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वक्त लगेगा - कविताएँ - नाथ गोरखपुरी

वक्त लगेगा
उनको भुलाने में वक्त लगेगा
उनसे दूर जाने में वक्त लगेगा

जख्म ताजा है मत छेड़ो मुझे
अभी मुस्कुराने में वक्त लगेगा

किस तरह अपनों ने लूटा मुझे
जग को  बताने में वक्त लगेगा

फिजा में है जो नफरत का जहर
उसको  मिटाने  में  वक्त  लगेगा

ख्वाब इश्क मोहब्बत दोस्ती
तुम्हें समझाने  में  वक्त  लगेगा

अभी-अभी उसने तो छोड़ा है मुझे
तेरे   पास  आने  में  वक्त   लगेगा

'नाथ'  से रूठना आसान है बहुत
  पर उसको मनाने में वक्त लगेगा
02
  जो होगा देखा जाएगा
सत्य से पीछे ना हटना,
झूठ के पीछे ना डटना
कोई भी जोर लगाएगा,
जो होगा देखा जाएगा

बांटने वाले बाटेंगे,
तेरी राह को काटेंगे
तू हिम्मत दिखलाएगा ,
जो होगा देखा जाएगा

अपने तुझसे रूठेंगे,
सपने तुझसे टूटेंगे
मोह तुझे उलझाएगा ,
जो होगा देखा जाएगा

होगा तू परेशान सही ,
पर होना हैरान नहीं
सत्पथ्य तुझे दिखलाएगा,
जो होगा देखा जाएगा

सत्य राह में कांटे हैं,
संवेगों के गांठें हैं
अंत विजय दिलवाएगा ,
जो होगा देखा जाएगा
03-
डग डगमग डगमग डोल रहा
मानव मन का ना मोल रहा

दिल में कोई जज्बात नहीं
रिश्तों में वो बरसात नहीं
मिलने को तो सब मिलते हैं
होती दिल से मुलाकात नहीं
कैसा कड़वाहट घोल रहा
डग डगमग- - - - - - - -

कैसे कोई आस लगाएगा
कैसे विश्वास जगाएगा
रिश्ते कच्चे धागे से हैं
कैसे कोई गांठ लगाएगा
जब है रिश्तों को तोल रहा
डग डगमग- - - - - - - -

कहीं दिन गुजरा कहीं रात गई
रिमझिम रिमझिम बरसात गई
नित -नित उन्नति के चक्कर में
मीठी - मीठी मुलाकात गई
पंछी पर किधर है खोल रहा
डग डगमग- - - - - - - -

मानव तू बड़ा ही ज्ञानी है
तब क्यों करता नादानी है
प्रकृति से टक्कर ले सकता
क्या तू इतना अभिमानी है
क्यों हृदय नहीं है टटोल रहा
डग डगमग- - - - - - - -

अहं को अपने जता नहीं
निर्बल को ऐसे सता नहीं
निर्बल के रास रचैया हैं
क्या इतना तुझको पता नहीं
कैसा इतिहास भूगोल रहा
डग डगमग- - - - - - - -

ग़र बनता आतताई है
तो तेरी शामत आई है
जिसका कोई ना होता है
उसके बल रघुराई हैं
वो राम राम है बोल रहा
डग डगमग- - - - - - - -

04-
आँधी हूँ हवा हूँ या मैं तूफ़ान हूँ
ख्वाबों के शहर में भटकता इंसान हूँ

मेरे फसाने सुनोगे तो हँसोगे शायद
खुदा को ढूंढता पर खुद से अनजान हूँ

पीढ़ियों का हिसाब रखने लगा आजकल
मैं जानता हूँ कि चार दिन का मेहमान हूँ

मुझ पर भी कभी शहर बसा करता था
आज मजहबी कटुता का बना मैं पहचान हूँ

मुझे धोखा फरेब नफरत नहीं है किसी से
हिन्दोस्तानी हृदय का मुसल्लम ईमान हूँ

05-
जग की ऐसी रीति थी
स्वार्थ की ही नीति थी

वियोग गाये जाते थे
दुःख बजाये जाते थे

संयोग गीत था नहीं
परमार्थ प्रीत था नहीं

अस्तु ये मानव का मन
बे'शर'म   होता    गया

प्रेम  कम  होता   गया

ग़र बुद्धि अंतर्द्वंद्व था
तो बल कहाँ स्वछंद था

बल बुद्धि का जो मेल था
आरम्भ मन का खेल था

उस मेल में भी द्वंद्व था
उस खेल में भी द्वंद्व था

जो भी जनमा जगत में
द्वंद्व   ही   बोता    गया

प्रेम   कम   होता  गया


06-


स्थिर रहिये
सूर्य की भांति
समस्याएं पृथ्वी का वेग ले
चक्कर काटती रहेंगी

मौन रहिए
पृथ्वी की भांति
समस्याएं ध्वनि का रूप ले
वक्त बेवक्त गूंजती रहेंगी

शीतल शांत रहिए
शशि की भांति
समस्याएं सूर्यताप लेकर
तपती रहेंगी

प्रयत्नशील रहिए
चींटी की भांति
पर्वत सी समस्याएं भी चूर होंगी
धूल के कणों के समान

     - नाथ गोरखपुरी

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