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हिंदी व्याकरण शिक्षण में नवाचार- देवेन्द्र कुमार पाठक

हिंदी व्याकरण शिक्षण में नवाचार-
हिंदी व्याकरण में किताबी माध्यम से इतर हम बच्चों के मौजूदा सामाजिक,पारिवारिक और ओर दैनिक वर्ताव से रुचिकर नवाचार सुनिश्चित कर सकते हैं.यद्यपि इस तौर-तेवर के नवाचार को लेकर परम्परागत सोच-समझ वाले लकीर के फकीरों को एतराज भी होता है.अपने चार दशक के अध्यापन काल में हिन्दी शिक्षण के दौरान मैंने कई ऐसे नवाचार किये,अब मैं सेवानिवृत्त हूँ. कतिपय नवाचार यहां साझा करना चाहूंगा,,जिन्हें विगत वर्षों में हर सत्र में कुछ आवश्यक बदलाव करके मैंने अच्छे परिणाम प्राप्त किये हैं.


1- सत्र के आरंभ में ही छात्र-छात्राओं के नाम श्यामपट पर लिखकर उन नामों के विद्यार्थियों की सहज भागीदारी से ही रोचक शिक्षण कर सकते हैं.

यथा,
अशोक,साहिल,नीरज,पवन और अज़ीज़;
सरिता,रजनी,तबस्सुम,पूनम,और वर्षा;
                       उपरोक्त 10 विद्यार्थियों के नामों को क्रमशः शब्दभेद,लिंग,तत्सम,तद्भव,देशज,विलोम,शब्दार्थ,पर्याय,संधि,समास,उपसर्ग,प्रत्यय आदि के अनुसार सूचीबद्ध कर सकते हैं. इसी क्रम में माता-पिता,भाई-भाभी,काका-काकी,दादा-दादी आदि रिश्तों,पड़ोसियों,शिक्षकों और अनाज,फल,पेड़,फूल,नदी,पर्वत आदि के नामों को भी सूचीबद्ध करते हुये उन शब्दों के अर्थ,महत्व को रेखांकित कर  जानकारी दे सकते हैं.यथा: 'नीरज' एक जलीय फूल का नाम है, जो संज्ञा शब्दभेद है; 'नीर' और 'ज' से नीर या पानी में जन्म लेने वाले इस फूल को 'पंक' में जन्म लेने जे कारण पंकज भी कहते हैं.इस तरह कमल के कई पर्याय नाम नीरज,पंकज,जलज,वारिज,सरसिज आदि का बोध कराते हुये कमला यानी लक्ष्मी और कमलनयन राम,राजीवलोचन आदि बताये जा सकते हैं. हर व्यक्ति,वस्तु,स्थान से अनेकानेक जानकारियां जुड़ी होती हैं.तिथि,पर्व,मास आदि से बनते नामों को आधार बनाकर भी शिक्षण को उपयोगी और रोचक कर सकते हैं


2-आज फिल्में हमारे सामाजिक परिवेश,मनोरंजन में कमोबेश भागीदारी करती हैं.कोई भी इनसे अछूता नहीं.फिल्मों के नामों को भी सूचीबद्ध कर अच्छी फिल्मों से प्रेरणा दी जा सकती है.नमकहराम,नमकहलाल,लगन,नीरजा, दो रास्ते,कभी कभी, बेईमान,धर्मात्मा,दयावान,त्रिशूल,बावर्ची,उपकार, दर्पण,गंगा-जमुना,हेरा फेरी,निकाह,प्रेम पर्वत, बैजू बावरा,मंगल पाण्डे, दोस्ती आदि फिल्मों के नामों से हम प्रत्यय,उपसर्ग,समास,सन्धि आदि का ज्ञान दे सकते हैं. विद्यार्थियों से फ़िल्मों,धारावाहिकों के नाम पूछकर उन फ़िल्मों से शिक्षा सन्देश दे सकते हैं.


3-मुहावरों के लिये हम शरीर के अंगों-उप अंगों से जुड़े मुहावरों को आसानी से चुन सकते हैं.यथा, बाल खड़े होना,,कान काटना,मुंह चुराना, आंख दिखाना, कान न देना,दांत खट्टे करना, पेट पालने, गले लगाना आदि पचासों मुहावरे स्वयं बच्चों से पूछकर लिखे एवम बताये जायें.


   इस पूरी चर्चा का आशय यह है कि जब शिक्षक कल्पनाशील,चिंतक,खोजी,हाजिरदिमाग ओर हाजिरजवाब  होने के साथ अपनी वृत्ति के प्रति जवाबदेह,संजीदा,ईमानदार और समर्पित होगा, तभी वह सफल नवाचारी होगा. शिक्षण की सफलता से बढ़कर उसकी  सार्थकता आवश्यक है, जो विद्यार्थियों में दीखनी चाहिए.

आत्मपरिचय-

देवेन्द्र कुमार पाठक

म.प्र. के कटनी जिले के गांव भुड़सा में 27 अगस्त 1956 को एक किसान परिवार में जन्म.शिक्षा-M.A.B.T.C. हिंदी शिक्षक पद से 2017 में सेवानिवृत्त. नाट्य लेखन को छोड़ कमोबेश सभी विधाओं में लिखा ..'महरूम' तखल्लुस से गज़लें भी कहता हूँ....
दो उपन्यास,( विधर्मी,अदना सा आदमी )चार कहानी संग्रह,( मुहिम,मरी खाल : आखिरी ताल,धरम धरे को दण्ड,चनसुरिया का सुख )एक-एक व्यंग्य,ग़ज़ल और गीत-नवगीत संग्रह,(दिल का मामला है,दुनिया नहीं अँधेरी होगी, ओढ़ने को आस्मां है)एक संग्रह 'केंद्र में नवगीत' का संपादन.' वागर्थ', 'नया ज्ञानोदय','अक्षरपर्व','अन्यथा','वीणा', 'कथन', 'नवनीत', 'अवकाश' ', 'शिखर वार्ता', 'हंस', 'भास्कर' आदि पत्र-पत्रिकाओं में रचनायें प्रकाशित,आकाशवाणी,दूरदर्शन से प्रसारित. 'दुष्यंतकुमार पुरस्कार','पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी पुरस्कार' आदि कई पुरस्कारों से सम्मानित.कमोबेश समूचा लेखन अपने ही देखे,जाने-पहचाने गांव-कस्बे के पिछड़े,शोषित- उत्पीड़ितों,खेतिहर मजूर-किसानों  के जीवन की व्यथा-विसंगतियों,संघर्षों-उम्मीदों और सामाजिक,आर्थिक समस्याओं पर केंद्रित.                                              
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सम्पर्क-
1315, साईंपुरम कॉलोनी,रोशननगर; साइंस कॉलेज डाकघर,कटनी; जिला-कटनी,483501,म.प्र.

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