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मां की दवा - लघुकथा - सुरेश सौरभ

   आज फिर बूढ़ी मां, बेटे के जाते समय बोली-आज मत भूलना वो ट्यूब और दवा जरुर लेते लाना। रात सोते समय जोडों में दर्द बहुत होती है।’ चार दिन से मां की दवा लाना भूल रहा बेटा बोला-मां याद बनी रही तो जरुर लेते आऊंगा। क्या करुं आफिस के इतने काम निकल आते हैं,कुछ ध्यान नहीं रहता।’

     शाम को वह आफिस से लौट रहा था। उसकी नजर स्टेशन के समीप फुटपाथ पर कराहती हुई मैली-कुचैली एक बूढ़ी महिला पर पड़ी, जिसके पैरो में एक मरियल बूढ़ा तेल मल रहा था, उसे देख अपनी बूढ़ी मां की याद आ आई। फिर वह मां की दवा खरीद कर घर लौटा। दवा पाकर बूढ़ी आंखों का नूर कई गुना बढ़ गया। मां प्रसन्नचित्त होकर बोली-बेटा आज दवा की कैसे याद बनी रही। बेटा खामोश था, शून्य में कुछ खोजता रहा। उसके हृदय में बरसो पहले मरे हुए बाप की एकदम से सोई हुईं संवेदनाएं जाग पड़ीं। अब उसकी चेतना में फुटपाथ पर पड़ी बुढ़िया के पैरो में तेल मलता वह बूढ़ा था, अब उसकी स्मृति  में वह दृश्य  भी आ गया, जब बचपन में खेलते समय, एक मामूली चोट उसके पैरो में लगी थी, तब फौरन दौड़कर पापा ने उसे उठाया था और जल्दी-जल्दी मां ने तेल गरम करके उसके घुटनों में मला था। गरम तेल की वह तासीर, आज उसे मां की दवा साधते हुए महसूस हुई थी, जिससे उसके हृदय में कुछ उमड़-घुमड़ रहा था, अब उसे लगा, वही सब कुछ मां की आंखों में उमड़-घुमड़ रहा था, जो एकटक उसे निहारे जा रही थी।

सुरेश सौरभ निर्मल नगर लखीमपुर खीरी कापीराइट-लेखक

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