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जमूरे आफिस हैं (पुस्तक समीक्षा) -सुरेश सौरभ


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जी हां यह शीर्षक है लोककवि नंदीलाल के ग़ज़ल संग्रह का। गोला गोकर्णनाथ निवासी नंदीलाल ने इस संग्रह में तमाम विसंगतियों, विद्रूपताओं को अपनी ग़ज़लों से पछोर-पछोर कर उड़ाते हुए दीख पड़ते हैं। संग्रह में ग़ज़लें इतनी सरस भाषा में हैं कि एक ही बैठक में ही हर पाठक पूरा संग्रह पढ़ जायेगा। वे कहीं राष्ट्र भाषा हिंदी का गुणगान करतें हैं यथा

   लगती कितनी प्यारी हिंदी

   सारे जग की न्यारी हिंदी।

   तुलसी सूर कबीर जायसी

    नानक और बिहारी हिंदी

    हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई

    सर्व धर्म की प्यारी हिंदी।

तो कहीं बच्चों की विलक्षणता और पावनता पर‌ अपनी लेखनी कुछ इस तरह नुमाया करतें हैं

यथा. द्वेष और ईर्ष्या नहीं हैं बच्चे तो पावन होते हैं/प्रेम-सुधा बरसाने वाले यह सुंदर सावन होतें हैं।/जैसे ढालोगे सांचे में सब वैसे ही ढल जायेंगे/घर की शोभा होते हैं यह घर आंगन होते हैं।

     कहीं किसानों के दर्द को अपना दर्द समझ कर बड़े कायदे से सरस शब्दों में बयान करते हैं, तो कहीं गिरते राजनैतिक स्तर पर अपनी गहन चिंता को ,अपनी ग़ज़लों की माला में पिरोतें हैं।

       इस संग्रह में दो शब्दों की छोटी बहर की ग़ज़ल बहुत प्रशंसनीय है यथा चले चले/बुरे भले।/सभी मिले/ किसे छले/हवा चले।/मकां जले।

      काव्य की हर विधा में लिखने वाले नंदीलाल ने लगभग बारह सौ दोहों की रचना की है ।वे अपने आत्म निवेदन में लिखतें हैं..आज के दौर में जब कविता हर हाथ से खोटे सिक्के की भांति लौटाई जा रही है मैं अपने ग़ज़ल संकलन जमूरे आफिस हैं लेकर आप के समक्ष प्रस्तुत हूं। वस्तुत: कविता मेरे लिए आरंभ से ही पूजा की तरह रही है। जैसे आराध्य की अर्चना मन को शांति देती है। उसी तरह काव्य सृजन सदैव मुझे संतुष्टि ,आनंद और ऊर्जा देता है रहा , वैसे भी कविता कभी किसी दबाव या लाभ के लोभ में नहीं लिखी जाती यदि ऐसा होता है तो वह कविता कालजयी नहीं हो पाती। आज के आर्थिक युग में भी कविता पर बाजार की मांग  और पूर्ति का सिद्धांत लागू नहीं होता।... नंदीलाल जी कविता को पूजा मानते हुए बरसों से साहित्य साधना में सक्रिय हैं। इसके लिए इन्हें तमाम नामी-गिरामी संस्थाओ ने सम्मानित किया है। काव्य रथ मासिक पत्रिका का आप  पिछले करीब बीस सालों से संपादन कर रहे हैं। जिसमें देश के  तमाम रचनाकारों को प्रकाशन अवसर देते रहे हैं।

         सत्तर पेज का यह संग्रह बहुत ही पठनीय और संग्रहणीय है। बहुत सरल भाषा शैली में लिखी गई इनकी ग़ज़लों में जीवन का सच्चा दर्शन और समग्र समाज का दस्तावेज कहा जाए कोई अतिशयोक्ति न होगी।

       पुस्तक-जमूरे आफिस हैं

(ग़ज़ल संग्रह)

  रचनाकार एवं प्रकाशक -नंदीलाल निरास, पता-हनुमान मंदिर के पीछे मोहन नगर गोलागोकर्णनाथ-खीरी

मूल्य-१५०/

पृष्ठ संख्या-७५

समीक्षक-सुरेश सौरभ

निर्मल नगर लखीमपुर खीरी उत्तर प्रदेश पिन-262701

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