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शुद्धिकरण का नाटक - लघुकथा - ज्ञानदेव मुकेश


  
   एक दुकान के अंदर काउंटर पर कुछ नोट रखे हुए थे। थोड़ी-थोड़ी देर में पुजारी वहां आते, काउंटर पर टीका लगाते और दुकानदार बड़ी उदारता से पुजारी की हथेलियों में एक नोट डाल देता। दिन भर मे न जाने कितनी बार धार्मिक व्यवहार की ये उदार घटनाएं होती रहतीं।


   शहर का वह इलाका बेहद गंदा था। जगह-जगह पर कूड़ों का अंबार लगा रहता था। नगरपालिका महीनों से गहरी नींद में सोई हुई थी। तभी वहां एक स्वैच्छिक संस्था विकसित हुई। उसने गंदी बस्ती को साफ करने और उन्हें स्वच्छ रखने का आश्चर्यजनक बीड़ा उठाया। इस कार्य के लिए उसे कुछ पैसों की जरूरत थी। स्वैच्छिक संस्था के कार्यकर्त्ता चंदा एकत्र करने बाजार में निकल पड़े। संस्था का एक कार्यकर्त्ता एक दिन उस दुकान पर आया। उसने दुकानदार से कहा, ‘‘भाई साहब, हमारी संस्था ने आपकी बस्ती की सफाई का जिम्मा लिया है। आपको सहयोग करना है और प्रतिदिन सिर्फ दो रुपए देना है।’’


यह सुनकर दुकानदार की भौंहें तन गईं। उसने तमतमा कर कहा, ‘‘देखिए भाई साहब, ऐसे फिजुल कार्यों में मेरी कोई रुचि नहीं है। मेरे पास बेकार के पैसे नहीं हैं। आप कोई और डगर देखें। ’’
  तभी उस दुकान पर एक नया पुजारी आया। उसने कमंडल से जल निकालकर काउंटर पर छिड़के और टीका लगाया। दुकानदार ने सफाई और सुगंध का अनुभव किया। उसने प्रसन्न होकर पुजारी के हाथ में पांच रुपए का नोट थमा दिया।


   यह देख बेचारा कार्यकर्त्ता उदास हो गया और चुपचाप चला गया। 

                                                  - ज्ञानदेव मुकेश

                                  पता-
                                               फ्लैट संख्या-301, साई हॉरमनी अपार्टमेन्ट,
                                               अल्पना मार्केट के पास,
                                               न्यू पाटलिपुत्र कॉलोनी, 
                                               पटना-800013 (बिहार)

e-mail address - gyandevam@rediffmail.com

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