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दीपावली विशेष आलेख - आत्माराम यादव पीव

दीपावली की रात लोग जुआ क्यों खेलते हैं ?

आत्माराम यादव पीव

दुनिया में देखा गया है कि लोग अक्सर मुकद्दर आजमाने के लिए जुआ खेलते है ,सट्टा खेलते है लाटरी खेलते है तो कुछ घुड़दौड़ या निरीह जानवरों की प्रतिस्पर्धा कराते है लेकिन ये सभी बुराईयां सिवाय धन बर्बादी ओर अपना सब कुछ हारने का सबाव बंता है पर कोई लखपति या करोड़पति नहीं बनता। दीपावली खुशियो का त्योहार है लेकिन कई शौकिया लोग दीपावली जैसे पर्व पर भी धर्म की आड़ लेकर इन बुराइयों को जिंदा रखे है। दीपावली की जगमगाती रात्रि में जुआं खेलना शकुन समझने वालों ने किसी अच्छाई को ग्रहण कर मिसाल तो पेश नहीं की किन्तु वे ये विश्वास जरूर करते है कि इस रात्रि में जुआं खेलने से लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं ओर घर मे छप्पर फाड़कर धन की बरसात होती है बशर्ते वे जुआ खेलते है ? मजेदार बात यह है की ऐसे लोगों ने इस परंपरा को जीवित रखने के लिए एक पौराणिक किस्सा गढ़ रखा है जिसकी सच्चाई किस पुराण में है यह ढूँढे नही मिलती। जुआ खेलने वाली इस जमात का मानना है कि एक बार शिव ने पार्वती के साथ जुआ खेला और सब कुछ हार कैलाश छोड़ गंगा तट पर निवास करने लगे, कार्तिकेय को जब ज्ञात हुआ तो उन्होंने इस कला में पारंगत होकर पार्वती को हराया। शिव रूठ कर चले गए उन्हे मनाकर लाने का प्रयास किया लेकिन वे नहीं आए। कार्तिकेय से हारने के बाद अब पार्वती जी दुखी रहने लगी, जिसे गणेश ने जान लिया इस विद्या को सीखकर गणेश ने कार्तिकेय के साथ जुआ खेलकर उन्हें हरा दिया। इस जुए में शिव का पूरा परिवार बिखर गया ओर मुश्किल से उनके बीच सुलह हुई। शिवजी के परिवार में हुये इस विग्रह ओर सबके जुआ खेलने के पीछे विष्णु का मज़ाक किया जाना जाहिर हुआ तब शिव जी क्रोधित हो गए जिन्हें मनाया तब काफी समझाने पर और विनम्र शब्दों पर प्रसन्न होकर भोले बाबा ने वरदान दिया कि कार्तिकी अमावस्या को जो जुआ खेलेगा वह वर्ष भर प्रसन्न रहेगा और समृद्धिवान होगा। तभी से धर्म परायण भोले भारतीय शकुन के रूप में जुआ खेलने लगे।

हालांकि यह बात अलग है कि इस जुए को धर्म से जोड़ने वाले लोग दीपावली पर शौकिया कुछ निश्चित राशि तय कर जुआ खेलने पहुचते है तो कुछ लोग अपना सर्वस्व दाव पर लगा देते है। एक अनुमान के अनुसार 60 प्रतिशत लोग किसी न किसी तरह जुआ खेलते है जिससे कानून व्यवस्था बिगड़ने के साथ अपराध को बढ़ावा मिलता है तो कई जगह हत्याये तक होने लगी है जिससे यह जुआ खतरनाक रूप ले चुका है । सभी जानते हैं कि लाटरी सट्टे से धन नसीब नहीं होता बल्कि तन,मन और धन की बर्बादी ही होती है, लेकिन फिर भी इस धन्धे में किसी न किसी तरह लिप्त हैं, दरअसल लाटरी सट्टा भी एक तरह का नशा है जो लोग लाटरी सट्टे में अपने दाव पेंच हारते हैं वे अपने बर्बाद हुए धन को पुनः हासिल करने के लिए नंबरों के मायाजाल से भिड़े रहते हैं, ऐसे में लोग अपना घर तक बेंच देते हैं। औरत के जेवर बेच देते हैं, इतिहास गवाह है जुएं के खेल में द्रौपदी भी दांव पर लग गई थी। आए दिन समाचार पत्रों की सुर्खियो में भी सट्टा जुआ से बर्बाद हुये लोगों ओर पकड़ाये लोगों के समाचार देखे जा सकते है ।

जो लोग इस क्षेत्र में थोड़ा बहुत धन जीत लेते हैं, वे तुरंत करोड़पति बनने के लिए कमाए धन को फूंकना शुरू कर देते हैं। ताश, चौपड़ और जुएं खेलने का चलन सदियों पुराना है, इस शौक के खातिर कई राजे-महाराजे बर्बाद भी हुए, दसवीं सदी के मध्य में यूनान में कुंआरी कन्याओं को जुएं के दांवपेंच लगाने की प्रथा थी, इस कारण इस खेल में हारी कन्याओं को कई यातनाओं के दौर से गुजरना पड़ता था। कई लोगों को लाटरी सट्टे में निकलने वाले नंबरों का पूर्व आभास स्वप्न के माध्यम से भी होता इस संबंध में मैंने पढ़ा था कि लंदन की मिस मारिया ने 8 अगस्त 1973 की रात्रि में एक स्वप्न में अगले दिन खुलने वाली एक करोड़ की लाटरी के निकट के नंबर दिखाई दिए, दूसरे दिन सुबह वह अपने प्रेमी से मिलने जा रही थी कि रास्ते में लाटरी की दुकान देखकर रात वाला स्वप्न उसके मस्तिष्क में तरोताजा हो उठा, और उसने स्वप्न में देखे नंबरों वाला टिकट खरीद लिया, सांझ को जब उसने सांध्यकालीन अखबार देखा तो उसे जानकर आश्चर्य हुआ कि जो टिकट उसने खरीदा था उस पर ही एक करोड़ पाउंड का पुरस्कार निकला था, स्वप्न की यह घटना दुनिया के अखबारों के लिए एक बाक्स न्यूज बनी। लेकिन लंदन कि मिस मारिया जैसे ही सभी भाग्यशाली हो यह संभव नहीं परंतु जिस तरह देश में लोग जुए को दीपावली कि रात से जोड़कर जुआ खेलते है तो यह रात जुए से भाग्योदय के लिए एक स्वस्थ शुरुआत नहीं ,व्यक्ति को यह समझना चाहिए ओर पालन भी करना चाहिए कि उसके पुरुषार्थ से जो धन कमाया है वही धन उसके लिए सच्ची लक्ष्मी है ओर यही लक्ष्मी उसका ओर उसके परिवार का कल्याण करने वाली है। अच्छा होगा लोग धर्म के नाम पर जुआ जैसी सामाजिक बुराई को छोड़कर अपराध करने से बचे ओर अच्छे नागरिक बनकर कानून तोड़ने कि बजाय कानून का पालन करे इससे जहां जुआ न खेलने से वे पुलिस थाने में बंद होने के अपयश से खुद को ओर परिवार को बदनाम होने से बचा सकेंगे।


रंगोली बिना सुनी है हर घर की दीपावली

आत्माराम यादव पीव

दीपावली पर रंगोली के बिना घर आँगन सुना समझा जाता है। जब रंगोली सज जाती है तब उस रंगोली के बीच तेल- घी का दीपक अंधकार को मिटाता एक संदेश देता है वही आज रंगोली के बीच पटाखे छोड़ने को लोग शुभ मानते है । पौराणिक या प्राचीन इतिहास में मनुष्य ने लोक कलाओ की अभिव्यक्ति रंगोली का कब प्रयोग किया इसका उदाहरण देखने को नहीं मिलता किन्तु भोगोलिक दृष्टि से लोक संस्कृति में मांगलिक आयोजनों के अवसर पर मालवा में लोक चित्रावन के जरिये लोग अपने घर आँगन में लीप पौत कर रंगोली सजाकर अपने घर का सूनापन दूर करने मे दक्ष थे। लोकजीवन सहल सुलभ साधनों और रंग उपकरणों द्वारा जीवन की गहन एवं विविध अनुभूतियों को अप्रतिम कल्पना शक्ति एवं सर्जनात्मक ऊर्जा से रूपंकर कलाओं में अभिव्यक्त करता रहा है जिसे मालवी लोकचित्रावण के व्यापक फलक में समाहित किया गया हैं- रंगोली, अल्पना, मांडणा, भित्तचित्रा, मेंहदीकला, भित्ति अलंकरण कला(म्युरल), गुदनाकृति, वस्त्राचित्रा(छीपाकला) आदि ऐसी प्राचीनतम कला इसका प्रमाण है ओर यही कारण है कि बोलचाल में मांडणा शब्द ही मालवी लोकचित्रावण का पर्याय बन चुका है। धार्मिक आनुष्ठानिक अवसरों, सामाजिक आयोजनों और सांस्कृतिक पर्व त्यौहारों पर लोक चित्रावण के साथ गीत, नृत्य, कथा, संगीत आदि लोक तत्वों का भी समावेश रहता है। यह कला कर्म चाहे एक सधे हाथ का प्रतिफल हो, किन्तु उसमें परिवार व समाज के अन्य सदस्यों की कलात्मक अभिरूचि एवं क्रियात्मक सहभागिता भी महत्वपूर्ण होती है। लोक चित्रावण की कोई औपचारिक शिक्षा नहीं दी जाती। यह लोककला विरासत के रूप में पीढ़ी दर पीढ़ी पनपती विकसित और समृद्ध होती हुई जन जीवन का अभिन्न अंग बनी हुई है।

दीपावली के समय मालवा की यह रंगोली कला का विस्तार देखते देखते एक प्रदेश से दूसरे प्रदेश की सीमाओं को लांघता हुआ पूरे देश का हिस्सा बन गया है ओर लोग कोई भी मांगलिक पर्व हो या घर में खुशियों का दिन हो उस दिन घर की बेटियाँ, बहुएं सहित परिवार की महिलाएं अपने घर-आँगन को अच्छी तरह बुहारकर, गोबर से लीपकर और सुखाकर कई डिब्बों में सँजोकर रखी गई विभिन्न रंगो की रंगोली से रांगोली बनाती हैं। जो अपने घरों में विशेष आकार-प्रकार की रांगोली बनाती है पहले वे उसके अनुसार बनने वाली कला, चित्र या आकृति के लिए बिंदकी डालती है फिर एक एक बिंदकी के सिरों को मिलाकर लकीर पूरी करके आकृति बनाते हैं। फिर उसे रंग बिरंगे पावडर रंगों के भरकर सुंदर रांगोली की संरचना करते हैं। जैसे कोई पुष्प ,कोई देवता या देवी या बेलपत्ती बनाना हो या फूल बनाना हो तो पहले गिनकर बिंदिया डालते हैं और उन्हें मिलाकर लकीरें बनाते हैं। पत्तियों में हरा रंग और फूल पंखुरियों में लाल अथवा गुलाबी रंग भरते हैं। सिन्दूरी रंग से स्वस्तिक बनाते हैंं। प्रतिदिन घर की द्वार-देहरी पर बनाई जाने वाली रांगोली आकार प्रकार में छोटी होती है और बार-त्यौहार पर वृहद और विविधताए लिए होती है जो मोहक होती है, जो जितनी सुंदर आकर्षक हो उस रंगोली को बनाने में उतना ही समय लगता है इसलिए देखा गया है की एक रंगोली को बनाने के लिए अनेक युवतियां, बच्चे लगे रहते हैं।

आजकल बाजारों में रांगोली बनाने के लिए विविध आकृतियों के सांचे और तरह-तरह के रंगीन पावडर आदि सामग्री सहज उपलब्ध हैं। इसके बावजूद इस पारम्परिक लोक कलाकर्म के प्रति मालवा की नई पीढ़ी का रूझान धीरे-धीरे घटना चिन्ताजनक है। जबकि दक्षिण भारतीय राज्यों, बंगाल और महाराष्ट्र में, मध्यप्रदेश ,उत्तरप्रदेश सहित राजस्थान ओर गुजरात में यह लोककला कहीं अधिक व्यापक आधार बनाये हुए हैं। यह सुखद ही कहा जा सकता है की इस पर्व पर रंगोली की आपूर्ति करने के लिए पूरे देश में कुछ समय के लिए हजारों लोगों को रोजगार भी मिल जाता है ओर अब हर शहर गाँव के बाजारों में इन रंगोली की सजी सेकड़ों दुकानों को देख सकते है । रंगोली कला मालवा के लोकजीवन में कलात्मक सौन्दर्य बोध की अभिव्यक्ति का सशक्त आधार बनी हुई है। पर्व-त्यौहारों विशेषकर दीपावली के अवसर पर मांडणा कला की बहार देखते ही बनती हैं।

हर साल दीपावली आते ही देश के सभी गांवों और शहरों के कच्चे-पक्के घर-आँगन रांगोली और मांडणों से सुसज्जित हो उठतें हैं। मांडणा मांडने के लिए सफेद आज एक से एक रंग आ गए है कई कंपनियों को करोड़ों का कारोबार इन्हीं रंगों से होता है लेकिन सदियों से इस व्यापार पर आज भी चूना , खड़िया मिट्टी और गेरू एसजे व्यापार कम नही हुआ है ओर जहां ग्रामीण लोग आज भी इन्हें पसंद करते है वही शहरों में पुराने लोग भी चूना ओर खड़िया मिट्टी को गलाकर एवं अच्छी तरह गाढ़ा बनाकर और फिर एक काड़ी में रूई लपेटकर मांडणा आकृतियां बनाते हैं। गांवों में आज भी लोगों के घर बड़े बड़े आँगन है जो घर की महिलाओं के हाथों का अद्भुत कौशल और रचनात्मक प्रतिभा की बानगियां के साक्षी बनते हैं तथा शहरो मे आँगन के अभाव में लोग अपने घर के द्वार पर ही इन मांडणा आकृतियों को बनाकर खुश होते हैं। यदि मांडणों की बाहरी रेखाएं श्वेत रंग की होती हैं, तो भीतरी भाग का भराव गेरूए चित्रों से किया जाता हैं। दीपावली की खुशियाँ में अनेक लोग अपने घरों के अंदर भी पुजा स्थान पर रंगोली सजाते है। दीपावली के बाद आने वाली एकादशी जो देवउठनी कहलाती है उसे दिन भी लोग अपनी देहरी पर पांव की आकृति गीले चूने और खड़िया मिट्टी से बनाते है आंगल ओर आँगन की पददिया को सजाया जाता है। एक पखवाड़े तक लोग दीपावली से गोवर्धन पुजा सहित देवउठनी एकादशी तक रोज रांगोली सजा कर अपनी खुशी का इजहार करते है । रांगोली प्रतिदिन बनती है और मिट जाती है। मांडणा कला जीवन के उल्लास, उमंग की प्रतीक हैं। पर्यावरण स्वच्छता और सौन्दर्य बोध की चेतना किरण को लोक जीवन में सदियों से कायम रखने में मालवा की मांडणा कला का अनूठा योगदान है जो देशवासियों को आल्हादित करता है।

आत्माराम यादव पीव

वरिष्ठ पत्रकार

सिटी पोस्ट आफिस के पास, मोरछली चौक, होशंगाबाद

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