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मिटटी के दीये - लघुकथा - डॉ सुशील शर्मा

''बाबूजी मेरे दीये ले लो "दस बरस के बच्चे की आवाज़ ने सुरेश को चौंका दिया।

सुरेश ने पलट कर देखा बच्चा बड़ी मासूमियत से उसे देख रहा था ,तभी साथ में सुरेश की बेटी निम्मो ने कहा "पापा ये दीये हम नहीं लेंगे ,मुझे कलरफुल दीये चाहिए। ''

सुरेश ने उस  लड़के के चेहरे को देखा उसका चेहरा उदास हो गया।

उसने अपने थैले में से कुछ दीये निकाले और निम्मो को बता कर बोला ''मेरे दीये भी तो सुंदर हैं देखो। ''

''नहीं ये उतने अच्छे नहीं है। '' निम्मो ने बेरुखी से कहा।

''सुंदर तो हैं ये दीये '' सुरेश ने उस लड़के की तरफदारी की।

''अच्छा मैं आपको दस रूपये के बीस दीये दे दूंगा ''उस लड़के के मन में आस जगी।

''नहीं पापा मैं ये दीये नहीं लूँगी ''निम्मो मचल गयी।

''तुम रोओ मत तुम्हारे कलरफुल दीये भी मैं ले दूँगा लेकिन इस बच्चे से भी हमें दीये खरीदना है। ''सुरेश ने निम्मो को समझते हुए कहा।

''लेकिन पापा क्यों ?'' निम्मो ने पूछा।

''क्योंकि बेटा जब हम इससे दीये लेंगे तभी इस बच्चे के घर दीवाली मनेगी। ''सुरेश ने निम्मो को समझाया।

''मिट्टी के दीये हमारी संस्कृति का हिस्सा हैं इनके बगैर दीवाली नहीं मनाई जाती और इन बेचारे गरीबों की रोजी रोटी इन्ही दीयों की बिक्री पर निर्भर है। "सुरेश ने उस बच्चे से दीये खरीदते हुए कहा।

''पापा हम पचास नहीं सौ मिट्टी के दीये खरीदेंगे इसी बच्चे से और अब मैं वो कलरफुल दीये भी नहीं लूँगी । ''निम्मो की चेहरे पर मुस्कराहट थी।
निम्मों ने थैले में से कुछ फटाके निकाल कर उस बच्चे को दिए।

उस बच्चे की आँखों में कृतज्ञता थी।

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