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[मारवाड़ का हिंदी नाटक] यह चांडाल चौकड़ी, बड़ी अलाम है। लेखक दिनेश चन्द्र पुरोहित - खंड तीन

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[मारवाड़ का हिंदी नाटक] यह चांडाल चौकड़ी, बड़ी अलाम है। लेखक - दिनेश चन्द्र पुरोहित अरे यार, मत हो नौ दो ग्यारह।   खंड तीन [मंच रौशन होता ह...

[मारवाड़ का हिंदी नाटक]

यह चांडाल चौकड़ी, बड़ी अलाम है।

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लेखक - दिनेश चन्द्र पुरोहित


अरे यार, मत हो नौ दो ग्यारह।

  खंड तीन

[मंच रौशन होता है, अब पाली स्टेशन का मंज़र दिखायी देता है। उतरीय पुल की सीढ़ियों पर राजू साहब, दयाल साहब, ओमजी, रशीद भाई और दीनजी भा’सा बैठे हैं। अब जसवंतपुरा–जोधपुर एक्सप्रेस ज़ोर से सीटी देती हुई, प्लेटफार्म नंबर एक पर आती दिखायी देती है। इस गाड़ी के शयनान डब्बे में बैठे मोहनजी खिड़की से मुंह बाहर निकालकर, सीढ़ियों पर बैठे साथियों को ज़ोर से आवाज़ देते हुए कहते हैं..]

मोहनजी – [ज़ोर से आवाज़ देते हुए] – आ जाओ, आ जाओ..ओ कढ़ी खायोड़ो। डब्बे में, कई सीटें ख़ाली पड़ी है।

[गाड़ी रुक जाती है। मोहनजी अपना बैग उठाये गाड़ी से उतरते हैं, फिर अपने साथियों की ओर जाने के लिए अपने क़दम बढ़ा देते हैं। उधर सीढ़ियों से उतरकर, राजू साहब और दयाल साहब खम्भे के पास आकर खड़े हो जाते हैं। फिर दयाल साहब अपने साथियों को रुकने का इशारा करते हुए, कहते हैं..]

दयाल साहब – किधर जा रहे हो, सांई ? मत जाओ शयनान डब्बे में, आज़ आबू साइड का टी.टी.ई. लगा है। कमबख्त कर देगा, जुर्माना।

राजू साहब – लोकल डब्बे में बैठ जाते हैं, इसमें सबको फ़ायदा है।

दयाल साहब – शत प्रतिशत सही कहा आपने, ना तो वहां टी.टी.ई. का डर, और न वहां मोहन प्यारे आकर करेगा अपुन को बोर। चलिए राजू साहब, सीटें रोक लेते हैं। [साथियों की तरफ़ देखकर कहते हैं] जल्दी आ जाना, हमारे पीछे-पीछे।

[इतना कहकर, वे दोनों जाते हैं। उनके जाने के बाद, गाड़ी रुकते ही मोहनजी गाड़ी से उतरकर वहां आते हैं।]

मोहनजी – [रतनजी से कहते हैं] – ठण्ड लग रही है, रतनजी। हड्डियां चरमरा रही है, अब आ जाओ शयनान डब्बे में।

रशीद भाई – आपको सर्दी लगने का कोई प्रश्न भी पैदा नहीं होता, क्योंकि आप तो मोहनजी सुबह-सुबह ठोक कर आते हैं...संदीणा [ताकत लाने के लिए बनाए गये, घरेलू दवाई के लड्डू]। फिर जनाब कहां लगेगी, आपको सर्दी ?

मोहनजी – हां रे, कढ़ी खायोड़ा। सुबह-सुबह ज़रूर खाकर आया हूं, अब तो रशीद भाई यह सोच रहा हूं...कल से, खाने का टिफ़िन लाना बंद कर दूं। ओ सेवाभावी, मैंने ठीक कहा या नहीं ?

रतनजी – यह ग़लती आप कभी करना, मत। बेटी का बाप, आपको भूख भी बहुत लगती है। और ऊपर से, आप दवाई की गोलियां भी अलग से लेते हैं...!

मोहनजी – बात तो आपने शत प्रतिशत सही कही, इसलिए कुछ न कुछ खाकर ही गोलियां गिटता हूं। [इंजन की सीटी सुनायी देती है] अरे ठोकिरा, इंजन ने सीटी दे दी है..अब चलिए, देर मत कीजिये।

रशीद भाई – आपको शयनान डब्बे में बैठना हो तो, आप जाकर बैठ जाइए। जनाब हम तो बैठेंगे लोकल डब्बे में, वहां दयाल साहब और राजू साहब सीटें रोकने के लिए गए हुए हैं।

मोहनजी – फिर, मैं क्यों पीछे रहूं, मुझे भी दयाल साहब से काम हैं।

[अब सभी जाकर, लोकल डब्बे में आकर बैठ जाते हैं। मोहनजी को देखते ही, राजू साहब और दयाल साहब उठकर दूसरे केबीन में चले जाते हैं। अब मोहनजी खिड़की की तरफ़ निग़ाह डालते हैं, जहां होम गार्ड दफ़्तर के बाबू मोहनजी जाखड़ बैठे हैं। उनकी सीट पर कब्ज़ा करने की नीयत से, वे मोहनजी जाखड़ के पास जाते हैं। फिर, उनसे कहते हैं..]

मोहनजी – जाखड़ साहब कढ़ी खायोड़ा, यहां खिड़की के पास ही क्यों बैठे हैं..? अरे यार, दूर हटिये, मुझे जर्दे की पीक थूकनी है। अगर नहीं थूकी तो, मुझे चक्कर आ जायेगा।

[मोहनजी जाखड़ उठकर गोपसा के पास बैठ जाते हैं, उनके उठते ही मोहनजी झट बैठ जाते हैं उनकी सीट पर। फिर खिड़की को देखते हुए थू-थू करते हुए, थूक के साथ जर्दा उछालते हैं। इधर हवा के तेज़ झोखे से उनके मुंह से उछलता ज़र्दा, आस-पास बैठे उनके साथियों के मुंह का मेक-अप करता जा रहा है। इसके साथ-साथ, बैठने की सीटें भी ख़राब हो जाती है।

मोहनजी – [मुस्कराते हुए, कहते हैं] – अरे कढ़ी खायोड़ा, इस खिड़की से क्या सुनहरी धूप निकल रही है..? अब तो जाखड़ साहब, मैं यहीं बैठूंगा।

[पहलू में बैठे, जलदाय विभाग के मुलाजिम गोपसा को टिल्ला देते हुए कहते हैं..]

मोहनजी – उधर खिसको, गोपसा। मुझे ढंग से, बैठने दो।

[अब बेचारे गोपसा खिसकना चाहे या न खिसकना चाहे..प्रश्न यह नहीं, मगर जर्दे का मेक-अप मुंह पर हो जाने का डर ज़रूर है। वे झट, थोड़ा आगे खिसक जाते है। उनके खिसकने से, मोहनजी को बैठने के लिए काफी जगह मिल जाती है। फिर , क्या ? वे तो खूंटी तानकर, आराम से पसरकर बैठ जाते हैं तख़्त पर।]

मोहनजी – [आराम से बैठते हुए, रशीद भाई से कहते हैं] – रशीद भाई, क्या हाल-चाल है ?

रशीद भाई – मेरे हाल तो ठीक है, अब उठूं तब आप मेरी चाल भी देख लेना। कल बोरियां गिनते और दफ़्तर आने-जाने में, हमारे घुटने घिस गए। अब तो साहब, आपकी दया से चांदी चखनी रही है।

मोहनजी जाखड़ – अजी खां साहब, ऐसा क्या किया है मोहनजी ने..जो बेचारे भोले आदमी को मामूकिमा सुनाते जा रहे हैं, आप ?

रशीद भाई – बात कल की है, जनाब। इन्होने, दावत का निमंत्रण दिया..और हम लोगों को दफ़्तर भेजकर, अकेले खा गए माल-मसाला। जब इनको कुछ खिलाना ही नहीं था, तो क्यों खाना खिलाने की बात कही ?

[दफ़्तर की बात का जिक्र आते ही, जनाब मोहनजी को रिपोर्ट वाली बात याद आ जाती है। के, ‘उन्होंने अभी-तक दयाल साहब के दस्तख़त रिपोर्ट पर नहीं लिये हैं।’ याद आते ही, झट कहते हैं।]

मोहनजी – [रिपोर्ट की बात याद आते ही, कहते हैं] – अरे अच्छा याद दिलाया रे, कढ़ी खायोड़ा। कल जो काम किया, उसकी रिपोर्ट पर दयाल साहब के दस्तख़त लेने बाकी है। अब मैं जा रहा हूं, दयाल साहब के पास।

[मोहनजी उठकर, सीधे चले जाते हैं पड़ोस के केबीन में। यहां बैठे दयाल साहब और राजू साहब के बीच, गुफ़्तगू चल रही है। अब उनकी गुफ़्तगू के बीच फाडी फंसाने, जनाब मोहनजी आकर दयाल साहब के पहलू में बैठ जाते हैं। फिर, कहते हैं..]

मोहनजी – जय बाबा री, सा। दयाल साहब, आप मालिक यहां बैठे हैं ?

दयाल साहब – [बेरुखी से] – क्यों, तूझे क्या तक़लीफ़ ? बोल पहले तू, इधर क्यों आया ? क्या, मुझे परेशान करते तेरा दिल भरा नहीं अभी-तक ?  

मोहनजी – बहुत दर्द है, साहब..इस दिल में। फिर भी यह शखिस्ता दिल [चोट खाया हुआ दिल], बार-बार बार-बार अपमान पाकर चोटे खाता जा रहा है।

दयाल साहब – चोट खाए दिल को लिए, काहे घूम रहा है ? जा, घर पर बैठकर आराम कर।

मोहनजी – अरे जनाब, आप मेरी बात को समझिये। यहाँ तो प्रेम के मारे, मैं बार-बार आपके पास आता हूं, मगर आप दोनों उठकर चले जाते हैं ?

राजू साहब – हमारी मर्ज़ी, हम जहां चाहे चले जायेंगे...आखिर...

दयाल साहब – इसके बाप की रेलगाड़ी नहीं।

मोहनजी - अरे जनाब, आप जानते ही हैं के मैं आपका पीछा छोड़ नहीं सकता, जब-तक मेरा काम आप पूरा नहीं कर देते। आख़िर मैं तो ठहरा ऐसा कंसला, जो बदन के ऊपर फेविकोल की तरह चिपक जाता है..बस उसी तरह चिपका रहूंगा आपसे, काम हुए बिना, मै आपका पीछा छोड़ने वाला नहीं।

[अब मोहनजी उनको चिढाने के लिए, फ़िल्मी गीत “पीछा न छोडूंगा सोनिया..” बेसुरी आवाज़ में गाते हैं। इनका गीत सुनकर, बेचारे दयाल साहब के कान पक जाते हैं। इनके व्यवहार से दुखी होकर, दयाल साहब को अब..फटे बांस की तरह बोलने के लिए, मज़बूर होना पड़ता है।]

दयाल साहब – गधे की तरह, क्यों दांत निकाले चिल्ला रहा है..? देख मोहन प्यारे तेरी इच्छा है जहां बैठ..

राजू साहब – [हंसते हुए] – सही बात है, दयाल साहब। यह आपके बाप की गाड़ी नहीं, मगर..

दयाल साहब – [नाराज़गी से] – मगर हमारी इस मोहन प्यारे के पास बैठने की इच्छा नहीं होगी, तो नहीं बैठेंगे इसके साथ....झट, उठकर चले जायेंगे। [राजू साहब से कहते हैं] अब चलिए राजू साहब, अब यहां नहीं बैठना।

राजू साहब – आप कहते हैं तो, ठीक है जनाब। लीजिये चलिए, दूसरे केबीन में। [बैग उठाते हैं]

मोहनजी – [उनको रोकते हुए, कहते हैं] – रुकिए जनाब, आपको कहीं जाने की ज़रूरत नहीं। पहले मेरी सुन लीजिये, कमेटी बनाकर मैंने माल-गोदाम में काम किया..उस रिपोर्ट पर, दयाल साहब आपके दस्तख़त होने बाकी है।

[इतना कहकर, मोहनजी लम्बी-लम्बी साँसे लेते हैं। फिर सामान्य होने पर, आगे कहते हैं।]

मोहनजी – [बैग से रिपोर्ट निकालकर, सामने रखते हैं] – दयाल साहब, बस आप इस रिपोर्ट पर अपने दस्तख़त कर लीजिये..फिर, मैं स्वत: चला जाऊँगा। आपको कहीं जाने की, ज़रूरत नहीं।

दयाल साहब – [क्रोधित होकर] – कितनी बार समझाऊंगा, तूझे। तू समझेगा नहीं, के मेरी ड्यूटी किसी दूसरी जगह बोलती है। अब नहीं करता दस्तख़त, अब चला जा मोहन प्यारे..न तो हम चले जाते हैं। चलिए, राजू साहब।

राजू साहब – वज़ा फरमाया, आपने। न उठे तो, सर-दर्द नाक़ाबिले बर्दाश्त हो जाएगा।

[दयाल साहब और राजू साहब उठकर, दूसरे केबीन में चले जाते हैं। उनके जाने के बाद सीटें ख़ाली हो जाती है, अब मोहनजी रिपोर्ट को वापस बैग में रख लेते हैं। फिर, आराम से तख़्त पर बैठ जाते हैं। गाड़ी की रफ़्तार बढ़ जाती है। तभी एक एक मंगता डफली लिये इस केबीन में आता है, और वह डफली बजाता हुआ गाता है..]

गाने वला मंगता – [डफली बजाता हुआ गाता है] – हम छोड़ चले इस महफ़िल को…….

[इस नज़्म को सुनते ही, मोहनजी को अतीत की घटना याद आने लगती है। जब वे अपना तबादला करवाकर, खारची डिपो में ड्यूटी जोइन करने आये थे...तब का पूरा वाकया उनकी आंखो के आगे छाने लगता है। मंच की रौशनी लुप्त होती है, थोड़ी देर बाद मंच वापस रौशन होता है। दफ़्तर का मंज़र, सामने दिखायी देता है। खारची डिपो के, पुराने साहब शर्माजी रिटायर हुए हैं। अभी इस वक़्त दफ़्तर के बड़े होल में पुराने वाले साहब की विदाई पार्टी चल रही है, इस पार्टी में आस-पास के सभी एफ़.सी.आई. दफ्तरों के अधिकारी इस मीटिंग में सम्मिलित हुए हैं। चाय-नाश्ते के बाद, यह मिटिंग शुरू होती है। इस बैठक में दफ़्तर के सभी कर्मचारी, ठेकेदार, राशन की दुकान वाले, गांव वाले और आस-पास के एफ़.सी.आई. डिपो के अधिकारी गण वगैरा उपस्थित हैं। इस मिटिंग में, शर्माजी के गुण व कार्य का बखान हो रहा है। अब नए अधिकारी मोहनजी के बोलने की बारी आती है, वे कुछ नया काम करने का मनोबल बनाते हैं। भाषण के स्थान पर वे एक नज़्म पेश करना चाहते हैं, बस फिर क्या ? वे झट लाउड-स्पीकर को थामकर, नज़्म गानी शुरू करते हैं।]

मोहनजी – [नज़्म गाते हुए] – हिजाबे फ़िला-परवर अब उठा लेती तो अच्छा था। तेरे माथे पे ये आँचल ही खूब है लेकिन, तू इस आँचल से इक परचम बना लेती तो अच्छा था। रुदाद-ग़मे उल्फ़त उनसे, हम क्या कहते, क्योंकर कहते, इक तरफ़ ना निकला होंठों से और आँख में आंसू भी आ गये। उस महफ़िले कैफ़-ओ-मस्ती में, उस अंजुमन-ए-इरफ़ानी में..सब जाम बक़फ़ बैठे ही रहे, हम पी भी गए, छलका भी गए।

[अब यह नज़्म उपस्थित लोगों को कुछ समझ में नहीं आती, बेचारे श्रोता गण एक-दूसरे का मुंह देखते जा रहे हैं। अब इस स्थिति को भांपकर, मोहनजी दूसरा गीत गाना शुरू करते हैं।]

मोहनजी – [हाथ ऊंचा करते हुए गाते हैं] – हम छोड़ चले इस महफ़िल को, याद आये तो मत रोना। इस दिल को तसल्ली दे देना, जी घबराये तो मत रोना।

[मंच के पास कई लोग, फूल-मालाएं लिये खड़े हैं। इस गीत को सुनते ही, उन लोगों को आश्चर्य होता है। वे सोचते जा रहे हैं, के ‘यह भाई साहब है, कौन ? और, ऐसा क्यों कह रहे हैं ? छोड़ चले, छोड़ चले..? शायद यह भाई साहब यही कह रहे होंगे, के वे ख़ुद ही सेवानिवृत हुए हैं। कुछ नहीं, अब पास में खड़े इस वाच मेन चम्पले से पूछकर तसल्ली कर लेते हैं।’ इधर यह अलामों का चाचा चम्पला, अभी है मज़ाक करने के मूड में। उन लोगों के पूछने पर, वह कह देता है के ‘यही साहब जाने वाले हैं।’]

एक आदमी – [आश्चर्य करता हुआ प्रश्न करता है] – अरे भाई चम्पला, यह तो बता कौन से साहब जाने वाले हैं ?   

चम्पला – [मज़ाक के मूड में, कहता है] – मुझे तो यह गीत गाने वाले साहब ही जाने वाले साहब लगते हैं, बेटी का बापां। देख भाई, इनके दिल में कितना दर्द भरा हुआ है ? कैसे ग़म भरी आवाज़ में गा रहे हैं, कैसा इमोशन है...?

दूसरा आदमी – सच्च, यही साहब है जाने वाले ?

चम्पला – शत प्रतिशत। मैं तो गीत गाने वाले साहब को ही माला पहना दूंगा, चलिए..चलिए, आप भी पहना दीजिये इन्हें।

[तभी ठेकेदार संपत वहां आता है, वह भी चम्पला का समर्थन कर बैठता है।]

संपत – हां रे, चम्पला। तू सच्च कह रहा है, मैं भी इनको ही माला पहना दूंगा। देख, इस बेचारे का मुंह कैसा उतरा हुआ है ? अरे यार, जाने वाले आदमी का ही मुंह ऐसे ही उतरा हुआ रहता है।

पास खड़े गांव वाले – जी हां, आपका कहना सच्च है। चलिए इनको माला पहना देते हैं, चलो चलो।

[फिर क्या ? सभी मंच पर चढ़कर, बेचारे मोहनजी को मालाओं से ढक देते हैं। इन लोगों का यह स्वांग देखकर, जाने वाले शर्माजी का मूड उखड़ जाता है। इस तरह उनके स्थान पर, मोहनजी को मालाएं पहनाना..? यह बात कभी उन्होंने, सपने में भी नहीं सोची थी। उनके माथे पर पसीने की बूंदे छलकने लगती है, कभी वे रुमाल से पसीने के एक-एक कतरे को साफ़ करने बैठ जाते हैं..और कभी वे, मालाएं पहने मोहनजी को देखते हैं। फिर, क्या ? वे ख़ुद उठकर खड़े हो जाते हैं, शायद कोई उन्हें पहचानकर कोई माई का लाल इनको भी पहना दे..पुष्पों का हार ?]

मोहनजी – [मालाएं गले से निकालकर, टेबल पर रखते हुए कहते हैं] – क्या कर रहे हो, बेटी का बापां ? मैं तो यहां ड्यूटी जोइन करने आया हूं, नया प्रबंधक मैं ही हूं।

[इतना कहकर, उन्होंने शर्माजी के कंधे पर हाथ रखा। फिर वे, आगे कहते हैं..]

मोहनजी - [कंधे पर हाथ रखते हुए, कहते हैं] – अच्छी तरह से देखिये, आप लोग। मेरे बाल पूरे काले हैं, इसलिए अभी मैं जाने वाला नहीं। अभी कई दिनों तक, आपकी छाती पर मूंग दलूंगा रे कढ़ी खायोड़ो।

[इतना कहकर, मोहनजी शर्माजी की कुर्सी खींचकर बैठ जाते हैं। बेचारे शर्माजी करमठोक की तरह अन्दर ही अन्दर पछताते जा रहे हैं, आखिर वे खड़े हुए ही क्यों ? अगर वे खड़े न होते, तो इस लंगूर को कब मौक़ा मिलता उनकी कुर्सी पर कब्ज़ा करने का ? और अब वे, सोचते जा रहे हैं..]

शर्माजी – [सोचते हुए] – ए मेरे रामा पीर। इस खारची दफ़्तर में, मेरा तबादला हुआ ही क्यों ? कार्य भार ग्रहण करने के वक़्त मेरा पोपला मुंह देखकर, यहां के कार्मिकों ने मुझे चपरासी समझ लिया। ऊपर से ये माता के दीने उस वक़्त एक-दूसरे से कह रहे थे, ‘अच्छा हुआ यह चपरासी आ गया, और आया नहीं डिपो मैनेजर।’ अब मरा है यह नालायक मोहनजी, मेरी शान भिष्ठ में मिलाने ? मालाएं पहननी गयी धेड़ में, कमीना बैठ गया मेरी कुर्सी खींचकर ? अब तो खड़े-खड़े, लोगों का मुंह देखना ही मेरे नसीब में रहा ? 

[इस तरह बेचारे शर्माजी खड़े-खड़े लोगों का मुंह ताकने लगे, बेचारे कब तक खड़े रहते..? खड़े-खड़े, उनके पांवों में दर्द होने लगा। उधर जनाबे आली मोहनजी शर्माजी की कुर्सी पर बैठकर, केसरी सिंह नार की तरह दहाड़ रहे हैं]

मोहनजी – [कुर्सी पर बैठकर गरज़ते हुए, कह रहे हैं] - आज़ मैं इस कुर्सी पर बैठ गया हूं, अब सुन लीजिये मेरा प्रशासन बहुत कड़ा है। समझ लें आप, मैं क़ायदा का आदमी हूं। दस बजे दफ़्तर आना, और शाम के पांच बजे ही दफ़्तर छोड़ना।

[तभी दूर से पाली डिपो के मैनेजर राजू साहब आते हुए दिखायी देते हैं, और इधर शर्माजी को मोहनजी की छोड़ी हुई कुर्सी पर बैठने का ख़्याल आता है।]

मोहनजी – आप सभी कर्मचारी सचेत हो जाना, मैं किसी तरह की लापरवाही बर्दाश्त नहीं करता। सुन लिया, कढ़ी खायोड़ो ?                    

[अचानक चम्पले की नज़र, सामने से आ रहे राजू साहब पर गिरती है। वह झट मंच पर चढ़ जाता है, और पहुंच जाता है मोहनजी के द्वारा छोड़ी हुई कुर्सी के पास। इधर शर्माजी उस कुर्सी पर जैसे ही बैठते हैं, मगर इससे पहले उस स्थान से चम्पला उस कुर्सी को हटा लेता है। और मोहनजी के दूसरी ओर बाजू में, उस कुर्सी को रखकर राजू साहब को बैठा देता हैं। बेचारे शर्माजी, को क्या पत्ता ? के, चम्पला ऐसी कारश्तानी कर चुका है। बेचारे अनजाने में नीचे क्या बैठते हैं..? वे तो धड़ाम से, नीचे ज़मीन पर गिर पड़ते हैं। उनको गिरते देखकर, सभी बैठे लोग ज़ोर-ज़ोर से हंसते हैं। उन लोगों का इस तरह खिलखिलाकर हंसना, खोड़ीले-खाम्पे मोहनजी को कैसे अच्छा लगता ? वे जनाब झट, उन सबको डपटना शुरू कर देते हैं।]

मोहनजी – [डांटते हुए कहते हैं] – सुन लीजिये, कान खोलकर। इस तरह छक्के की तरह हंसना और लोगों की मज़ाक उड़ाना मुझे पसंद नहीं, समझ लीजिये आप..मैं तीन रंग की स्याही के तीन कलम रखता हूं, लाल, आसमानी और हरी।

राजू साहब – [हंसते हुए, कहते हैं] – जनाब, अब बता दीजिये इन तीनों कलमों की महिमा।

मोहनजी – आप भी रख लीजिये, राजू साहब काम आयेगी। सुनो, इसमें से लाल स्याही की कलम तो कभी चलनी ही नहीं चाहिये। अगर चल गयी तो फिर, ब्रह्माजी भी यहां आकर आपको बचा नहीं पायेंगे।

[इस तरह ज़ोर की झटकी पिलाकर, मोहनजी अपना भाषण समाप्त करते हैं। अब उनकी आंखो के आगे, अगला मंज़र छाने लगता हैं। अब वे दो दिन तक लगातार तड़के उठ जाते हैं, और जम्मू-तवी में बैठकर समय पर दफ़्तर आते हैं, व शाम को दफ़्तर की छुट्टी होने के बाद बराबर वक़्त पर दफ़्तर छोड़कर गाड़ी पकड़ते हैं। इस तरह मोहनजी, रात के इग्यारह बजे तक जोधपुर आ जाया करते हैं। इसके बाद, मोहनजी के हाथ की बात नहीं। तीसरे दिन ही, लाडी बाई के गुस्से का कोई पार नहीं..वह क्रोधित होकर, कहती है..]

लाडी बाई - [गुस्से में, कहती है] – ऐसे कौनसे बड़े अफ़सर बन गए आप, जो हम सब को आपने परेशान कर डाला ? जोधपुर डिपो में थे तब आप जाते थे, बारह बजे। अब किस बावड़ी का भूत या खबीस लग गया आपको, जो...

मोहनजी – [तुनककर कहते हैं] - आगे बोलो भागवान, चुप मत रहो। सुनाना हो तो तो आज़ ही सुना डालो, इस तरह रोज़-रोज़ की किच-किच से छुटकारा तो मिलेगा।

लाडी बाई – सुन लीजिये, बार-बार मैं कहने वाली नहीं। मेरा भी, सर-दर्द बढ़ जाता है। अब आप कैसे जा रहे हैं, छ: बजे की गाड़ी से ?

मोहनजी – मैं किसी भी गाड़ी से जाऊं, इससे क्या फर्क पड़ता है ? कहीं आपकी अक्ल घास चरने तो नहीं गयी है, जो लगातार बेकार की बकवास करती जा रही हैं...आप ?

लाडी बाई – अक्ल आपकी ठिकाने नहीं है, इतना भी सोच नहीं सकते..के, इतना जल्दी मैं कैसे खाने का टिफ़िन तैयार करूं ? क्या मेरे पास कोई, दूसरा काम नहीं है ? अब अफ़सराई अपने डिपो में दिखाया करो, मेरे ऊपर क्यों ?

मोहनजी – [सर पकड़कर कहते हैं] - करूं क्या, आख़िर ? अब आप ख़ुद ही बता दो, करना क्या ?    

लाडी बाई – बात यह है, बच्चे हो गए हैं बीमार। इधर इस कमबख्त चिकुनगुनियां बुखार ने तो तोड़ डाले, मेरे घुटने। मगर, आपको क्या ? यदि अप खारची में कमरा लेकर रह जाते, तो मुझे मिलता आराम।

[लाडी बाई की ऐसी कड़वी बातें सुनकर, मोहनजी को बहुत गुस्सा आता है। वैसे उनका सिद्धांत है, के गुस्सा करना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। अत: गुस्सा नहीं करना चाहिए..बाईचांस अगर गुस्सा आ भी जाय तो तो दिमाग़ को दूसरी तरफ़ लगाना अच्छा है। इस तरह, माइंड-डाइवर्ट करने के लिए पेसी खोलते हैं। फिर पेसी से जर्दा और चूना बाहर निकालकर उस मिश्रण को हथेली पर रखकर अंगूठे से अच्छी तरह से मसलते हैं। फिर क्या ? सुर्ती तैयार होते ही, वे दूसरे हाथ से थप्पी लगते हैं। थप्पी लगते ही, खंक उड़ती है, जो उनकी घरवाली लाडी बाई के नासाछिद्रों में चली जाती है। अब बेचारी लाडी बाई की बुरी हालत का पूछो मत, वह लगा देती है, छींकों की झड़ी। फिर बेचारी अपने पल्लू से नाक साफ़ करती है, नाक साफ़ करके वह कड़े लफ़्ज़ों में मोहनजी से कहती है..]

लाडी बाई – [गुस्से में] – ऐसे पशुवत इंसानों के पास बैठना, ख़ुद का खून जलाना है। यह ज़र्दा है, या रोटियों का ढेर ? खाने को आपको यही मिला, गीगले के बापू ?  

मोहनजी - [हाथ जोड़कर, कहते हैं] – भागवान, आख़िर, आप चाहती क्या हैं ?

लाडी बाई – भले आदमी, आपको औरत को खुश करना भी नहीं आता ? अगर नहीं आता है बन जाइए, उस चूकली के पति जैसे..तो भी, मैं समझ लूंगी के...!

मोहनजी – [लबों पर मुस्कान लाकर] – आ जाइए, कमरे के अन्दर..आपको पूरी फिल्म दिखला दूंगा। फिर दे दूंगा मैं, मेरी मोहब्बत का सबूत। झट आ जाओ, इस वक़्त बदमाश गीगला भी घर पर नहीं।

लाडी बाई – [गुस्से में उठकर, कहती है] – अब रहने दीजिये, अक्ल नाम की कोई चीज़ आपके खोपड़े में नहीं। ढेरे के ढेरे बने रहोगे, करमठोक इंसान हो..अच्छी बातें आपको करनी आती नहीं, के ‘कहीं लिजावूं सैर कराने, आज़ लाया हूं पाली से गुलाब हलुआ..

मोहनजी – [हाथ नचाते हुए, कहते हैं] – गालों के अन्दर घोड़े दौड़ रहे हैं, खोपड़ी के अन्दर अक्ल नाम की कोई चीज़ नहीं। टिफ़िन तैयार करते आती है मौत, ऊपर से बिचारी बोलती है मुंह खोलकर...लाओ, पाली से गुलाब हलुआ..?     

[मंच पर अंधेरा छा जाता है, थोड़ी देर बाद मंच वापस रौशन होता है। गाड़ी के लोकल डब्बे का मंज़र सामने आता है। मोहनजी नींद में, हाथ नचाते-नचाते बड़बड़ाते जा रहे हैं। उनके इस तरह हाथ नचाने से इनके ऊपर, खूंटी पर लटक रहा रशीद भाई का पांच किलो का बैग..धब्बीड़ करता, सीधा उनके सर पर आकर गिरता है। दर्द के मारे बेचारे मोहनजी चिल्लाते हैं, और फिर चेतन होकर सामने देखते हैं। सामने बैठे उनके साथी रतनजी, रशीद भाई और ओमजी खिल-खिलाकर हंसते जा रहे हैं। ये तीनों महानुभव, इस केबीन में दयाल साहब और राजू साहब को न पाकर झट अपने साथी मोहनजी के पास बैठने आ गए। उस वक़्त, जनाबे आली मोहनजी झपकी ले रहे थे। इनके पीछे-पीछे न्याय विभाग के मुलाजिम पंकजजी, आनंदजी, और आर.एफ़.सी.आई. के शर्माजी भी चले आये हैं। अब ये सभी, उनके आस-पास व सामने की सीटों पर बैठे दिखायी देते हैं। यह सत्य है, इन साथियों को मोहनजी के बिना मन लगता नहीं। अब इस वक़्त उनको बड़बड़ाते देखकर, वे खिल खिलाकर हंसते जा रहे हैं। उन सबको इस तरह हंसते देखकर, मोहनजी जल-भुन जाते हैं। इनके चेहरे की बदलती रंगत को देखते हुए, रशीद भाई उनसे कहते हैं...]

रशीद भाई – [लबों पर मुस्कान लाकर] – ऐसा कौन है भाग्यशाली, जो आपसे मांग रहा है पाली का गुलाब हलुआ ? उसके लाओ तब, आप मेरे लिए भी ला देना..पैसे तनख्वाह मिलने पर, आपको चुका दूंगा।

[रशीद भाई की बात सुनते ही, रतनजी चुप-चाप बैठने वाले नहीं...झट अनचाही बात कह देते हैं।]

रतनजी – [लबों पर मुस्कान लाते हुए कहते हैं] – रशीद भाई, एक बार सुन लीजिये। इनको पैसे देने का सवाल भी पैदा नहीं होता, आपको याद है ? मोहनजी की पदोन्नति हुई, मगर अभी तक इन्होने मिठाई नहीं खिलायी है।

रशीद भाई – तब ठीक है, यह गुलाब हलुआ इनकी पदोन्नति की मिठाई मानकर खा लेंगे। फिर, और क्या ?

रतनजी – अरे यार रशीद भाई, मंगवाओ तो सही।

मोहनजी – गालों के अन्दर घोड़े दौड़ाने से काम नहीं चलता, रतनजी। समय पर दफ़्तर पहुंचना, कोई हंसी-खेल नहीं। भागवान कभी टिफ़िन तैयार करती है, और कभी करती ही नहीं, मैं तो..

रशीद भाई – साहब आपके दिल में बहुत दर्द भरा है, इस दर्द को बाहर निकाल लीजिये। कहने से, दर्द हल्का हो जाता है।

मोहनजी – ऊपर से भागवान कटु शब्द कहकर, मेरे दिल को छलनी कर देती है। अब तो मैं इस दफ़्तर को लाप्पा देवूं, और बन जाऊं मसानिया बाबा। मैं तो इस औरत के कारण, चारों तरफ़ से परेशान हो गया।

रशीद भाई – आख़िर, भाभीसा ने ऐसा क्या कह दिया आपको ? ऐसा नहीं लगता, वे आपको कुछ कहें ? आपने, कुछ कहा होगा भाभीसा को ?

मोहनजी – भागवान ने ऐसे कहा, ‘मैं सुबह नौ बजे के पहले, आपका टिफ़िन तैयार नहीं करूंगी। आप खारची में कमरा किराये पर लेकर वहीँ रह जाओ, तभी मुझे मिलेगा आराम।’

रतनजी – [मोहनजी से कहते हैं] - यही कारण है, भूख से परेशान होकर आप लोगों से चाय मांगकर पी लिया करते हैं।

मोहनजी - अब आप कहिये, कैसे गुलाब हलुआ लाकर आपको खिलाऊं ? मेरे पास जेब में ख़ाली, टेम्पो या सिटी बस का किराया ही रहता है।

ओमजी – साहब, आप बड़े-बुजुर्गों की यह बात याद रखें के ‘संतोषी सदा सुखी। जो मिले, उसे प्रेम से बांटकर खाओ।’

[मगर मोहनजी जैसे समझदार इंसान को, ओमजी की सलाह कैसे पसंद आ सकती है ? मोहनजी ठहरे एम.ए.एल.एल.बी. पास, एक दानिशमंद इंसान। फिर, क्या ? वे तो झट, अपने दांत निपोरते हुए कहते हैं..]

मोहनजी – तृप्त इंसानों को ही आपकी बातें अच्छी लग सकती है, यहां तो दो रोटी भी धीरज रखकर मैं खा नहीं सकता। [रशीद भाई को झंझोड़कर, कहते हैं] बोलो ना, रशीद भाई कढ़ी खायोड़ा।

रशीद भाई – [भोला मुंह बनाकर कहते हैं] – धैर्य रखकर, आपको खाना खाना आता नहीं। खाओ तब आपकी पूरी मूंछें खाती है कढ़ी की सब्जी। पत्ता-गोभी की सब्जी खाता है, आपका मफलर। रोटी का आधा निवाला जाता है आपके मुंह में, और आधा जाता है..

[मोहनजी इनकी बात सुनकर, नाराज़ हो जाते हैं। वे अब, नाराज़गी ज़ाहिर करते हुए कहते हैं..]

मोहनजी – [नाराज़गी ज़ाहिर करते हुए, कहते हैं] – मैं बेचारा ग़रीब इंसान यह समझता था, के रशीद भाई मेरे हितेषी हैं। मगर ये जनाब तो ऐसे बोल रहे हैं, मानो मैं मोहन प्यारे नहीं अघोरमल हूं।

रतनजी – गुस्सा करने की, क्या ज़रूरत ? आप जानते नहीं, हमारे रशीद भाई दब्बीर यानि पक्के मुंशीजी ठहरे। ऐसी-ऐसी तरकीबें अपने पास रखते हैं, जिससे आपकी सारी तकलीफ़ें दूर हो सकती हैं।

ओमजी – मगर एक बात यह है, सलाह देने के पहले मूड बनाने के ख़ातिर एक दौर चाय का..आपकी तरफ़ से हो जाय, तो सोने में सुहागा।

रतनजी – ऐसा हो जाय, तो क्या बढ़िया रहे जनाब ?

मोहनजी – मैं तो यह समझता था, रतनजी। इस मूर्खों की मंडली में आप ही एकमात्र समझदार इंसान हैं, मगर आप तो कढ़ी खायोड़ा इन मूर्खों के साथ मिल गये ?

रशीद भाई – क्या करें, साहब ? इनके वश की बात नहीं, मूर्खों के साथ रहते-रहते ये भी आप जैसे बन गये हैं। मगर, ये सज्जन पुरुष आपके हितेषी ज़रूर है। वैसे हम सभी आपके हितेषी हैं, मगर..

[इतनी देर तक बेचारे शर्माजी को बोलने का अवसर मिला नहीं, पहले वे कुछ बोलना भी चाहते थे। अब बिना कोई टोपिक आये, वे मैं लाडे की भुवाबनकर झट बीच में टपक पड़ते हुए कह बैठते हैं..]

शर्माजी – [तुली सिलगाते जैसे, बोलते हैं] – रशीद भाई ने कोई ग़लत बात नहीं कही, मगर करें क्या ? मिठाई के नज़दीक मक्खियाँ मंडराती है, और आपको खाना खाते देखकर मंगतियाँ आपके नज़दीक आ जाती है।

रतनजी – वाह भाई, वाह। वह कैसा मंज़र दिखाई देता होगा.? मोहनजी बन जाते होंगे कान्हा, और इनके चारों ओर मंडराती ये मंगतियां बन जाती होगी गोपियां...

पंकजजी – वाह रे, वाह कान्हा.....!

रशीद भाई – [अचानक याद आने का अंदाज़ दिखाते हुए, कहते हैं] – अरे साहब, अब याद आया। वह भिखारन खां साहबणी जब आती है, आपके पास..वह मांगती है एक रोटी, और आप कहते हैं आधी रोटी दूंगा। मगर वह ज़िद्द पर उतर जाती है, के पूरी रोटी लूंगी।

रतनजी - अरे साहब, ऐसे अच्छे गुण है आपमें, तब आपको भाभीसा कैसे समझ सकती है ? राम राम, अब कैसे भाभीसा आपको बता पायेगी, के ‘वे आपसे क्या चाहती हैं ?’

रशीद भाई - तब आपको, कैसे सलाह दी जा सकती है ? इसमें, हम लोग क्या कर सकते हैं ? बात सही है, आप ठहरे..दानिशमंद इंसान। आपके जितना पढ़ा-लिखा इंसान, हमारे डिपो में है कहां ?

मोहनजी – [मुंह बनाकर कहते हैं] – अब रहने दीजिये, रशीद भाई। मैंने आपसे चाहा, तकलीफ़ दूर करने का उपाय। मगर जनाब आप ऐसी बातें करते जा रहे हैं, मानो मैं मोहनजी नहीं होकर फूस [कचरा] निकालने वाला फूसाराम कढ़ी खायोड़ा हूं ?

रशीद भाई – [चिढ़ते हुए, कहते हैं] - जी हां, हम सब मूर्ख ही हैं। मुझे बस आप अकेले ही समझदार इंसान लगते हैं, फिर आप हम जैसे मूर्खों से सलाह क्यों ले रहे हैं ? ऐसा लगता है..

शर्माजी – [वाक्य पूरा करते हुए] – ‘हमें किसी पागल कुत्ते ने काटा है..? या, आ बैल मुझे मार..बस ऐसे ही, कर्म है हमारे।’ रशीद भाई, क्या आप यही कहना चाहते हैं ?

[मगर रशीद भाई शर्माजी से कुछ नहीं कहते, और मुंह फुलाये चुप-चाप बैठ जाते हैं। तब मोहनजी अपने लबों पर, मुस्कान लाकर कहते हैं।]

मोहनजी – [लबों पर मुस्कान लाकर] – अरे यार, रशीद भाई। ऐसे काहे नाराज़ होते हैं आप, यार ? आपको मैंने, ऐसा मूर्ख नहीं कहा है। आप तो जनाब एक पढ़े-लिखे मुलाजिम हैं, कभी-कभी...

शर्माजी – [मुस्कराते हुए] – मूर्ख आदमी भी समझदारी की बात करता है। अब माफ़ कीजिये, कढ़ी खायोड़ा।यही कहना चाहते हो, मोहनजी आप ?

रतनजी – हमारे मुंशीजी तो रहम की दरिया है, ये जनाब तो माहत्मा गांधी के पक्के चेले हैं।

ओमजी – साहब, आप कुछ नहीं जानते इनको ? इनके एक गाल पर मारो तमाचा, तब ये अपना दूसरा गाल सामने लाते हैं।

रतनजी – जेब के पैसे ख़र्च करके इन्होने हम दोनों को, दस बार फिल्म ‘लगे रहो मुन्ना भाई’ दिखायी है। अब समझे साहब, ये कितने बड़े महापुरुष है ?

ओमजी – [व्यंग-बाण छोड़ते हर, कहते हैं] - शत प्रतिशत, आपकी बात सच्च है। कौन जानता है, आज़ राजा और कल रंक..? इनको, कोई समझ नहीं सकता। अनजाने में लोगों के पास, ऐसी क्या शक्तियां आ जाती है..

रतनजी – [बात पूरी करते हुए] – और वे अपना रुतबा, दिखाना चालू कर देते हैं। झट अपने अधीनस्थ मुलाजिमों की सी.आर. ख़राब कर देते हैं।

ओमजी – फिर ऐसे साहब लोग, बाद में हेड ऑफ़िस के चक्कर काटते रहते हैं। फिर मानसिक तनाव से गुज़रते हुए, हाफ़-मांइड जैसी बातें करते रहते हैं। [सीटी सुनायी देती है] अरे छोड़ो यार, इंजन सीटी दे चुका है...

रतनजी – लूणी स्टेशन पर चाय पीनी हो तो, निकालो अपनी जेब से रुपये। आख़िर, तेल तो तिलों से ही निकलता है। [रशीद भाई से कहते हैं] रशीद भाई, आप निकाल रहे हो या मैं निकालूं रुपये ?

[रशीद भाई को जेब से रुपये निकालते देखकर, रतनजी उन्हें रोकते हुए कहते हैं।]

रतनजी – अरे रुको, रशीद भाई। चाय पिलाने से पहले मोहनजी से ज़बान ले लीजिये, के चाय पीने के बाद ऐसे नहीं कहेंगे के ‘ठोकिरा, बासी चाय पाय दी रे कढ़ी खायोड़ा ?’

मोहनजी – मैं काळी रांड का जाया नहीं हूं, जो खाकर बिगाड़ा करूं ? अगर थूक कर भाग गया तो आप लोग मुझे कह देना, के गली का काबरिया कुत्ता दौड़ रहा है। इसके अलावा, आप क्या कहेंगे ?

[मोहनजी तो अन्दर ही अन्दर खुश हो रहे हैं, के “मुफ़्त की चाय मिल रही है..पीने को।” जनाब, फिर ख़िदमत करने के लिए पीछे रहने वाले नहीं। वे आगे बढ़कर, कहते हैं..]

मोहनजी – लाइए रुपये, अभी दौड़कर आप सब के लिए गर्म-गर्म मसाले वाली चाय लाता हूं।

[रशीद भाई अपनी जेब से रुपये निकालकर, मोहनजी को थमा देते हैं।]

मोहनजी – [होंठों में ही] – यह डोफा रशीद क्या समझता होगा, इस ओटाल मोहन प्यारे को ? केन्टीन वाले देते हैं, दो रुपयों में एक चाय। और ठेले वाले देते हैं, तीन रुपये में एक। अब लाऊंगा चाय मैं केन्टीन से, मगर बताऊंगा इन्हें..ठेले से, चाय आयी है। इस तरह सीटी बस का किराया, मुफ़्त में निकल जाएगा।

[गाड़ी की रफ़्तार धीमी हो जाती है, थोड़ी देर बाद लूणी के प्लेटफार्म पर आकर रुक जाती है। अब वहां कई चाय बेचने वाले छोरे ग्राहकों को बुलाने के लिए आवाजें लगाते जा रहे हैं ‘चायेSS चाये, ऊनी ऊनी मसाले वाली चाय।’ कभी बीच में पुड़ी वाले वेंडर शर्माजी की रोनी आवाज़ अलग से सुनायी देती है ‘ईइं ईइं..पुड़ी ले लो, दस रुपये में। ई इं ई इं मुफ़्त में सब्जी दाणा मेथी की, पुड़ी खायके..!’ ये पुड़ी वाले वेंडर शर्माजी, न्याय विभाग के मुलाजिम आनंदजी के सगे बड़े भाई है। ज़्यादा बिक्री करवाने के इरादे से, अभी शर्माजी के दिल में मची है उतावली। ठेले को तेज़ी से आगे बढ़ाते हुए, रसगुल्ले वाले घेवरसा के ठेले को टक्कर लगा देते हैं। अचानक आये इस टिल्ले को घेवरसा संभाल नहीं पाते हैं, और पास खड़े यात्री को थमाए जा रहे रसगुल्ले उनके हाथ से छिटक कर ज़मीन पर गिर जाते हैं। ज़मीन पर बैठे काबरिये कुत्ते को, ऐसा बढ़िया मौक़ा कब मिल पाता ? वह तो झट उन रसगुल्लों को अपने जबड़ो में दबाकर दौड़ता है, मगर घेवरसा के लिए, रसगुल्लों का नुकसान नाक़ाबिले बर्दाश्त ठहरा। इस तरह उनको आ जाता है, क्रोध। फिर क्या ? घेवरसा झट पांव की जूत्ती निकालकर, उस दौड़ते कुत्ते पर फेंकते हैं। जूत्ती लगते ही, वो कुत्ता दर्द के मारे किलियाता है। इस कुत्ते को शर्माजी रोज़ बची हुई पुड़ियाँ खिलाया करते हैं, इस वक़्त उस कुत्ते का किलियाना सुनकर उनको बुरा लगता है। वे क्रोधित होकर बेचारे घेवरसा के ऊपर बरस पड़ते हैं।]

शर्माजी – [गुस्से में] – ए मक्खीचूष, इतना कमाकर कहां ले जाएगा रे ? अब यह बता, तूने मेरे कुत्ते को मारी कैसे ? आख़िर, तू है कौन ? साला तू तो है, झूठ का मगरमच्छ।

घेवरसा – ऐसा क्यों कह रहे हैं, शर्माजी ? मैंने, आपका क्या बिगाड़ा ?

शर्माजी – [घेवरसा की बात न सुनते हुए, कह देते हैं] – आख़िर तू है, कौन ? डब्बे के अन्दर ख़ाली रस डालकर, वजन बढ़ा देता है रसगुल्ले का। यही कारण है, ग्राहक अख़बार पर रखे हुए रसगुल्लों को ही ख़रीदना चाहते हैं, मगर तू...

घेवरसा – शर्माजी, आप जो कुछ कहना चाहते हैं वह साफ़-साफ़ कहें..मुझे कुछ भी, समझ में नहीं आ रहा है ? जल्दी कहिये, ग्राहक आ रहे हैं।

[घेवरसा के रसगुल्लों की अधिक बिक्री होने से, ये खोड़ीले-खाम्पे शर्माजी अब बन गए हैं...बलोकड़े [ईर्ष्यालु]। इस कारण शर्माजी कोई मौक़ा नहीं छोड़ते, ताना देने का। अब यही कारण है, अभी वे जलन के मारे आग-बबूला होकर कहते जा रहे हैं।]

शर्माजी – तेरे रसगुल्लों का वजन कराया जाय, तो रसगुल्लों का भार कम निकलेगा और रस का ज़्यादा। यही बात अब स्टेशन मास्टर साहब को बतानी होगी, तब तेरी अक्ल ठिकाने आयेगी।

[इतनी जली-कटी बातें सुनने के बाद भी घेवरसा शांत रहते हैं, कुछ बोलते नहीं। बोलते भी, कैसे..? वे तो बेचारे पहले से ही शर्माजी के अहसान तले दबे हुए हैं, जिस टोकन नंबर से रसगुल्लों की बिक्री करके ये जनाब पैसे कमा रहे हैं...वो टोकन नंबर, लूणी के बदरीजी मास्टर साहब के नाम से आवंटित है। यह तो शर्माजी की रहम-दिली है, उन्होंने मास्टर साहब से बात करके....इनको इस प्लेटफार्म पर, रसगुल्ले बेचने का ठेका दिलाया है। बस इसी अहसान तले दबकर, घेवरसा इन जनाबे आली शर्माजी को कोई तू-तड़ाक का जवाब नहीं दिया करते। इस कारण लिहाज़ बरतते हुए, इस वक़्त भी बेचारे घेवरसा कुछ नहीं बोलते। उनके नहीं बोलने पर, आख़िर शर्माजी कब तक ज़बान लड़ाते ? आख़िर, थककर वे भी शांत हो जाते हैं। मगर शर्माजी की दी हुई धमकी ज़रूर काम कर जाती है, उनको अब वहम हो जाता है, ‘कहीं ईर्ष्यालु शर्माजी, स्टेशन मास्टर साहब से शिकायत नहीं कर दे..?’ अब वे आले-कट सभी ग्राहकों को, अख़बार पर रसगुल्ले रखकर बेचते नज़र आ रहे हैं। उधर डब्बे का हेंडल पकड़कर आनन्दजी उतरते वक़्त ध्यान नहीं रख पाते, के उनके पांव तले कौनसा जीव कुचला जा रहा है ? उतरते वक़्त वे अपना पांव, शर्माजी के प्यारे काबरिये कुत्ते के ऊपर रख देते हैं। यह काबरिया कुत्ता पायदान के नीचे बैठा-बैठा अरोग रहा था, रसगुल्ले और शर्माजी की डाली हुई बासी-फफूंद लगी पुड़िया। बेचारा कुचले जाने से किलियाता है, उसके किलियाने की आवाज़ सुनकर शर्माजी गुस्से में बक-बक करने का भोंपू वापस चालू कर देते हैं।]

शर्माजी – [गुस्से में] – कौन है रे, पापी ? मेरे कुत्ते को मारी, पुड़ी खाते हुए ?

[अब आनंदजी शर्माजी के बिल्कुल समीप आकर, उनके कंधे पर अपना हाथ रखकर कहते हैं..]

आनन्दजी – [समीप आकर, मुस्कराते हुए कहते हैं] – पापी मैं हूं, आनंद..आपका, छोटा भाई। सुनो, मोटा पापी है मेरा बड़ा भाई...जो बासी और फफूंद लगी पुड़ियों को, कुत्तों को खिलाकर उन्हें बे-मौत मार रहा है।

शर्माजी – [झींकते हुए, कहते हैं] – परे हट, आनंदिया। भेजा मत खा, अभी धंधे का वक़्त है रे। तू तो एक काम किया कर, तेरे एम.एस.टी. वाले साथियों के पास, मेरी शिफ़ाअत लगाकर मेरी बिक्री बढ़ाया कर। उनको कहना, दाणा-मेथी का अचार फ्री में...

[मगर उनकी बातें, आनन्दजी को क्यों पसंद आये..? वे तो झट, वहां से ख़िसक जाते हैं। अब शर्माजी ठेले को आगे बढ़ाते-बढ़ाते, ग्राहकों को आवाजें देते जा रहे हैं।]

शर्माजी – [रोनी आवाज़ में] – इंई इंई पुड़ी दस रुपये, दाणा-मेथी का अचार फ्री..ले लो भाई ले लो, पुड़ी खाईके।

[मोहनजी डब्बे के दरवाज़े के पास आकर, केन्टीन वाले को आवाज़ देते हैं।]

मोहनजी – [ज़ोर से आवाज़ देते हुए, कहते हैं] – ओ केन्टीन वाले भाई, हम एफ़.सी.आई. के कर्मचारी हैं, चार चाय भेजना जी।

[ग्राहकों से घिरा हुआ केन्टीन वाला, उनके आदेश को क्यों सुने ? आख़िर मोहनजी के बार-बार पुकारने पर, वो केन्टीन वाला भड़ककर ज़ोर से कह देता है..]

केन्टीन वाला – [ज़ोर से कहता है] – ओ मूंछों वाले भाई, आकर ले लो। चाय पहुंचाने के पैसे, हमें मिलते नहीं है। आ जाओ, भय्या आ जाओ।

[मोहनजी डब्बे से नीचे उतरते हैं, और केन्टीन वाले से एक कप चाय पोलीथीन ग्लास में भरवा लेते हैं। तभी इंजन सीटी दे देता है, अब अगले तीन कप चाय लेने का वक़्त कहां रहता है ? झट दो रुपये केन्टीन वाले को थमाकर, वह चाय से भरी पोलीथीन ग्लास उठाकर डब्बे की तरफ़ अपने क़दम बढ़ा देते हैं। चलते-चलते चाय छलकने लगती है, और थोड़ी चाय छलककर उनके सफ़ारी बुशर्ट पर गिर पड़ती है। मगर, उन्हें कहां इसकी परवाह ? वे तो झट पायदान चढ़कर डब्बे के अन्दर दाख़िल हो जाते हैं, अब वे अपनी सीट पर बैठकर सुड़क-सुड़क की आवाज़ निकालते हुए गर्म चाय अघोरी की तरह पीते हुए दिखाई देते हैं। बेचारे मोहनजी को क्या मालुम, उतावली के कारण चाय उनके सफ़ारी बुशर्ट पर गिकर उसे काफ़ी गंदा कर चुकी है ? इधर गाड़ी की रफ़्तार बढ़ जाती है, अब मोहनजी अपने साथियों को ताने मारते हुए कहते जा रहे हैं..]

मोहनजी – आप लोगों ने, तंग कर डाला मुझे। चाय मंगवावो तो ऐसी जगह...जहां चाय लाने का, पूरा वक़्त नहीं मिलता। मेरे सारे वस्त्र ख़राब हो गए, चाय लाने के चक्कर में। दौड़ता-दौड़ता, चाय लाया जी। [इधर इस डब्बे में लूणी प्लेटफार्म से चढ़े भोमजी लाइन मेन, ने यह सोचा के ‘साहब लोगों के केबीन में खिड़की के नीचे, आँगन पर बैठ जाते है। बैठ जाने के बाद, उन लोगों के श्रीमुख से निकली हुई कई काम की बातें मेरे कान में गिरेगी..तो जनाब, फ़ायदा मुझको ही होगा।’ भोमजी ऐसा सोचकर, उनके केबीन में आकर खिड़की के नीचे बैठ जाते हैं। इधर बेचारे भोमजी नीचे बैठते हैं, और उधर जनाबे आली मोहनजी चाय पीकर गुड़-मुड़ की हुई ख़ाली पोलीथीन ग्लास खिड़की की तरफ़ फेंकते हैं, ताकि वह ग्लास खिड़की के बाहर चली जाय। मगर क़िस्मत का साथ उन्हें कैसे मिले..? आख़िर जनाब ठहरे, करम-ठोक। फिर क्या ? फेंकी गयी ग्लास का खिड़की से बाहर जाना तो दूर, वो तो सेबरजेट की तरह उड़ती हुई भोमजी के थोबड़े से टकरा जाती है। अब तो बेचारे भोमजी, अपना मुंह साफ़ कर लेते हैं। इसे बड़े अफ़सरों का आशिर्वाद समझकर, वे उस जूठी पोलीथीन ग्लास को उठाकर खिड़की से बाहर फेंक देते हैं। अब मोहनजी चाय पीने के बाद, अपने चाय से भींगे होंठों को साफ़ करके कहते हैं..]

मोहनजी – [होंठ साफ़ करते हुए, कहते हैं] – क्या देख रहे हो, कढ़ी खायोड़ो ? यों मत देखो, मुझे आँखे फाड़कर। मेरे साथियों, थोड़ा धीरज रखो। आप यह सोचिये, मैं कैसे लाता, आपके लिए यह बांसी चाय ? अगर, आप बीमार हो जाते तो..

[रशीद भाई, ओमजी और रतनजी उनका चेहरा देखते रह जाते हैं, अब उनका चुप बैठे रहना ही वाज़िब है। इधर मोहनजी के चुप रहने का, सवाल ही नहीं ? वे जनाब तो, बोलते ही जा रहे हैं..ख़ुदा जाने, बोलने के भोंपू पर ब्रेक क्यों नहीं लगा पा रहे हैं ?]

मोहनजी – अरे जनाब, मैं तो ठहरा ‘चखने वाला।’ पहले मैं चखता हूं, फिर आप लोगों को देता हूं। ताकि बीमार पड़ना होगा तो मैं पडूंगा, आप नहीं। आप फ़िक्र न करें, मैं ज़रूर आपको बढ़िया चाय कहीं मिली, तो ज़रूर पा दूंगा।

[मगर, अब ओमजी से बिना बोले रहा नहीं जाता..आख़िर वे मुंह-तोड़ जवाब देते हैं, जैसे वे पत्थर बरसाते आ रहे हैं..?]

ओमजी – ख़ुद पीते गये, और अब आप न पीने का उपदेश हमें देते जा रहे हैं..? वाह, भाई वाह। ख़ुद गुरूजी बैंगन खाते हैं, और चेलों को उपदेश देते हैं नहीं खाने का। वाह पंडितजी, वाह।

[ओमजी की कही बात का असर तो हुआ नहीं, मगर इधर रशीद भाई अलग से मुंह चढ़ाकर बैठ जाते हैं ? रतनजी से उनका इस तरह बैठना, देखा नहीं जा रहा है ? वे उन्हें समझाते हुए, कहते हैं..]

रतनजी – रशीद भाई, गुस्सा थूक दीजिये। आप तो समझदार आदमी हैं, दे दीजिये कोई सलाह मोहनजी को...इन्होने वादा कर लिया है, चाय पिलाने का।

[इधर अजिया बूट-पोलिस का सामान लेकर केबीन में दाख़िल होता है, अभी इस वक़्त इसके कंधे पर ट्रांजिस्टर लटका हुआ है...जिसमें फ़िल्मी गीत ‘याद करेगी दुनिया, ये तेरा अफ़साना..’ आ रहा है। बेवक्त ऐसे गीत के सुर, रशीद भाई के कानों में गिरते हैं। उन्हें ऐसा लगता है ‘जैसे किसी ने उनके कान में, गर्म कड़वा तेल उंडेल दिया है ?’ क्योंकि ये जनाबे आली रशीद भाई, अब-तक मोहनजी के ऐसे स्वार्थ से भरपूर व्यवहार को देखकर पहले से परेशान हैं..और ऊपर से यह खोजबलिया अजिया, समय के प्रतिकूल गीत बजाता हुआ यहां ट्रांजिस्टर लेकर आ गया ? फिर, क्या ? रशीद भाई, अपने गुस्से को क़ाबू नहीं कर पाते..झट अजिया का हाथ पकड़ते हैं, और उसे खींचकर डब्बे के दरवाज़े तक ले आते हैं..और बाद में, उस बेचारे को कड़वे शब्द सूना बैठते हैं।...]

रशीद भाई – [क्रोधित होकर, कहते हैं] – आ गया माता का दीना, यहां ट्रांजिस्टर लेकर ? नासपीटे चला जा, यहां से। वापस आया तो कमबख्त, तेरी टाँगे...

[इतना कहने के बाद, रशीद भाई चुप-चाप आकर अपनी सीट पर बैठ जाते हैं..मुंह फुलाये। मगर रतनजी को उनकी यह अदा, अच्छी नहीं लगती। वे झल्लाते हुए, रशीद भाई से वापस कहते हैं..]

रतनजी – क्यों नखरे दिखला रहे हो, रशीद भाई ? दे दीजिये इन्हें कोई अच्छी सलाह, ये भले आदमी हमेशा आपको याद रखेंगे।

रशीद भाई – मुझे क्या ?

रतनजी – यह कह रहा हूं, जनाब..के आप कोई बढ़िया सलाह दे दीजिये, इन्हें..ये आपको हमेशा याद रखेंगे। [चिढ़ते हुए कहते हैं] अब कितनी बार कहूं जनाबे आली, के इन महापुरुष को कोई सलाह दीजिये। मगर..

रशीद भाई – मगर, क्या ?

रतनजी - [गुस्से से कहते हैं] - आपके कानों को, सुनायी नहीं दे रही है...मेरी बात ? 

रशीद भाई – ये महानुभव, मुझे क्या याद रखेंगे ? याद तो मैं रखूंगा, इन्हें। और याद रखूंगा, इनकी आदतों को। इनको, मैं क्या सलाह दूं ? इतना तो ये ख़ुद समझते हैं, के इनके नीचे कई कर्मचारी...

रतनजी – आगे कहिये, जनाब। रुकिये मत, बातों की गाड़ी को चलने दीजिये।

रशीद भाई – इनके नीचे कई कर्मचारी डरे हुए काम करते हैं, उन सब को इकट्ठा करके बस यही कहना है के ‘मुझे समय पर, आपका काम पूरा चाहिए। आप कब आते हैं और कब जाते हैं, यह मुझे नहीं देखना।’

रतनजी – समझ गये, मोहनजी ? बस आपको यही कहना है, ‘भय्या दफ़्तर का डेकोरेटम मेनटेन रहना चाहिए।’

रशीद भाई – बस, फिर क्या ? मोहनजी भी राज़ी, और कर्मचारी भी राज़ी। और भाभीजी भी राजी, इस तरह सभी खुश रहेंगे।

रतनजी – [मोहनजी से कहते हुए] – देखिये जनाब, आपका पूरा स्टाफ़ रोज़ का आना-जाना करते है गाड़ी से। ये सब, आपसे डरे हुए ही रहेंगे। बाकी कोई, खोड़ीला-खाम्पा करम-ठोक कुछ भी...

रशीद भाई – [बात पूरी करते हुए] – कुछ भी बोले, तो उसकी तरफ़ ध्यान नहीं देना। यही सोच लीजिये तब, के ‘हाथी के पीछे, कोई कुत्ता भौंक रहा होगा ?’ अरे जनाब, यह ख़िलक़त है..

रतनजी – हाथी चलता है तब, शान से चलता है....

रशीद भाई – वह पीछे मुड़कर नहीं देखता, आप अफ़सर होकर क्यों डरते हैं ? क्यों उनकी ओर, ध्यान देते हैं ? आपको तो वक़्त देना चाहिए, भाभीसा को। और साथ में, संदिणा के लड्डूओं पर रखो ज़ोर।

[इतना सुनते ही, मोहनजी के चेहरे पर मुस्कराहट छा जाती है। अब वे मुस्कराते हुए रशीद भाई से कहते हैं..]

मोहनजी – [मुस्कराते हुए] – रशीद भाई मैं तो इस भागवान को, बहुत राज़ी रखना चाहता हूं। मगर इसे मेरी बदक़िस्मत कहूं, या उनकी नादानी। वह कभी मुझसे, खुश रहती नहीं। जब भी मैं उन्हें नज़दीक आने का कहता हूं, मगर..

रतनजी – नज़दीक लाने में, कितना वक़्त ? कोई पास नहीं है तो उन्हें खींच लो अपने पास, और झकड़ लो बाहुपोश में। और क्या, यह तरीका भी करके आपको सिखायें क्या ?

मोहनजी – अरे रतनजी यार, कहने की बात सरल है। मगर वे ठहरी, चालाक। कहना बेकार है, वे तो मुझसे दूर-दूर ही रहती है। एक बार ऐसा हुआ, गीगला घर में था नहीं..मौक़ा अच्छा था..

रतनजी – [उत्सुकता दिखाते हुए, कहते हैं] – बोलो, आगे क्या हुआ ?

मोहनजी – मैंने टी.वी. को ओन किया, और जनाब आया आया रोमांटिक मंज़र। शाहरुख और काज़ोल रोमांस करते हुए डांस कर रहे थे, मैं बोला ‘देखो भागवान, कैसा रोमांस चल रहा है ?’ मेरी बात सुनकर, जनाब वह क्या बोली ?

रशीद भाई – फ़रमाइये, हुज़ूर। क्या कहा, उन्होंने ? यही कहा होगा, के ‘चलिए आलीजा, छैल-बगीचे में..चलकर, साथ में झूला झूलते हैं।’

मोहनजी – [ग़मगीन आवाज़ में, कहते हैं] – कहां ऐसी क़िस्मत मेरी, जो ऐसा कह दे मुझे ? काश, ऐसा होता ?

रतनजी – आख़िर कुछ तो कहा होगा, कह दीजिये जनाब शर्माइए मत। जो करे शर्म, उसके फूटे कर्म।

मोहनजी – उन्होंने कहा के ‘गीगले के बापू। कान खोलकर, सुन लो। इस काजोल को रोमांस करने के मिलते हैं, पूरे पिचहतर लाख रुपये। पिचहतर लाख को छोडो, आप तो मुझे केवल पांच हज़ार रुपये दे दो तो...

रशीद भाई – तो क्या ? कहीं ज़्यादा रुपयों की डिमांड तो न कर डाली, भाभीसा ने ?

मोहनजी – अरे नहीं रे, कढ़ी खायोड़ा। उन्होंने कहा के ‘हेमा मालिन जैसे ठुमके लगाय दूं, इस कल की छोरी काजोल का डांस फीका रह जाएगा मेरे सामने। आप, देखते रह जाओगे ?

रशीद भाई – यही बात मैं आपसे कहना चाहता था, के भाभीसा को राज़ी रखना आपको आता नहीं। अब आप ऐसा करना, के कल पाली से आते वक़्त दो किलो गुलाब हलुआ लेते आना..

मोहनजी – फिर, क्या होगा ?

रशीद भाई - फिर भाभीसा भी खुश, और मैं भी खुश आपके परमोशन के मिठाई खाकर।

रतनजी – शत प्रतिशत सही कहा, आपने। फिर इनके घर में उगेगा, चौदवी का चाँद।

रशीद भाई – [खुश होकर] – ऐसा ही हो, फिर उस चांदनी रात में मोहनजी भाभीसा का घूघंट खोलते हुए गीत गायेंगे के ‘चौदवी का चांद हो, क्या लाज़वाब हो..’

रतनजी – हां रतनजी, बिल्कुल ठीक। गीत गाते-गाते, वे भाभीसा का घूंगट खोलेंगे तब..

ओमजी – [हंसते हुए] – घूंगट की ओट से चाँद सा मुखड़ा दिखेगा, ज़रूर। मगर, किसका ?

[सभी विस्मित होकर ओमजी का मुंह देखने लग जाते हैं, उनके दिल में यह जानने की जिज्ञासा बढ़ जाती के “अब किसका चेहरा सामने आयेगा ?”]

ओमजी – मुंह दिखायी देगा, उस गुलाबो हिज़ड़े का, और उसे बहुपोश में झकड़ते ही मंज़र आ जायेगा गाड़ी का। आख़िर, मोहनजी सपने गाड़ी में ही देखा करते हैं।

मोहनजी – [गुस्से से यह कहते हुए उठते हैं] – इधर मर, ओमजी कढ़ी खायोड़ा। अब भागना मत, काबरिये कुत्ते की तरह ? कमबख्त, मुझे तू गुलाबो हिज़ड़े के दीदार करवा रहा है ? करम ठोक, ठहर अभी..

[मोहनजी क्रोधित होकर, ओमजी को पीटने के लिए उठते हैं। मगर जनाब ओमजी तो बच जाते हैं, युरीनल की तरफ़ भागकर..और बेचारे मोहनजी फंस जाते है, गुलाबो हिज़ड़े के हाथ। वो हिज़ड़ा अपना नाम सुनते ही, झट पड़ोस के केबीन से निकलकर इधर इस केबीन में चला आता है। फिर ताली पीटता हुआ, कहता है..]

गुलाबो – [ताली पीटता हुआ कहता है] – सेठ साहब, कैसे याद किया..? आज़कल आपको मेरी याद बहुत आती है, लो जी देखिये मेरा जलवा।

[गुलाबो मोहनजी को पकड़कर, वापस उनको सीट पर बैठा देता है। फिर उनके गालों को सहलाता हुआ, कहता है..]

गुलाबो – [गालों को सहलाता हुआ, कहता है] – तेरी घरवाली मेरे जैसी सुन्दर नहीं है रे, मैं तो हूं चौदवी का चाँद..और तू है, मेरा गुलाब का फूल। अरे मेरे गुलाब के फूल, क्या मौसम है आज़ ? आ जा, अपुन मिलकर डांस करें।

[इतना कहकर, वह झट हाथ पकड़कर मोहनजी को खड़ा कर देता है। फिर उनकी कमर में हाथ डालकर, जबरदस्ती उनसे ठुमके लगवा देता है। उनको ठुमके लगाता हुआ देखकर, सभी खिल खिलाकर हंसने लगते हैं।]

गुलाबो – [मोहनजी को नचाता हुआ गाता है] – मौसम है आशियाना, ए दिल कहीं तू..

[रशीद भाई झट अपनी जेब से कड़का-कड़क दस का नोट निकालकर, मोहनजी के ऊपर गोळ करके..[वार कर] वह नोट, गुलाबा को थमा देते हैं। फिर वे, गुलाबा से कहते हैं।]

रशीद भाई – [मोहनजी पर दस रुपये गोळ के गुलाबा को थमाते हुए] - ए रे गुलाबा, अब तू छोड़ हमारे साहब को। [रुपये देते हुए] ये ले रुपये, अब आगे जाकर कमा..!

[अब गुलाबो मोहनजी को छोड़ देता है, फिर उनके गालों पर चुम्मन लेकर वापस गाने लगता है।]

गुलाबो – [नाचता हुआ गाता है] – चोली में क्या है, चोली में है मेरा दिल [ब्लाउज़ के अन्दर, हाथ डालकर नोट रखता हुआ] दूंगी, मेरे यार को।

[ब्लाउज़ में नोट ठूंसकर गुलाबो चला जाता है, दूसरे केबीन में। यह गाड़ी एक्सप्रेस होने के कारण छोटे स्टेशनों पर रुकती नहीं, मगर न मालुम इस समय यह गाड़ी सालावास स्टेशन पर आकर क्यों रुक जाती है ? गाड़ी के रुकते ही, गाड़ी के मुसाफ़िर खिड़कियों से मुंह बाहर निकलकर बाहर झांकने लगते हैं। कई यात्री प्लेटफार्म पर आकर खड़े हो जाते हैं, इस वक़्त वे गाड़ी के गार्ड साहब से गाड़ी के रुकने का कारण मालुम कर रहे हैं। गार्ड साहब उन्हें बता रहे हैं, के ‘सामने से माल गाड़ी आ रही है, उसके निकल जाने के बाद यह गाड़ी रवाना होगी।’ खिड़की से बाहर झांक रहे मोहनजी ने जैसे ही गार्ड साहब की बात सुनते हैं और, वे बहुत खुश हो जाते हैं..वे तो सोच चुके हैं, के ‘अब तो यह कुचामादिया का ठीकरा गुलाबा डब्बे से उतरकर चला गया होगा..तो, फिर क्या ? दरवाज़े के पास चलकर, बाहर का नज़ारा देख लेते हैं।’ अब वे दरवाजे के पास आकर बाहर का नज़ारा देखते हैं, मगर उन्हें वहां कहीं भी गुलाबा नज़र नहीं आता..मगर सामने दूसरे प्लेटफार्म पर, धान की बोरियों से लदी हुई माल गाड़ी खड़ी दिखायी देती है। उनके मुंह में ठूंसे हुए ज़र्दे के कारण उनसे बोला नहीं जा रहा है, मगर बिना बोले उनसे रहा नहीं जाता..बस ज़र्दा उछालते हुए अपने तकिये कलाम का प्रयोग करते हुए कहते हैं।]

मोहनजी – [मुंह से ज़र्दे की बरसात करते हुए, कहते हैं] – कहां जा रयी है, माल गाड़ी कढ़ी खायोड़ी ? [पीक थूकते हैं]

[इधर वे पीक थूकते है, उसी वक़्त पड़ोस के डब्बे से उतरकर गोपसा बाहर आते हैं और उसी जगह आकर खड़े हो जाते हैं जहां मोहनजी पीक थूकने वाले हैं। फिर, क्या ?]

मोहनजी – [पीक थूककर, कहते हैं] – कहां जा रयी है, कढ़ी खायोड़ी माल गाड़ी ?

[प्लेटफार्म पर खड़े गोपसा के गरदन के ऊपर ज़र्दे की पीक गिरती है, और वहां उन्हें कुछ ठंडक महशूस होती है। वे दरवाज़े पर खड़े मोहनजी की तरफ़, खारी-खारी नज़रों से देखते हैं। उनका इस तरह देखना, मोहनजी को क्यों अच्छा लगेगा ? वे उनको व्यंग भरे लफ़्ज़ों में, कह देते हैं..]

मोहनजी – [गोपसा से कहते हैं] – देख क्या रहे हो, गोपसा ? कोई मैंने हीरे-पन्नों की बरसात तो की नहीं, फिर क्यों ऐसी नज़रों से आप मुझे देखते जा रहे हैं ?

गोपसा – [मुस्कराते हुए, कहते हैं] – क्या करें, मोहनजी ? आख़िर, आपमें ब्याणसा का स्वभाव झलकता है।

[मोहनजी काहे गोपसा की बोली गयी लोकोक्ति का मफ़हूम, जानने की कोशिश करेंगे ? “चोरनी ब्याणसा” के खास्सा के बारे में जानने का तो कोई सवाल ही खड़ा नहीं होता। बात यह है, ब्याणसा घर लौटते वक़्त बेटी के ससुराल से गीला पोछा छिपाकर ले आयी, भले उसके कपड़े गंदे गीले पोछे से ख़राब हो गए हों। मगर, वह चुराने के गुण को किसी हालत में छोड़ नहीं सकती थी। सच्चाई यही है, उसके लिए अपने खास्से को छोड़ना उसके हाथ में नहीं था। चाहे, रास्ते में उसे देख रहे सभी लोग पोछे से झरते गंदे पानी को देखकर यही कहते जा रहे थे कि, ब्याणसा का स्वाभाव झर रहा है। इसी तरह, बेचारे मोहनजी भी जर्दे की पीक उछालने के गुण को कैसे छोड़ पाते ? कहीं भी पीक थूक देना, उनका खास्सा बन चुका था। अब वे इस वक़्त उन धान की बोरियों को देख-देखकर ही खुश हो रहे हैं, और धान से लदी गाड़ी आने के समाचार साथियों को देने के लिये..अपने क़दम, केबीन की तरफ़ बढ़ा देते हैं। वे केबीन में पहुंचकर, अपनी सीट पर बैठ जाते हैं...और फिर, बोलने का भोंपू चालू कर देते हैं।]

मोहनजी – भाई ओमजी, रशीद भाई और रतनजी। अब सुनिये, आप। अब गेहूं की स्पेशल गाड़ी आ रही है, एक बार और..अब फिर आपके पाली स्टाफ़ के ऊपर हमारा माल उड़ाओ ज़रुर, मगर घर का नहीं का कार्य-क्रम तय हो जायेगा।

रशीद भाई – करम फूटे हुए होंगे हमारे, तो एक बार और सही। यह बात तो अच्छी है, जनाब। मगर, आप धान की बोरियों की जांच करने के लिये..गाड़ी से नीचे, मत उतरना। नहीं तो बापूड़ा, गाड़ियों के क्रोस से मारे जाओगे।

रतनजी – अभी तो जनाब, सुर्य नगरी एक्सप्रेस की भी क्रोसिंग होने बाकी है। साहब, आप नीचे उतरना मत..कुचल दिये जाओगे ?

मोहनजी – [सुर्ती को होंठों के नीचे दबाते हुए, कहते हैं] – मैं इतना पागल नहीं हूं, कढ़ी खायोड़ा। उधर देखो, प्लेटफार्म पर खड़े उस पगड़ी वाले देहाती को आवाज़ देकर उससे सारी जानकारी ले लेता हूं। न तो उस उस कढ़ी खायोड़े देहाती को भेज दूंगा, तहकीकात करने..!

ओमजी – [हंसते हुए कहते हैं] – ठीक है, जनाब। आप बच जायेंगे, और उस बेचारे देहाती को भेज देंगे सूर्य नगरी एक्सप्रेस से कटने..

[सभी बाहर देखने के लिये खिड़की की तरफ़ बढ़ते हैं, मगर मोहनजी तो जनाब वहीँ बैठे-बैठे आवाज़ लगा देते हैं उस पगड़ी वाले को। उनके बोलने से ज़र्दे के साथ थूक भी उछलता है, जिसका बाहर जाना असंभव है..क्योंकि, खिड़की के कांच ढके हुए हैं। अत: इस प्रकार, ज़र्दे और थूक के छींटे जगह-जगह बिखर जाते हैं। क्या कहें ? खिड़की के नज़दीक आया साथियों का मुंह, अब इस ज़र्दे व थूक की बरसात से बच नहीं पाता। मुंह पर छींटें ऐसे लगते हैं, जैसे उस पर पाउडर छिड़का जा रहा है ?

मोहनजी – [मुंह से ज़र्दा उछालते हुए, कहते हैं] – ठोकिरा, कहां जा रिया है रे, कढ़ी खायोड़ा पगड़ी वाले ? जा, पता लगाकर आ, के ‘माल गाड़ी कहां से आ रही है, और कहां जा रही है ?’

रशीद भाई – [रुमाल से मुंह साफ़ करते हुए, कहते हैं] – जनाबे आली मोहनजी, आपने यह क्या कर डाला ज़र्दा उछालकर ?

मोहनजी – [लबों पर मुस्कान लाते हुए, बेशर्मी से कहते हैं] – रशीद भाई कढ़ी खायोड़ा, जर्दे को मुंह में पड़ा रहने दूं, तो बोलूंगा कैसे ? अब पीक तो थूक दी है बाहर, देख लेता हूं..कहां गिरी है ? भगवान करे, किसी भले आदमी पर न गिरी हो..!

रशीद भाई – ज़रूर देख लीजिये, कहीं रास्ते चल रहे राहगीरों के ऊपर वह पीक गिरी तो नहीं ? [धीमे से कहते हैं] सर फूटते ही नसीहत ले लेना, आगे से...

[देखने के लिए जैसे ही वे खिडकी की ओर अपना सर बढ़ाते हैं, और भूल जाते हैं के ‘खिड़की का कांच खुला नहीं है।’ फिर, क्या ? जनाब उस खिड़की के कांच से, अपना सर टक्करा बैठते हैं। उनका सर टकरा जाने से, उनके साथी खिल-खिलाकर हंसते जाते हैं। इस वक़्त मोहनजी को धान की बोरियां आने की इतनी ख़ुशी है कि, उसके आगे उनका यह सर-दर्द होना कोई मायना नहीं रखता। वे क्यों सोचेंगे, उन पर ये साथी क्यों हंसते जा रहे हैं ? जनाब, कहां रुकने वाले ? झट खिड़की का कांच हटाकर, मुंह बाहर निकालकर झांक ही लेते हैं। बाहर किसी परिचित हम-उम्र के ग्रामीण को खड़े देखकर, उसे आवाज़ दे डालते हैं।]

मोहनजी – अरे ए सुगनिया। कहां जा रिया है रे, कढ़ी खायोड़ा ? बहुत दिन से यार, तू दिखायी दिया नहीं रे भाईड़ा..? [मुंह अन्दर डालकर, कहते हैं] हम दोनों, एक ही गुरुकुल में साथ-साथ पढ़ें हैं। अब मैं, उससे बात करके आ रहा हूं।

[मोहनजी झट गाड़ी से नीचे उतरकर, सुगना के निकट चले आते हैं। वहां जाकर उसके कंधे पर अपना हाथ रखकर, कहते हैं..]

मोहनजी – [उसके कंधे पर हाथ रखकर कहते हैं] – ए रे सुगनिया, अब तू आ गया है तो मेरा एक काम करता जा।

[माल गाड़ी की तरफ़ अपनी अंगुली से इशारा करते हुए, मोहनजी अपना काम बताते हैं..]

मोहनजी – उस माल गाड़ी के पास जाकर पता लगाकर आ ज़ा, के ‘यह धान की बोरियों से लदी हुई गाड़ी कहां जा रही है, और कहां से यह आ रही है ?’

सुगना – [झुंझलाते हुए] – ए रे मोहनिया, तू कैसा आदमी है ? ना तो तू देखता है वक़्त, और न देखता है आदमी ? आते ही, बोलने का भोंपू चालू कर देता है ? यार देख, एक तो मेरा नाती गुम हो गया..

मोहनजी – [बात काटते हुए कहते हैं] - ग़लती तेरी है, क्यों इस छोटे बच्चे को साथ लेकर इधर आया ? ये बच्चे है, कुत्ते के पिल्ले जैसे..कहीं भाग जाए, तो नाती को पकड़कर लाना भी मुश्किल।

सुगना – क्या करूं रे, मोहनिया ? कई दिनों से इस छोरे को बुखार आ रहा था, सोचा जोधपुर जाकर इस छोरे को बच्चों के डाग़दार डॉक्टर छंगाणी साहब को दिखला दूं।

[अचानक सुगने को, झाड़ियों के पीछे से निकलता हुआ उसका नाती दिखायी देता है। इस वक़्त वह, अपनी चड्डी का तीजारबंद [नाड़ा] बंद कर रहा है।]

सुगना – [नाती को आवाज़ देते हुए, ज़ोर से कहते हैं] – अरे नालायक़, मूतने गया क्या ? कहकर जाता तो, क्या बिगड़ जाता रे तेरा..भंगार के खुरपे। अब जा, [डब्बे की तरफ़ अंगुली करके] जाकर, अपनी सीट पर बैठ जा।

[सुगना का नाती, डब्बे के अन्दर चला जाता है। उसके जाने के बाद, प्लेटफ़ोर्म पर लगी पत्थर की बेंच के ऊपर बैठ जाता हैं, सुगना। फिर वह, मोहनजी से कहता है..]

सुगना – ए रे मोहनिया, तू भी बैठ ज़ा यहां आकर।

[अब मोहनजी और सुगना दोनों बैठ जाते हैं, तख़्त [बेंच] पर। बैठने के बाद, मोहनजी सुगना की पहनी हुई खाक़ी वर्दी को गौर से देखते हैं। फिर वे, उससे सवाल करते हैं।

मोहनजी – सुगनिया तू तो यार, सेवानिवृत हो गया रे..फिर यह ख़ाकी वर्दी तेरे बदन पर कैसे ? कहीं तूने वापस, पुलिस में नौकरी कर ली क्या ?  

सुगना – क्या करें, मेरे यार ? रिटायर होने के बाद ख़ाली बैठा नहीं गया, बस यार कर ली होम-गार्ड में ड्यूटी जोइन। अच्छे-खासे पैसे भी मिल जाते हैं, वक़्त भी आराम से कट जाता है।

मोहनजी – कभी चुनाव में भी कमा लेता है तू, टी.ए.डी.ए.। खूब कमा रहा है, यार। तूझे, क्या फ़िक्र ? फ़िक्र तो मुझे है, जब रिटायर हो जाऊंगा तब..

सुगना – बोल यार आगे, तू तो है अफ़सर..तूझे, क्या तकलीफ़ हो सकती है ? मेरे लायक कोई काम हो तो बोल, मेरे भाई।

मोहनजी – [भोला मुंह बनाकर, कहते हैं] – क्या कहूं, सुगना ? तू तो जनता ही है, मैंने तीन-तीन ब्याव रचाए थे..दो के तो कोई बच्चा हुआ नहीं आख़िर तीसरी शादी हुई अधेड़ावस्था में। इस कारण बच्चे भी डेरी से हुए।

सुगना – आगे बोल, तूझे तक़लीफ़ क्या है ?

मोहनजी – बताता हूँ, यार। वह तो अभी छोटा बच्चा है और इधर मैं रिटायर भी जल्दी हो जाऊंगा। फिर..रिटायर होने के बाद कैसे मैं, इन नन्हे-नन्हे बच्चों को पालूंगा ? अब तू ऐसा कर सुगना, के..

सुगना – बोल बोल, यार बोल..जो कुछ मुझसे होगा, ज़रूर करूंगा।

मोहनजी – [खुश होकर, कहते हैं] – मुझे मालुम है, के ‘होम गार्ड दफ़्तर वालों से, तेरे बहुत अच्छे रसूखात है।’ अब ऐसा कर कढ़ी खायोड़ा, रिटायर होने के बाद तू मुझे भी होम-गार्ड की नौकरी में लगा दे..मेरे नन्हें बच्चे, तूझे बहुत दुआ देंगे।

[मोहनजी की बात सुनकर, सुगना उन्हें खारी-खारी नज़रों से देखता है। उसे भरोसा नहीं हो रहा है, के इतना बड़ा अफ़सर होकर, ऐसी पागलों जैसी बात कैसे करता जा रहा है ?’ मगर मोहनजी, कहां रुकने वाले ? वे जनाब, बोलते ही जा रहे हैं..]

मोहनजी – मैं सब जानता हूं, तुम लोग कैसे काम करते हो ? मुझसे ये बातें, छिपी हुई नहीं है..आख़िर, तुम लोग करते क्या हो ?

[मोहनजी की बात सुनकर, सुगना का दिल खट्टा हो जाता है। वह सोचता है, के ‘एक तरफ़ नौकरी मांग रहा है, और दूसरी तरफ़ हम होम गार्ड वालों की बखिया उधेड़ता जा रहा है ?’ अब वह खिन्न होकर, कहता है..]

सुगना – [मूंछों पर ताव देता हुआ कहता है] – भाई मोहनिया, क्यों गाँव का नाम बदनाम कर रहा है ? मालुम नहीं, तू कितना पढ़ा-लिखा है..और तू अब, ऐसी गेलसफ़ी बातें करता जा रहा है ? 

मोहनजी – ऐसी कौनसी ग़लत बातें कह दी मैंने, जो तू बके जा रहा है मुंह फाड़ के ? कह दिया मैंने, जो कहा वो सही कहा।

सुगना – तू अफ़सर होकर, अब रिटायर होने के बाद में होम-गार्ड जैसी नौकरी करेगा तो गाँव के लोग क्या कहेंगे तूझे ? अरे यार तू जानता नहीं, तूने अफसर बनकर गाँव का नाम ऊंचा किया है। हम लोग गर्व से तेरा नाम लेकर, अपनी मूंछों पर ताव देते है...

मोहनजी – गाँव वाले मुझे बुरा-भला कहेंगे, तो मैं क्या करूं कढ़ी खायोड़ा ? पैसों का काम तो, पैसे आने से ही पूरा होता है। मुझे अपने बच्चे पालने हैं, मुझे इन गांववालों की नाराज़गी से क्या लेना-देना ?       

सुगना – मगर यह सोच, सेवा निवृति के बाद तूझे मिलेंगे तीस लाख रूपये। फिर, छोटी-बड़ी नौकरी करने की गेलसफ़ी बात क्यों करता है ?

मोहनजी – तो फिर, क्या करू रे कढ़ी खायोड़ा ?

सुगना – देख रे, मेरे मामी ससुरजी सौभागमलसा का धंधा है...जेवर रखवाकर, लोगों को ब्याज पर कर्ज देना। सिमोका गाँव, जो बेंगलूर के पास है..वहां उन्होंने, हवेलियां खड़ी कर दी रे मोहनिया। अब तू..

मोहनजी – तू यह कहना चाहता है, के मैं यह धंधा कर लूं ? अरे गेलसफ़े तू तो उल्टी सलाह देकर मेरे पैसे को डूबाने की बात करता है, ब्याज आना तो दूर..मूल से भी, हाथ धो बैठूंगा मैं।

सुगना – गहने तो तेरे पास रहेंगे, फिर गेलसफ़े पैसे कैसे डूबेंगे तेरे ?

मोहनजी – अगर गहने खोटे आ गये तो गेलसफ़ा, सर पर हाथ रखकर रोऊंगा मैं। अब बोल, तू मेरा दोस्त है या दुश्मन ?     

सुगना – तब तू मुझे पटरियां पार करने, माल गाड़ी का पता लगाने क्यों भेज रहा है ? पटरियां पार करते वक़्त अगर मैं क्रोसिंग करने वाली गाड़ी के नीचे आ गया, तो गेलसफ़े फिर मैं इस नाती की शादी कैसे देख पाऊंगा ? अब बोल, तू मेरा दोस्त है या दुश्मन ? 

[हर सवाल का जवाब मिल जाने से, मोहनजी का मूड उखड़ जाता है..मगर, कडाण जाने का सवाल नहीं। उठते वक़्त, वे कहते हैं..]

मोहनजी – सचेत रहने से, कुछ नहीं होता। अगर क़िस्मत में मौत लिखी है, तो मौत ज़रूर आती है। अरे यार, क्या कहूं तूझे ? रोटी खाते-खाते, प्राण निकल निकल जाते हैं..

सुगना – अरे यार, ऐसा कहकर तू मेरे प्राण मत निकाल। बोल, अब मैं तेरे लिए क्या करूं  ?

मोहनजी – [गुसे से कहते हैं] - अब तू यहां बैठा-बैठा अपने नाती को खेला, और मैं..जाकर माल गाड़ी के बारे में खुद पता लगा लूंगा। अब मुझे, किसी की गर्ज़ नहीं।

[आख़िर मोहनजी पटरियां पार करके जाते है गाड़ी के पास, वहां पहुंचकर उन बोरियों को अच्छी तरह से देखते हैं। और देखते ही, उनके चेहरे की रंगत बदल जाती है। फिर उखड़े सुर में, बरबस बोल उठते हैं...]

मोहनजी – [उखड़े सुर में कहते हैं] – ठोकिरा, मैंने तो खाक़ गौते खाये ? अरे कढ़ी खायोड़ा इस माल गाड़ी में तो ख़ाली, सीमेंट की बोरियां है। और मेरे जैसे सूर दास को दिखायी देती है..ये, धान की बोरियां ?

[ज़र्दे की पीक थूककर, फिर नाक साफ़ करते हैं मोहनजी। फिर दरवाज़े के पास खड़े रशीद भाई को देखकर वे, उन्हें आवाज़ देते हुए कहते हैं..]

मोहनजी – [आवाज़ देते हुए, कहते हैं] - ओ रशीद भाई, कढ़ी खायोड़ा। अपनी गाड़ी खड़ी कैसे है, चली क्यों नहीं ? मुझे उम्मेद अस्पताल जाना है, मेडिकल बिल लाने। घडी में सवा पांच हो गए, अरे ठोकिरा देरी में और देरी।

रशीद भाई – [ज़ोर से आवाज़ देते हुए, कहते हैं] – अरे, ओ मोहनजी। आ जाओ, आकर गाड़ी में बैठ जाओ। अब रेलवे वालों को गालियां मत देना, उनकी मेहरबानी से आप इन पटरियों के आर-पार चल रहे हो।

मोहनजी – ज़ोर से कहिये, रशीद भाई। पटरियों पर, क्यों नहीं चलूं ?

रशीद भाई – [ज़ोर से चिल्लाते हुए, कहते हैं] – अरे मोहनजी, कहीं आपको पटरियों के आर-पार किसे टी टी ने घुमता देख लिया तो वह टी.टी. ज़रूर आकर आपसे जुर्माना भरवा लेगा ? अब जल्दी आ जाओ, जनाब।

मोहनजी – [ज़ोर से चिल्लाते हुए, कहते हैं] – तू क्या जानता है रे, कढ़ी खायोड़ा ? मैंने तो आज़ तक कभी किसी को चाय नहीं पिलायी, फिर जुर्माना भरने वाला कोई और होगा..मैं नहीं।

[इंजन सीटी देता है, मोहनजी दौड़कर डब्बे में चढ़ते हैं। चढ़ने की उतावली में मोहनजी ध्यान नहीं दे पाते, के ‘दरवाज़े के पास हाथ में बैग थामे, गुलाबा किन्नर खड़ा है।’ फिर, क्या ? वे उसको टक्कर देकर, अन्दर चले आते हैं। उनके टक्कर देने से, गुलाबा किन्नर का बैग नीचे गिर जाता है। गुलाबा उनको गालियां देता हुआ, चलती गाड़ी से नीचे उतर जाता है। बैग उठाकर वह वापस गाड़ी में चढ़ना चाहता है, तभी गुलाबा को तेज़ी से आती हुई सुर्य नगरी एक्सप्रेस दिखाई देती है। इस एक्सप्रेस को आते देखकर, यह गाड़ी रुक जाती है और साथ में रुक जाता है...गुलाबा। अब वह इस गाड़ी में, वापस चढ़ने का इरादा छोड़ देता है। वह जनता है, सुर्यनगरी एक्सप्रेस के यात्रियों से तगड़ी कमाई की जा सकती है। मंच पर, अंधेरा छा जाता है। थोड़ी देर बाद, मंच वापस रौशन होता है। मोहनजी अपने साथियों के साथ, केबीन में बैठे दिखाई देते हैं। अब न जाने, रशीद भाई को क्या हो जाता है ? वे झट उठकर, खड़े हो जाते हैं। फिर, मोहनजी से कहते हैं..]

रशीद भाई – [मुहावरे का प्रयोग करते हुए, कहते हैं] – जान बची और लाखों पाये, मोहनजी। [धीरे-धीरे कहते हुए] लौटकर बुद्धु, घर को आये।

[यह धीरे से बोला गया जुमला भी मोहनजी को सुनायी दे जाता है, सुनते ही वे भड़क कर कहते हैं]

मोहनजी – आपने अभी क्या कहा, जनाब ? मुझे बुद्धु कैसे कह दिया, आपने ? मगर मैं तो हूं समझदार, जो बचकर आ गया..अगर वहां पटरियों पर खड़ा रहता तो कढ़ी खायोड़ा, ज़रूर कुचला जाता इस सुपर फास्ट सुर्य नगरी एक्सप्रेस से।

[अब सुपर फास्ट तेज़ी से गुज़रकर, आंखो के आगे से ओझल हो जाती है। इधर रशीद भाई दरवाज़े के पास ऐसी सीट पर बैठ जाते हैं, जिससे वे लोगों के आने-जाने में पूरे बाधक बन जाते हैं। अब वे मोहनजी को देखते हुए, उन्हें राई के पहाड़ पर चढ़ाते जैसे शब्दों में कहते हैं..]

रशीद भाई – [मोहनजी से] - देखिये साहब, अब आपको फ़िक्र करने की कोई ज़रूरत नहीं। मैं तो ऐसा जम गया हूं दही के माफ़िक, अब आप गुलाबे को छोड़ो, उसकी उस्ताद कमला बाई भी नहीं आ सकती इधर।

रतनजी – अब कहिये, मोहनजी..कैसी रही ?

रशीद भाई – बोलिए, जनाब। आपका काम, निकाला या नहीं ? कहिये..?

ओमजी – कैसी रही कहकर, काहे मुंह का स्वाद बिगाड़ रहे हैं ? भले आदमी का काम करने से मुंह मीठा होता है, मगर ये जनाब ठहरे ऐसे महापुरुष। जो भले आदमी नहीं है, बल्कि....

रतनजी – सच्च कहा, आपने। ये तो ठहरे, अघोरमलसा। ख़ाली थूक-थूक कर गाड़ी को ख़राब कर सकते हैं, इनसे कोई फ़ायदा होने वाला नहीं।

मोहनजी – [ओमजी को खुश करते हुए कहते हैं] – ओमजी आप महान हो, आपने कई बार मुझे मरने से बचाया है।

[अब रशीद भाई को भी खुश रखना बहुत ज़रूरी है, आख़िर रशीद भाई ठहरे सेवाभावी। अब मोहनजी, उनकी तरफ़ देखते हुए कहते हैं..]

मोहनजी – [रशीद भाई से] – अरे रशीद भाई, ज़रा सुनो आपके काम की बात। आपकी कसम खाकर कहता हूं, के ‘कल से मैं जर्दा छोड़ रहा हूं।’ अगर मैं जर्दा-सेवन करता हुआ पाया गया तो आप..

रतनजी – आगे कहिये, क्या रशीद भाई आपके लिए पानी लाना बंद कर दें..?

मोहनजी – अरे नहीं रे, कढ़ी खायोड़ा..तब आप लोग मुझे कह सकते हैं लो देखो काबरिया कुत्ता जा रहा है।

[इतना कहने के उपरांत, मोहनजी अपने लबों पर मुस्कान बिखेरते हैं। फिर सोचने बैठ जाते है, के ‘अब जोधपुर आने में कितना वक़्त बाकी रहा ? फिर, यश लेने में पीछे क्यों रहे ?’ यह सोचकर, वे सबसे कहते हैं..]

मोहनजी – डोफों, आप क्या जानते हैं मुझे ? मेरा जैसा कोई दिलदार नहीं, इस ख़िलक़त में।

[खरड़ाहट की आवाज़ करता हुआ, एक दस का नोट जेब से निकालते हैं। फिर ख़ुशी से चहकते हुए, कहते हैं..]

मोहनजी – ज़र्दा छोड़ने की ख़ुशी में, आप सब को मैं एम.एस.टी. कट चाय पिलाता हूं।

[पहलू में बैठे ओमजी को कोहनी से टिल्ला मारते हुए, उनसे कहते हैं..]

मोहनजी – [कोहनी से टिल्ला देते हुए, कहते हैं] – उठिए अब, चाय लेते आइये बेटी का बाप।

ओमजी – काका रहने दो, आप तो कंजूस ही अच्छे। चाय पाने का ओर्डर मारा, सालावास जैसे स्टेशन पर...जहां चाय की केंटीन को छोड़, यहां कोई ढाबा भी नहीं है।

[इंजन सीटी देता है, गाड़ी रवाना होती है। ओमजी खिन्न होकर, कहते हैं..]

ओमजी – [खिन्नता से, कहते हैं] – लीजिये गाड़ी रवाना हो गयी है, अब नोट को पड़े रहने दीजिये..अपनी जेब में, गर्मी मिलती रहेगी आपको।

रतनजी – जेब से निकला हुआ नोट वापस जेब में जाना नहीं चाहिये, जोधपुर स्टेशन अब आने वाला ही है। वहां पी लेंगे, मसाले वाली चाय।

[मोहनजी को निहारते है, उन्हें बार-बार मेडिकल बिलों की फ़ेहरिस्त को पढ़ते देख..जनाब को संदेह हो जाता है के ‘कहीं ये अलामों के काका मोहनजी टालने का मानस तो नहीं बना चुके ?’]

रतनजी - क्यों बार-बार मेडिकल बिलों की फ़ेहरिस्त देखते जा रहे हैं, कहीं आपका टालने का मानस तो नहीं है ? ओटाल तो आप पहले से ही है, मुझे पूरा ध्यान है।

[गाड़ी पटरियों पर तेज़ी से दौड़ती जा रही है, अब कोई क्रोसिंग होने वाला नहीं। छोटे-बड़े स्टेशन सब पीछे छूट गये हैं। अब जोधपुर स्टेशन का सिंगनल दिखाई दे रहा है, गाड़ी आगे बढ़ती जा रही है। अब खतरनाक पुलिया भी दिखने लग गया है। संध्या काल हो चुका है। इस पुल के नीचे आये हुए ‘अम्बे माता के मंदिर’ में, भक्त गण लगातार टंकोर बजाते जा रहे हैं। और साथ में भक्त-जन मधुर सुर में, माता की आरती गा रहे हैं। आरती के बोल सुनकर, रतनजी खिड़की से मुंह बाहर निकालते हैं। फिर, मात अम्बे को नमन करते हैं। अब सिंगनल काफी पीछे छूट चुका है, और गाड़ी जोधपुर स्टेशन के प्लेटफार्म संख्या एक पर आकर रुक जाती है। सभी बैग लिए, नीचे प्लेटफार्म पर उतरते हैं। नीचे उतरते ही वे सब, मोहनजी को घेरकर खड़े हो जाते हैं। ओमजी मुस्कराते हुए, मोहनजी से कहते हैं..]

ओमजी – [मुस्कराते हुए, कहते हैं] – जोधपुर आ गया है..अब चलिये मोहनजी, हम-सबको चाय-वाय पिला दीजिये जनाब। केंटीन की ओर चलते हैं, आइये।

मोहनजी – [झट हाथ की घड़ी देखते हैं, फिर कहते हैं] – आप देख लीजिये जनाब, छ: बज गए है। किसी तरह मैं सिटी-बस पकडूंगा, फिर जाऊंगा उम्मेद अस्पताल। वहां जाकर, मेडिकल बिलों पर....

[अपनी जेब पर हाथ रखकर, नोट की गर्मी का अहसास करते है। फिर, कहते हैं..]

मोहनजी – मेडिकल बिलों पर, डॉक्टर साहब के दस्तख़त ले लूंगा। अब आप लोगों को चाय पीनी हो तो एक भाई, मुझे अपने स्कूटर पर मुझे बैठाकर अस्पताल ले जा दे..यह शर्त आप लोगों को मंजूर हो तो, आप सभी चाय पी सकते हैं।

[मोहनजी की शर्त सुनकर सभी सोचते हैं, के इनको अस्पताल ले जाना अब आसान नहीं है। अस्पताल से निपटकर जनाब कह सकते है, अब मुझे घर पहुंचा दीजिये। इस तरह इनकी मांग बढ़ती जायेगी, उसको पूरा करना, अब किसी के वश में नहीं है। इस इल्लत से बचने के लिए, रशीद भाई पहले ही बोल देते हैं..]

रशीद भाई – ओमजी आज़ जनाब, आप ही कर लीजिये यह भलाई का काम। मैं तो रोज़ इनकी ख़िदमत करता ही हूं। मगर एक बात आपसे कह देता हूँ..

ओमजी – कहिये, आपको किसने रोका है ?

रशीद भाई - आप अस्पताल का काम निपटा देंगे, तब मोहनजी आपको कहेंगे जनाब थका हुआ हूं..अब तो कढ़ी खायोड़ा, आप मुझे घर छोड़ दें तो आपकी मेहरबानी होगी। फिर..

रतनजी – ‘फिर-फिर’ कहना बंद कीजिये, मगर यह सोचिये..के, ‘आपके पास गाड़ी है, या नहीं ? अगर नहीं है, तब आप मोहनजी के काम कैसे आ सकते हैं ? सुनिये, सच्चाई यही है “अफसर की बात अफसर ही समझ सकता है। “ आप और हममें, कहाँ है इतनी समझ ?

रशीद भाई जानता हूं, रतनजी। ये अफ़सर पहले पकड़ते हैं, अंगुली। फिर पकड़ते हैं, पुणचा। बस, सच्चाई यही है कि, मोहनजी को जो साथी अपनी गाड़ी पर बैठाकर ले जाएगा.... उसे, इनके सभी बकाया काम करने होंगे।

ओमजी – मुझे कब इनको, अपनी पीठ पर बैठाकर ले जाना है ? मोटर साइकल पर बैठाकर ले जाना है, और यह मोटर साइकल चलती है प्योर पेट्रोल से। [मोहनजी से कहते हैं] मोहनजी, क्या आप गाड़ी में पेट्रोल भरवा देंगे ? फिर आप जहां कहेंगे, वहां पहुंचा दूंगा। कहिये, आप तैयार हैं ?         

[मोहनजी ठहरे, कंजूस इंसान। ख़र्चा करने वाले नहीं, फिर वे इस सवाल का ज़वाब कैसे देते ? बस, फिर क्या ? उनके रास्ते के बीच में रोड़ा बनकर आ रहे यात्रियों को एक ओर धकेलते हुए, वे तेज़ी से आगे बढ़ जाते हैं। मोहनजी को तेज़ी से चलते देखकर, टिकट कलेक्टर को इनके बेटिकट यात्री होने का संदेह हो जाता है। वह उनको पीछे से, आवाज़ देता हुआ उनके पीछे दौड़ता है।]

टिकट कलेक्टर – [आवाज़ देता हुआ] – अरे, रुक जा। टिकट दिखाता जा। अरे यार, मत हो नौ दो ग्यारह।

[इधर इनके साथियों को चाय न मिलने के कारण, वे सब उनको पीछे से आवाजें देते हैं]

सभी साथी – [ज़ोर-ज़ोर से, आवाजें देते हैं] – पैसे देते जाओ..पैसे देते जाओ। ओ मोहनजी, चाय के पैसे देते जाओ।

[इनकी आवाजें सुनकर, मोहनजी घबरा जाते हैं। उनको ऐसा अहसास होता है, के ‘अब ये कुचमादी के ठीकरे, ज़रूर उनकी जेब से पैसे निकलवाकर ही रहेंगे।’ यह विचार इनके दिमाग़ में आते ही, वे अपनी गति बढ़ाकर और तेज़ चलते हैं। बचने के चक्कर में वे ध्यान रख नहीं पाते, के ‘वे किस आदमी से टकराते हुए, आगे बढ़ रहे हैं ?’ उतावली में वे एक कुली से टकरा जाते हैं, इस टक्कर से कुली की आंखो पर लगा ऐनक ज़मीन पर गिर जाता है। मुसीबतें आती है, तो एक साथ आती है। आस-पास चल रहे यात्रियों के पांवों के नीचे, उस बदक़िस्मत कुली का ऐनक बेरहमी से कुचल दिया जाता है। वह बेचारा कुली, इस नुकसान को कैसे बर्दाश्त कर पाता ? वह चिल्लाता हुआ मोहनजी के पीछे दौड़ता है, मगर ऐनक के बिना उसे साफ़ दिखायी नहीं देता..खुदा की पनाह, वह मोहनजी के स्थान पर आगे चल रहे एक नाज़र को पकड़ लेता है। आगे क्या होता है, बेचारे की बनी बनायी इज्ज़त..?]

कुली – [दौड़ता हुआ, कहता हाता है] – ओ मूंछों वाले बाबू, ठहर जा, अरे यार, मत हो नौ दो ग्यारह। झट दे दे प्यारे, ऐनक के पैसे। [सामने चल रहे नाज़र को मोहनजी समझकर, वह कुली नाज़र के ब्लाउज़ को उनका कमीज़ समझकर ज़ोर से खींचता है। फिर फटकारता हुआ, उसे कहता है।]

कुली – [फटकारता हुआ कहता है] – अरे मूंछ्यों वाले मुए, पैसा देता जा..साला चार सौ बीस, नहीं देता है तो..

नाज़र – [ताली पीटता हुआकहता है] – अरे ठाकर, तू....? पैसे तो अभी तू देगा रे, नहीं तो खोल देती हूं तेरा पेंट। फिर, नचाती हूं तूझे....

[वह नाज़र एक झट झटका देकर, अपना ब्लाउज़ छुड़ा लेता है..फिर उस कुली की पेंट पकड़कर, चेन खोल देता है। इस मंज़र देख रहे यात्री-गण, तमाशबीन बनकर वहीँ खड़े हो जाते हैं। फिर, इस खिलके को देखते हुए तालियां पीटते जाते हैं। इस हुड़दंग से पीछा छुड़ाता हुआ, वह कुली उस नाज़र को धक्का देकर मेन गेट की ओर तेज़ गति से बढ़ता है। ख़ुदा जाने, इस बार वह कितने लोगों से टक्कर खाता हुआ आगे बढ़ रहा है ? बेचारा कुली ज़ोर-ज़ोर से मोहनजी को आवाज़ देता हुआ, उनका पीछा करता नज़र आता है।]

कुली – [दौड़ता हुआ, आवाज़ देता जा रहा है] – अरे, ओ मूंछ्यां वाले बाबू। पैसा देता जा, पैसा देता जा। अरे यार, मत हो नौ दो ग्यारह।

[मेनगेट के बाहर बैठे भिखारियों के झुण्ड को, ऐसा लगता है के ‘कोई दान-पुण्य करने वाला धर्मात्मा आदमी इधर से गुज़र रहा है...? जिसके पीछे बराबर, टिकट कलेक्टर, कुली और मोहनजी के साथी पीछा करते जा रहे हैं ?’ बस, फिर क्या..? जैसे ही मोहनजी गेट से बाहर निकलते हैं, वे सारे भिखारी उनके पीछे लग जाते हैं। और उनके पीछे-पीछे, टिकट कलेक्टर मोहनजी को ज़ोर से आवाज़ देता हुआ बाहर आता है।]

भिखारी – [एक साथ] – ओ बाबू पैसा देता जा, अल्लाह के नाम से।

टिकट कलेक्टर – [जोर से आवाज़ देता हुआ, कहता है] – ओ मूंछ्या वाला बाबू, ज़रा टिकट दिखाता जा। अरे यार, मत हो नौ दो ग्यारह।

[इन भिखारियों को मोहनजी के पीछे दौड़ते देखकर, रास्ते में खड़े कुत्ते भी उनके पीछे लग जाते हैं। इधर कुत्ते भौंकते हैं, तो उधर भिखारियों के पुकारने की आवाज़। और उनके पीछे, बेचारे टिकट कलेक्टर की आवाज़। बस, चारों ओर कोलाहल में एक ही आवाज़ गूंज़ती है अरे यार, मत हो नौ दो ग्यारह। थोड़ी देर बाद, मंच पर अंधेरा छा जाता है।]

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रचनाकार: [मारवाड़ का हिंदी नाटक] यह चांडाल चौकड़ी, बड़ी अलाम है। लेखक दिनेश चन्द्र पुरोहित - खंड तीन
[मारवाड़ का हिंदी नाटक] यह चांडाल चौकड़ी, बड़ी अलाम है। लेखक दिनेश चन्द्र पुरोहित - खंड तीन
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