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समकालीन कथा परिदृश्य में स्त्री रचनाकार – डॉ॰ रानू मुखर्जी


इक्कीसवीं सदी के साहित्यिक परिदृश्य में स्त्री को केंद्र में रखकर होनेवाले चिंतन ने अब एक निर्णायक स्थिति अख़्तियार कर ली है। सदियों से हाशिए पर खड़े हुए ये वर्ग अब चर्चा में है और अपना महत्व सुनिश्चित कर चुके हैं। समकालीन स्त्री लेखन में स्त्री की अस्मिता की पहचान की कोशिश है। साथ ही वह परंपरा और रूढ़ी के विरूद्ध सतर्कता से संघर्ष और प्रतिरोध कर रहा है। आज के इस भूमंडलीकृत समाज में स्त्री के प्रति व्यावसायिक और भोगवादी नजरिया तेजी से पनपा है। समकालीन महिला रचनाकारों ने अपनी रचनाओं के माध्यम से इस स्थिति से उबरने की सृजनात्मक कोशिश की है। उनकी रचनाओं में समाज की इस व्यवस्था में नारी की स्थिति को बड़ी ईमानदारी के साथ व्यक्त किया गया है।

साहित्य और समाज का संबंध बहुत पुराना है और उसका संबंध अनादिकाल से चला आ रहा है और दोनों का संबंध मनुष्य से है। मनुष्य समाज में रहने के साथ-साथ समाज को प्रभावित करता है और खुद भी प्रभावित होता है। साहित्यकार समाज का अंग है और समाज की परिस्थिति का प्रभाव उस पर पड़ता है। साहित्यकार समाज को साहित्य में बांधता है और साहित्य से समाज का मार्गदर्शन होता है। इस बात को नकारा नहीं जा सकता है कि साहित्यकार युग दृष्टा और सृष्टा होता है। वह समाज की समस्याओं को देखता, सुनता और समझता है और उसी तरह साहित्य की सृष्टि करता है।

स्त्री लेखन और उसके जीवन अनुभूत के बीच का फासला बहुत कम है। शायद यही वजह है कि स्त्री लेखन अपनी प्रारम्भ से ही समाज और परिवार द्वारा बनाए दायरों को अतिक्रमण करने की कोशिश करता रहा है। वो दायरे जो उसके अपने ने कभी सुरक्षा, कभी मर्यादा के नाम पर उसके लिए रचे हैं। इन दायरों की पहचान और समझ “कि समाज के विधानों की जंजीरों से जकड़ी हुई नारी जब तक अपने बंधन आप नहीं काटती – कोई शक्ति उसका सर्वनाश होने से नहीं बचा सकती” (व्यक्तित्व की भूख - सुमित्रा कुमारी सिन्हा)

वास्तव में स्त्री का प्रतिरोध या चेतना की जागृति एक ही घटना नहीं है। इसमें सदियों से चली आ रही संघर्ष की गाथा प्रस्तुत है। इसमें सांस्कृतिक नवोत्थान, शैक्षिक संस्थाएं एवं नारीवादी आंदोलनों का प्रमुख हिस्सा है।

समकालीन लेखिकाओं ने आज के जीवन की परिवर्तनशीलता और नारी-जीवन के परिवर्तित मूल्यों को अत्यंत मार्मिकता के साथ अपने उपन्यासों में चित्रित किया है।

नीत नई होती टेक्नोलोजी, भूमंडलीकरण और बाजारवाद के इस दौर में, जबकि स्त्री की दबी-डुबकी दुनिया में एक जबर्दस्त परिवर्तन आया है, बेशक वह कितना ही सतही क्यों न हो, कहानी के भीतर भी यह बदलाव भिन्न-भिन्न रूपों में प्रतिध्वनित हो रहा है। आज एक बड़ी संख्या में स्त्री कथाकार सामने आ रही हैं और तमाम नारी आंदोलनों और स्त्री विमर्शों को बरबस खुलकर लिख रही है। उन्होंने यह मिथ्या भी तोडी है कि स्त्री सिर्फ घर-परिवार की ही बात कर सकती है। कृष्णा सोबती, मन्नू भण्डारी, ममता कालिया, मृदुला गर्ग, नासिरा शर्मा, उषा प्रियंवदा से लेकर चित्रा मुद्गल, अल्का सरावगी, चन्द्रकान्ता, मैत्रेयी पुष्पा, राजी सेठ, अर्चना वर्मा, मधु कांकरिया, अल्पना मिश्र, मनीषा कुलश्रेस्ठ, जया जादवानी, उर्मिला शिरीष, गीतांजली श्री, सुषमा मुनीन्द्र, रोहिणी अग्रवाल, रजनी गुप्त, कविता, सुधा अरोड़ा, इंदिरा दागी आदि की एक लंबी फेहरिस्त है जिन्होंने हिन्दी कथा साहित्य को अपनी लेखन से सींचा है।

समकालीन लेखिकाओं ने आज के जीवन की परिवर्तनशीलता और नारी जीवन के परिवर्तित मूल्यों को अत्यंत मार्मिकता के साथ अपनी रचनाओं में चित्रित किया है। भूमंडलीकृत समाज में अपने अस्तित्व को बनाए रखने की जो छटपटाहट स्त्री रचनाकारों में दर्ज हुई है वह समकालीन दौर में स्त्री-लेखन को विशिष्ट स्थान प्रदान करती हैं। आलोचकों के अनुसार, “वह अपने वजूद को महसूस करती है। एक सजग इकाई के रूप में वह तमाम यथार्थ स्थितियों से प्रतिकृत होती वर्तमान सामाजिक परिवेश के अंतर्विरोधों व असंगतियों को अपनी व्यक्तिमत्ता, स्त्री अस्मिता और मानवीय स्थिति के परिप्रेक्ष्य में जानना समझना चाहती है। उनका विश्लेषण विवेचन करने का प्रयास करती है।“

आज के कथा साहित्य में स्त्री स्वर का सच बेरोकटोक सबके सामने उजागर हो रहा है। कहीं सुधा अरोड़ा जैसी लेखिकाओं की संयमित कलम से जो उधड़े हुए सच को बेशक उधड़ा ही रहने देगी, लेकिन इस बात का भी ध्यान रखेगी कि वह और अधिक बेपर्दा न हो तो दूसरी ओर जयश्री राय और गीताश्री बिंदास और बेबाक लेखिकाएँ हैं जो उधड़े हुए स्वेटर को खींचकर पूरा उधेड़ देने में भी कोणी नहीं बरतेंगी लेकिन उद्देश्य सबका वही है, सब वही कर रही हैं अपने अपने अंदाज में कथा के माध्यम से सच को सामने लाना।

स्त्री के आधे अधूरे रिश्तों के पीछे छिपी हकीकत को निर्ममता से उजागर करती किरण अग्रवाल की कहानी “जो इन पन्नों में नहीं है” की नायिका का कथन – “हर नाम मुझे अपना ही लगता है। हर स्त्री का चेहरा अपने जैसा लगता है। जब कभी किसी स्त्री को अकेली भीड़ में देखती हूँ तब लगता है कि वह तो मैं हूँ। तब बड़े पेशोपोस में पड़ जाती हूँ कि अगर वह मैं हूँ तो मैं कौन हूँ?” मन को उत्कंठा से भर देता है। नीला प्रसाद की कहानी “चालीस साल की कुंवारी लड़की” की नायिका की शादी इसलिए नहीं हो पाती क्योंकि वह तो एक ईसाई के साथ शादी करना चाहती है और दूसरे तमाम गुणों के बावजूद वह साँवली भी है। प्रकृति करगेती की कहानी “ठहरे हुए से लोग” की नायिका, बाजार में काँच की दीवार के पीछे सजी-धजी खड़ी एक बुत, खुश है कि वह एक बुत है क्योंकि “शीशे की दीवारों के अंदर कोई ‘गलत काम’ भी नहीं हो सकता था उसके साथ।”

पर्वतारोहण की पृष्ठ भूमि पर लिखी गई किरण सिंह की कहानी “द्रोपदी पीक” में भी वहाँ इस ऊंचाई पर भी बर्फ के नीचे दबा वही निर्मम सच उभर कर आ रहा है – “दुनिया में औरत का भाग्य और सब्जी मंडी में सब्जियों का भाव एक बराबर होता है। काहे की सब सब्जीवाले मिलकर यह तय कर लेते हैं। कोई दाम बिगाड़नेवाला हो तो उसे जात बाहर किया जाता है।”

उपरोक्त सभी लेखिकाओं का जीवनानुभव अलग-अलग है। न केवल कहानियों के विषय और प्रस्तुतीकरण बल्कि स्वरों के घात प्रतिघात भी एक दूसरे से बिलकुल भिन्न है। फिर भी सच एक ही है जो दिखाई दे रहा है – हर स्त्री स्वर से।

कहानियों में स्त्री स्वर का सच अपने होने के पक्ष में चाहे कितना भी बुलंद हो – समाज में उसका प्रभाव उस अनुपात में पड़ता नहीं दिखता है – परंतु जितना दिख रहा है वह निराशाजनक नहीं है। कहानियाँ मात्र कोरी काल्पनिक नहीं होती। कथाकार की संवेदना अपने परिवेश में घट रही विसंगतियों के तरंग को अनायास ही ग्रहण कर लेती है। और उन अनुभूतियों को वह शब्दों के द्वारा अभिव्यक्त कर देता है।

पुरातन काल से नारी की सोच, अपने प्रति हो रहे अन्य, अत्याचार, शोषण, दैहिक या मानसिक और अपने होने को नकारे जाने की पीड़ा उसकी भावनाओं को उथल-पुथल करती रही है, विरोध के लिए उद्धत होती रही है – मुखर भी होती रही है। सीता, मंदोदरी, द्रौपदी के स्वर से लेकर मीरा जैसी अन्य अनेक स्त्रियॉं के स्वर का सच हमारे सामने है। प्रतिष्ठित लेखिका मैत्रेयी पुष्पा मानती है कि समस्याएँ सभी औरतों के लिए लगभग वही है, बस उसके आकार प्रकार अलग हैं। मैत्रेयी पुष्पाजी की कहानी “पगला गई है भगवती” की स्त्री का स्वर मन को विचलित कर देता है। सवर्ण स्त्रियॉं के विधवा हो जाने का अभिशाप, जहां दूसरी शादी वर्जित है – बड़ी मार्मिकता से उभरकर आया है। कृष्णा सोबती जी की बहुचर्चित कहानी “ऐ लड़की” में मृत्यु शैया पर पड़ी अम्मी की यह तड़प या पीड़ाभरी चाहत की अगले जनम वह पुरुष होकर दुनिया को देखना चाहती है। शायद इस जनम में उनकी भोगी हुई यातना का न कहीं मनोवैज्ञानिक भाव है जो केवल विरोध नहीं, कहीं न कहीं सूक्ष्म बदली की भावना को भी दर्शाता है।

साहित्य की विशेषता यही है कि उसमें हम घटनाओं से नहीं संवेदना के भागीदार होते हैं। घटनाएँ तो हर एक के जीवन की अलग-अलग और अपनी-अपनी होती है। उनका होना या घटित होना हमारे अंदर कोई समरसता पैदा नहीं करता। संवेदना के द्वारा हम दूसरे की अनुभूति को समझ सकते हैं। पढ़ते समय रचना से तादात्मय हमारे संवेदन तंत्र को उकसाता जरूर है, और हम लेखक को भूलकर अपने साथ जुडते जाते हैं।

समकालीन कथा लेखिकाओं में चित्रा मुद्गल जी का नाम बड़े सम्मान से लिया जाता है। 2018 में उपन्यास “नाला सोपारा पोस्ट बॉक्स नं॰ 203” के लिए उनको साहित्य अकादमी पुरस्कार से नवाजा गया। उनका लेखन नारी के आत्मबोध को एक नई पहचान देता है। उनकी नायिका लीक तोड़कर एक नई परंपरा गढ़ती है। अस्तित्व के संघर्ष, अस्मिता की लड़ाई, आत्मनिर्भरता की खोज के लिए घर की चौखट को पार करती है। सामंती मूल्यों तथा कथित समाज के षडयंत्रों से टकराने में नहीं हिचकिचाती है।

इनका “आवां” उपन्यास भी प्रसिद्ध है। बाजारीकृत समाज में स्त्री का अस्तित्व किस प्रकार से मिटता जा रहा है उसकी जटिलता को परत-दर-परत खोला गया है। “आवां” जलती भट्टी का प्रतीक है। स्वत्व संघर्ष की ज्वाला का प्रतीक है जिसमें नारी अपने को तपा-तपाकर नष्ट रूप में परिभाषित करने को बाध्य है। उनका कहना है मेरा लेखन स्त्री विमर्श से उस सीमा तक जुड़ा है जिस सीमा तक समाज में स्त्री है। स्त्री समाज की देश की आधी आबादी है। एक स्त्री और लेखिका होने के नाते उनके प्रति मेरी ज़िम्मेदारी बनती है। स्त्री की समस्या केवल स्त्री की समस्या नहीं है आधी आबादी की समस्या है तो उनकी समस्याओं को उठाया जाना चाहिए। उन पर होने वाले शोषण समाप्त होने चाहिए। एक बेहतर सामंजस्य की तलाश होनी चाहिए। इसलिए मेरे सभी नारी पात्र स्वचेतना और संघर्ष की कहानी कहती हैं। (हिन्दी साहित्य का आधा इतिहास – लेखक सुमन राजे – पृष्ठ 98)

अपनी कथाओं के माध्यम से चित्रा जी का कहना है कि स्वीकारना होगा और स्वीकार करवाना होगा आधी आबादी को कि उसके धड़ के ऊपर उसका अहम मस्तिष्क भी है। किसी भी माने में वह क्षमता और ऊर्जा में उससे कम नहीं है। समान अवसर के अधिकार को कागजों में नहीं, समाज में देना होगा – भेदभाव को तिलांजली देकर। अपनी कथाओं में चित्रा जी ने स्पष्ट किया है कि स्त्री के मस्तिष्क की पहचान और प्रतिष्ठा ही उसे उसकी आवाज लौटा सकती है। पितृसत्ता से उसे मुक्ति चाहिए – पुरुष से नहीं। और यह भी कि – आधी आबादी को समाज से अपनी आजादी के लिए सिखाना होगा कि स्त्री को वह किस तरह से समझे और देखे।

“एक जमीन अपनी” उपन्यास में चित्रा जी ने विज्ञापन जगत में स्त्री के शोषण का जीवंत विश्लेषण कर, स्त्री को देहमात्र समझने की पुरुष प्रवृत्ति को अनावृत करती है। बाजार की चकाचौंध स्त्री को भटका देती है, पर उसकी चेतना उसे संभालने का विवेक भी देता है। चित्रा मुद्गल जी स्त्री जीवन के संघर्ष को लेखन का आधार बनानेवाली प्रमुख रचनाकार हैं। “कठगुलाब” उपन्यास में मृदुला गर्ग जी स्त्री के मानसिक, दैहिक शोषण के भयंकर परिणामों से समाज को चेतावनी देती है। पुरुष की हिंसक नीतियों, नारी मन के तरल भाव को सुखाकार उसे रूक्ष बना सकती हैं। नारी संतानोत्पत्ति से इंकार कर सकती है। उन्होंने “चितकोबरा” उपन्यास में इस स्थिति को और अधिक सशक्त रूप में दर्शाया है। “छिन्नमस्ता” “आओ पेपे घर चले” आदि उपन्यासों में प्रभा खेतान ने नारी की संघर्ष गाथा को एक विराट फ़लक दिया है। उसे रूढ़ियों की त्रासदी से गुजरकर, स्वयं से ऊपर उठकर, वृहत पुरुष समाज में अपनी अलग पहचान बनाती दिखाई देती है। “छिन्नमस्ता” की प्रिया परिवार के शोषण से जूझती, आर्थिक आत्मनिर्भरता से सम्पन्न नारी बन जाती है। “उषा यादव” “काहे री नलिनी” और मधु कांकरिया ने “सलाम आखिरी” उपन्यास में देह बाजार में धकेली गई मासूम लड़कियों की यातनाएँ और उससे निजात पाने की व्यथा कथा को दर्शाती है। “नासिरा शर्मा” “हसालमाली” और “ठीकरे की मंगनी” में पारिवारिक समस्याओं से जूझती स्त्रियॉं के आत्मविश्वास और आत्म निर्णय को संवेदी स्वर देती है।

समकालीन कथा परिदृश्य में जो स्त्री रचनाकार सतत लिख रही है उनमें रजनी गुप्त का नाम विशेष रूप से लिया जाता है। “स्त्री जीवन के प्रश्न हो या युवाओं के सपनों की उड़ान, राजनीतिक सवाल हो या स्त्री का बदलता हुआ रूप, पुरुष से मुक्ति का सवाल हो या आत्मनिर्भर बनकर एक स्वाभिमानी स्त्री की इंसान के रूप में जीने की उत्कंठा, रजनी जी ने हर दृष्टि और दिशा में अपनी लेखनी को मोड़ा है और इसका उदाहरण है उनका कथा संग्रह “फिर वहीं से शुरूआत” इस बात का प्रमाण है कि बाहर की बदली हुई दुनिया में बैठा पुरुष आज भी अपनी मानसिकता को बदल नहीं पाया है, वह नारी को उपभोग और उपयोग की वस्तु मानता है। पुरुष की ज़िम्मेदारी तो नारी या पत्नी को निभानी होती है पर पुरुष जैसा जीवन जीने पर उसे कठघरे पर खड़ा क्यों किया जाता है? आज यह प्रश्न मुंह बाएँ खड़ा है।

इक्कीसवीं सदी के प्रथम दशक में हिन्दी कथा साहित्य में जिन चुनिन्दा श्रेष्ठ स्त्री कथाकारों ने अपनी अलग पहचान बनाई हैं उनमें युवा कथाकार मनीषा कुलश्रेष्ठ का नाम विशेष उल्लेखनीय है। उन्होंने अपनी रचनाओं में नारी-अस्मिता को एक नई पहचान देने के साथ हिन्दी कथा साहित्य को नई संभावनाओं, संवेदनाओं और अनुभवों के व्यापक डायरे से भी समृद्ध किया है। उनका नया कहानी संग्रह “किरदार” स्त्री मन, प्रेम, स्वप्न और द्वंद से भारी अविस्मरणीय कहानियों को समेटे हुए है। कोई कठपुतली वाले की लीक से हटकर चली पाली, कोई बहरूपिया, कोई डायन करार कर दी गई आवारा औरत, बिगड़ैल टीनेजर, नुऊद माडलिंग करने वाली..... । जैसे विषयों की वैविध्य और मौलिक किरदार उनकी कहानियों की अंदरूनी शक्ति है। जो प्रस्तुत कहानी संग्रह में प्रतीक बनकर उभरी है।

महिला विमर्श पर चर्चा होते हुए कई दशक बीत गए। ऐसे में नीलिमा चौहान की किताब “पतनशील पत्नियों के नोट्स” में उभरा असमंजस महिला विमर्श को थोड़ा हटकर और नए सिरे से उठाने की दिशा में एक सार्थक प्रयास है। “पतनशील पत्नियों के नोट्स” की खूबसूरती इसी में है कि वह पत्नी होकर सवाल पूछ रही है, बच्चों को संभालते हुए पति का सारा ख्याल रखते हुए, सास-ससुर के लिए बहू का धर्म निभाते हुए और इसके साथ नौकरी करते हुए। सवाल यह कि पत्नी उड़ना चाहती है पर जानती है कि दिमाग में बसे इस कीड़े का कोई इलाज नहीं। सवाल तभी उठता है कि पत्नी तमाम जिम्मेदारियों को पूरा करते हुए भी अपनी इच्छा के अनुरूप क्यों नहीं कुछ कर पाती है? सवाल कि परंपरा और आडंबर की आड़ में पत्नी को ज्यादा क्यों भोगना है? सवाल कि सृष्टि का सर्जक होते हुए भी कष्ट का बड़ा हिस्सा औरत के ही जिम्मे क्यों आता है? और इन सबसे बड़ा सवाल कि आखिर ऐसा कब तक चलेगा? नीलिमा ने बड़े साफ शब्दों में इस बात की ओर इशारा किया है कि समानता का अधिकार केवल विमर्शों तक ही सीमित है। किताबों में दफन है।

असल में नीलिमा चौहान ने अपनी किताब के माध्यम से उस गंभीर चिंता को नए तरीके से जाहिर किया है जहां कुछ नहीं बदला है। न तो सोच बदली है न ही महिलाओं को देखने समझने का नज़रिया बदला है। पति नामक पुरुष की मानसिकता में कहीं कोई बदलाव नहीं आया।

उपरोक्त सभी महिला कथाकारों की शृंखला में और भी अनेक लेखिकाएँ हैं जिन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से समाज को उसकी स्थिति दर्शाने का तथा उससे ऊपर उठकर एक समन्वयवादी समाज व्यवस्था करने का प्रयास किया है। इस विषय में भी फिर आगे चर्चा होगा।

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परिचय – पत्र

नाम - डॉ. रानू मुखर्जी

जन्म - कलकता

मातृभाषा - बंगला

शिक्षा - एम.ए. (हिंदी), पी.एच.डी.(महाराजा सयाजी राव युनिवर्सिटी,वडोदरा), बी.एड. (भारतीय

शिक्षा परिषद, यु.पी.)

लेखन - हिंदी, बंगला, गुजराती, ओडीया, अँग्रेजी भाषाओं के ज्ञान के कारण आनुवाद कार्य में

संलग्न। स्वरचित कहानी, आलोचना, कविता, लेख आदि हंस (दिल्ली), वागर्थ (कलकता), समकालीन भारतीय साहित्य (दिल्ली), कथाक्रम (दिल्ली), नव भारत (भोपाल), शैली (बिहार), संदर्भ माजरा (जयपुर), शिवानंद वाणी (बनारस), दैनिक जागरण (कानपुर), दक्षिण समाचार (हैदराबाद), नारी अस्मिता (बडौदा),नेपथ्य (भोपाल), भाषासेतु (अहमदाबाद) आदि प्रतिष्ठित पत्र – पत्रिकाओं में प्रकाशित। “गुजरात में हिन्दी साहित्य का इतिहास” के लेखन में सहायक।

प्रकाशन - “मध्यकालीन हिंदी गुजराती साखी साहित्य” (शोध ग्रंथ-1998), “किसे पुकारुँ?”(कहानी

संग्रह – 2000), “मोड पर” (कहानी संग्रह – 2001), “नारी चेतना” (आलोचना – 2001), “अबके बिछ्डे ना मिलै” (कहानी संग्रह – 2004), “किसे पुकारुँ?” (गुजराती भाषा में अनुवाद -2008), “बाहर वाला चेहरा” (कहानी संग्रह-2013), “सुरभी” बांग्ला कहानियों का हिन्दी अनुवाद – प्रकाशित, “स्वप्न दुःस्वप्न” तथा “मेमरी लेन” (चिनु मोदी के गुजराती नाटकों का अनुवाद 2017), “बांग्ला नाटय साहित्य तथा रंगमंच का संक्षिप्त इति.” (शिघ्र प्रकाश्य)।

उपलब्धियाँ - हिंदी साहित्य अकादमी गुजरात द्वारा वर्ष 2000 में शोध ग्रंथ “साखी साहित्य” प्रथम

पुरस्कृत, गुजरात साहित्य परिषद द्वारा 2000 में स्वरचित कहानी “मुखौटा” द्वितीय पुरस्कृत, हिंदी साहित्य अकादमी गुजरात द्वारा वर्ष 2002 में स्वरचित कहानी संग्रह “किसे पुकारुँ?” को कहानी विधा के अंतर्गत प्रथम पुरस्कृत, केन्द्रीय हिंदी निदेशालय द्वारा कहानी संग्रह “किसे पुकारुँ?” को अहिंदी भाषी लेखकों को पुरस्कृत करने की योजना के अंतर्गत माननीय प्रधान मंत्री श्री अटल बिहारी बाजपेयीजी के हाथों प्रधान मंत्री निवास में प्र्शस्ति पत्र, शाल, मोमेंटो तथा पचास हजार रु. प्रदान कर 30-04-2003 को सम्मानित किया। वर्ष 2003 में साहित्य अकादमी गुजरात द्वारा पुस्तक “मोड पर” को कहानी विधा के अंतर्गत द्वितीय पुरस्कृत। 2019 में बिहार हिन्दी- साहित्य सम्मेलन द्वारा सृजनात्मक साहित्य के लिए “ साहित्य सम्मेलन शताब्दी सम्मान “ से सम्मानित किया गया। 2019 में सृजनलोक प्रकाशन द्वारा गुजराती से हिन्दी में अनुवादित पुस्तक “स्वप्न दुस्वप्न” को “ सृजनलोक अनुवाद सम्मान” से सम्मानित किया गया।

अन्य उपलब्धियाँ - आकाशवाणी (अहमदाबाद-वडोदरा) को वार्ताकार। टी.वी. पर साहित्यिक पुस्तकों क परिचय कराना।

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संपर्क - डॉ. रानू मुखर्जी

17, जे.एम.के. अपार्ट्मेन्ट,

एच. टी. रोड, सुभानपुरा, वडोदरा – 390023.


Email – ranumukharji@yahoo.co.in.

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