कहानी - कलंक - सिराज

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कलंक

शादी की तैयारियां हो चुकी थीं। अगले दिन सुबह बारात आने वाली थी। लड़की के परिवार में तनाव की स्थिति थी। लड़की के पिता रतन से कहते हैं 'बेटा चौकन्ना रहना कोई गड़बड़ी न हो। वो हमारे घर के आस-पास दिखने न पाए। मैंने सब को बोल रखा है जैसे वो दिखे तो टांगे तोड़ दें।' ठीक है पिता जी... मैंने भी अपने दोस्तों को बोल रखा है। अरे हां, शादी के कार्ड सारे लोगों तक पहुंच गए हैं न? हां, वो तो कल ही पहुंचा दिए गए। एक बार मामा जी से पूछ लेता हूं। ठीक है बेटा। शाम होते-होते रिश्तेदारों का आना-जाना शुरू हुआ। यह सब देख कर मानसी का बी.पी. डाउन होने लगा। वह अपने कमरे में इधर से उधर टहलते हुए सोचने लगी कि पता नहीं आज रात क्या होगा। 'उफ्फ... यह नेटवर्क भी बहुत परेशान कर रहा है। मैसेज सेंड ही नहीं हो रहे। कल ही तो रिचार्ज करवाया था उसने। कैसे बात होगी? क्या करूं समझ नहीं आ रहा।' इतने में दरवाजा खटखटाने की आवाज आई।

'अरे दरवाजा खोल मानसी'। जल्दी।

‘अरे...तू कब आई? दो घंटे हुए मुझे आ कर’

‘अच्छा... तो ऊपर क्यों नहीं आई?’

‘आते ही तेरी मम्मी ने इतना काम लगाया कि क्या बताऊं? थक गई मैं तो।’

‘क्या हुआ मुंह क्यों लटकाई हो तुम?

तबीयत तो ठीक है न तेरी?’

‘हां, ठीक है। तेरे मोबाइल में नेटवर्क है?’

‘हां, है... क्यों?’

‘चल दे जल्दी... कॉल करना है अर्जेंट।’

‘अच्छा लॉक तो खोलने दे मुझे। ले...’

‘मेरी प्यारी कजिन अब ज़रा तू बाहर जा, मुझे कुछ बात करनी है। समझ प्लीज...’

‘अच्छा...’

मानसी, यामिनी के मोबाइल से चंद्रकांत को कॉल करती है। लेकिन कॉल रिसीव नहीं करने की वजह से परेशान हो जाती है। नए नंबर से आने वाले कॉल को चंद्रकांत बार-बार इग्नोर करता रहता है। मानसी का टेक्स्ट मैसेज देख कर चौंक जाता है और तुरंत कॉल बैक करता है। हड़बड़ाते हुए- हां हेल्लो! मानसी क्या हुआ? ये किसका नंबर है? तू नंबर छोड़, ये बता करना क्या है?

‘रात एक बजे निकल कर बाजू गली में आ जाना। वहां से हम रेलवे स्टेशन चलेंगे तीन बजे शिरडी एक्सप्रेस है।’

‘क्या हम शिरडी...?’

‘हां’

‘ठीक है। मैं तैयार हूं। बाय।’

मानसी और चंद्रकांत की बाते हो चुकी थीं। इतने में फिर दरवाज़ा खटखटाते हुए यामिनी कहने लगी 'अरे दरवाजा खोल कब तक बतियाती रहोगी' ‘अरे थोड़ा सब्र नहीं कर सकती तुम? मैं, थोड़ी न तेरा मोबाइल खाए जा रही थी। ले।’ यामिनी छेड़ते हुए ‘अच्छा... हो गई बात जीजा जी से... कल तो विदा हो कर जाना ही तो है। इतनी भी क्या बात करनी थी।’

मानसी चिढ़ कर कहने लगी ‘ओह हेल्लो... मैं कोई जीजा-वीजा से बात नहीं कर रही थी।’

यामिनी मानसी के कन्धों पर अपने दोनों हाथ रखते हुए पूछा ‘तो फिर किससे कर रही थी’

‘मैं तो चंद्रकांत से बात कर रही थी

यामिनी अपने हाथ हटाते हुए ‘कौन चंद्रकांत? क्या बात?’ अपने कमरे की विंडो खोल कर एक लम्बी सांस लेते हुए मानसी ने कहा-

‘कुछ नहीं... छोड़ बाद में बताऊंगी सब।’

मानसी का हाव-भाव देखकर, उसके सामने फेस टू फेस खड़े होकर, एक हाथ अपनी कमर पर और दूसरा हाथ मानसी के कंधे पर रखते हुए पूछने लगी-

‘मानसी सच बता चल क्या रहा है। मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा। कुछ तो गड़बड़ है।’

‘अरे कुछ नहीं सब ठीक है। तू तो मेरे पीछे ही पड़ गयी। चल मुझे रेस्ट करने दे। तू भी नीचे जा कर देख...।’

यामिनी मानसी के कमरे से नीचे आकर काम में जुट गई। मानसी अपने ऊपर कमरे में बैठे रात के एक बजने का इंतजार कर रही थी। अपनी आंखें टिक-टिक करती घड़ी की सुइयों पर गड़ाए रखी थी। अपने मोबाइल की बैटरी और नेटवर्क पर भी ध्यान था। इंतजार में मानसी को एक-एक पल भारी लग रहा था, और दिल की धडकनें तेज होने लगी थीं। पूरे घर में चहल-पहल, गाने-बजाने और विदाई गीतों का माहौल धीरे-धीरे कम हो रहा था। जैसे-जैसे वक्त बीतता गया घर का माहौल शांत हो गया। घर आए रिश्तेदारों और मेहमानों को रहने के लिए दो-तीन जगहों पर व्यवस्था की गई थी। अब घर के अंदर की सारी लाइट है बंद हो चुकी थी और घर के दीवारों पर टिमटिमाती छोटी-छोटी लाइटों की कलरफुल लड़ियां जगमगा रही थी। कुछ लोगों के मोबाइल पर आनेवाले मेसेजस की टोनें भी साइलेंट हो चुकी थीं। थोड़ी देर में घर-आंगन में पूरी तरह सन्नाटा छा गया था। इतने में मानसी के मोबाइल पर एक मैसेज आता है- 'मैं आ गया हूं तुम जल्दी आ जाओ।'

‘हां बस निकल ही रही हूं।‘

मानसी अपने कमरे से अपने चेहरे पर दुपट्टा बांध कर सीढ़ियों से नीचे की तरफ आने लगी। आंगन में देखा तो सारे लोग सो रहे थे। धीरे से किचन रूम के पास वाले पीछे के दरवाजे से बाहर निकल गयी। अपने दबे हुए हल्के-हल्के कदमों से बाजू वाली गली में आ गई। जहां चंद्रकांत अपनी टू व्हीलर लेकर खड़ा था। दोनों एक दूसरे को देखते ही आपस में गले लग गए। मानसी ने कहा 'चलो निकलो जल्दी यहां से अब' रात के सन्नाटे में चंद्रकांत की टू व्हीलर की आवाज सुनकर गली के कुत्ते भौंकने लगे। चंद्रकांत और मानसी शॉर्टकट रास्ते से रेलवे स्टेशन की तरफ बढ़ने लगे। इधर कुत्तों की आवाज सुनकर मेहमानों की नींद टूट चुकी थी और एक-एक करके जागने लगे थे। आपस में एक दूसरे से बात करते हुए कहने लगे कि 'इतनी रात में कुत्तों का भौंकना, शायद कोई चोर आया होगा'। वैसे पिछले हफ्ते से चोरी की वारदातें होने लगी थीं। अब घर के ज्यादातर लोग जाग चुके थे। रतन ने यामिनी से कहा 'अरे यार मेरे मोबाइल की बैटरी डाउन हो गई है, तुम मानसी के कमरे से चार्जर लेते आना'  यामिनी फर्स्ट फ्लोर पर मानसी के कमरे की तरफ बढ़ती है। कमरा खुला हुआ था और अंदर मानसी को न देखकर, यामिनी घबरा जाती है, परेशान होकर इधर-उधर देखने लगती है और मानसी को जोर-जोर से आवाज़ देने लगती है। नीचे से रतन की आवाज आई- 'क्या हुआ यामिनी क्यों चिल्ला रही हो'

यामिनी घबराते हुए-'कमरे में मानसी नहीं है'।

यह सुनते ही घर के सारे लोगों में हड़कंप मच गई। किसी ने छत पर देखने को कहा तो किसी ने वॉशरूम में। लेकिन मानसी घर के किसी भी कोने में नहीं थी। घर के सारे लोग इधर-उधर ढूंढने लगे। रात के सन्नाटे में लोगों की चहल-पहल से कुत्ते और ज्यादा भौंकने लगे। पिताजी गुस्से में लाल अपने हाथ में कुल्हाड़ी लेकर कहने लगे- 'मुझे लग रहा था यह नीच जाति का नीच हरकत ही करेगा, घेरो साले को मिल जाए तो टुकड़े-टुकड़े कर देना, अगर नहीं मिला तो उसकी बस्ती में जाकर उसके मां-बाप को चौराहे पर ले आओ' यह सुनना ही था यामिनी समझ गई और कहने लगी- 'थोड़ी देर पहले मेरे मोबाइल से उसने कॉल किया था शायद मेरे मोबाइल में रिकॉर्डिंग हो...' यामिनी के मोबाइल की रिकॉर्डिंग सुनने के बाद सब कुछ पता चल गया। कुछ लोग रेलवे स्टेशन की तरफ भागने लगे और कुछ लोग गांव के किनारे वाली बस्ती में जा कर चंद्रकांत के मां-बाप और मामा की खूब पिटाई की। उधर चंद्रकांत और मानसी शिरडी एक्सप्रेस ट्रेन से निकल चुके थे। इधर सुबह होते-होते चौराहे पर भीड़ बढ़ गयी। चंद्रकांत के मां-बाप और मामा को मार-मार कर अधमरा कर दिया गया। चंद्रकांत के मां-बाप और मामा भीड़ के सामने हाथ जोड़कर अपनी जिंदगी की भीख मांग रहे थे। रतन कुछ दोस्तों के साथ पुलिस स्टेशन जा कर अपनी बहन के किडनैपिंग का चंद्रकांत पर एफआईआर दर्ज कराया और उन दोनों की फोटो और रिकॉर्डिंग क्लिप पुलिस को सौंप दिया। शिरडी एक्सप्रेस प्लेटफार्म पर आने के इंतजार में पुलिस तैनात थी। जैसे प्लेटफार्म पर दोनों उतरते हैं, दोनों की गिरफ्तारी हो जाती है। पुलिस कस्टडी में चंद्रकांत को थर्ड डिग्री देते हुए कहते हैं - 'तुम लोगों में इतनी हिम्मत कहां से आई नीचों, तुम्हारे छूने से हमारी जूती भी गंदी हो जाती है। साले तुम लोगों को गावं के अंदर आने क्या दिए, तुम लोग हमारे घरों तक पहुंच गए? लड़की भगा कर ले जाता है?' यह कहते हुए पुलिसवाला बड़े गुस्से में पीटने लगा।

'साब हम दोनों एक दूसरे से प्यार करते हैं साब... हम दोनों साथ रहना चाहते हैं साब... आप मानसी से भी पूछ लो साब...

प्यार में जाति धरम नहीं रहता साब और हम 18 साल से ऊपर के हैं'

'दे रे इसको... साला हमें कानून सिखाता है।'

वागले... 'आन रे त्या पोरी ला काय सांगती बगू ज़रा, त्याला काय माय-बाप आणि जाति ची चिंता नाही का' (ले आओ उस लड़की को ज़रा देखें तो सही, उसे अपने मां बाप और जाति की चिंता है कि नहीं) मानसी का बयान लिया जाता है और वह अपने बयान में कहती है कि 'हम दोनों अपनी मर्जी से आए हैं सर। हम दोनों एक दूसरे को चाहते हैं और शादी भी करना चाहते हैं।' मानसी की यह बात सुनकर पुलिसवाले का गुस्सा और बढ़ गया। चंद्रकांत को दो-तीन दिन लगातार थर्ड डिग्री दी जाती है। और उधर गांव में उसके मां-बाप और मामा को गांव के लोग मिलकर मारते-पीटते हैं और जान से मारने की धमकी भी देते हैं। चार दिन बाद मानसी और चंद्रकांत को पुलिसवाला गांव लाकर पंचायत के हवाले कर दिया। एक भीड़ चंद्रकांत को पंचायत से घसीटते, लात-घूंसे मारते हुए चौराहे की तरफ ले गयी। चौराहे के खंबे से बांध कर उस पर पेट्रोल डाला जाता है... मानसी यह दृश्य देख कर चीखती-चिल्लाती, रोती रह गयी। कुछ औरतें उसे थप्पड़ मारते, गाली-गलोच करते घर ले जाने लगीं। ‘कुलच्छनी, खानदान का नाम मिट्टी में मिला दिया, नाक कटवा दी तूने... ‘तुला मरण येवदे’ (तुझे मौत आये) थोड़ी देर में धुंआ चौराहे के चारों तरफ फैल गया। चारों तरफ बस एक आवाज़ गूंज रही थी- 'प्यार का कोई जाति धरम नहीं होता' धुआं धीरे-धीरे बढ़ता गया। पुलिस और भीड़ अपने चेहरे पर कालिख लेकर लौट रही थीं।

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लेखक

©सिराज

पीएच-डी. शोधार्थी, हिंदी विभाग,

मौलाना आज़ाद नेशल उर्दू यूनिवर्सिटी, हैदराबाद


ईमेल : raajship@gmail.com

नाम

 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आत्मकथा,1,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. 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कहानी - कलंक - सिराज
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