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डॉ मनोज 'आजिज़' की ग़ज़ल व नज़्म

ग़ज़ल

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डॉ मनोज 'आजिज़'


 
रिश्ते फीके अंदर-बाहर
कोई नहीं है मस्त-कलंदर

ग़ुरूर रहा पढ़ गीता, कुरआन
कर दो कोई जादू- मंतर

चाँद तारे भी देखा कर
कहती हवा कमरे में आकर

ख़ामोशी भी ताक़त है
सीख देते धरती अम्बर

गई ख़ासियत आदम की
दिन-ब-दिन होता बर्बर

बातें करते दूसरों की
ख़ुद पर भी कुछ सोचा कर

(नज़्म)

अपने शहर के नाम

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डॉ मनोज 'आजिज़'

जमशेदपुर

फिर यूँ हुआ
कि निस्फ़ शब को
इख़्तियार किया हवाओं ने।

तूफ़ानों की सूरत
सितारें ढूंढें क़हर बन कर,
और ज़मीनें धंस गईं
सिलसिले-ख़्वाब टूटा।

यकीन की फुहार सूख चुकी थी
सब लटक रहे थे
मौजूदगी और खालीपन के बीच।

तमाम शहर दश्त हुआ
फना हुआ !

आदित्यपुर-२ जमशेदपुर
झारखण्ड

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From :-
Dr. Manoj K Pathak (Dr. Manoj 'Aajiz')
Adityapur, Jamshedpur.

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