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बंगाल के बाऊल - डॉ. रानू मुखर्जी

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बंगाल के बाऊल - डॉ . रानू मुखर्जी अपरिमेय तथा अमूल्य भक्ति साहित्य विस्तृत एवं वैविध्यपुर्ण भारतवर्ष के विभिन्न धर्मों तथा संप्रदायों एव...

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बंगाल के बाऊल - डॉ. रानू मुखर्जी

अपरिमेय तथा अमूल्य भक्ति साहित्य विस्तृत एवं वैविध्यपुर्ण भारतवर्ष के विभिन्न धर्मों तथा संप्रदायों एवं विभिन्न परिस्थितियों के अंतर्गत दीर्घ काल तक लिखा जाता रहा। फलस्वरुप अनेक भाषाओं एवं बोलियों तथा अनेक शैलियों से भक्ति साहित्य का सृजन हुआ।

ब्रह्मतत्व पर चिंतन करना मानव हृदय की एक अत्यंत उच्च एवं उदात्त वृति है। साथ ही इस अलौकिक सत्ता को स्वीकार करना तत्व विवेचक दृष्टि के लिए एक महान गूढ़ प्रश्न है। ईश्वर को पहले स्वीकार करना होगा। उसके पश्चात ही उसके सगुण अथवा निर्गुण होने की समस्या सामने आती है। अतः सगुण और निर्गुण दोनों विचार धाराओं के मूल में एक निश्चित तथ्य है और वह है ईश्वर की सत्ता का अन्तर्दर्शन।

जिस समय किसी परोक्ष शक्ति की सत्ता का निश्चय हो गया होगा उसी समय सत्ता परिवेश का प्रश्न उठा होगा। इसलिए संभवतः ब्रह्म को अगोचर कहा गया है। कबीर का हृदय गूंगा बनकर ब्रह्मानंद के गुड के स्वाद का वर्णन कर सका है। “नश्वर स्वर” से अनश्वर के गीत किस प्रकार गाये जा सकते हैं? वस्तुतः ब्रह्मतत्व को विराट सत्ता की अनुभूति में अनेक कठिनाइयां हो सकती है। अतः इस कठिनाई के साथ-साथ इस प्रकृति में अन्तर्व्याप्त और उससे परे “प्रकृति परावार नाथ के संबोधनों” में अनेकानेक प्रश्न सदैव ही उठा करते हैं कि उस शक्ति की अनुभूति को शब्दों में प्रकट करना संभव है कि नहीं ।

और यही पर बंगाल के साधना की बात करने की आवश्यकता आन पडी है, जिसमें यहां के बाउलों के विषय में बात करना जरूरी बन जाता है। इस विषय पर गहन अध्ययन के पश्चात यह जानने में आया है कि संत मत और बाऊल मत अधिकांशतः एक है। इनकी साधना के लक्षण “सहज” है दोनों का मार्ग “मध्यपंत” है और दोनों ही शास्त्र की भार से मुक्त है। “काया” इनकी साधना के केन्द्र में है उनका पूरा विश्व देह में स्थित है जाती समाज के बंधनों से मुक्त है। अतः हम इनके धर्म को “मानव धर्म” कहते हैं।

बंगाल के मंगल काव्य के अन्तर्गत नाथ मत, योग मत, तथा धर्म मत की जो बाते आती है ये सभी बाऊल धर्म की मुख्य और महत्व पूर्ण बाते है।

सदियों से जाति और धर्मवाद से दूर किए गए ये निरक्षर साधकगण शास्त्रभार से मुक्त इन मानव धर्म की साधना करता आया है। ये सब मुक्त मानव थे। इन्होंने समाज के सभी बंधनों को अमान्य किया। पर समाज में रहते हैं तो समाज को जवाब तो देना ही है| तब उन्होंने बताया कि “हम पागल है” हमें छोड़ दो। पागल की कोई जवाबदारी नहीं होती है। (बाऊल अर्थात वायु ग्रस्त) समाज मान ले कि हम सामाजिक दृष्टि से मर गए है। मृतकों से किसी सामाजिक कर्तव्य की आशा नहीं करनी चाहिए। इस लिए बाऊलो की साधना को “जीवन मुक्त मरजीवा” कहते है।

धर्म साधना के तीन मुख्य मार्ग है (१) कर्म (२) ज्ञान और (३) प्रेम। कर्म मार्ग में विशेष रूप से बाह्याचरण होता है अतः मार्ग गौण माना जाता है। ज्ञान मार्ग सबसे कठिन है अतः यह कर्म से उच्च स्तर का है। सबसे उच्च स्तर का और अन्तरंग है प्रेम। अतः प्रेम ही साधनों के क्षेत्र का सबसे श्रेष्ठ और मुख्य मार्ग है। प्रेम के आदी और अंत में मानव है। अतः इस प्रेम की साधना में मानव जैसा दूसरा कोई नहीं है।

अगर सही रूप से देखा जाए तो साधक के अंतर में बसे आदर्श मानस गुरु ही है। यह प्रेम है। यही साधना का मुख्य गुरु है। बाहर के गुरु, साधु, संत इस मार्ग के सहायक मात्र है। अतः वे सभी नमस्य है।

बाऊल कहते हैं, “साधना का क्षेत्र, उपास्य भगवान और गुरु जब हमारे अंतस में ही है तो स्वयं के प्रति श्रद्धावान होना अति आवश्यक है। ईश्वर का जो स्वरुप हमारे अंतस में नहीं है उससे हमारी क्या क्षति होने वाली है? बाह्यजगत के जो ईश्वर है उनको तो हमने कभी जाना नहीं पहचाना नहीं। वो हमारे प्रेम की चीज कैसे हो सकती हैं? उससे हमें क्या मिलेगा? प्रेम के द्वारा अगर उसे अन्तस में पाना है तो अन्तस को शुद्ध रखना पडेगा। सभी विद्वेश की भावना को दूर करके मैत्री भाव से स्वयं का निर्माण करना अति आवश्यक है। तभी मन का मानव (मनेर मानुष) दिखाई देगा। और तभी उनको प्राप्त करना संभव होगा (चाहना)| (पृ.32) (बंगाल की साधना” – क्षितिमोहन सेन शास्त्री)

“विश्वकाया के साथ मानवकाया की कोई समानता नही हैं अर्थात विश्वनाथ का इस संकीर्णकाया में रहना संभव नहीं है अतः स्वयं को विश्व की तरह असीम और व्याप्त करने की आवश्यकता है, नहीं तो ब्रह्म संकोच का दोष लगेगा। अतः साधक को साधना करते, समय ध्यान को “असीम शून्य” में व्याप्त करने की आवश्यकता है। शून्य समाधि “ख” समाजी जैसी है। “खसम” आकाश जैसा है। खसम तत्व जब खसम अर्थात प्रियतम बन जाएगा तभी उसका मर्म समझ में आएगा। यह सहज समाधि है। अपनी काया की सहायता से कर्म में, रूप में, योग में, ध्यान में, प्रेम में क्रमशः इस सीमाहीन साधना की ओर अग्रसर होना पड़ता है। अतः कायायोग ही सारभूत साधना है। (“बाऊल फकीर कथा” सुधीर चक्रवर्ती पृ. 65)

“पानी थेके बरफ हय, बरफेर मध्ये पानी हय।

बरफ किन्तु पानी नय, पानी किन्तु बरफ नय।”

यह शब्दों का खेल नहीं है, जीवात्मा और परमात्मा का तत्व है, पिता और संतान का तत्व है, गुरू और शिष्य का तत्व है (पृ. 32 – वही बाऊल फकीर कथा)

“गुरु की मदद से इस मार्ग में अग्रसर होने पर सारे बाह्य बन्धन स्वतः छूट जाते है। साधक स्वतंत्र और मुक्त बनता है। बाह्य कर्मकाण्ड की कोई आवश्यकता नहीं रहती है। इस “अन्तर्वेद” को स्वीकार करने पर बाह्य शास्त्र निष्प्रयोजन हो जाते हैं। बाऊलो के अनुसार ये सभी मत सहज है अथवा आदि वेद के पूर्व भी ये थे और शोध के पश्चात यह ज्ञात होगा की वेद में भी इसका प्रभाव है। याज्ञ यज्ञ वाले वेद पंथी भी धीरे धीरे इसी मार्ग में अग्रसर होते गये है।

पुरुष सूक्त के अनुसार जो कि बाऊलो का मुल मंत्र है इस चराचर जगत का आविर्भाव मैंसेमन का मानव (मनेर मानुष) से हुआ है। बाऊल हसन राजा ने गाया है –

“मम आंखी होईते पयदा आसमान जमीन;

आमि होईते सब उत्पत्ति हासन राजा कय”॥ (“बंगाल की साधना पृ. 52”)

बीरभूम जिला के निवासी आदीत्य नारायण गांवों में घूम घूम कर बाऊलो के संग रहकर उनको बहुत करीब से देखा परखा और जाना कि बाऊलो का जीवन प्रणाली “मानव को अपनाना” ही है। अक्सर यह प्रश्न उठता है कि यथार्थ बाऊल कोन है? क्या है उसका जीवन चरण, उसका करण कारण, उसका अंग वास क्या है? कोई पटूली श्रांत सहजीया है, कोई जात वैष्णव है, कोई साहब धनी है, कोई मतूआ पंथी है, कोई योगी है, कोई फकीर है, कोई दरवेश है सब मिलजुल कर एकाकार हो कर बाऊल परिचय में रचपच गएं है – क्योंकि बाऊलो की ग्रहणीयता समाज में बहुत व्यापक रूप में है। बंगाल के बीरभूम, बर्धमान, मूशिर्दाबाद की सीमाओ में इनकी संख्या सबसे अधिक है। बांकुडा जिला के बहुत से अंचलों में भी अधिकतया इनको पाया जाता है। मुर्शिदाबाद तथा नदीया के ग्रामांचल के हिन्दू मुसलमान बाऊलों के भावों का आदान प्रदान इतना सजीव है कि वहां के बाऊल तथा फकीरों का कर्म मिलन उदाहरण देने जैसा है –

“मन चलो जाई भ्रमणे, कृष्ण अनुरागेर बागाने । (“बंगलार बाउर-पृ-73”)

अधिकांश बाऊल अपने को वैष्णव कहते हैं। क्योंकि उनके शुद्धाचरण ही उनको वैष्णव बना देते है। इसलिए वे स्वयं को “वैष्णव बाउल” कहते है। “बाऊल बोष्टम” शब्द इतना प्रचलित है कि इनकी भिन्नता पकड़ में नहीं आती है। इसी प्रकार से “बाउल फकीर” शब्द भी उतना ही प्रचलित है। लालत स्वयं को बाऊल फकीर कहते थे आजकल के अधिकांश प्रचलित बाउल गीत उनके द्वारा ही रचा गया है मुसलमानों में से कुछ लोग निकलकर आएं है जो स्वयं को “बातेनी दोरबेश फकीर” कहतें है। समाज में उनको “बाऊल” या “नेडा फकीर” कहा जाता है। (बाऊल फकीर सभा – पृ.93)

ॠगवेद पुरूषसूक्त के अनुसार पुरुष के मन में से चन्द्रमा का जन्म हुआ, आंखों से सूर्य, मुख से इन्द्र और अग्नि, वायु में से प्राण, उसके नाभि में से अन्तरिक्ष, माथे में से द्युलोक पैर से भूमि, कान में से सौ देव और सभी लोक का जन्म हुआ।

बाऊल कहते हैं जो भांड में है वही ब्रह्माण्ड में है। अथर्ववेद भी वही कहता है। यह मानव देह भी हररोज कमल की तरह खिलता है। “दृश्य कमल चोल छे गो फूटे कतो जुग धोरी” (बाउलगान) उनका कहना है वहां अमृत का पुष्प है। “सोनार नांव, सोनार बांधनं, अमृतेर फुल फोटे।”

महानिर्वाण, कुलावर्णव, रूद्रामल, प्रपंचसार, आदि का अध्ययन करने पर बाऊलमत के साथ-साथ “कायायोग” संबंधी अनेक बातें मिलेगी। समानताएं और असमानताएं दोनों। कायायोग और कायाबोध के विषय में दोनों में समानताएं मिलेगी। ‘परंतु बाऊलों की विशेषता उनका अनुराग तत्व है जो कि किसी तंत्र के नहीं है। वेदाचार और लोकाचार ये दोनों मत के समान रुप से विरोधी है अनुराग तत्व के आधार पर बाऊल सभी बंधनों को तोड़ने में सक्षम होते हैं प्रेम रुपी पंख के आधार पर सबसे ऊंची उडान भर सकते हैं। अतः उनका कहना है –

“आमरा पाखीर जात। आमरा हांटिया चलार भाव जानीना। आमोदर उडिया चलार धात”

(हमरा पंछी है, जात के चलना हमारा स्वभाव नहीं है हमने उड़कर आगे बढ़ना ठान लिया है।)

मुसलमानों के आगमन के पश्चात भारतीय विचारधारा और धर्म साधना का आपस में संघर्ष हुआ। दोनों पक्ष के पण्डितों ने देखा कि प्रयत्न करने पर भी दोनों धाराएं मिलजुल कर नहीं रह सकते और तभी निरक्षर साधकों ने दोनों दलों में समन्वय करने का प्रयास किया। जबकि कबीर ने दोनों कौम के साधकों को उदार, प्रेम और भक्तिभाव से एक करने का प्रयास किया तो पंडितों ने उनको निरक्षर मूर्ख कहकर फटकार दिया।

रामानंद कबीर के गुरु थे ‘ब्राह्मण थे’ आचार पंथी रामानुज के दल के थे परंतु आंतरिक प्रेमभक्ति के कारण आचार को मानने में विफल हुए। इसलिए उन्होंने उस संप्रदाय का त्याग किया। उसके साथ कुछ ब्राह्मण भी निकल गए परन्तु उनके शिष्य पिंजारा, कबीर, रविदास, सेना, धन्ना, भगत आदि जो उनके साथ रहे उन्होंने स्त्रियों को भी दीक्षा दी उनके प्रिय शिष्य पीपा भगत राजपूत थे।

रामानन्द में हमें बाऊल तत्व का सार मिलता है उनके अनुसार हिन्दू और मुसलमान के साधना के मिलाप पथ पर अड़चन स्वरुप है “बाह्याचार”। भक्ति और प्रेम में सब संभव है उनके अनुसार “धर्मबाह्य” वस्तु नहीं है, अन्तर की है। मानव देह में ही इनके सार तत्व है। अतः बाऊलो के कायायोग का सार तत्व रामानन्द की भाव धारा में मिलता है। ग्रंथ साहब में रामानन्द की जो वाणी मिलती है उसमें उन्होंने कहा है, “बाहर कहां भटक रहे हो? देह मंदिर में आश्चर्य जनक लीलाएं है इसे जानकर धन्य बनो।

“कत जईए रे धर लागु रंगु ! “ (ग्रन्थ साहब) ब्रह्म अंतर में ही है। अतः रामानन्द ने अंतर की खोज पर अधिक महत्व दिया।

रामानन्द के शिष्यों में कबीर श्रेष्ठ थे कबीर में बाऊल तत्व और बाऊल साधना के लक्षण समान रुप से मिलते है। उन्होंने भगवान को अंतर में बसाया। बाऊल जिसे “जिवन्ते मरा” कहते हैं उसके बारे में कबीर कहते है –

“जीवत में मरणा भला जो मरी जाने कोई।”

सूफी इसे “फनाफिला” कहते हैं। (साखी ग्रंथ पृ.330) काया के मध्य जो सागर है उसकी धाह किसे मिली है? जो जीते जी मर सकता है वही सागर से मोती चुराकर ला सकता है “मरजीवा” कहलाता है-

“जो मरणा सो जग डरै, सो मरे आनन्द,

कब मरिहौं कब भेटिहौं पूरण परमानंद” (साखी ग्रंथ पृ. 332)

यह जीवन मृत होना प्रेम के बीना संभव नहीं है। प्रेम जगत में दोनों को एक होना पड़ता है। प्रेम का ग्रंथ अति सूक्ष्म है। (बंगाल के बाऊलो – क्षितिमोहन सेन पृ. 46)

बाऊल फकिर दरवेश के अनुसार मानव एक समान धर्मी विचार धाराओं में बंधे होते हैं उनसे देह तत्व का अर्थ सर्वथा भिन्न है, “भजो भजो मानुष भगवानमानुष ही श्रेष्ठ है

“मानुषेते मानुष आधे, मानुष नाचाय, मानुष नाचे।

मानुष जाय मानुषेर काछे, मानुष होई ते।”

मानवतत्व तत्व की अवधारणा है। मानुष्य मानुष्य के पास मनुष्य बनने के लिए जाता है प्रेम–भक्ति का उत्कृष्ट उदाहरण है।

“बाऊल” शब्द का उच्चारण करते ही मन मे एक उदास मानव का चित्र उभरकर आता है। गेरुंआ पोशाक, सर पर चूडा के रुप में बंधे केश, कंधे पर भनोला, हाथ में एक तारा धरती को अपने कदमों से नापते हुए चलते जाते हैं। जो भी मिला रास्ते में साथ हो लिया। चलते-चलते सभी के भाव-विचार मिलजुलकर एक हो जाते हैं। सभी का उद्देश्य एक है उस मानव को पाना जो सचमुच का मानव है।

“मानुष होए मानुष जानो, मानुष रतन धन।

करो सेई मानुषेर अनवेषण”

यही उद्देश्य हे मानुष रतन धन का अन्वेषण करना। उनके कंठ के गान, उर्ध्वमुखी नयन, सदा प्रसन्न आनन, विनीत वचन, नम्र स्वर, उद्धत स्वभाव के साधक विरल है। अपना परिचय “गरीब बाऊल” कहकर देंगे। एक दम फकीर यह सांसारिक की फकीरी से अनजान, गुरुकृपा मे अधम अज्ञानी-मुझसे आपको क्या मिलेगा। यह जो अत्यंत विनय वचन है यह उनकी साधना का अंग है शिष्य संतान जैसा है, स्वयं का परिचय बढाचढा कर देना पाप है, गुरु का निषेध है। बाउल का परिचय है-हम भाव के रसिक है। हम जो भी जानते हैं वह सब गुरु द्वारा सिखाया गया मानव धर्म की वाणी है –

“आमी आऊल नोई, बाऊल ओ नोई । आमी मानुषेर गान गेऐ जाई ।”

“जब मैं था तब पिउ नहीं, अब पिउ हैं मैं नाहीं।

प्रेम गली अति सांकरी, तामे दो न समाही ।” (बंगाल के बाऊल पृ.155)

प्राचीन काल से ही भारत में “द्वेत-अद्वेत” को लेकर तर्क चल रहा है, अगर इसमें प्रेम तत्व का समावेश हुआ तो इस तर्क से उबरा जा सकता है। जब दोनों मिल जाते हैं तो प्रेम का उदय होता है अतः बाऊल कहतें हैं –

“नित्य द्वेत नित्य अैकथ प्रेम तार नाम।” ब्रह्म में विलीन होने को भी (Merge) मरना कहते हैं। यह है जीवितावस्था में ही मृत्यु को प्राप्त होना । बरसात का पानी ऊंची भूमि पर ठहर नहीं सकता है। “ऊंचे पानी ना टिके नीचे ही ठहराय।”

बाऊलों का शून्य तत्व एक बडे महत्व का विषय है। कबीर तो शून्य की विशालता पर वारी जाते हैं। शून्य ही असीम अनन्त तत्व है जो कि बडी सहजता से अपने में दूसरों को समा लेता है। शून्य आकाश के घट में भी शून्य आकाश है और घट के बाहर भी शून्य आकाश है। जैसे सागर में डुबकी लगाते हैं तो सागर का पानी घट में भी ओर घट के बाहर भी सागर का पानी भरा रहता है। शून्य में डूबना हो तो बध्याचारों से मुक्त होना पडेगा। यह डुबकी सहज साधना से ली जा सकती है। इस सहज साधना की बात को कबीर ने बडी गहराई से समझाया है। इसे कबीर सहज समाधि कहते हैं। गुरु की कृपा से इसे प्राप्त किया जाता है। सभी कर्म सेवा बन जाता है। सोना दंडवत होता है। बोलना नाम जप होता है, सुनना स्मरण करना होता है, अन्न-जल पूजा बन जाते हैं। घट का वन प्रदेश का संसार का सन्यास का भेद मिट जाता है। द्वेत भाव समाप्त हो जाता रहता है। खुली आंखों से सर्वत्र उनका दर्शन होता रहता है। उनका ही परिचय मिलता है।

बाऊलों का परमतत्व है कायायोग। दादू की कायावेली के अन्तर्गत काया में पूरा ब्रह्माण्ड समाहित है। ऐसा कहा गया है यह देह ईश्वर का मंदिर होने के कारण पवित्र है। अतः इसे कष्ट देना अनुचित है। इस प्रकार के अनेक काया कष्ट के दृष्टांत दादू के पदों में मिलता है।

लोकाचार या बंधे-बंधाए पथ को बाऊल नकारते हैं। लोक प्रचलित विधि भी अन्याय है। उनको तो केवल मानव से मतलब है और वो भी “संपूर्ण मानव” जिसे अंग्रेजी में personality कहते हैं। उसी में सब निहित है। “आद्य अंत इस मानव में बाहर कुछ भी नहीं”।

मन का मानुष चाहिए, गगन बाऊल कहते हैं – “आमार मनेर मानुष जे रे कोथाय पाबो तारे”। जहाँ प्रेम का संबंध हो वहां कामना का कोई स्थान नहीं है। इसलिए बाऊल स्वर्ग या मुक्ति किसी की भी कामना नहीं करते हैं। -

“पार न उतारो, डूबो दो इसमें भी मैं राजी”। हमने देखा कि बाऊल लोकाचार या शास्त्राचार किसी को भी स्वीकार नहीं करते केवल मात्र रस और भाव के मार्ग को स्वीकार करते हैं। पंडित सत्य की खोज पोथियों में करते हैं जबकि बाऊल जीवंत मानव में करते हैं।

स्व. अक्षयकुमार दत्त ने भारतवर्षेर उपासक संप्रदाय नामक पुस्तक में प्रेमरस तथा राग का अनुसंधान करते समय कुछ स्वाधीन पंथी संप्रदायों का नाम उल्लेख किया है जिनमें हिन्दू तथा मुसलमान दोनों मिलतें है। बाऊल मत इन दोनों के साथ मिलने पर भी दोनों से भिन्न है। अधिकांश बाऊल निरक्षर या निम्न वर्ग के होते हैं।

उपरोक्त पुस्तक के अनुसार बाऊलों के आदी गुरु चैतन्य महाप्रभु है परंतु इससे पुर्व भी बाऊल मत की उपस्थिति तथा “बाऊल” नाम दिखाई देता है। “ जा आछे भांडे ता आछे ब्रह्माण्डे” (पिंडे सो ब्रह्माण्डे)।

श्रीयुक्त मणीन्द्र मोहन बसु ने अपने “पोस्ट चैतन्य कल्ट” नामक पुस्तक के अन्तर्गत सहजिया मत का जो परिचय अनेक पोथियों में से कराया है वह बहुत ही सूक्ष्मता और दक्षता पूर्वक कराया है। उनकी यह पुस्तक कोलकाता विश्वविद्यालय से 1930 में प्रकाशित हुई।

बाऊल पोथी के बहार के विषयों की खोज करते है अर्थात मानव का अनुसंधान ही श्रेष्ठ है। वे केवल मात्र मानव को ही जानते है। स्वर्ग के अमृत से पृथ्वी का प्रेम रस श्रेष्ठ है। इसलिए प्रेमामृतप्रार्थी देवता पृथ्वी में जन्म ग्रहण कर मानव होने की इच्छा रखते हैं।

“प्रेम आमार परश्मणी, तारे छुईले काम हयरे सेवा

ताई गोलोक चायजे भुलोक होईते, मानुष होईते चाय जे देवा।”

(प्रेम स्पर्षमणी है जिसके स्पर्ष से काम सेवा में परिवर्तित हो जाता है। इससे स्वर्ग भूलोक में परिणत होना चाहता है और देव मानव बनना चाहतें है।)

सामान्यतः अधिकांश बाऊल फकीर होने के बावजूद गृहस्थ होते है तो सामाजिक विधि-विधानों को नकारते है तो गृहस्थ धर्म कैसे निभाते है? तब एक गृहस्थ बाऊल ने जवाब दिया, “विधि के मंत्र द्वारा हम अधिकार का निर्णय नहीं करते हैं। सामाजिक रुपसे विधि को स्वीकार करके, साथ रहकर संसार धर्म का पालन करते है।”

बाऊल दो प्रकार के होते हैं- पुथ्या (पोथी वाले) और तथ्या (तथ्य वाले)। श्रीवासु के सहजिया विषयक पुस्तक में पोथी वाले बाऊलो का तथ्य परिचय मिलता है। पोथी बीना के “तथ्या” बाऊलों का सही परिचय कवि गुरु रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने कराया है। इसमें उन्होंने श्रिहट्ट के बाउल कवि हासन रजा चौधरी के गानों में से सबसे अधिक वाणियों का उपयोग किया है इस हासन राजा का जन्म लक्ष्मणश्री के दीवान वंश में हुआ था। अली चौधरी के पूर्वज कायस्थ थे। हासन राजा के पुत्र ने एक ललुर के राजा से सुना था कि उनका गोत्र भारद्वाज है।

रवीन्द्रनाथ का परिचय तरुण अवस्था में ही बाऊलों से हो गया था। उनकी “वैष्णवी” नामक कहानी मे इसका स्पष्ट परिचय मिलता है। जहाँ उनकी जमीनदारी थी वहां, शिलाईदह परगाणा के पास लालन फकीर का स्थल है। लालन बाऊल अति प्रभावशाली व्यक्ति थे। कांगाल हरिनाथ मजुमदार (फिकिर चांद बाऊल) उनके अनुरागी थे बंगाल के दैनिक समाचार पत्र के संस्थापक माने जाने वाले जलधर सेन हरिनाथ के मंडल में से थे।

लालन के शिष्य परंपरा में से एक जन रवीन्द्रनाथ के शिलाईदह के चिट्ठी पत्री विभाग के कर्मचारी थे। उनका नाम गगन था रवीन्द्रनाथ ने उसके “हीवर्ट व्याख्यान” में उनके गीत को शामिल किया “आभार मनेर मानुष जेई, आमि कोथाय पाबो तारे” लालन का स्थान कुष्टिया के नजदीक था, जन्म से लालन हिन्दू थे, परंतु सिराज सांई नामक मुसलमान फकीर से उन्होंने दीक्षा ग्रहण की थी। उनकी साधना में दोनों धर्मों का समन्वय मिलता है। इस धारा के साथ रविन्द्रनाथ का गहरा संबंध था। कुष्टिया के नजदीक उस दल में पांचु नामक एक बाऊल थे मेछेल चांद नामक बाऊल उनसे गान सुनने आते थे। उनमें से पागल चांद एक समर्थ बाऊल थे।

इस प्रकार से बाऊलो की एक लम्बी परम्परा हमारे समक्ष है। ऊँच-नीच, जात-पात, धार्मिक भेद-भाव, के बिना ही अंतर की चक्षु से उन्होंने “मनेर मानुष” के प्रति स्वयं को समर्पित कर दिया।

एक धारा में मदन बाऊल जन्म से मुसलमान थे। उनके गुरु ईशान जोगी थे। ईशान के गुरु दीनानाथ नापित थे। गुरु हराई नमः शुद्र थे। हराई के गुरु कालाचांद बढई थे। कालाचांद के गुरु नित्यनाथ, नित्यनाथ के गुरु मूलनाथ और मूलनाथ के गुरु आदिनाथ। इन तीनों परम्पराओं में “नाथ” बाऊल को देखकर नाथ पंथ के साथ बाऊलों का प्राचीन संबंधों की ओर हमारा ध्यान जाता है। (“बंगाल के बाऊल” – क्षितिमोहन सेन पृ. 70)।

बला बाऊल के बारे में कहा जाता है कि वे मछुवारे के सरदार थे। मेघना नदी के उपरी भाग में उनका मछली का अड्डा था। जवानी में ही उनकी पत्नी का देहान्त हो गया था। एक बार वो नौका में बैठकर जा रहे थे ऐसे मे एक नवविवाहीत कन्या को उसकी मां विदा करने आई थी। बला ने देखा कि बेटी की नाव ज्यों ही आगे बढ़ने लगती है त्यों ही बेटी ने गायन वादन करने वालों को सब बंद करने के लिए कह देती है, क्योंकि ज्यों-ज्यों नाव दूर हो रही थी त्यों-त्यों उसकी मां के रुदन का स्वर क्षीण हो रहा था ।

“थामाईयो रे ढोल, ढूली भाई, कांसीर झन-झनी”।

धीरी-धीरे बाईयो रे माझी, जेनो मायेर कांदोन सुनी॥”

इसे सुनकर बला बाऊल को ऐसा लगा कि वह स्वयं इसी प्रकार से जगत जननी से दूर हो रहा है। इससे विश्व चराचर में मां का जो क्रन्दन हो रहा है उसे संसार के कोलाहल के कारण वह सुन नहीं पा रहा है। उसके मन में उथल-पुथल मच गई, वह अपने गुरु, साधक नित्यानंद के पास गया और दीक्षा देने को मांग की। गुरु ने कहा, “मैं तुम्हें क्या दीक्षा दूं जगत जननी ने स्वयं उस कन्या के रुप में आकर तुम्हें दीक्षा देकर गई है। तेरे अंतर की वेदना ही तेरी दीक्षा मंत्र है”।

बाऊल अनेक गुरु को मानते हैं। ढाका जिले के राजबाडी के बाऊल दागु के शिष्य – दुर्लभ और बल्लभ अति उच्च कोटी के बाऊल थे। दुर्लभ अति तीव्र मरमी भावी साधक (Mystic aspirtant) थे उनकी आठ-नौ वर्ष की बेटी ने मृत्यु के समय परकाल के द्वार को खोल कर पिता को चिन्मय प्रकाश दर्शाया। इसलिए जब उन्होंने दागु से दीक्षा की मांग की तब दागु ने कहा, “तुम्हारी बेटी ही तुम्हारी गुरु है, तुम धन्य हुए दीक्षित हुए। अब तुम्ही मुझे वो मार्ग दिखाओ”।

इस प्रकार की अनेक घटनाओं से बाऊलो के विषय में जानकारी मिलती है। बाऊल अक्सर स्वयं को समाज से लिगों से दूर रखते हैं। प्रश्नों का सामना करने से डरतेंहैं। आन्तरिक ज्ञान, अनुभूति को शब्दों में व्यक्त कर लोगों के समक्ष रखने की विद्या का ज्ञान उनको नहीं है ऐसा उनका मानना है। उनका कहना है, “यह सब साधक की साधना के लिए है’ साहित्य के क्षेत्र में इसका प्रचार प्रसार हो ऐसा हम नहीं चाहते।“

लेखक क्षितिमोहन सेन ने जब इस गुप्तता का कारण जानना चाहा तब उन्होंने जवाब दिया,” ये तो साहित्य नहीं है, ये हमारे अंतरंग की प्राणवस्तु है, हमारी “आत्मजा” है। जो कोई हमें हमारी इस कन्या के बारे में यह कहता है कि “तेरे साथ में घर बसाउगां” तो तब हम उसे दे कर धन्य बन जाते हैं वह भी धन्य हो जाता है और हमारी आत्मजा भी धन्य हो जाती है। परंतु कोई रसास्वादन के लिए चखने के लिए हमारी आत्मजा की मांग करता हो तो ऐसी बिनती अधन्य है, हम अधन्य होते हैं, और आत्मजा भी अधन्य होती है। ये वाणी साहित्य रस के आश्वासन के लिए नहीं है’ यह साधना के लिए है। कदाच गौण रूप से इसमें साहित्यरस रहता भी है। परन्तु यह तो मुख्य लक्ष्य नहीं है इसलिए हम इसका प्रचार नहीं करते हैं। फिर भी अगर कोई साधनार्थ व्यक्ति साधना के लिए इसकी मांग करता हो तो हम इसका विरोध कभी भी नहीं करते हैं। परन्तु हम परख लेते हैं कि उसकी बिनती सच्ची है या नहीं”।

समाज के नैतिक कानून और धार्मिक क्रिया-कांड या विधि-विधानों को नकारने वाले बाऊल किसी बंधे-बंधाए धर्म धारा या साधना पद्धति के नहीं हो सकते। किसी तात्विक सिद्धांतों के बंधन को भी इन्होंने नहीं स्वीकार किया इसलिए बाऊल एक जीवन शैली है और इसका चालसबल प्रेमतत्व है’ यही प्रेम तत्व साध्य नहीं साधन है। इससे यह स्पष्ट है की पृथ्वी पर जबसे मानव जाती है तबसे एक जीवन शैली के रुप में अध्यात्म के प्रेमरंग में रंग और सदा ही मुक्त रुप से असीम आकाश में उड़ने की इच्छा रखती चेतना मानव को आकर्षित करती रही है – (बंगाल नो बाऊल पंच”-मावजी के. शाह-पृ.36)

प्रेमतत्व को केन्द्र में रखकर परकीया प्रेम को मानने के बावजूद बाऊलों के जीवनशैली के लक्ष्य में कहीं भी भोगवाद, स्वच्छन्दता था उन्मुक्त व्याभिचार का कोई स्थान नहीं है। परकिया प्रेम को साधना का अत्यन्त प्रभावक साधन के रूप में ही यहां समझा जा सकता है।

केवल मात्र उपलब्ध बाऊल गीतों के आधार पर ही बाऊलों के विषय में इतनी बातें हमारे सामने आती हैं। बाऊलों की फिलोसोफी, जीवन शैली और साधना के नित्य नवीन माध्यम की थोडी जानकारी का आधार बाऊल गीत ही है।

बहुत कम ही ऐसे बाऊल गीत हैं जिनसे उनके रचियेता का नाम जानने को मिलता है। अपात मौखिक परंपरा के रूप में ये बाऊल गीत समाज में विकसित होते रहते हैं। गीत गाने वाले बाऊल अपने अंतर के भाव तथा नए नए गूढ अर्थों को इन गीतों में जोड़ते रहते हैं। इससे बाऊल फिलसोफी में नित्यनूतनता, एक ताजगी भरे भावों का अवकाश सदा मिलता रहता है।

यह कहा जा सकता है कि साधना की धार या संप्रदाय या परंपरा जो भी हो परंतु प्रत्येक साधक में एक बाऊल सुषुप्त रुप से रहता है उसे जगाकर किसी भी मार्ग में साधक अपनी साधना को सहजरुप से अग्रसर हो सकता है।

बाऊलों के विषय में अगर कुछ मुख्य जानकारी रखनी हो तो निम्न प्रकार से है-

१. काया बोध – काया योग

२. “मनेर मानुष” – मानव तथा मनुष्य जीवन मुख्य है।

३. जीवन और साधना के क्षेत्र में प्रेमतत्व मुख्य है।

४. परकीया प्रेम – साधना का प्रेरक बल है।

५. मौखिक परंपरा।

६. सहज जीवन।

७. धर्म ग्रंथ – क्रियाकांड अनावश्यक है।

८. काया क्लेश।

९. तपजप व्यर्थ है।

१०. सादगी-अर्थात वैराग्य को प्रधानता।

११. मार्ग की गुप्तता (बंगाल के बाउल-मावजी के सावला पृ.४२)।

संदर्भ ग्रंथ

१. बंगाल ना बाऊलो – व्याख्याता क्षितिमोहन सेन शास्त्री – भाषान्तर – जयंती लाल म. आचार्य।

२. बंगाल नो बाऊल पंथ – मावजी के. सावला।

३. बंगाल नी साधना – क्षितिमोहन सेन शास्त्री – अनुवादक – मोहन दास पटेल

४. बाऊल फकिर कथा – सुधीर चक्रवर्ती।

लालन फकीर का एक विशिष्ट गान

आमार प्रणेर मानुष आछे प्राणे ताई हेरी ताई सकलखाने (मेरे अंतर का मानव मेरे अंतर में रहता है। इसलिए मैं जिधर भी देखता हूं वही नजर आता है)

आछे से नयन ताराय आलोक धाराय, ताई ना हाराई (वह मेरी नजरों में, बिजली की चमक में है, इसलिए उसे में खो नहीं सकता)।

ओगो ताई देखी ताई जे थाय से थाय ( चारों तरफ वही नजर आता है)।

ताकाई आमी जेदिक पाने । (जिधर-जिधर मेरी नजर जाती उधर वही दिखता है)।

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परिचय – पत्र

नाम - डॉ. रानू मुखर्जी

जन्म - कलकता

मातृभाषा - बंगला

शिक्षा - एम.ए. (हिंदी), पी.एच.डी.(महाराजा सयाजी राव युनिवर्सिटी,वडोदरा), बी.एड. (भारतीय

शिक्षा परिषद, यु.पी.)

लेखन - हिंदी, बंगला, गुजराती, ओडीया, अँग्रेजी भाषाओं के ज्ञान के कारण अनुवाद कार्य में

संलग्न। स्वरचित कहानी, आलोचना, कविता, लेख आदि हंस (दिल्ली), वागर्थ (कलकता), समकालीन भारतीय साहित्य (दिल्ली), कथाक्रम (दिल्ली), नव भारत (भोपाल), शैली (बिहार), संदर्भ माजरा (जयपुर), शिवानंद वाणी (बनारस), दैनिक जागरण (कानपुर), दक्षिण समाचार (हैदराबाद), नारी अस्मिता (बडौदा),नेपथ्य (भोपाल), भाषासेतु (अहमदाबाद) आदि प्रतिष्ठित पत्र – पत्रिकाओं में प्रकशित। “गुजरात में हिन्दी साहित्य का इतिहास” के लेखन में सहायक।

प्रकाशन - “मध्यकालीन हिंदी गुजराती साखी साहित्य” (शोध ग्रंथ-1998), “किसे पुकारुँ?”(कहानी

संग्रह – 2000), “मोड पर” (कहानी संग्रह – 2001), “नारी चेतना” (आलोचना – 2001), “अबके बिछ्डे ना मिलै” (कहानी संग्रह – 2004), “किसे पुकारुँ?” (गुजराती भाषा में अनुवाद -2008), “बाहर वाला चेहरा” (कहानी संग्रह-2013), “सुरभी” बांग्ला कहानियों का हिन्दी अनुवाद – प्रकाशित, “स्वप्न दुःस्वप्न” तथा “मेमरी लेन” (चिनु मोदी के गुजराती नाटकों का अनुवाद 2017), “बांग्ला नाटय साहित्य तथा रंगमंच का संक्षिप्त इति.” (शीघ्र प्रकाश्य)।

उपलब्धियाँ - हिंदी साहित्य अकादमी गुजरात द्वारा वर्ष 2000 में शोध ग्रंथ “साखी साहित्य” प्रथम

पुरस्कृत, गुजरात साहित्य परिषद द्वारा 2000 में स्वरचित कहानी “मुखौटा” द्वितीय पुरस्कृत, हिंदी साहित्य अकादमी गुजरात द्वारा वर्ष 2002 में स्वरचित कहानी संग्रह “किसे पुकारुँ?” को कहानी विधा के अंतर्गत प्रथम पुरस्कृत, केन्द्रीय हिंदी निदेशालय द्वारा कहानी संग्रह “किसे पुकारुँ?” को अहिंदी भाषी लेखकों को पुरस्कृत करने की योजना के अंतर्गत माननीय प्रधान मंत्री श्री अटल बिहारी बाजपेयीजी के हाथों प्रधान मंत्री निवास में प्रशस्ति पत्र, शाल, मोमेंटो तथा पचास हजार रु. प्रदान कर 30-04-2003 को सम्मानित किया। वर्ष 2003 में साहित्य अकादमी गुजरात द्वारा पुस्तक “मोड़ पर” को कहानी विधा के अंतर्गत द्वितीय पुरस्कृत। 2019 में बिहार हिन्दी- साहित्य सम्मेलन द्वारा सृजनात्मक साहित्य के लिए “ साहित्य सम्मेलन शताब्दी सम्मान “ से सम्मानित किया गया। 2019 में सृजनलोक प्रकाशन द्वारा गुजराती से हिन्दी में अनुवादित पुस्तक “स्वप्न दुस्वप्न” को “ सृजनलोक अनुवाद सम्मान” से सम्मानित किया गया।

अन्य उपलब्धियाँ - आकाशवाणी (अहमदाबाद-वडोदरा) को वार्ताकार। टी.वी. पर साहित्यिक पुस्तकों क परिचय कराना।

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संपर्क - डॉ. रानू मुखर्जी

17, जे.एम.के. अपार्ट्मेन्ट,

एच. टी. रोड, सुभानपुरा, वडोदरा – 390023.


Email – ranumukharji@yahoo.co.in.

टिप्पणियाँ

ब्लॉगर: 1
  1. सुश्री रानू मुखर्जी जी.
    सादर.नमस्कार.
    आपका रचनाकार में प्रकाशित आलेख"बंगाल के बाऊल" पढ़ने को मिला. धन्यवाद
    "बाऊल" एक सुना हुआ शब्द था कभी मेरे लिए,जिसका अर्थ मैं इतना ही समझ पाया था कि ईश्वर को समर्पित एक साधु-संतो की टोली है जो भाव-भक्ति के साथ ईश्वर का गुणानुवाद करता, भजन गाता हुआ भ्रमण करता रहता है. पूरे आलेख को पढ़ने के बाद "बाऊल" को गहराई के साथ समझ पाया. आपने काफ़ी विस्तार के साथ इस आलेख को लिख कर उन्हें गरिमा प्रदान की है...उसके व्यापकता को बखान किया है. आपको साधुवाद.
    भवदीय
    गोवर्धन यादव
    छिन्दवाड़ा (म.प्र.) 480001
    09424356400

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रचनाकार: बंगाल के बाऊल - डॉ. रानू मुखर्जी
बंगाल के बाऊल - डॉ. रानू मुखर्जी
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