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नजराने में - प्रज्ञा शुक्ला

नजराने में

ये जमाना अर्श पर मुद्दतों से
कहता आया है चाहो जो मिलता है
रब से वह नजराने में।

मुज्महित हो गयी थी मैं भी
  मशरूफ थी महफिल खुशगवार बनाने में
तब्दीली थी हजारों ख्वाहिशें मैंने!
बिठाया था तुम्हें रूह-ए-तसव्वुर से।

तबील मुद्दतें कटी इन्तज़ार में तेरे
तुम छोड़ गये यूँ दो पल में
दर्द-ए-मोहब्बत  मिली याद में तेरे
रूसवा किया तुमने इख्तियार से।

रब ने यही दिया बेकरां दिल को
आमीन हुई ना एक भी मन्नत मेरी
चाहा तो मैंने भी था दिल से

ये सिर्फ कहता है जमाना
चाहों जो मिलता है!
मगर ऐसा होता तो नहीं गाफ़िल ।।

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