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मानव जीवन और अध्यात्म - डॉ. श्रीमती शारदा मेहता


अध्यात्म क्या है? भौतिक जगत से अलग हटकर जो कुछ भी शक्तिशाली प्रतीत होता है वही अध्यात्म है। इसको स्वीकार करने से जो शक्ति प्राप्त होती है, उसे अध्यात्म कहते हैं। लोभ, मोह, मत्सर, क्रोध, बैर आदि से हमें दूर कर शान्ति के प्रशस्त पथ पर अग्रसर करता है वह अध्यात्म है। आत्मशुद्धि तथा सद्विचार व्यक्ति का आंतरिक विकास करते हैं। आंतरिक विकास से व्यक्ति का झुकाव अध्यात्म की ओर बढ़ता है। अधि+आत्म इन दो शब्दों से बना 'अध्यात्म' अर्थात् आत्मा की ओर, आत्मा का विकास करने वाला ज्ञान।


भगवान सर्वसुलभ नहीं है। उनके गूढ़ रहस्य की ज्ञेयता को समझना, आत्मसात् करना कठिन ही नहीं दुर्लभ भी है। अनादिकाल से अनेक सम्प्रदाय इस गूढ़ रहस्य को जानने के लिए प्रयत्नशील है। हमारी सारी प्रवृत्तियों का नियामक कोई अदृश्य शक्ति है। हमारी प्रवृत्तियां हमारे हृदय स्थित शक्ति (देव) के इंगित करने पर ही कार्य के लिए हमें प्रवृत्त करती है। अज्ञानान्धकार के नष्ट होने पर देहाभिमान नष्ट हो जाता है। ऐसे समय कर्त्ता कर्म और करणादि का कोई भेद नहीं होता है। प्रवृत्ति प्रवर्त्तक और प्रवर्त्य इन सबमें वह अन्तर्यामी ही रहते हैं। हम सच्चेकर्ता को भूलकर तुच्छ देहाभिमान के सिर पर समस्त कर्त्तव्य भोक्तृत्व का भार लाद देते हैं और देहाभिमान को न समझकर परमार्थस्वरूप मान लेते हैं। हमें परमेश्वर की इच्छा के अनुसार ही कार्य के लिए प्रवृत्त होना पड़ता है और उसे नियन्ता की इच्छा के अनुसार ही सफलता और असफलता प्राप्त होती है।


सृजनात्मक शक्ति का विकास अध्यात्म से ही संभव है। हमेशा इस बात के लिए प्रयत्नशील रहें कि हमारे विचार सकारात्मक रहें। विध्वंसक तथा नकारात्मक विचार से आपका कल्याण असंभव है। प्रेम, करूणा, सेवा, सहानुभूति जैसी बातें ही हमारा सृजनात्मक विकास करेगी। हमारे ऋषि मुनियों ने चिरंतन तप से ज्ञान प्राप्त कर शाश्वत, चिरन्तन कल्याण का मार्ग दिखलाया है। हम इस क्षणभंगुर मनुष्य देह को अर्थोपार्जन की होड़ में लगाकर अपना जीवन जीना चाहते हैं और अपनी अध्यात्मिक उन्नति को दरकिनार कर जाते हैं। फिर अन्त में पछताना पड़ता है। अपने संस्कार से जुड़े रहें। भावी पीढ़ी को भी संस्कार से जोड़ें। अध्यात्म की शक्ति अपने आप प्राप्त होगी।


विश्व के महान देशों के वैज्ञानिकों ने विज्ञान में अपूर्व प्रगति की है। चन्द्रमा, मंगल आदि कई ग्रहों, उपग्रहों पर अंतरिक्ष में पहुँच रहे हैं। विशाल पहाड़ों को काटा जा रहा है। बड़ी-बड़ी नदियों को बाँधा जा रहा है। इतना सब कुछ होने पर भी हमारे जीवन में आत्मिक शान्ति नहीं है। चारों ओर अशान्ति, बैचेनी, अकुलाहट, दौड़भाग तथा आपाधापी का वातावरण परिलक्षित हो रहा है। हमारा जीवन भौतिकवाद की ओर द्रुतगति से दौड़ रहा है। हम पश्चिमी सभ्यता के समान जीवन यापन करने में स्वयं को प्रगतिशील समझ रहे हैं। प्राचीन जीवन पद्धति का माखौल उड़ाया जा रहा है। उसे हेय दृष्टि से देखा जा रहा है। यह सही है कि हम ऋषि मुनियों जैसे वस्त्र धारण कर, हिमालय की कन्दराओं में बैठकर, ध्यानस्थ होकर आध्यात्मिक प्रगति नहीं कर सकते हैं, किन्तु मानव जीवन के चरमोत्कर्ष की आधारशिला, मानवता का मेरूदण्ड, 'अध्यात्म’ को हम दरकिनार कदापि नहीं कर सकते हैं। सत्ययुग में अध्यात्मिक प्रेरणा से ही जीवन अनुशासित था। कोई राजकीय सत्ता इसके लिए व्यक्ति को बाध्य नहीं करती थी। मानवीय स्वभाव ही व्यक्ति को आध्यात्मिक जीवन व्यतीत करने के लिए प्रेरित करता था। प्राचीन ऋषि मुनियों ने क्रमबद्धतापूर्वक आध्यात्मिक उन्नति की उच्च साधना के द्वारा अपना जीवन यापन किया। उनके द्वारा प्राप्त ज्ञान का चरमोत्कर्ष का प्रकाशपुंज की एक छोटी सी किरण ही हमारे भौतिक जीवन को आध्यात्मिक विकास के लिए प्रेरित कर सकती है। ब्रह्मचर्य, सच्चरित्रता, सदाचार, स्वानुशासन, मर्यादापालन आदि गुण ऐसे हैं जो हमारे जीवन में सुख का संचार कर सकते हैं। अस्तव्यस्तता, व्यसन, प्रमाद, आलस्य आदि ऐसे जीवनकाल के दुर्गण हैं जो हमारी आत्मोन्नति में बाधक हैं। हमारी शक्ति दूसरों को पीड़ा देने के लिए न हो, विद्या दान के लिए न हो, धन आमोद-प्रमोद, व्यसन में खर्च करने के लिए न हो तो ही हम अध्यात्म की ओर कदम बढ़ा सकते हैं। सर्वप्रथम हमें अपने भौतिक जीवन या बाह्य जीवन को सुधारना होगा तभी हम अध्यात्म की ओर बढ़ सकते हैं।


आध्यात्मिक दृष्टिकोण रखने वाला व्यक्ति लौकिक और आत्मिक दोनों प्रकार की विचारधाराओं में ऐक्य स्थापित कर अपना जीवन व्यतीत करता है। अपने भीतर के चेतन तत्व को जानना भी आवश्यक है। भगवद्गीता में कहा है-
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।

(भगवद्गीता अ. ४/७)


अर्थात् श्रीकृष्ण जी कहते हैं कि जहाँ धर्म का पतन होता है और अधर्म की प्रधानता होने लगती है तब मैं अवतार लेता हूँ तथा अध्याय अठारह के श्लोक ६१ में श्रीकृष्ण कहते हैं-
ईश्वर: सर्वभूतानां हृदृशेऽर्जुन तिष्ठति।
भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारुढ़ानि मायया।।


हे अर्जुन परमेश्वर प्रत्येक जीवन के हृदय में स्थित है और भौतिक शक्ति से निर्मित यंत्र में सवार की भाँति बैठे समस्त जीवों को अपनी माया से घुमा रहे हैं।
सारे लौकिक सुखों को भोगकर यदि व्यक्ति अपनी उम्र के अंतिम पड़ाव में सत्य की खोज में लगता है तो उसे समयावधि की न्यूनता का आभास होता है। ऐसे समय उसका न तो इहलोक और न ही परलोक सुधरता है।


आत्म कल्याण के लिए हमें भटकने की आवश्यकता नहीं है। आवश्यकता है तो अपने आपको जानने की, समझने और भीतर से परखने की। आध्यात्मिक दृष्टि से देखें तो हमें आभास होगा कि जिस प्रकार मछली पानी में रहकर भी प्यासी है-
जल बिच मीन पियासी रे मोहे सुन सुन आवत हासी रे।


हमारी भी स्थिति ठीक वैसे ही है। हमारी आत्मा में स्थित ब्रह्मा तथा आध्यात्मिक शान्ति को खोजने के लिए हमारे लौकिक चक्षु बेचैन हैं। इच्छाओं और अहंकार पर विजय प्राप्त करना तथा आंतरिक गुणों को विकसित करना सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। मनुष्य जीवन के महत्व को व्यक्ति को समझना चाहिए। वैदिक ग्रंथ हमारा पर्याप्त दिशा निर्देशन करते हैं। मानव समाज को उन विश्व प्रसिद्ध ग्रंथों से मार्गदर्शन प्राप्त होता है। अध्यात्म जगत तथा लौकिक जगत का साम्य नहीं हो सकता है। दोनों के संतुलन से मानव को अपार सुख शान्ति प्राप्त हो सकती है। सतोगुण में रहकर हम जीवन में आध्यात्मिक उन्नति कर सकते हैं। रजोगुणी और तमोगुणी व्यक्ति के लिए अध्यात्म शिक्षा का आनंद प्राप्त करना दुष्कर कर्म है। आध्यात्मिक शक्ति वह शक्ति है जिसने भारतीय संस्कृति को सम्पूर्ण विश्व में सिरमौर बनाया है। जहाँ पश्चिम की संस्कृति समाप्त होती है वहाँ से भारतीय संस्कृति प्रारंभ होती है।
आध्यात्मिक नजरिए से देखें तो सुख और दु:ख केवल विचार है। इनमें वास्तविकता जरा भी नहीं है। धन पैसा, परिवार, समाज, स्वास्थ्य, विलासिता की वस्तुएँ ये हमारे भौतिक जीवन की आवश्यकता मानी जाती है। परन्तु इससे सच्ची शान्ति, सच्चा सुख नहीं प्राप्त किया जा सकता है। सच्चा सुख तो मानव के आध्यात्मिक योग से ही संभव है। नई पीढ़ी की विचारधारा को आध्यात्मिकता की ओर मोड़ें। यह कार्य हमें बालक की बाल्यावस्था से ही करना होगा। आज भी समाज के अनेक घरों में शिशु के जन्म के पश्चात् उसकी जीभ पर परिवार की दादी, नानी बुआ आदि चाँदी की सींक से 'ऊँ’ अक्षर लिख कर उसमें आध्यात्मिकता के बीज का अंकुरण कर देती है। यह है हमारी गरिमामय संस्कृति। आधुनिक समय में कई महान देश अपने यहाँ सुख शान्ति की स्थापना के लिए अध्यात्म का आश्रय लेकर भारत का अनुसरण कर रहे हैं।


आध्यात्मिक विकास न होने से व्यक्ति दिग्भ्रमित है और तनावग्रस्त है। अधिकतर भयंकर व्याधियाँ भी तनाव के कारण हो रही हैं। पश्चिमी सभ्यता, धन, विलासी वैभवपूर्ण जीवन के महत्व को प्रतिपादित कर रही हूँ। किन्तु मन को खोखला कर रही है। शान्ति की खोज में मानव भटक रहा है पर इसलिए अध्यात्म को अंगीकार किए बिना शान्ति असंभव है।
आज आप समाचार पत्र पढ़िए, टी.वी. देखिए या कोई भी प्रिंट मीडिया को देखिए, सभी में दिल दहला देने वाली खबरें ही दिखाई देती हैं। नित नई समस्या का सामना करना होता है। प्रदूषण, विज्ञान की विनाशक उन्नति इन सभी ने मानव का जीना मुश्किल कर दिया है। शाश्वत शान्ति नश्वर पदार्थ में नहीं है। मानव को आंतरिक शांति चाहिए। आत्म संतुष्टि होना अत्यावश्यक है। आत्मा का अनुसंधान करें। आत्मनिरीक्षण करें। मैं कौन हूँ? इस विषय पर चिंतन मनन करें। जो कुसंस्कार बचपन से धारण कर रखें हैं उन्हें शीघ्र दूर करने का प्रयत्न करें। आज के परिवेश में पारिवारिक कलह, पति-पत्नी के दरकते आपसी सम्बन्ध, तलाक की ओर बढ़ते कदम, कुरीतियाँ, बलात्कार, लूटपाट, हत्या आदि सभी हमारी बढ़ती कलुषित मानसिकता तथा नकारात्मक सोच का परिणाम है।


मेरा नई पीढ़ी के अंकुरों से आग्रह है कि वे अपने स्वयं के लिए चौबीस घंटे में से एक आध घंटा अपने लिए सुरक्षित रखें। सारे कार्य भूलकर ध्यान लगाएं, योग करें, अपने आप को जानने का प्रयत्न करें। इससे प्राप्त होने वाली आत्मिक शान्ति का अनुभव करें। वर्ष में एकाध बार प्रकृति का सामीप्य प्राप्त करने के लिए पर्यटन स्थलों पर जाएँ और मानसिक शान्ति प्राप्त कर परिवार को चहकते हुए देखें। कभी-कभी संतों के सत्संग में जाकर अध्यात्म के अपने ज्ञान को परिमार्जित करें। क्योंकि-
सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामय:।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित् दु:ख भाग्भवेत्।

(वृहदारण्यक उपनिषद्)

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डॉ. श्रीमती शारदा मेहता
सीनि. एमआईजी-१०३, व्यास नगर,
ऋषिनगर विस्तार, उज्जैन (म.प्र.)
Email : drnarendrakmehta@gmail.com

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