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जीवन प्रवाह के सजीव बिंब - विजय सिंह

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अगर अभिव्यक्ति के अनूठेपन को ही कवि की प्रतिभा की पहचान न माना जाये तो हर कवि अनुभवों की कोई न कोई नई इबारत लेकर आता ही है। इसमें उसके नितांत निजी अनुभवों से लेकर ज़माने भर के वे दुनियावी अनुभव भी शामिल रहा करते हैं जिनमें उसकी अपनी कोई खास भूमिका नहीं रहती। ऐसे कवियों की एक विपुल भीड़ आज लहलहा रही है। ये वे कवि हैं जो प्रतिक्रियायों को सतही काव्य भाषा में व्यक्त कर कवि होने की उपाधि पा लेना चाहते हैं। आश्चर्य तो यह कि इनकी कविता में शायद ही ऐसी कोई प्रभावी पंक्ति हो जो हमें आश्वस्त कर सके।

इस भीड़ में कुछ कवि जिन्होंने सचमुच कवि होने की सादगी भरी संजीदा जद्दोजहद की है वे इस भीड़ में अलक्ष्य रहे आए हैं। उनका इस तरह अदृश्य रह जाना उन पाठकों को तो सालता ही है जो गंभीर और लोकप्रिय कविता के बीच किसी अच्छी कविता के इंतज़ार में रहा करते हैं। शैलेन्द्र चौहान एक ऐसे ही कवि हैं जिनकी कविता भाषा के स्तर पर सहज तो है लेकिन वह लोकप्रिय नहीं है क्योंकि उसके भीतर एक महत्वपूर्ण वैचारिक द्वंद्व है जो मनुष्य के सामाजिक और सांस्कृतिक उन्नयन की आकांक्षा का अनूठा पर वास्तविक उपक्रम है। उनके अबतक तीन कविता संग्रह प्रकाशित हुए हैं। पहला "नौ रुपये बीस पैसे के लिए" जिसने अपने नाम के कारण कुछ विद्वान रचनाकारों -आलोचकों को आकर्षित तो अवश्य ही किया लेकिन उसकी अंतर्वस्तु की जनपक्षधर भूमिका को लेकर उन्होंने चुप्पी धारण कर ली, जबकि इस संग्रह की कविताएं श्रम की गरिमा और वैज्ञानिक चेतना की भावभूमि पर सृजित बहुत अच्छी कविताएं थीं। इस संग्रह पर शील जी की या टिप्पणी काबिलेगौर है - " शैलेन्द्र की कविताओं का फलक बड़ा है। मानवीय संवेदना से ओतप्रेत है। आतंकवाद के पेट से जन्मी आतंकवादी व्यवस्था कोढ़-खाज की खेती है। शोषण उत्पीड़न के दायरे निरंतर बढ़ते जा रहे हैं. शैलेन्द्र की कविता मांग करती है अपराधी तत्वों के विरुद्ध संगठित संघर्ष की और शोषितों की पक्षधरता के लिए विश्वास अर्जित करती है।" (इसी संग्रह के दूसरे संस्करण की भूमिका से)। यह संभव है शैलेन्द्र के शील जी ने अपने स्नेह के कारण यह प्रशंसा की हो लेकिन संगृहीत कविताएं यदि इस बात की पुष्टि करती हों तो ?

संग्रह की पहली कविता की शुरूआती पंक्तियां देखें -

सुबह हो चुकी है

सूरज तपने लगा है

सर पर लकड़ी का गट्ठर लादे

एक औरत बढ़ रही है शहर की ओर

खेतों के किनारे किनारे

उसके नंगे पैरों के निशान

उभर रहे हैं इस विश्वास के साथ

कि कल की रोटी उसकी मुट्ठी में है

रोटी जो सिर्फ रोटी

और कुछ नहीं है

न संवेदन, न फ़्रस्ट्रेशन न उच्छ्वास

सब कुछ रोटी में समा गया है....

शैलेन्द्र का दूसरा संग्रह 'श्वेतपत्र' भी अलक्षित ही रहा। संभवतः एक छोटे शहर के छोटे प्रकाशन से छपे होने के कारण, और शैलेन्द्र की अपनी अति स्वाभिमानी प्रकृति के कारण जो कुछ लोगों को अवश्य ही अहंकार की अनुभूति कराती है। इस संग्रह में अनेक महत्वपूर्ण कविताएं हैं यथा - अतीत, समय, विरासत, सूर्यास्त, संचार अवरोध, जिजीविषा, याद आएंगे वे फूल, थार का जीवट प्रक्रिया सुबह के भूले आदि लेकिन संग्रह की सबसे सशक्त कविता है 'पियरी पियरी जुनहिया' जो लोकभाषा में है और गांव के बड़े फलक को प्रतिबिंबित करती है।

दिन ढरि गओ है

संझा हुय गई है

गाय-गोरू लौटि आए है चरि कै

धीरे-धीरे पियरी-पियरी जुनहिया

दिखाई देन लगी है आसमान में

अंधियारे में -ताल के किनारे

संभर की तान सुनाई दै रही है -

मेरो तनु डोरै, मेरो मनु डोरै

मेरे दिलु को गओ करारु रे....

कौनु बजाए बाँसुरिया..... आ..... अ

ईश्वर की चौखट पर शैलेन्द्र का तीसरा कविता संग्रह है जो उन्हें नए अवतार में सामने लाता है और इन पंक्तियों के साथ -

इस प्रपंची समय में

वाकई कितना कठिन है

सृजन....

यहीं कवि अपने समय को कुछ इस तरह से परिभाषित कर रहा है -

कबूतर की तरह तड़पता फड़फड़ाता

गिरा वह गली में छत से

ठाँय ... थ्री नॉट थ्री राइफल से

निकली गोली बेधती सीना..

वह दंगाई नहीं तमाशबीन था...

दूसरी ओर -

कोई संपादक अशोभन छेड़छाड़ करता स्त्रियों से

ढेरों लच्छेदार संपादकीय लिखकर

छूट पा लेता है स्त्री शोषण और अश्लीलता के विरुद्ध

इसी संग्रह से कुछ और पंक्तियां हैं -

कौन जाने इस झील के किनारे हो

अद्भुत बाजार कल

अनगिनत शो-रूम

और

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हर तरफ आदमी फैले हैं

सूखते हुए कपड़ों की तरह

नालों के किनारे.....

वहीँ जहाँ हर शहर में कभी एक नदी थी

समकालीन सभ्यता और जीवन प्रवाह के ये कसैले बिम्ब कविता की प्रमाणिकता की गवाही देते हैं। कवी अपने समय के प्रति पूरी तरह सजग है। इस दृष्टि से उसकी कविता दया दलित सन्दर्भ में विशेष उल्लेखनीय है जहां दया एक मखौल बन गई है -

उस दिन एक हत्यारे ने मुझ पर दया की

जान से नहीं मारा दोनों हाथ काट दिए

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गुंडों ने दया की फिरौती ली

बेइज़्ज़त नहीं किया

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सवर्णों ने बड़ी दया की

रात-भर दलित प्रश्न हल किया

इन पंक्तियों में जितना गहरा व्यंग्य है उसके मूल में कहीं गहरा गुस्सा भी है। वह समयानुभव है जो एक तरह से इन कविताओं में लावा बन बह रहा है।

कविकर्म की जो फजीहत इन दिनों हुई है वह भी कवि की आँखों से ओझल नहीं है। संवेदनशून्यता वाले इस समय में संवेदनों का बचे रह जाना कितनी बड़ी उपलब्धि हो सकती है लेकिन वह सहज कहाँ है ?

अब

न तो मन की कचोटेँ और

न कसमसाते दर्प

न ही अपराधबोध

ये कवितायेँ इस तरह की सभ्यता (?) की तीखी आलोचना हैं। ऐसा नहीं कि किनमे कहीं मानव मन की कोमलता के बिम्ब नहीं हैं। वे भी भरपूर हैं लेकिन उन्हें अपने में गहराई से महसूस करने के क्षण काम ही हैं।

हमारे कस्बे के दशहरा मैदान में

ऐन दशहरे के दिन

जब भड़-भड़ की ध्वनि के साथ

जल उठा रावण

तब कस्बे के एक कवि ने तय किया कि

वह लिखेगा एक कविता

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यूं समाये थे चित्त में उसके चाट-पकौड़ी

सजे-बजे लोग, लुगाइयां, बच्चे

निश्चित ही कवि की यह वह निगाह है जहां निथरे हुए मानव मूल्य बार बार आकर हमें अपने आदमी होने की याद दिलाते हैं। यहां कतिपय ऐसी भी कविताएं हैं जिनका संबंध कवि के निजी जीवन से है जैसे एक लम्बी कविता 'देहरी पर मरी मां'। यह बहुत अच्छी कविता है। यहां कवि मां को लेकर भावुक नहीं यथार्थवादी है। अभिव्यक्ति के प्रति ईमानदार है। उसकी यह विवेकवान दृष्टि सराहनीय है।

दरअसल

माँ गाँव की थीं

गाँव-जैसी ही थीं

गाँव के लिए थीं

मैंने भी कभी नहीं चाहा

कि वह हमारे साथ रहें

उनकी बातें, भाषा

और उनकी सोच

मेरी पटरी उनसे बैठती नहीं थी

उनका अतुल स्नेह

वह भी मुझे असह्य होता

अक्सर मैं झुँझलाया करता

उन पर

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माँ नहीं रहीं

मैं विचलित नहीं हुआ

पर लगा माँ नहीं रहीं

वह गाँव

वहाँ कुछ भी नहीं रहा अपना

न रागन न द्वेष

माँ को कंधा दे

रख दिया चिता पर

धू-धू... जल गईं माँ

माँ और श्रम

वे माँ से अधिक एक श्रमिक थीं

मैं यह कभी न भूल पाऊँगा

कभी नहीं।

इन कविताओं को पढ़ चुकने के बाद यह दुविधा नहीं रह जाती कि कवि की मूल चिंताएं क्या हैं। ये कविताएं अपने विचारों में साफ़ सुथरी और सुलझी हुई हैं। ये भारत के उस आम हिंदी पाठक से संवाद करती हैं जो अपनी ही भूली-बिसरी चेतना के रहस्यों को समझना चाहता है। शैलेन्द्र निश्चय ही अपने समय के एक विशिष्ट कवि हैं भले ही किन्हीं आग्रहों या साहित्येतर कारणों से उन्हें अलक्षित किया गया हो।

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