नाका - विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, लोकप्रिय ई-पत्रिका. 

विविध विधाओं में से चुनकर पढ़ें -

* कहानी  || * उपन्यास || * हास्य-व्यंग्य  || * कविता  || * आलेख  || * लोककथा  || * लघुकथा  || * ग़ज़ल  || * संस्मरण  || * साहित्य समाचार  || * कला जगत  || * पाक कला  || * हास-परिहास  || * नाटक  || * बाल कथा  || * विज्ञान कथा  ||  * समीक्षा  ||

---***---

यहाँ की विशाल ऑनलाइन लाइब्रेरी में मनपसंद रचनाकार अथवा रचनाएँ खोज कर पढ़ें -

 नाका में प्रकाशनार्थ  रचनाएं इस पते पर ईमेल करें : rachanakar@gmail.com  रचनाकार के वाट्सएप्प नंबर 8989162192 (कृपया कॉल नहीं करें, कॉल रिसीव नहीं होगी, तथा इसका उपयोग केवल प्रकाशनार्थ रचना भेजने के लिए ही करें) पर भी वाट्सएप्प से रचनाएँ अथवा रचना पाठ के वीडियो प्रकाशनार्थ भेजे जा सकते हैं. अधिक जानकारी के लिए यह पृष्ठ [लिंक] देखें.

--

लघुकथा - सिर उठाता रावण - -ज्ञानदेव मुकेश

सिर उठाता रावण

   दशहरे का दिन था। रावण-वध देखने के लिए मेरा दस वर्षीय पुत्र बेहद उत्साहित और रोमांचित था। शाम हुई तो हम लोग सज-संवर कर गांधी मैदान में तशरीफ ले आए। बुराई पर सच्चाई की विजय देखने के लिए लोगों का विशाल हुजूम गांधी मैदान में एकत्रित हो चुका था। उनमें उत्साह और उमंग की कोई कमी नहीं थी। मुझे इस बात से बड़ी खुशी हो रही थी कि लोग भले ही बुराई के आगे सिर झुकाते रहते हों, मगर आज अच्छाई की जीत देखने के लिए किस तरह लालायित थे।


  शाम थोड़ी और गहरी हुई तो मेघनाद, कुंभकरण के बाद बुराई शिरोमणी रावण धूं-धूं कर जलने लगा। तालियों की पुरजोर आवाज और पटाखों की गड़गड़ाहट के बीच हम निश्चिंत होते जा रहे थे कि आखिर बुराई का बोरिया-बिस्तर बंध ही गया।

[post_ads]
  हम घर आए। बेटा बेहद आह्लादित था। उसने मां से कहा, ‘‘मां, मजा आ गया। इस बार रावण खूब बड़ा बना था। उसके बेहद बडे़-बड़े सिर थे। वे खूब डरावने भी थे। मैं उन्हें बड़ी आसानी से देख पा रहा था। पिछले साल वह छोटा था तो मुझे दिखा ही नहीं था। इस बार तो कमाल हो गया।’’
  मगर मैं एक कोने में उदास बैठा था। पत्नी पास आयी और उसने पूछा, ‘‘तुम दुखी क्यों हो ? इस बार हम सभी ने व्यापार में ज्यादा मुनाफे कमाए। यह जानकर मंडली वालों ने हम लोगों से ज्यादा पैसे लिए तो बड़ा रावण भी बनाया। तुम्हें तो खुश होना चाहिए।’’


  मैंने कहा, ‘‘आज मैंने अखबार में पढ़ा कि इस बार सभी जगह बड़े-बड़े रावण खड़े किए गए हैं। तुम लोगों को इस बात खुशी हो सकती है। मगर मैं यह सोच रहा हूं कि बढ़ता हुआ रावण कहीं इस बात का संकेत तो नहीं है कि हमारे बीच बुराइयां बड़ी होती जा रही हैं।’’
  इस बात पर पत्नी भी बेहद गंभीर हो गयी।

                                                      -ज्ञानदेव मुकेश                                               
                                   पता-
                                               फ्लैट संख्या-301, साई हॉरमनी अपार्टमेन्ट,
                                               अल्पना मार्केट के पास,
                                               न्यू पाटलिपुत्र कॉलोनी, 
                                                पटना-800013 (बिहार)

e-mail address - gyandevam@rediffmail.com

0 टिप्पणियाँ

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.