नाका - विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, लोकप्रिय ई-पत्रिका. 

विविध विधाओं में से चुनकर पढ़ें -

* कहानी  || * उपन्यास || * हास्य-व्यंग्य  || * कविता  || * आलेख  || * लोककथा  || * लघुकथा  || * ग़ज़ल  || * संस्मरण  || * साहित्य समाचार  || * कला जगत  || * पाक कला  || * हास-परिहास  || * नाटक  || * बाल कथा  || * विज्ञान कथा  ||  * समीक्षा  ||

---***---

यहाँ की विशाल ऑनलाइन लाइब्रेरी में मनपसंद रचनाकार अथवा रचनाएँ खोज कर पढ़ें -

 नाका में प्रकाशनार्थ  रचनाएं इस पते पर ईमेल करें : rachanakar@gmail.com  रचनाकार के वाट्सएप्प नंबर 8989162192 (कृपया कॉल नहीं करें, कॉल रिसीव नहीं होगी, तथा इसका उपयोग केवल प्रकाशनार्थ रचना भेजने के लिए ही करें) पर भी वाट्सएप्प से रचनाएँ अथवा रचना पाठ के वीडियो प्रकाशनार्थ भेजे जा सकते हैं. अधिक जानकारी के लिए यह पृष्ठ [लिंक] देखें.

--

मन की नदिया को गीत सूझा है - आकृति विज्ञा 'अर्पण'

आकृति विज्ञा 'अर्पण'

मन की नदिया को गीत सूझा है


प्रियतम ताल मिलाओ तो
घनघोर प्रतीक्षा यहाँ तुम्हारी
कभी इधर को आओ तो

मन उपवन की मंजरियां
स्वत: मोहती हार बनीं
बिरह भाव की सभी मोतियां
देखो ना! श्रृंगार बनीं
शब्द तुम्हारे कंठ चूमते
अधरों से उनको गाओ तो
घनघोर प्रतीक्षा यहाँ तुम्हारी
कभी इधर को आओ तो

मानो जैसे दिन बहुरे हैं
कोई रात छंटी हो आज
सुबह संदेशा ले आया है
करो मजूरन फिर से काज
सब व्याकुल हैं उसी ध्वनि को
उठकर तूर्य बजाओ तो
घनघोर प्रतीक्षा यहाँ तुम्हारी
कभी इधर को आओ तो

आशाओं की ढेरों किरणें
अभिनंदन को उत्सुक आतुर
स्वत: निराशा ने पथ त्यागा
जब  नयनों को देखा आकुल
नियति के मधुराधर शोभित
बंशी तुम बन जाओ तो
घनघोर प्रतीक्षा यहाँ तुम्हारी
कभी इधर को आओ तो।

#आकृति विज्ञा अर्पण
---

ढलते सूरज के संग होकर


रूप सभी के ढल जाने हैं
जो उगना है वो रूह का है
जो ढलना है वो तन का है
कच्ची मिट्टी से पक्का गागर
फिर पक्के का कभी फूटना
वो हाल सभी का होना है
जो दृग से बहते अंजन का है
जो ढलना है वो तन का है
जुगनी रूह को उगने दो
यह मानवता के गान करेगी
अमर लहरियां इसके स्वर की
ये ही तो उत्थान करेगी
रूप झरेगा रंग झरेंगे
अहंकार के ढंग झरेंगे
मन विराट को तपने दो
इसका तपना कुंदन सा है
जो ढलना है वो तन का है।

    आकृति विज्ञा 'अर्पण

--


अन्हरिया के महला


केतनो पसरि ले
अजोरिया के चिनगी से
जईबे करी.....
जे बोअलस कांटा
दिनो रात लग के
एक दिन भागि काँटा
ते अईबे करी....
जे चोरावत फिरल
चोर मनवा में अपने
एक दिन मन के अदमी
हेरईबे करी....
झूठ पे झूठ बोलला के
आदत हे अईसन
साँच जिभिया पे आके
भुलईबे करी .......
पास रहते समय
जे न समझी सही
काल बीतत बितत
मन दुखईबे करी ...
चार दिन के जिनगिया
जियल प्रेम से जां
बा आईल एहाँ जे
सब ते जईबे करी....
---

0 टिप्पणियाँ

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.