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सूफी संत - डॉ. रानू मुखर्जी

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सूफी संतों और मुस्लिम सहित्यकारों ने भारतीय संस्कृति और सनातन धर्म से संपर्क स्थापित करते हुए इस्लाम की उदार छवि प्रस्तुत की जिससे की भारतीयों के मन में इस्लाम के प्रति आदर और श्रद्धा के भाव उपजे। भारत में हिन्दू-मुस्लिम एकता और साम्प्रदायिक भावों को बनाए रखने में सूफी संतों का महत्वपूर्ण योगदान है।

यह सूफी संतों के भारतीय अध्यात्म, वेदान्त और पुनर्जन्म के सिद्धांतों से जुडाव का ही प्रभाव था कि कई हिन्दुओं ने सूफी संतों को अपना गुरु और आराध्य भी बनाया। कट्टरपंथी बादशाह औरंगजेब के घर जैबुन्निसा जैसी बेटी और ताज बीबी जैसी भतीजी का जन्म लेना इस्लाम के भारतीय करण का प्रत्यक्ष उदाहरण है।

शहजादी ताज बीबी ने गोस्वामी विट्ठलनाथजी से वैष्णव मत की दिक्षा लेकर मुगलिया सल्तनत में कयामत ला दी। ताज बीबी भाव विभोर होकर कृष्ण-भक्ति में डुबाकर कहतीं हैं –

नन्दजू का प्यारा, निज कंस को पछारा

वह वृन्दावन वारा, कृष्ण साहेब हमारा है ।

सुनो दिलजानी मेरे दिल की कहानी,

तुम दस्त की बिकानी, बदनामी भी सहूंगी मैं ।

नंद के कुमार, कुरबान तेरी सूरत पे,

है मैं मुगलानी, हिन्दुआनी रहूंगी मैं।

(ताजबीबी)

पंजाबी के रहस्यवादी भक्ति कविताओं की जो परंपरा बाबा फरीद ने रची वह सदियों तक पंजाबी संत कवियों की कवितओं का आदर्श बना रहा। सूफी और निर्गुणवादी दोनों काव्यधाराओं को जोडनेवाली कडी स्वरुप बाबा फरीद सूफी मार्ग के चिश्ती समुदाय के शिरमोर दरवेशो में एक और भारतीय संत परंपरा के अग्रणी संत है।

ई.स. ११७३ में मुलहान के खोटवाल गांव में जन्म और ई.स. १२६५ में अजोधन – पाक पट्टन में निधन हुआ था। उनका असली नाम “मसऊद” था। दीक्षा लेते समय मुर्शिद कुतुब साहब की ओर से करीदुद्दीन पदवी मिली। शांत और मधुर जीवन के कारण समाज में बाबा फरीद “शंकरगंज” नाम से जाने जाते थे। “शंकरगंज” अर्थात शंकर का भंडार।

जन साधारण में श्रेष्ठ मानवगुणों से भावना को जगानेवाली वाणी को बाबा उस समय की लोकबोली में कहा है।“सलोक” नाम से जानेवाली इन फरीदवाणी को उनके निधन के ढाईसों वर्ष के पश्चात गुरु नानक साहब ने (ई.स. १४६९-१५३९) तत्कालीन उत्तराधिकारी शेख इब्राहिम से प्राप्त करके आनेवाली पीढियों के लिए संरक्षित किया। शीखों के पंचम गुरु अर्जुनदेवजी ने “आदि गुरुग्रंथ साहब” (१५०४) के संपादन करते समय उनको बडे भक्तिभाव के साथ सामिल किया । आदि ग्रंथ में ११२ श्लोक के साथ सम्पुर्ण शबद सामिल हैं । इसके व्यतीत गुरुग्रन्थेतर फरीदवाणी भी पंजाबी समाज में लोगों के कंठ में से सुनने को मिलती है।

भाषा की सुन्दरता, भाषा की मिठास, कथनी में लयात्मकता के साथ रची उनकी रचनाएं दर्शन और कला का एक सुन्दर तालुमेल प्रस्तुत करती हैं। उनकी रचनाएं लोगों के दुःख से दुखी दरवेश की संवेदना है, जिसमें स्तुति, निंदा या विरोधाभास का नामोनिशान नहीं है। केवल निश्छल प्रेम छलकता है। आत्ममंथन स्वरुप मानव के अवगुणों पर प्रहार करते है। भाषा, जाति, मत, सम्प्रदाय तमाम चीजों को छोडकर फरीदवाणी में जीवन जीने के असली कला तथा वरमाला के साथ जुड़ने का सही रास्ता दिखाया गया है।

एनी लोइणी देखदियां, केती चली गई।

फरीदा, लोकां आपो आपणी, मैं आपणी पई॥

(इन नैनो से मैने देखा, गए कितने जन

अपने गत सौ सौ पडे, मैं निज गत मगन ॥)

फरीदा साहिब दी करी चाकरी दिल को लाही भरांदि ।

दरवेशां नूं लोरीए रुखां दी जीरांदी॥

( कर साहब के चाकरी, धोकर दिल का मैल

दरवेशों को चाहिए, वृक्ष सहोरता बल ॥)

बाबा फरीद की प्रार्थना बडे सम्मान और श्रद्धा के साथ आज भी गुन्गुनाई जाती है।

कागा सब मन खाईयो, मेरा चुन चुन मांस।

दो नैना मत खाईयो मोही दिया मिलन की आस॥

मथुरा में रसखानजी की समाधी आजभी हमें उनमें कृष्ण भक्ति गीतों की याद दिलाती है। कृष्ण के दीवाने रसखान लिखते हैं – मानुस हों तो वही रसखान, वसौ गोकुल, गांव के ग्वारन जो पशु हो तो कहा बस मोरी, चरौ नित नंद की धेनु भम्मारन।

कई सूफी संतों ने सनातन धर्म के देवी देवताओं को आजार बनाकर महाकाव्यों का सृजन किया। मौलवी मोहम्मद “जायसी” ने “पद्मावत” में राजा रत्नसेन को जीवत्मा तथा राजकुमारी पद्मावती को परमात्मा का प्रतीक मानकर प्रेमाख्यान काव्य परंपरा का निर्वाह किया है। सूफी काव्य परंपरा के अन्य प्रमुख कवि हैं – मुल्ला दाउद, कुतुबान, मंम्ल्न नयामत खां, शेख नबी, नजक अली, ख्वाजा अहमद आदि है।

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परिचय – पत्र

नाम - डॉ. रानू मुखर्जी

जन्म - कलकता

मातृभाषा - बंगला

शिक्षा - एम.ए. (हिंदी), पी.एच.डी.(महाराजा सयाजी राव युनिवर्सिटी,वडोदरा), बी.एड. (भारतीय

शिक्षा परिषद, यु.पी.)

लेखन - हिंदी, बंगला, गुजराती, ओडीया, अँग्रेजी भाषाओं के ज्ञान के कारण अनुवाद कार्य में

संलग्न। स्वरचित कहानी, आलोचना, कविता, लेख आदि हंस (दिल्ली), वागर्थ (कलकता), समकालीन भारतीय साहित्य (दिल्ली), कथाक्रम (दिल्ली), नव भारत (भोपाल), शैली (बिहार), संदर्भ माजरा (जयपुर), शिवानंद वाणी (बनारस), दैनिक जागरण (कानपुर), दक्षिण समाचार (हैदराबाद), नारी अस्मिता (बडौदा),नेपथ्य (भोपाल), भाषासेतु (अहमदाबाद) आदि प्रतिष्ठित पत्र – पत्रिकाओं में प्रकशित। “गुजरात में हिन्दी साहित्य का इतिहास” के लेखन में सहायक।

प्रकाशन - “मध्यकालीन हिंदी गुजराती साखी साहित्य” (शोध ग्रंथ-1998), “किसे पुकारुँ?”(कहानी

संग्रह – 2000), “मोड पर” (कहानी संग्रह – 2001), “नारी चेतना” (आलोचना – 2001), “अबके बिछ्डे ना मिलै” (कहानी संग्रह – 2004), “किसे पुकारुँ?” (गुजराती भाषा में अनुवाद -2008), “बाहर वाला चेहरा” (कहानी संग्रह-2013), “सुरभी” बांग्ला कहानियों का हिन्दी अनुवाद – प्रकाशित, “स्वप्न दुःस्वप्न” तथा “मेमरी लेन” (चिनु मोदी के गुजराती नाटकों का अनुवाद 2017), “बांग्ला नाटय साहित्य तथा रंगमंच का संक्षिप्त इति.” (शीघ्र प्रकाश्य)।

उपलब्धियाँ - हिंदी साहित्य अकादमी गुजरात द्वारा वर्ष 2000 में शोध ग्रंथ “साखी साहित्य” प्रथम

पुरस्कृत, गुजरात साहित्य परिषद द्वारा 2000 में स्वरचित कहानी “मुखौटा” द्वितीय पुरस्कृत, हिंदी साहित्य अकादमी गुजरात द्वारा वर्ष 2002 में स्वरचित कहानी संग्रह “किसे पुकारुँ?” को कहानी विधा के अंतर्गत प्रथम पुरस्कृत, केन्द्रीय हिंदी निदेशालय द्वारा कहानी संग्रह “किसे पुकारुँ?” को अहिंदी भाषी लेखकों को पुरस्कृत करने की योजना के अंतर्गत माननीय प्रधान मंत्री श्री अटल बिहारी बाजपेयीजी के हाथों प्रधान मंत्री निवास में प्रशस्ति पत्र, शाल, मोमेंटो तथा पचास हजार रु. प्रदान कर 30-04-2003 को सम्मानित किया। वर्ष 2003 में साहित्य अकादमी गुजरात द्वारा पुस्तक “मोड़ पर” को कहानी विधा के अंतर्गत द्वितीय पुरस्कृत। 2019 में बिहार हिन्दी- साहित्य सम्मेलन द्वारा सृजनात्मक साहित्य के लिए “ साहित्य सम्मेलन शताब्दी सम्मान “ से सम्मानित किया गया। 2019 में सृजनलोक प्रकाशन द्वारा गुजराती से हिन्दी में अनुवादित पुस्तक “स्वप्न दुस्वप्न” को “ सृजनलोक अनुवाद सम्मान” से सम्मानित किया गया।

अन्य उपलब्धियाँ - आकाशवाणी (अहमदाबाद-वडोदरा) को वार्ताकार। टी.वी. पर साहित्यिक पुस्तकों क परिचय कराना।

- डॉ. रानु मुखर्जी

ranumukharji@yahoo.co.in

1 टिप्पणियाँ

  1. नमस्कार....
    रानू मुखर्जी का आलेख पढ़ा. सार गर्भित लेख के लिए उन्हें साधुवाद.
    गोवर्धन यादव
    छिन्दवाड़ा (म.प्र.) 480001
    09424356400

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