मुंतज़िर मगर
हिज्र में जल रहे हैं आप आप बहुत अजीब हैं

अपने ख़िलाफ़ फ़ैसला ख़ुद ही लिखा है आप ने
हाथ भी मल रहे हैं आप आप बहुत अजीब हैं

वक़्त ने आरज़ू की लौ देर हुई बुझा भी दी
अब भी पिघल रहे हैं आप आप बहुत अजीब हैं

दायरा-वार ही तो हैं इश्क़ के रास्ते तमाम
राह बदल रहे हैं आप आप बहुत अजीब हैं

अपनी तलाश का सफ़र ख़त्म भी कीजिए कभी
ख़्वाब में चल रहे हैं आप आप बहुत अजीब हैं

एक अच्छा शेर कैसे लिखा जाता है इसका नमूना कुछ ऐसे है कि जैसे आज के हुक्मरान जो मन में आये करते है ! आपका एक शेर कितना सटीक है –
शहर तलब करे अगर तुम से इलाज-ए-तीरगी
साहिब-ए-इख़्तियार हो आग लगा दिया करो
और यह पूरी ग़ज़ल कुछ यूँ है –


ज़ख़्म दबे तो फिर नया तीर चला दिया करो
दोस्तों अपना लुत्फ़-ए-ख़ास याद दिला दिया करो

एक इलाज-ए-दाइमी है तो बरा-ए-तिश्नगी
पहले ही घूँट में अगर ज़हर मिला दिया करो

शहर तलब करे अगर तुम से इलाज-ए-तीरगी
साहिब-ए-इख़्तियार हो आग लगा दिया करो

मक़्तल-ए-ग़म की रौनक़ें ख़त्म न होने पाएँगी
कोई तो आ ही जाएगा रोज़ सदा दिया करो

जज़्बा-ए-ख़ाक-पर-वरी और सुकून पाएगा
ख़ाक करो हमें तो फिर ख़ाक उड़ा दिया करो

इस पूरी गज़ल में एक – एक शेर कितना सटीक और मौजूं है ! मुझे याद है जब मैंने पहली मर्तबा डॉक्टर साहब की एक ग़ज़ल देखी थी इन्टरनेट पर जो उनकी सबसे पसंदीदा और प्रसिद्ध ग़ज़लों में भी –
ज़िंदगी ने झेले हैं सब अज़ाब दुनिया के
बस रहे हैं आँखों में फिर भी ख़्वाब दुनिया के

दिल बुझे तो तारीकी दूर फिर नहीं होती
लाख सर पे आ पहुँचें आफ़्ताब दुनिया के

दश्त-ए-बे-नियाज़ी है और मैं हूँ अब लोगों
इस जगह नहीं आते बारयाब दुनिया के

ज़िंदगी से गुज़रा हूँ कितना बे-नियाज़ाना
साथ साथ चलते थे इंक़लाब दुनिया के

हम ने दस्त-ए-दुनिया पर फिर भी की नहीं बैअत
जानते थे हम तेवर हैं ख़राब दुनिया के


यकीन मानिये डॉक्टर साहब की यह गज़ल और उनका यह लहज़ा किसी करिश्मे से कम नहीं लगता है !
उनकी एक और ग़ज़ल जो मुझे पसंद है जिसका एक शेर –
अब तो मेरा दुश्मन भी मेरी तरह रोता है
कुछ गिले तो कम होंगे साथ साथ रोने से
यह गज़ल कुछ यूँ है –
सानेहा नहीं टलता सानेहे पे रोने से
हब्स-ए-जाँ न कम होगा बे-लिबास होने से

अब तो मेरा दुश्मन भी मेरी तरह रोता है
कुछ गिले तो कम होंगे साथ साथ रोने से

मत्न-ए-ज़ीस्त तो सारा बे-नुमूद लगता है
दर्द-ए-बे-निहायत का हाशिया न होने से

सच्चे शे'र का खलियान और भरता जाता है
दर्द की ज़मीनों में ग़म की फ़स्ल बोने से

हादसात-ए-पैहम का ये मआल है शायद
कुछ सुकून मिलता है अब सुकून खोने से

एक – एक शेर जो आप महसूस कर सकते है !

पीरज़ादा क़ासिम साहब की एक नज्म कुछ यूँ है कि –
वक़्त – ए – रुखसत वो चुप थी
बस हाथों में एक गुलदस्ता था
जिसमें तीन ही फूल थे लेकिन
हरेक बातें करता था
दो उसकी आँखों जैसे थे
एक मेरे दिल जैसा था !

दुनिया में जहाँ – जहाँ मुशायरे और कवि-सम्मेलन हुए ! ऐसा नहीं हुआ कि वहां डॉ पीरज़ादा क़ासिम शेर या वह खुद नहीं मौजूद रहे ! दुनिया के बहुत से देशों में मुशायरे पढ़े आपने !
राज्यसभा टीवी को दिए एक इंटरव्यू में आप बताते है की १८८९ में दिल्ली के प्रगति मैदान में मुशायरा पढ़ने के बाद कैसे वह अपने पुराने दिल्ली के घर पर गए ! बेहद सादे और संजीदा डॉ पीरज़ादा क़ासिम !

इन्टरनेट आपके साथ एक बड़ा धोखा करता है कि आपको वही दिखाता है जो आप देखना चाहते है ! ख़ासकर एक ही तरह की चीजें !  आप खोजिये कि कितने बेहतरीन लोग है इस दुनिया में !

चलते – चलते डॉ पीरज़ादा क़ासिम की एक और नज़्म, उस शायर के नाम जो मुहब्बत की बात करता है ! अमन और चैन की बात करता है !
क़त्ल-गाह की रौनक़
हस्ब-ए-हाल रखनी है
ग़म बहाल रखना है
जाँ सँभाल रखनी है
ज़ोर-ए-बाज़ू-ए-क़ातिल
इंतिहा का रखना है
दशना तेज़ रखना है
और बला का रखना है
और क्या मिरे क़ातिल
इंतिज़ाम बाक़ी है
कोई बात होनी है
कोई काम बाक़ी है
वक़्त पर नज़र रखना
वक़्त एक जादा है
हाँ बता मिरे क़ातिल
तेरा क्या इरादा है
वक़्त कम रहा बाक़ी
या अभी ज़ियादा है
मैं तो क़त्ल होने तक
मुस्कुराए जाउँगा
 

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-    मनीष कुमार सिंह
लेख़क परिचय :-
जन्मस्थली बहराइच,उत्तर-प्रदेश ! कंप्यूटर साइंस में परास्नातक के बाद वर्तमान में सॉफ्टवेर इंजिनियर के रूप कार्यरत ! शिक्षा, साहित्य, दर्शन और तकनीकी में रूचि ! 

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