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दीपावली की कविताएँ

प्रज्ञा शुक्ला

'दीवाली"

दीपों की दिवाली है आदि से अनंत तक,
प्रकाश है खुशहाली है आदि से अनंत तक।

तिमिर जा छुपा कहीं ना जाने किस के अंक में,
दीप है सजे हुए झिलमिला रहे हैं पंक्ति में।

अरुण की लालिमा भी आज मंद लग रही,
दीप की लो है देखो कोने कोने सज रही।

पटाखे फुलझड़ियां है आनंद को बढ़ा रहे,
स्त्री-पुरुष सभी है आज भक्ति गीत गा रहे।

रामजी ने अंत कर रावण का बता दिया,
नैतिकता ही शक्तिमान है पाप को मिटा दिया।

श्री राम का है आगमन सुस्वागतम सुस्वागतम,
लक्ष्मी गणेश आपका सुस्वागतम सुस्वागतम।

प्रकाश का पर्व तो प्रकाश ही फैलाईये,
मन गगन संसार से अन्धकार को मिटाईये।।

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दोहे रमेश के दिवाली पर

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संग शारदा मातु के, लक्ष्मी और गणेश !

दीवाली को पूजते, इनको सभी 'रमेश !!


आतिशबाजी का नहीं, करो दिखावा यार !

दीपों का त्यौहार है,… सबको दें उपहार !


आतिशबाजी से अगर,गिरे स्वास्थ्य पर गाज !

ऐसे रस्म रिवाज को, .......करें नजर अंदाज !!


करें प्रदूषण वाकई, .....ऐसे रस्म रिवाज !

उनका करना चाहिए,झटपट हमें इलाज !!


पैसा भी पूरा लगे ,.......... गंदा हो परिवेश !

आतिशबाजी से हुआ,किसका भला "रमेश"!!


मंदी ने अब के किया , ऐसा बंटाधार !

फीकी फीकी सी लगे, दिवाली इस बार !!


सर पर है दीपावली, सजे हुवे बाज़ार !

मांगे बच्चों की कई ,मगर जेब लाचार !!


बच्चों की फरमाइशें, ......लगे टूटने ख्वाब !

फुलझडियों के दाम भी,वाजिब नहीं जनाब !!


दिल जल रहा गरीब का, काँप रहे हैं हाथ !

कैसे दीपक अब जले , बिना तेल के साथ !!


बढ़ती नहीं पगार है,....... बढ़ जाते है भाव !

दिल के दिल में रह गये , बच्चों के सब चाव !!


कैसे अब घर में जलें,... दीवाली के दीप !

काहे की दीपावली , तुम जो नहीं समीप !!


दुनिया में सब से बड़ा,. मैं ही लगूँ गरीब !

दीवाली पे इस दफा, तुम जो नहीं करीब !!


दीवाली में कौन अब ,.... बाँटेगा उपहार !

तुम जब नहीं समीप तो, काहे का त्यौहार !!


आपा बुरी बलाय है, करो न इसका गर्व !

सभी मनाओ साथ में , .दीवाली का पर्व !!


लिया हवाओं से सहज, मैंने हाथ मिलाय !

सबसे बड़ी मुंडेर पर, दीपक दिया जलाय !!


हुआ दिवाली पर सदा,माँ को बडा मलाल !

सरहद से जब घर नहीं, लौटा उसका लाल !!


रमेश शर्मा

-----.

डॉ. चंद्रेश कुमार छतलानी

आइए जलते हैं


आइए जलते हैं
दीपक की तरह।


आइए जलते हैं
अगरबत्ती-धूप की तरह।


आइए जलते हैं
धूप में तपती धरती की तरह।


आइए जलते हैं
सूरज सरीखे तारों की तरह।


आइए जलते हैं
अपने ही अग्नाशय की तरह।


आइए जलते हैं
रोटियों की तरह और चूल्हे की तरह।


आइए जलते हैं
पक रहे धान की तरह।


आइए जलते हैं
ठंडी रातों की लकड़ियों की तरह।


आइए जलते हैं
माचिस की तीली की तरह।


आइए जलते हैं
ईंधन की तरह।


आइए जलते हैं
प्रयोगशाला के बर्नर की तरह।
क्यों जलें जंगल की आग की तरह।


जलें ना कभी खेत लहलहाते बन के।
ना जले किसी के आशियाने बन के।
नहीं जलना है ज्यों जलें अरमान किसी के।


ना ही सुलगे दिल… अगर ज़िंदा है।
छोडो भी भई सिगरेट की तरह जलना!
नहीं जलना है
ज्यों जलते टायर-प्लास्टिक।


क्यों बनें जलता कूड़ा?
आइए जल के कोयले सा हो जाते हैं
किसी बाती की तरह।

----.


अविनाश तिवारी

आओ हम नवदीप जलाएं

प्रेम और विश्वाश का

जगमग ज्योति ज्ञान का

तमस हटे संसार का


जीवन में खुशियाँ फैलाएं

आओ हम नवदीप जलाएं

श्रद्धा तप और त्याग का

जतन करें इस बात का


रिश्ता कुछ ऐसा निभाएं

जिसमें सम्मान हो जज्बात का

अपने घर के मान का


फर्ज कुछ ऐसा निभाएं

आओ हम नवदीप जलाएं

देश के अभिमान का


मातृभूमी के यशगान का

समृद्ध भारत के निर्माण का

सुरभित हो जीवन सबका


पल्लवित सौरभ हो सुगंधा

सर्वे भवतु सुखिन: बन जाये हमारी वसुंधरा

दीप ऐसा सब जलाएं आओ हम नवदीप जलाये।।

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@अवि

अविनाश तिवारी

अमोरा

जांजगीर चाम्पा

-----.

सुनील कुमार

।। दीप पर्व मनाना तुम ।।

******************************

दीप पर्व अबकी जब मनाना तुम

एक दीप स्नेह का भी जलाना तुम।


घर आंगन दीपों से सजाना तुम

पर एक दीप अपनत्व का भी जलाना तुम।


भोग लक्ष्मी गणेश को बेशक लगाना तुम

पर भूख किसी भूखे की भी मिटाना तुम।


खुशियां सिया राम घर वापसी की मनाना तुम

पर वनवास किसी और को न कराना तुम।


वचन सिया राम सा निभाना तुम

प्रीत भरत लक्ष्मन सी लगाना तुम

दीप पर्व अबकी जब मनाना तुम।


कलंक किसी सिया पर न लगाना तुम

दिल किसी का न दुखाना तुम

दीप पर्व अबकी जब मनाना तुम।


धन दौलत के खातिर

अपनों को न ठुकराना तुम

मार्ग सत्य का अपनाना तुम

दीप पर्व अबकी जब मनाना तुम।


दीप खुशियों के बेशक जलाना तुम

पर दर्द भी किसी का मिटाना तुम।

राग द्वेष सभी मिटाना तुम

दीप पर्व अबकी जब मनाना तुम।

********************************

प्रस्तुति- सुनील कुमार

पता- ग्राम फुटहा कुआं

निकट पुलिस लाइन

जिला- बहराइच, उत्तर प्रदेश।

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