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उर्दू नाटक - सुखान्त - अहमद शाह पतरस बुख़ारी - अनुवाद - डॉक्टर आफ़ताब अहमद

सुखान्त

दृश्य: एक तंग-व-अँधेरा कमरा जिस में सिवाय एक पुरानी सी मेज़ और थर-थर काँपती कुर्सी के और कोई फ़र्निचर नहीं। फ़र्श पर एक ओर चटाई बिछी है जिसपर अनगिनत पुस्तकों का ढेर लगा है। इस ढेर में से जहाँ तक पुस्तकों की पुश्तें नज़र आती हैं वहाँ शेक्सपियर, टॉलस्टॉय, वर्ड्सवर्थ इत्यादि साहित्य के सुविख्यात नाम दिखाई दे जाते हैं। बाहर कहीं पास ही कुत्ते भौंक रहे हैं। निकट ही एक बरात उतरी हुई है। उसके बैंड की आवाज़ भी सुनाई दे रही है जिसके बजाने वाले क्षय रोग, दमा, खाँसी और इसी प्रकार के अन्य रोगों से पीड़ित प्रतीत होते हैं। ढोल बजाने वाले की सेहत अलबत्ता अच्छी है।

पतरस नामक एक दरिद्र अध्यापक मेज़ पर काम कर रहा है। युवा है लेकिन चेहरे पर पिछली सेहत और सम्पन्नता के आसार केवल कहीं-कहीं बचे हैं। आँखों के गिर्द स्याह हलक़े पड़े हुए हैं। चेहरे से बुद्धिमत्ता पसीना बनकर टपक रही है।

सामने लटकी हुई एक जंत्री से मालूम होता है कि महीने की अंतिम तिथि है।

बाहर से कोई द्वार खटखटाता है। पतरस उठकर द्वार खोल देता है। तीन विद्यार्थी अत्यंत उत्तम वस्त्र पहने अंदर प्रवेश करते हैं।

पतरस: सज्जनों अन्दर पधारिये। आप देखते हैं कि मेरे पास केवल एक कुर्सी है। लेकिन ठाठ-बाट व पद-प्रतिष्ठा का विचार बहुत तुच्छ विचार है। ज्ञान बड़ा वरदान है। अतः ऐ मेरे पुत्रो! इस ढेर से चंद मोटी पुस्तकें चुन लो और उनको एक दूसरे के ऊपर चुनकर उनपर बैठ जाओ। ज्ञान ही तुम लोगों का ओढ़ना और ज्ञान ही तुम लोगों का बिछौना होना चाहिए।

(कमरे में एक रहस्यमय प्रकाश-सा छा जाता है। फ़रिश्तों के परों की फड़फड़ाहट सुनाई देती है) ।

विद्यार्थी: (तीनों मिलकर) ऐ ईश्वर के महान बंदे! ऐ हमारे आदरणीय गुरु, हम तुम्हारी आज्ञा मानने को तैयार हैं। ज्ञान ही हम लोगों का ओढ़ना और ज्ञान ही हम लोगों का बिछौना होना चाहिए।

(पुस्तकों को जोड़कर उनपर बैठ जाते हैं)

पतरस: कहो हे हिन्दुस्तान के सपूतो! आज तुम को कौन-सी ज्ञान-पिपासा मेरे द्वार तक खींचकर ले आयी?

पहला विद्यार्थी: हे सदाचारी पुरुष! हम आज तेरी कृपाओं का बदला उतारने आए हैं।

दूसरा विद्यार्थी: हे देवता! हम तेरे आभारों की भेंट प्रस्तुत करने आए हैं।

तीसरा विद्यार्थी: हे करुणावान इन्सान! हम तेरे परिश्रमों का फल तेरे पास लाए हैं।

पतरस: यह न कहो! यह न कहो! स्वयं मेरा परिश्रम ही मेरे परिश्रम का फल है। कॉलेज के निर्धारित समय के अतिरिक्त जो कुछ मैंने तुम को पढ़ाया उसका पारिश्रमिक मुझे उसी समय वसूल हो गया जब मैंने तुम्हारी आँखों में बुद्धिमत्ता चमकती देखी। आह तुम क्या जानते हो कि शिक्षण-प्रशिक्षण कैसा दिव्य धंधा है, फिर भी तुम्हारे शब्दों से मेरे हृदय में एक अद्भुत प्रसन्नता सी भर गई है। मुझ पर भरोसा करो और बिल्कुल मत घबराओ। जो कुछ कहना है विस्तारपूर्वक कहो।

पहला विद्यार्थी: (सीधा और हाथ बाँधे हुए खड़ा होकर) हे आदरणीय गुरु ! हम ज्ञान की बहुमूल्य संपत्ति से वंचित थे। कक्षा के निर्धारित समय से हमारी प्यास न बुझ सकती थी। पुलिस और सिविल सर्विस की परीक्षाओं की कसौटी कड़ी है। तूने हमारी सहायता की और हमारे अँधेरे मस्तिष्कों में उजाला हो गया। श्रेष्ठ अध्यापक! तू जानता है, आज महीने की अंतिम तिथि है। हम तेरी सेवाओं का तुच्छ मुआवज़ा प्रस्तुत करने आए हैं। तेरे अगाध ज्ञान और तेरे सयाने स्नेह का मूल्य कोई अदा नहीं कर सकता। फिर भी कृतज्ञता की अभिव्यक्ति के रूप में जो तुच्छ राशि हम तेरी सेवा में प्रस्तुत करें उसे स्वीकार कर कि हमारा अनुग्रह इससे कहीं बढ़कर है।

पतरस: तुम्हारे शब्दों से एक विचित्र व्यग्रता मेरे शरीर पर तारी हो गई है।

(पहले विद्यार्थी का संकेत पाकर शेष दो विद्यार्थी भी खड़े हो जाते हैं। बाहर बैंड एकाएक ज़ोर- ज़ोर से बजने लगता है) ।

पहला विद्यार्थी (आगे बढ़कर): हे दयावान इंसान! मुझ तुच्छ की भेंट स्वीकार कर। (बड़े आदर व सम्मान के साथ अठन्नी पेश करता है।)

दूसरा विद्यार्थी (आगे बढ़कर): हे देवता! मेरी भेंट को स्वीकार कर। (अठन्नी पेश करता है।)

तीसरा विद्यार्थी (आगे बढ़कर): हे सदाचारी पुरुष, मुझ तुच्छ मनुष्य को गौरवान्वित कर। (अठन्नी पेश करता है।)

पतरस (भावनाओं से बेक़ाबू होकर भर्राई आवाज़ से): “हे मेरे पुत्रो, ईश्वर की कृपा तुम पर हो। तुम्हारे आज्ञापालन और दायित्व-निर्वहन से मैं बहुत प्रभावित हुआ हूँ। तुम्हें इस लोक में आराम और परलोक में मुक्ति प्राप्त हो और ईश्वर तुम्हारे सीनों को ज्ञान के प्रकाश से जगमगाता रखे। (तीनों अठन्नियाँ उठाकर मेज़ पर रख लेता है।)

विद्यार्थी (तीनों मिलकर): ईश्वर के महान बंदे! हम दायित्यों से मुक्त हो गए। अब हम अनुमति चाहते हैं कि घर पर हमारे मता-पिता हमारे लिए बेचैन होंगे।

पतरस: ईश्वर तुम्हारी मदद करे और तुम्हारी ज्ञान की तृष्णा और भी बढ़ती रहे।

(विद्यार्थी चले जाते हैं)

पतरस (एकांत में सजदे में गिरकर): ऐ ईश्वर! तेरा लाख-लाख आभार है कि तूने मुझे अपने तुच्छ परिश्रम के फल के लिए बहुत दिनों प्रतीक्षा में न रखा। तेरी कृपा अपार है। लेकिन हमारी दरिद्रता उससे भी कहीं बढ़कर है। यह तेरी ही कृपा है कि तू मेरे माध्यम से औरों को भी आजीविका पहुँचाता है और जो सेवक मेरी सेवा करता है उसका भी संभरक तूने मुझ ही को बना रखा है। तेरी कृपा अपार है और तेरी बख़्शिश हमेशा-हमेशा जारी रहने वाली है।

(कमरे में फिर एक रहस्यमय प्रकाश-सा छा जाता है और फ़रिश्तों के परों की फड़फड़ाहट सुनाई देती है कुछ देर के बाद पतरस सजदे से सिर उठाता है और सेवक को आवाज़ देता है।)

पतरस: हे ईश्वर के ईमानदार और परिश्रमी प्राणी! तनिक यहाँ तो आइयो।

सेवक (बाहर से): ऐ मेरे सदाचारी स्वामी! मैं खाना पकाकर आऊँगा कि जल्दबाज़ी शैतान का काम है।

(एक लम्बा विराम जिसके दौरान वृक्षों के साए पहले से दुगुने लंबे हो गए हैं) ।

पतरस: आह प्रतीक्षा की घड़ियाँ कितनी मीठी हैं। कुत्तों के भौंकने की आवाज़ किस सुन्दरता से बैंड की आवाज़ के साथ मिल रही है।

(सजदे में गिर पड़ता है।)

(फिर उठकर मेज़ के सामने बैठ जाता है। अठन्नियों पर नज़र पड़ती है। उनको तुरंत एक पुस्तक के नीचे छुपा देता है।)

पतरस: आह! मुझे धन-दौलत से घृणा है। ऐ ईश्वर मेरे दिल को दुनिया की लालच से पाक रखियो!

(सेवक अंदर आता है।)

पतरस: ऐ मज़दूर-पेशा इंसान, मुझे तुझपर दया आती है कि ज्ञान की एक किरण भी कभी तेरे सीने में प्रविष्ट न हुई। फिर भी ईश्वर के दरबार में तुम हम सब बराबर हैं। तू जानता है आज महीने की अंतिम तिथि है। तेरे वेतन की अदायगी का समय सिर पर आ गया। प्रसन्न हो कि आज तुझे अपने परिश्रम का पारिश्रमिक मिल जाएग़ा। ये तीन अठन्नियाँ स्वीकार कर और शेष साढे़ अठारह रूपये के लिए ईश्वर की सहायता की प्रतीक्षा कर। संसार आशा पर टिका है और निराशा पाप है।

(सेवक अठन्नियाँ ज़ोर से ज़मीन पर फेंककर घर से बाहर निकल जाता है । बैंड ज़ोर से बजने लगता है)

पतरस : हे मेरे ईश्वर! अहंकार के पाप से हम सबको बचाए रख और निम्न वर्ग के लोगों का सा घमंड हम से दूर रख!

(फिर काम में व्यस्त हो जाता है।)

रसोईघर से खाना जलने की हल्की-हल्की गंध आ रही है...........

एक लंबा विराम जिसके दौरान में वृक्षों के साए चौगुने लंबे हो गए हैं। बैंड बदस्तूर बज रहा है। एकाएक बाहर सड़क पर मोटरों के आकर रुक जाने की आवाज़ सुनाई देती है।

(थोड़ी देर बाद कोई व्यक्ति द्वार पर दस्तक देता है।)

पतरस (काम पर से सिर उठाकर): ऐ इंसान तू कौन है?

एक आवाज़: (बाहर से) श्रीमान! मैं दासों का दास हूँ और बाहर हाथ बाँधे खड़ा हूँ कि अनुमति हो तो अंदर आऊँ और अपना हाल बयान करूँ ।

पतरस: (दिल में) मैं इस आवाज़ से अपरिचित हूँ, लेकिन स्वर से पाया जाता है कि बोलने वाला कोई सभ्य व्यक्ति है। हे ईश्वर यह कौन है? (बुलंद आवाज़ से) अंदर आ जाइए।

(दरवाज़ा खुलता है और एक व्यक्ति बहुमूल्य वस्त्र पहने अंदर प्रवेश करता है। हालाँकि चेहरे से गरिमा टपक रही है लेकिन नज़र ज़मीन पर गड़ी हैं और आदर व सम्मान से हाथ बाँधे खड़ा है।)

पतरस: आप देखते हैं कि मेरे पास केवल एक ही कुर्सी है, लेकिन ठाठ-बाट व शानो-शौकत का विचार बहुत तुच्छ विचार है। ज्ञान बड़ी दौलत है। अतः हे आदरणीय अजनबी! उस ढेर से कुछ मोटी पुस्तकें चुन लो और उनको एक दूसरे के ऊपर चुनकर उन पर बैठ जाओ। ज्ञान ही हम लोगों का ओढ़ना और ज्ञान ही हम लोगों का बिछौना होना चाहिए।

अजनबी: ऐ महान इंसान! मैं तेरे सामने खड़े रहने ही में अपना सौभाग्य समझता हूँ।

पतरस: तुम्हें कौन से ज्ञान की तृष्णा मेरे द्वार तक खींचकर ले आई?

अजनबी: हे महाज्ञानी! हालाँकि तुम मेरी सूरत से परिचित नहीं, लेकिन मैं शिक्षा विभाग का उच्च अधिकारी हूँ और लज्जित हूँ कि मैं आज तक कभी आपकी सेवा में प्रस्तुत न हुआ। मेरी इस कोताही और ग़फ़लत को अपने ज्ञान व विद्वता के सौजन्य से क्षमा कर दो।

(सजल नयन हो जाता है ।)

पतरस: हे ईश्वर क्या यह सब वहम है। क्या मेरी आँखें धोखा खा रही हैं?

अजनबी: मुझे आश्चर्य नहीं कि तुम मेरे आने को वहम समझो क्योंकि आज तक हमने तुम जैसे सदाचारी और महान इंसान से इस क़दर ग़फ़लत बरती कि मुझे ख़ुद अचम्भा मालूम होता है । लेकिन मुझ पर विश्वास करो। मैं वास्तव में यहाँ तुम्हारी सेवा में खड़ा हूँ और तुम्हारी आँखें तुम्हें हरगिज़ धोखा नहीं दे रही हैं। ऐ सज्जन और दुखी पुरुष विश्वास न हो तो मेरे चुटकी लेकर मेरी परीक्षा कर लो।

(पतरस अजनबी के चुटकी लेता है। अजनबी बहुत ज़ोर से चीख़ता है।)

पतरस: हाँ मुझे अब कुछ-कुछ विश्वास आ गया, लेकिन श्रीमान आपका यहाँ दिव्य आगमन मेरे लिए इतने गौरव का कारण है कि मुझे डर है कहीं मैं दीवाना न हो जाऊँ।

अजनबी: ऐसे शब्द कहकर मुझे काँटों में न घसीटो और विश्वास करो कि मैं अपनी पिछली भूलों पर बहुत लज्जित हूँ।

पतरस: (अचंभे से) मुझे अब क्या आज्ञा है?

अजनबी: मेरी इतनी मजाल कहाँ कि मैं आपको आज्ञा दूँ। अलबत्ता एक निवेदन है अगर आप स्वीकार करलें तो मैं स्वयं को संसार का सब से सौभाग्यशाली इंसान समझूँ।

पतरस: आप फ़रमाइए! मैं सुन रहा हूँ। हालाँकि मुझे विश्वास नहीं कि यह जाग्रत अवस्था है। (अजनबी ताली बजाता है। छह सेवक छह बड़े-बड़े संदूक़ उठाकर अंदर प्रवेश करते हैं और ज़मीन पर रखकर बड़े आदर से झुककर सलाम करके बाहर चले जाते हैं)

अजनबी: (संदूक़ों के ढकने खोलकर) मैं महाराजा, वेल्ज़ के राजकुमार, भारत के वाइसराय और कमांडर-इन-चीफ़, इन चारों की इच्छा से ये भेंटें आपकी सेवा में आपके ज्ञान व विद्वता की क़द्रदानी के तौर पर लेकर उपस्थित हुआ हूँ (भर्राई हुई आवाज़ से) इनको स्वीकार कीजिए और मुझे निराश वापस न भेजिए वरना उन सबका दिल टूट जाएगा।

पतरस: (संदूक़ों को देखकर) सोना, अशर्फ़ियाँ, जवाहरात! मुझे विश्वास नहीं आता। (आयतल-कुर्सीI पढ़ने लगता है)।

अजनबी: इनको स्वीकार कीजिए और मुझे निराश वापस न भेजिए। (आँसू टप-टप गिरते हैं।)

गाना: (आज मोरी अँखियाँ पल न लागें)

पतरस: हे अजनबी! तेरे आँसू क्यों गिर रहे हैं? और तू गा क्यों रहा है? मालूम होता है तुझे अपनी भावनाओं पर नियंत्रण नहीं। यह तेरी दुर्बलता की निशानी है। ईश्वर तुझे शक्ति और साहस दे। मैं प्रसन्न हूँ कि तू और तेरे स्वामी ज्ञान से इतना प्रेम करते हैं। बस अब जा कि हमारे अध्ययन का समय है। कल कॉलेज में अपने लेक्चरों से हमें चार-पाँच सौ आत्माओं को अज्ञानता की नींद से जगाना है।

अजनबी: (सिसकियाँ भरते हुए) मुझे अनुमति हो तो मैं भी उपस्थित होकर आपके विचारों से लाभान्वित हूँ।

पतरस: ईश्वर तुम्हारी मदद करे और तुम्हारे ज्ञान की प्यास और भी बढ़ती रहे।

(अजनबी विदा हो जाता है। पतरस संदूकों को खोई हुई दृष्टि से देखता रहता है और फिर अचानक हर्ष की एक चीख़ मारकर गिर पड़ता है और मर जाता है। कमरे में एक रहस्यमय प्रकाश छा जाता है और फ़रिश्तों के परों की फड़फड़ाहट सुनाई देती है। बाहर बैंड बदस्तूर बज रहा है।)


I आयतल-कुर्सी: क़ुरान की एक आयत जो संकट की घड़ी में या किसी की मृत्यु के समय परिवार जनों द्वारा पढ़ी जाती है (अनु.)

अहमद शाह पतरस बुख़ारी

(1 अक्टूबर 1898- 5 दिसंबर 1958)

असली नाम सैयद अहमद शाह बुख़ारी था। पतरस बुख़ारी के नाम से प्रशिद्ध हैं। जन्म पेशावर में हुआ। उर्दू अंग्रेज़ी, फ़ारसी और पंजाबी भाषाओं के माहिर थे। प्रारम्भिक शिक्षा से इंटरमीडिएट तक की शिक्षा पेशावर में हासिल की। लाहौर गवर्नमेंट कॉलेज से बी.ए. (1917) और अंग्रेज़ी साहित्य में एम. ए. (1919) किया। इसी दौरान गवर्नमेंट कॉलेज लाहौर की पत्रिका “रावी” के सम्पादक रहे।

1925-1926 में इंगलिस्तान में इमानुएल कॉलेज कैम्ब्रिज से अंग्रेज़ी साहित्य में Tripos की सनद प्राप्त की। वापस आकर पहले सेंट्रल ट्रेनिंग कॉलेज और फिर गवर्नमेंट कॉलेज लाहौर में प्रोफ़ेसर रहे। 1940 में गवर्नमेंट कॉलेज लाहौर के प्रिंसिपल हुए। 1940 ही में ऑल इंडिया रेडियो में कंट्रोलर जनरल हुए। 1952 में संयुक्त राष्ट्र संघ में पाकिस्तान के स्थाई प्रतिनिधि हुए। 1954 में संयुक्त राष्ट्र संघ में सूचना विभाग के डिप्टी सेक्रेटरी जनरल चुने गए। दिल का दौरा पड़ने से 1958 में न्यू यार्क में देहांत हुआ।

पतरस ने बहुत कम लिखा। “पतरस के मज़ामीन” के नाम से उनके हास्य निबंधों का संग्रह 1934 में प्रकाशित हुआ जो 11 निबंधों और एक प्रस्तावना पर आधारित है। इस छोटे से संग्रह ने उर्दू पाठकों में हलचल मचा दी और उर्दू हास्य-साहित्य के इतिहास में पतरस का नाम अमर कर दिया। उर्दू के व्यंग्यकार प्रोफ़ेसर रशीद अहमद सिद्दिक़ी लिखते हैं “रावी” में पतरस का निबंध “कुत्ते” पढ़ा तो ऐसा महसूस हुआ जैसे लिखने वाले ने इस निबंध से जो प्रतिष्ठा प्राप्त करली है वह बहुतों को तमाम उम्र नसीब न होगी।....... हंस-हंस के मार डालने का गुर बुख़ारी को ख़ूब आता है। हास्य और हास्य लेखन की यह पराकाष्ठा है....... पतरस मज़े की बातें मज़े से कहते हैं और जल्द कह देते हैं। इंतज़ार करने और सोच में पड़ने की ज़हमत में किसी को नहीं डालते। यही वजह है कि वे पढ़ने वाले का विश्वास बहुत जल्द हासिल कर लेते हैं।” पतरस की विशेषता यह है कि वे चुटकले नहीं सुनाते, हास्यजनक घटनाओं का निर्माण करते और मामूली से मामूली बात में हास्य के पहलू देख लेते हैं। इस छोटे से संग्रह द्वारा उन्होंने भविष्य के हास्य व व्यंग्य लेखकों के लिए नई राहें खोल दी हैं । उर्दू के महानतम हास्य लेखक मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी एक साक्षात्कार में कहते हैं “….पतरस आज भी ऐसा है कि कभी गाड़ी अटक जाती है तो उसका एक पन्ना खोलते हैं तो ज़ेहन की बहुत सी गाँठें खुल जाती हैं और क़लम रवाँ हो जाती है।”

पतरस के हास्य निबंध इतने प्रसिद्द हुए कि बहुत कम लोग जानते हैं कि वे एक महान अनुवादक (अंग्रेज़ी से उर्दू), आलोचक, वक्ता और राजनयिक थे। गवर्नमेंट कॉलेज लाहौर में नियुक्ति के दौरान उन्होंने अपने गिर्द शिक्षित, ज़हीन और होनहार नौजवान छात्रों का एक झुरमुट इकठ्ठा कर लिया। उनके शिष्यों में उर्दू के मशहूर शायर फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ शामिल थे।

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Aftab Ahmad-Photo

डॉक्टर आफ़ताब अहमद

जन्म- स्थान: ग्राम: ज़ैनुद्दीन पुर, ज़िला: अम्बेडकर नगर, उत्तर प्रदेश, भारत

शिक्षा: जवाहर लाल नेहरु यूनिवर्सिटी, दिल्ली से उर्दू साहित्य में एम. ए. एम.फ़िल और पी.एच.डी. की उपाधि। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी, अलीगढ़ से आधुनिक इतिहास में स्नातक ।

कार्यक्षेत्र: पिछले आठ वर्षों से कोलम्बिया यूनिवर्सिटी, न्यूयॉर्क में हिंदी-उर्दू भाषा और साहित्य का प्राध्यापन। सन 2006 से 2010 तक यूनिवर्सिटी ऑफ़ कैलिफ़ोर्निया, बर्कली में उर्दू भाषा और साहित्य के व्याख्याता । 2001 से 2006 के बीच अमेरिकन इंस्टीट्यूट ऑफ़ इन्डियन स्टडीज़, लखनऊ के उर्दू कार्यक्रम के निर्देशक ।

विशेष रूचि: हास्य व व्यंग्य साहित्य और अनुवाद ।

प्रकाशन: सआदत हसन मंटो की चौदह कहानियों का “बॉम्बे स्टोरीज़” के शीर्षक से अंग्रेज़ी अनुवाद (संयुक्त अनुवादक : आफ़ताब अहमद और मैट रीक)

मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी के उपन्यास “आब-ए-गुम (हिन्दी शीर्षक “मृगमरीचिका”) का अंग्रेज़ी अनुवाद ‘मिराजेज़ ऑफ़ दि माइंड’(संयुक्त अनुवादक : आफ़ताब अहमद और मैट रीक)

पतरस बुख़ारी के उर्दू हास्य-निबंधों और कहानीकार सैयद मुहम्मद अशरफ़ की उर्दू कहानियों के अंग्रेज़ी अनुवाद ( संयुक्त अनुवादक : आफ़ताब अहमद और मैट रीक ) कई प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में प्रकाशित।

मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी और पतरस बुख़ारी के कई हास्य निबंधों के हिन्दी अनुवाद हिन्दी की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में प्रकाशित।

सम्प्रति: हिन्दी-उर्दू लैंग्वेज प्रोग्राम, दि डिपॉर्टमेंट ऑफ़ मिडिल ईस्टर्न, साउथ एशियन एंड अफ़्रीकन स्टडीज़, कोलम्बिया यूनिवर्सिटी, न्यूयॉर्क से सम्बद्ध।

सम्पर्क: 309 Knox Hall, Mail to 401 Knox Hall,

606 West 122nd St. New York, NY 10027

ईमेल: aftablko@gmail.com

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