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दीपावली पर लक्ष्मीजी कैसे प्रसन्न होती हैं? - डॉ. शारदा मेहता

हमारे सनातन धर्म में ऐसे अनेक त्योहार हैं, जिनको परिवार के सभी सदस्यगण बड़े उत्साह एवं आनंद के साथ मनाते हैं। दीपावली भी उन्हीं प्रमुख त्योहारों में से एक है। इस दिन धन की देवी माँ लक्ष्मीजी का पूजन-अर्चन किया जाता है। वैसे तो हमारे दिन का प्रारंभ भी हम लक्ष्मीजी की वन्दना से ही करते हैं। प्रात:काल उठकर अपने हाथ की दोनों हथेलियाँ मिलाकर हम प्रार्थना करते हैं : -

'कराग्रे वसते लक्ष्मी करमध्ये सरस्वती।

करमूले तु गोविन्दं प्रभाते कर दर्शनम्’

(आचार प्रदीप)

कतिपय भक्तगण 'करमूले स्थितो ब्रह्म प्रभाते करदर्शन’ का पाठ भी करते हैं। अर्थात् लक्ष्मीजी का निवास हाथ के अग्रभाग में है तथा सरस्वती हाथ के मध्य भाग में स्थित है। हाथ के पंजे के नीचे (मूल भाग में) गोविन्द (ब्रह्मा) का निवास है। श्रम कर के जो व्यक्ति धनार्जन करता है उसे सर्वप्रथम अपने हाथों का ही आश्रय लेना होता है। बिना अक्षर ज्ञान (सरस्वती) के वह अपनी आजीविका चला सकता है। बिना पैसे (लक्ष्मीजी) के तो उसका जीवन दूभर हो जाएगा। इसलिए लक्ष्मीजी का स्थान कर के अग्र भाग में बतलाया गया है।

वर्षा ऋतु लगभग समाप्त हो जाती है। घर आँगन की सफाई और रंग रोगन का कार्य दीपावली के आगमन के पूर्व पूर्ण कर लिए जाते हैं। कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी से ही घर के बाहर दीप जलाए जाते हैं। पकवानों की मधुर सुगन्ध आबाल वृद्ध सभी के मन को हर्षित करने लगती है। घर के सभी सदस्य नए परिधानों को क्रय करने में व्यस्त हो जाते हैं। दीपावली का त्योहार धनतेरस से भाई-दूज तक पाँच दिनों तक बड़े उत्साह से मनाया जाता है। धनतेरस को आयुर्वेद चिकित्साचार्य भगवान धन्वंतरि का पूजन भी किया जाता है। पूजन में भगवान को आरवा (खड़ा) धनिया अर्पित किया जाता है। व्यापारीगण इस दिन से नवीन बही खाते खरीदने की प्रक्रिया प्रारंभ करते हैं। नर्क चतुर्दशी के दिन प्रात: जल्दी उठकर उबटन आदि करके स्नान किया जाता है। कथन है कि ऐसा करने से स्वास्थ्य एवं सौंदर्य की वृद्धि होती है। इस दिन भगवान कृष्ण ने नरकासुर राक्षस का वध किया था। इसलिए इसे नर्क चतुर्दशी कहा जाता है।

भगवान राम चौदह वर्ष के वनवास के पश्चात् अयोध्या वापस आए थे। उस दिन अयोध्यावासियों ने अपने घरों में आनंदोत्सव मनाकर दीप प्रज्वलित किए थे। उसी की स्मृति में दीपावली का पर्व मनाया जाता है। जैन समाज के अनुसार महावीर स्वामी को निर्वाण प्राप्त हुआ था।

दीपावली के दिन खड़ी (सफेद खड़िया) तथा गेरू से माँडने (चौक) बनाए जाते हैं। यह एक लोक-कला है। अधिकांश घरों की महिलाएँ इस कला में पारंगत होती हैं। बाजार में आजकल स्टीकर्स भी मिलते हैं जिन्हें यथास्थान फर्श पर चिपका दिए जाते हैं। बालिकाएँ बड़े उत्साह से रंग बिरंगी रांगोली का निर्माण करती है। सायंकाल के समय घरों की जगमगाहट सभी के मन को आकर्षित करती है। शुभ मुहूर्त में सायंकाल के समय माँ लक्ष्मी जी के पूजन की तैयारी की जाती है। माँ लक्ष्मी के साथ श्री गणेशजी तथा सरस्वती माता का पूजन भी किया जाता है ऐसी मान्यता है कि माँ लक्ष्मीजी को चंचला भी कहते हैं। वह एक स्थान पर स्थिर नहीं रह सकती है। इसलिए माँ लक्ष्मीजी, श्री गणेश जी तथा सरस्वती जी के बैठे हुए स्वरूप का ही पूजन किया जाता है। लाल रंग के बाजोट (पटिए) पर आम्रपत्तों से सज्जित कलश रखा जाता है। उस पर नारियल रख कर पूजा में रखते हैं। मिट्टी के दीपक को मीठे तेल से पूर कर (भर कर) उसमें नए कपास से बत्तियाँ बना कर रखी जाती है। दो बत्ती से एक बत्ती बनाई जाती है। दीपक में आँवला, गन्ना, बैंगन, पोखड़ा (नई जुआर के दाने), बेर, मूली, चने की पत्तियाँ, बिनौले (कपास के बीज), साल की धानी (कील), सिघाड़े, काचरी, मूँग की फली, फूल, हल्दी, कंकू आदि डाला जाता है। लक्ष्मीजी के साथ भगवान विष्णु का भी पूजन किया जाता है। चाँदी के सिक्के, गहने, बर्तन आदि की भी पूजा की जाती है। श्रीसूक्त तथा श्रीविष्णुसहस्त्रनाम का पाठ भी किया जाता है। विष्णुजी के बिना माँ लक्ष्मी का पूजन अपूर्ण है और माँ लक्ष्मीजी के बिना श्री विष्णु की आराधना अधूरी है। पूजन में कमल का फूल, सीताफल, सिंघाड़े, गन्ना, डंडीवाले पान, मिठाई, गृह निर्मित पकवान आदि का विशेष महत्व है। एक नई झाडू चाहे वह छोटी हो को भी पूजन में रखी जाती है। पूजन के पश्चात् पंचामृत ग्रहण कर घर के सभी सदस्यों को प्रसाद दिया जाता है। सभी सदस्य माँ लक्ष्मी को धोक देकर आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। पटाके जलाए जाते हैं और एक दूसरे को बधाई दी जाती है। ब्राह्मण समाज के कई घटक में पूजन के समय अठारह दीपक प्रज्वलित किए जाते हैं। ऐसी मान्यता है कि ये अठारह दीपक लक्ष्मीजी के अठारह पुत्रों के लिए हैं। पूजित दीपकों को मंदिर, कुआँ, घर, सभी कमरे तथा छत आदि पर रखा जाता है। यह कथन है कि जिस घर के सदस्य आपस में प्रेम, दया, सेवा, सहानुभूति तथा सहिष्णुता की भावना से रहते हैं वहाँ माँ लक्ष्मी सहर्ष निवास करने के लिए पधारती है। माता लक्ष्मीजी के एक सौ आठ नाम प्रचलित हैं तथा उनके पुत्रों के अठारह नाम हैं। जब इन अठारह नामों को श्रद्धापूर्वक जपा जाता है तो ममतामयी माता लक्ष्मीजी अपने भक्तों के पास दौड़ी चली आती है और भक्तों के घर धनाभाव नहीं रहता है।

अठारह पुत्रों के नाम इस प्रकार हैं- १. देव सरवा, २ चिक्लीत, ३. आनन्द, ४. कर्दम, ४. श्रीप्रद, ६. जातवेद, ७. अनुराग, ८. सम्वाद, ९. विजय, १०. वल्लभ, ११. मद, १२. हर्ष, १३. बल, १४. तेजस, १५. दमक, १६. सलिल, १७. गुग्गल, १८. करुण्टक।

दीपावली के दूसरे दिन अन्नकूट, गोवर्धन पूजा तथा सुहाग पड़वा का पर्व मनाया जाता है। गोबर से गोवर्धन बनाकर पूजा की जाती है। छप्पन प्रकार के पकवान बनाकर अन्नकूट का नैवेद्य लगाया जाता है। सुहागिन स्त्रियाँ नवीन वस्त्र धारण कर सौभाग्यवती महिलाओं के चरण वन्दन कर आशीर्वाद प्राप्त करती हैं। इसके बाद भाई दूज या यम द्वितीया का पर्व होता है। बहिन अपने भाई को भोजन के लिए आमंत्रित करती है। भाई को तिलक लगाकर नारियल देकर, आरती कर भाई के स्वस्थ व दीर्घायु जीवन की कामना करती है।

पौराणिक ग्रंथ के अनुसार लक्ष्मीजी का प्रादुर्भाव समुद्र से हुआ है। देवासुर संग्राम में जब समुद्र मंथन हुआ तो उसमें से चौदह रत्न निकले। उन चौदह रत्नों में से एक रत्न लक्ष्मीजी थी, उनके हाथ में स्वर्णमुद्राओं से परिपूर्ण एक स्वर्ण कलश था। असुरगण उन रत्नों में से लाभ वाले रत्न स्वयं लेना चाहते थे। तब तत्काल देवताओं ने लक्ष्मीजी को भगवान विष्णु को सौंप दिया, जिससे वे स्थायी रूप से उनके पास ही रहे। सामान्य रूप से लक्ष्मीजी का वाहन उल्लू है। कहीं-कहीं हाथी को भी लक्ष्मीजी का वाहन दर्शाया गया है। एक कथा के अनुसार लक्ष्मीजी की बहिन अलक्ष्मी का वाहन उल्लू है। वह हमेशा लक्ष्मीजी के साथ ही रहती हैं।

हमारी सनातन परम्परा में द्रुतगति से परिवर्तन हो रहे हैं। पारम्परिक त्योहार धीरे-धीरे अपना मूलस्वरूप खोते जा रहे हैं। त्योहारों के प्रति उदासीनता का भाव जाग्रत होता जा रहा है। पारिवारिक सौहार्द्र का अभाव दिखलाई देता है। प्राचीन समय में धन कमाना मुख्य उद्देश्य नहीं था। सत्य निष्ठा के आधार पर धनोपार्जन किया जाता था। मुंशी प्रेमचन्द की कहानी 'नमक का दरोगा’ तथा महात्मा गाँधी का सादगीपूर्ण जीवन इसके स्पष्ट उदाहरण हैं। आधुनिक समय में हत्या, मारकाट, भ्रष्टाचार, दुराचार, अनाचार यहाँ तक कि व्यभिचार के द्वारा भी विपुल धनराशि प्राप्ति के प्रयत्न किए जाते हैं। रातोंरात करोड़पति से अरबपति और अरबपति से खरबपति बनने का प्रयत्न किया जाता है और जनता के हितों को ताक में रख दिया जाता है।

वर्तमान समय में युवा पीढ़ी के युवक स्वदेश को छोड़कर विदेशों में आजीविका के लिए चले जाते हैं और उनमें से अधिकांश युवक वहीं अपने परिवार के साथ बस जाते हैं। देश में निवासरत वृद्ध माता-पिता यहाँ रहते हैं और फोन या व्हाट्सएप पर अपनी संतान से चर्चा कर ही संतुष्ट हो जाते हैं। दीपावली के आगमन तथा लक्ष्मीजी को प्रसन्न करने के लिए हम अपने घर, आभूषण, फर्नीचर, परदे आदि सभी के स्वरूप में परिवर्तन करते हैं या नवीन क्रय कर लेते हैं। लक्ष्मीजी के आगमन के लिए आतुर रहते हैं। परन्तु बाहरी सफाई के साथ हमें अपने अन्दर की सफाई अर्थात् आत्मा को प्रकाशवान बनाकर करनी चाहिए। मन को निर्मल करना सबसे बड़ी स्वच्छता है। दीपक से, विद्युत सज्जा से तथा रंगीन मोमबत्तियों से बाहर तो प्रकाश हो जाएगा परन्तु हृदय के मैलेपन, छल, कपट, असत्यवाचन, दुर्व्यवहार, विश्वासघात आदि आदि को भी हमें दीप के प्रकाश से हटाकर निर्मल मन को दैवीय प्रकाश से प्रकाशित करना है। तभी हम वास्तविक श्री (लक्ष्मीजी) को प्राप्त कर सकेंगे। महाकवि तुलसीदासजी ने कहा है—

'जहाँ सुमति तहँ सम्पति नाना। जहाँ कुमति तहँ विपति निदाना।।

(श्रीराम.चरि.मा. सुन्दरकाण्ड दोहा-३९)

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डॉ. शारदा मेहता

सीनि. एमआईजी-१०३, व्यास नगर,

ऋषिनगर विस्तार, उज्जैन (म.प्र.)

Email : drnarendrakmehta@gmail.com

पिनकोड- ४५६ ०१०

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