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बदकिस्मती को कहिये तो क्या कहिये - अरुण कुमार प्रसाद

1.    बदकिस्मती को कहिये तो क्या कहिये
2.    उसके घर में
3.    दोस्ती के रिश्ते
4.    ख़ुदा मुझको देना
5.    मनुष्य सा संवार दो या......
6.    तुम
7.    ॐ
8.    ये चमचमाते लोग
9.    आदमी वृक्ष का खुला ख़त मनुष्य को
10.    तुम गा देना
11.    बचपन     
12.    लोग मिट्टी के बने हैं
13.    विवादास्पद मुस्कान
14.    हाईकू_ अँधेरा पक्ष
15.    गाँव-बेटी
16.    वस्त्र का होना विवस्त्र
17.    गीत_ रात निगोड़ी



1--बदकिस्मती को कहिये तो क्या कहिये


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मगर इस बदकिस्मती को कहिये तो क्या कहिये!
हम मिले मगर,अपनी ही जमीन नहीं है पांव तले.
धमका-डरा देगा यह आकाश यह हवा क्या जानें?
सहम जायेंगे हम,हम तो अच्छे शिशु जैसे हैं पले.
कितना बदनसीब है पहाड़ की वह अल्हड़ लड़की.
आका को ताकती है,कि अच्छे लगे लड़के से मिले कि न मिले.

साहित्य का रिश्ता शब्दों का नहीं पीड़ा,दर्दों का है.
रुकते नहीं ये रिश्ते जब दर्द आंसू बनकर निकले.
देश,काल,धर्म,लिंग,रंग,शक्ल से परे है रचनाकार.
क्यों करेंगी सरकारें तय ये जुड़वें बच्चे मिलें न मिलें.
मगर इस बदकिस्मती को कहिये तो क्या कहिये?
हम मिले मगर,अपनी ही जमीन नहीं है पांव तले.

वक्त गरम लोहा है कि लोग आओ यह तय कर दो.
सहारा और संरक्षण आ जीवन के सारे गड्ढे भर दो.
झांकता रहा अजनबीपन आँखों से संरक्षण होने तक.
रहा नहीं तो दोस्त और दोस्ती की बातें आ झलके.
कैसा अजीब हादसा हुआ इस अच्छी जिन्दगी में.
आदमीपन जो था आदमी में वह टूटे-फूटे निकले.

उम्र का अहसास कराता सोचों का दर्द कि जोड़ों का?
दर्दों के कोख से जो उमर निकले सब मरे निकले.
समय की बोतलों के काग खुलें,धमाका हो हादसा है.
उम्र की चाहत है वह जब निकले अपनों सा निकले.

घृणा और युद्ध के लिए नहीं भरे हैं लोगों ने टैक्स.
लड़ें सत्ता और कुर्सियां और दम हमारे निकलें.
धूप बूढ़ा नहीं होते हैं हम,होता है मन का देह.
जीवन की तपिश बर्दाश्त नहीं होती कैसे जलें!

मर्दानापन की परिभाषा गई बदल कब पता नहीं.
मर्द वह जो करे बलात्कार मर्दों का दिन-दुपहरी,साँझ ढले.
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2--उसके घर में


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अब तो नहीं किन्तु,तब तो हिसाब होगा.
उसके जहाँ में होंगे जब,तब जबाब होगा.

पढ़ो मर्शिया या गीता हर गुनाह शक्ल लेगा.
मेरी जिन्दगी का लोगो यही एक सबाब होगा.

भई हर सितम तुम्हारा तेरा जख्म होगा साबित.
जिए जख्मी जिन्दगी हो,अफ़सोस आह! होगा.

कोई करम,रहम या कोई वफा तुम्हारा.
शायद ख़ुदा तुम्हारा तब ज्यों जनाब होगा.

सचमुच यहाँ कयामत एक रोज जरुर होगा.
तेरी ही जिन्दगी तब तेरा किताब होगा.

देखोगे अपनी करतूतें जब उस जहाँ से लोगो.
मन ग्लानि से सोचो कितना खराब होगा.

अच्छे विचार रखकर अच्छे आचार करना.
मन हो प्रसन्न तब क्या नहीं लाजबाब होगा.

सो लफ्ज भी निकालें तो आदमी की भांति.
कोई गवाह न हो पर,आफ़ताब होगा.

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3--दोस्ती के रिश्ते


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दोस्ती के रिश्ते मैंने देखे उधेड़ कर जब.
दोस्तों ने खुशियाँ बांटे गैरों ने दर्द बांटे.

सूरज की रौशनी से जब फूटा सिरफ़ लहू था.
ये थे अँधेरे जिसने मेरे गम के अँधेरे बांटे.

दर्दों के कोख दोस्तों ने जितने सके हैं पाले.
वे गैर थे सड़क के जिसने हैं दर्द बांटे.

जिन्दगी की ख़ुशी,गम के हिस्सेदार हमने देखे.
हम दोस्त हैं वे दुश्मन रिश्तों ने ऐसे बांटे.

दर्दों के रिश्ते ऐसे कि दुश्मन से मिला देता.
दुश्मन ने दोस्ती तब,अपनों ने गर्द बांटे.

खुशियों से जुड़ा रिश्ता,ठहरा हुआ पानी है.
अपनों ने दर्द,पीड़ा कुछ ब्याज कर्ज बांटे.

अच्छों तथा बुरों को रिश्तों ने तय किया है.
इस काव्य के खण्डों को दर्दों ने सर्ग बांटे.

उनकी निगाह कैसी,इनकी निगाह कैसी.
चाहे दोस्ती या दुश्मनी दर्दों न्र गरज बांटे.

कुर्बान जाँ को करना या इनको नहीं लुटाना.
लोगों ने नहीं बांटे रिश्तों ने फ़र्ज बांटे.
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4--ख़ुदा मुझको देना


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ख़ुदा मैंने तुमसे इतना कहा था.
मुझे जीस्त देना नहीं ताज देना.

सरल मन देना सबल तन लेकिन.
कभी किन्तु, न नखरे न नाज देना.

जीने के क्रम में मरें सौ दफे भी.
पर,मृत्यु में जीवन का अहसास देना.

जीवन में जय जो नहीं दे सके तो.
जीवन में पर, गिरने न गाज देना.

जो चाहे कांच सी बाँहों को उसको सौष्ठव देना.
मुझको पर, जीवन में हमराज देना.

चलना है मुझको तप्त तपे रेत पर.
साथी ख़ुदा मुझको जांबाज देना.

ख़ुदा मुझको जीने का अंदाज देना.
गजल देना मुझको मुझे साज देना.

हर्फों ने तरकीब बयाँ का न जाना.
इन ओठों को मीठी सी आवाज देना.

इस मुहब्बत में जिस्मानी बू है भरी.
मुझको इश्वर के मर्मों का राज देना.

जिक्र मस्जिद का मन्दिर का होता रहे.
मुझको इंसानियत की बस लाज देना.
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5--मनुष्य सा संवार दो या......


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आ शिव मैं तेरा श्रृंगार कर दूँ.
सुलझाकर तेरी जटाओं को
गंगा की अजस्र हर धार धर दूँ.
चन्द्रमा को सजा किरीट सा
सारा लौकिक सौन्दर्य बेकार कर दूँ .
ग्रीवा में डाल विषदंत भुजंगें
सृष्टि के विषपायी हो
कथन यह साकार कर दूँ.
आ शिव मैं तेरा श्रृंगार कर दूँ.

नग्न देह पर भस्म लपेटूं
व्याघ्र चर्म से कटि को ढंककर
समाधित्व को तैयार कर दूँ.
सारी उर्जा अन्तरिक्ष का
भर ललाट में
सृष्टि,स्रष्टा सारे कुछ का
सच्चा सा चौकीदार कर दूँ.
बिल्व पत्र में भरी औषधि
भंग,धतूरे में छुपा हुआ जो
खोज-बीनकर नया नया
आविष्कार कर दूँ.
नाद प्रथम डमरू में तेरे
दूँ भर मैं
सप्त स्वरों का मधुर ध्वनि में
वह मैं होऊं और इसे प्रसार कर दूँ.
आ शिव मैं तेरा श्रृंगार कर दूँ.
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6--तुम


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तुम्हारा लब अस्थिर पात सा चंचल,चपल है.
कि बोलो कुछ तो बोलो, प्यार होगा ज्ञात कैसे.

अँधेरा रौशनी से कर रहा था बात क्योंकर !
लगाना सीखता था कौन जाने घात कैसे !

महल चल झोपडी के पास आये.
उसे है ज्ञात, लगता है किसे आघात कैसे !

किये तुम दर्द की बातें, पहाड़े दुःख के बोले.
नहीं तुम! है तुम्हारा अक्स हो यह ज्ञात कैसे.

नजर मिलना निगाहों का बड़ा वाचाल होना.
मुहब्बत है नहीं यह, हो सके यह बात कैसे.

तुम्हें देखा, शरम से फूल ने भी मुँह छिपाया.
तू इतनी बेशरम होगी ये होता ज्ञात कैसे.

तुम्हारे लब लबालब, देह भी सौन्दर्य से है.
तुम्हारा दिल नहीं ऐसा, होगा ये बात कैसा.

तुम्हारा जिस्म घायल शेरनी सा क्रोध में है.
नहीं रोको न मुझको, यूँ बनेगी बात कैसे.

कलम लिखता ख़ुदा का नाम आया है सियाही से.
ख़ुदा के नाम में होवे कहो जज्बात कैसे.

बड़े हो बेबफा एवं बड़े बेदर्द हो तुम.
तुम्हारे बिन गुजरता क्या कहें दिन-रात कैसे.

तुम्हारा प्यार शीतल,चाँद सा निर्मल, धवल है.
करो तुम प्यार,होगा नेह का बरसात कैसे.

तेरा सौन्दर्य जलते सूर्य सा दाहक प्रबल है.
पिघल जाये न ये मन, हो सके यह बात कैसे.

तुम्हारा प्रणय पागल चैत सा बौरा रहा है.
न भंवरे को न रोको, दे सकेगा वह तुम्हें सौगात कैसे.

तुम्हारा हुस्न दहके आग सा हिंस्र हो उठा है.
न दूँ मैं इश्क का खून हो सके यह बात कैसे.

तेरा मन चोट खाए नागिन सा प्रतिशोध में है.
उठाकर सौंपता अपना तुम्हें यह गात कैसे.
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7--ॐ


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जंगल होता जा रहा है अतीत।
सुग्गा चोंच उठाये बैठा।
तड़प रहा है तीव्र क्षुधा से।
गिलहरियाँ हाथों में पत्थर के टुकड़े उठाये
दाँतों को तोड़ता अपना वर्तमान जीने की
कर रहा है जी तोड़ कोशिश ।

गमलों में वन उगाते हुए
गौरव से ऊँचे उठे माथों को
देख देख कर हैरान है।
नदी और हवा गलबाँही दिए
लौटने की तैयारी कर रहे हैं
अपने ठौर को वापिस।
सचमुच उन्हें रोकना है।
उन्हें रोकना,उन्हें नहीं
दरअसल अपने आपको रोकना है।

आईये
इन्हें किताबी होने से
रोकें हम।
पुरातत्वविद खुदाई करके
हमारा इतिहास जोड़ें-
ऐसी प्रतीक्षा करना ।
हमारा आज का गुनाह है।
हमें अपना इतिहास उत्तरदायित्व की भाँति
सौंपना चाहिये।
वनों को गमलों से उठाकर
धरती पर भी बोना चाहिये।
______________________


8--ये चमचमाते लोग


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यातना की तंद्रा से अलसायी आंखों में।
वासना के लाल डोरे खोजते हैं लोग ।

संत्रास व संताप से सिहर उठे अंगों में।
यौवन का आमंत्रण खोजते हैं लोग ।

यंत्रणा के तनाव से तने रगों,जिस्म में।
संभोग के साथ के अवसर खोजते हैं लोग।

पीड़ा की साँसों से उभरे हुए वक्ष में
वात्सायन के कामसूत्र खोजते हैं लोग।

कल की टूटन और आज के घुटन से बिखरे जुल्फों में
साँझ की सर्वजयी शीतलता खोजते हैं लोग ।

अनास्था के प्रहार से ठहर गये मन में
अपने लिए आकर्षण खोजते हैं लोग।

आतंक के अहसास से सहमे हुए भंगिमा में
हिरनी की कुलांचें मारती अदा खोजते हैं लोग ।

दमन की चक्की में पिसकर स्तब्ध देहयष्टि में
सौन्दर्य का खजुराहो खोजते हैं लोग ।

भावनाएँ मरी हुई मछली की तरह गँधाता है
पर, पढ़े हुए शब्दों के अर्थ यहीं खोजते हैं लोग।

इन दहशतजदा,युगों से शोषित,दलित लोगों के
शोषण,दमन में भी अपने लिए सुख खोजते हैं लोग।

अभाव और भूख से चाहे त्रस्त हों व परेशान
अर्थ और रोटी से वे,सुख ही सुख खोजते हैं ये लोग ।
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9--आदमी


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बहुतेरे उधेड़बुनों का लम्बा इतिहास है आदमी।
और जिन्दगी से उठता हुआ विश्वास है आदमी।

मुट्ठी भर राख के सिवा शायद कुछ नहीं और है।
हर चौराहे पर एकाकी खड़ा हताश है आदमी।

शवदाहों में दहन के लिए सजाता रहा है तन।
सच यह है कि मन में सूखा पलाश है आदमी।

टूटेगा ही गणित का भ्रम और भ्रम का गणित।
जिन्दगी से जिन्दगी तक केवल तलाश है आदमी।

भीड़नुमा सपनों को बुनते हुए जीता, जागता है।
कपूर सा उड़ना है,व्यर्थता भरा नि:श्वास है आदमी।

ताजिन्दगी सय्याद है,नाशादहै,प्यास है हर आदमी।
दरअसल,पूरी जिन्दगी झेलता हुआ संत्रास है आदमी।
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अरूण कुमार प्रसाद,


10--वृक्ष का खुला ख़त मनुष्य को


______________________________
बुनियादी तौर पर
मानवीय सृष्टि का सर्जक और संवाहक
मैं, वृक्ष।
था और हुँ और रहुँगा।
सृष्टि में मैं संभावनओं का समुन्दर।
आज भी।

कभी यदि ऐसा हो कि
मैं या मेरे जैसे लोग
कटे हुए वृक्षों की संज्ञा लेकर
हो जायें धराशायी तो
संभवतः तुम सोच नहीं पा रहे कि
इस गोल-मटोल पृथ्वी का
क्या होगा हश्र।
इसे पृथ्वी की तरह पहचाननेवाला ही कोई
न होगा।

इसलिए
आकाश,पाताल,तल,धरातल,कोण,त्रिकोण
सभी आयामों में
हल्ला करो कि
वृक्ष है जैविक सृष्टि का सर्जक और संवाहक।
अतः आनदोलन करो इसे बचाने हेतु-
फैलओ इस सत्य का चिराग शब्दों में,कर्मों में।
गिरकर एक कटा हुआ वृक्ष
धरती पर
मृत होने से पूर्व
कहता है
गर्व कर रहे मनुष्य से कि
तुमने मेरे देह पर नहीं चलाई है कुल्हाड़ियाँ
बल्कि चलाई है अपने पैरौं पर कुल्हाड़ियाँ।
जो जख़्म तूने लिए हैं स्वाभिमानी
उनमें यथा समय भरेगा मवाद,भरेंगे ही।
तुम लँगड़ाओगे,लड़खड़ाओगे।
फिर भरेगा पूरे जिस्म में मवाद का जहर।

मुझे भी पूरी जिन्दगी जीने की चाहत थी।
यूँ अकाल मृत्यु मर जाऊँगा सोचा न था।
मेरी नियति यह तो नहीँ थी
जो कर दिया तुमने।

यदि मैं कठोर होता!
काश! मेरा तन कोमल न होता।
पर,तब मैं पत्थर होता-
संवेदना शुन्य।
फिर मेरे होने, न होने का
कोई अर्थ न होता।
और ब्रह्मा का यह विशाल ब्रह्मांड
होता स्पन्दनहीन।

न होते हवा के झोंके न बरसते मेघ
सर्वत्र नीरवता।

मेरी उम्र पूछकर अपना अपमान न करो।
मेरे उम्र का गणित तुम्हारे वर्षों का हिसाब है
गणना करो।

मैं अभी जवान हुआ हूँ।
खोज रहा हूँ जीवन संगिनी।
उसे हँसाना है,गुदगुदाकर हँसाना है।
अपनी उपस्थिति से
तमाम प्रतिकुलताओं के विरुध्द
करते रहना है आश्वस्त।

मुझे उम्र की लम्बी दहलीज पर
उम्र के तमाम अनुभवों को
अनुभव करने की है तमन्ना।
ऐश्वर्य प्राप्ति की नहीं,
न तो सम्राट होने की।

मैं नदी की चौड़ाई का दुश्मन।
मैं जो वृक्ष की सारी जीवन्तताओं के साथ
वृक्ष की गरिमा से अभिभूत खड़ा हूँ,
उसे काटकर
कर दोगे लाचार और बेबस।

अकाल मृत्यु की यंत्रणा और अहसास
भयंकर है अतीव।
मुझे इस भयंकर व्यथा झेलने के लिए
विवश करने को कटिबध्द तुम।

नदी की धारा मैं अपने लिए नहीं
तुम्हारे लिए रोक रहा हूँ।
कि तुझे जीवन का आदि रस हो प्राप्त
तेरी धरती अक्षुण्ण रहे
सागर में न बिला जाय।
बरकरार रहे तेरी हवाओं में शीतलता।
शुष्क होकर,गर्म होकर
न भर दे रेत तेरे अस्तित्व पर।

लगायगा प्रश्नचिन्ह तुझ पर
तेरी करतूतें।
अतः क्रूर न होवो।
तुम्हारी क्रूरता में चाहे जितनी क्षमता हो
तुम्हारे अहम् को संतुष्ट करने की
अन्ततः मुझे काटकर
अपना विनाश रोपोगे।

पत्र के अन्त में लिखता हूँ,
जैसा कि तुम भी लिखते हो।
-थोड़ा लिखा -ज्यादा समझना
शेष को शुभ रहने दो।
------------------------------------------



11--तुम गा देना


______________________
जब-जब मैं लिख दूँ गीत
जरा तुम गा देना।
अरूण-किरण सा फैलेगा यह
गाकर मुझे जगा देना।
मेरा कवि जीवंत रहेगा
जब जब तुम यह गा दोगी।
मूक रहूँ मैं चाहे जितना
मुखर मुझे तुम कर दोगी।
मैं,मेरा जीवन सारा कुछ
तुम परिभाषित कर दोगी।
राग,द्वेष अन्तर का सारा
गा के प्रदर्शित कर दोगी।
सत्य कहूँगा दुनिया का जो
गाकर सब को कह देना।
विष्णु सा छल कैसे करता
राजनीति बतला देना।
शिव के शव होने की कथाएँ
मन से मेरे ले लेना।
कौन? बनाता शिव को शव है
‘मनु’ की गाथा कह देना।
क्यों नहीं? शिव सुन्दर हो पाते
सत्य असत्य से घिरकर क्योँ?
जँगल-जँगल भटक रहे शिव
गा देना,यह ज्यों का त्यों।
मेरे मुख से स्वर फूटें तो
यश,सौन्दर्य तुम्हारा गावें।
बिखरे मेरे सोच सुधरकर
छन्द-छन्द में ये भर जावें।
शब्द मेरे मानवता के हों
शब्दों में व्यक्ति दौड़ें।
मेरा कुछ भी नहीं रहे सब
तेरे हित ही हम छोड़ें।
विपदाओं से झुके न कोई
गा-गाकर इसको बतलाना।
उनके अन्दर भी अर्जुन है
गीता गाकर समझाना।
ब्रह्मा ने क्या?श्रेष्ठ, अन्तज्य में
सृष्टि विभाजित कर डाला?
नहीं-नहीं, व्यक्तित्व बनाया
सुन्दर रचना में था ढाला।
हास्य-रुदन सुख-दुःख की कविता
उन्हीं सुरों में गा देना।
मेरे अन्तर्मन के मंथन को
सागर-मंथन कर देना।
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12--बचपन


----------------------------------------
चंदन समान शीतल सपना।
ललचाता है बचपन कितना!

वह भोला मन,छोटा सा तन।
वह हास और निर्दोष रुदन।

क्षण-क्षण में तन जाना मेरा।
फिर तुरत मचल जाना मेरा।

वह दीप जलाना चौखट पर।
झोंकों से बचाना औ’ चटपट।

वह ब्याह रचाना गुड़ियों का।
वह साज सजाना परियों सा।

वह भग्न घरौंदे पर रोना-।
वह नग्न धरा पर जा सोना।

वह सुलह मात से लिपट-लिपट।
फिर वह मेरा विद्रोह विकट।

वह लाड़ लगाना तुतलाना।
उस क्षण रुपया,इस क्षण आना।

वह कंचे का सौन्दर्य मुझे।
भूला नहीं है आश्चर्य सखे।

वह दौड़ कबड्डी का अपना।
आ छू,आ छू, ले छू कहना ।

वह आँख मिचौली,प्रेम-प्रणय।
वह लघु गुल्ला में धन संचय।

वह झूम-झूम पढ़ना-लिखना।
नित भोर होड़ में वह रटना।

वह उछल-कूद वह धूम-धाम।
चंचल तन,मन वह आठ याम।

वह बाग-बगीचे का झूला।
मुझको न आजतक है भूला।

वह दादी माँ का गोद लाड़।
वह कथा कहानी औ’ दुलार।

वह रात-रात तक का जगना।
वह डरना और दुबक रहना।

वह छाया मुझे डराती थी।
कभी कितना और सताती थी।

वह चक्रव्यूह की संरचना।
जागी आँखोँ का वह सपना।

आ-आकर यूँ सहलाता है।
अब कितना मुझे सताता है।
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13--लोग मिट्टी के बने हैं


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लोग मिट्टी के बने हैं, सोचते सोने के हैं।
यह अहम् की भावना सबमें नहीं अच्छा हुआ।
कौन काबिल आदमी है और नाकाबिल है कौन?
तय किया जाना नहीं मुमकिन हुआ, अच्छा हुआ।
तख्त जिसपर तुम हुए आसीन,वह तेरा न था।
गिर गये तुम,तुम समझ पाये न यह अच्छा हुआ।
सिंग पर बकरी के रख कर पैर तुम उपर उठे।
शख्सियत ऐसी कहाती सफल,कह,ये क्या हुआ?
कितने शिकवे थे शिकायत,कह न पाये हम खुदा।
बिन कहे ही जिन्दगी यह कट गयी, अच्छा हुआ।
हर घुटन, संत्रास, पीड़ा शान्त रहकर पी लिए।
तोहफे मंजूर हम ये कर लिए अच्छा हुआ।
कौन है वह बोझ जैसी जिन्दगी जिसकी कटी।
वह नहीं थे,यह हमारी थी यही अच्छा हुआ।
तख्त जिसपर तुम हुए आसीन है वह गिर गया।
तुम गिरे हो,साफ कहना ना पड़ा अच्छा हुआ।
गर्व में इतना ना डूबो,गर्व ही तेरा नाम हो।
सूर्य को भी ग्रहण लगता,बस यही अच्छा हुआ।
__________________________________





14-विवादास्पद मुस्कान


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आईये, विवादास्पद मुस्कानों की बातें करें।
इनमें बड़ा मजा है।

युवक ने युवती को ‘टहोका’
वह बहुत हल्के मुस्कुरायी।
हिकारत से?
शर्म से गड़ी-गड़ी?
सौन्दर्य व प्रणय के गौरव से?
या बस यूँ ही-
मुस्कुराने के उम्र के कारण?

बहस करते रहे लोग,वह मुस्कुराती रही।

मानव-जात के सिवा
क्या और कोई मुस्कुराता होगा?
पता नहीं प्रश्न हो या उत्तर?

इस महान रहस्य को प्रतिपादित करने वाला
बड़ी निरीह सी मुस्कानों से मुस्कुराता होगा!
आत्म-विश्वास है नहीं,
कृपाकांक्षी लोग मुस्कुरायेंगे तो उधार लेकर।

पक्ष,विपक्ष के लोग
मिलें मुस्कुराय़ें
कौन किसके लिए मुस्कराता
ज्ञात उन्हें भी नहीं।
उनके मुस्कान विवादास्पद हैं।

मुस्कानों से खुशी ही नहीं सिर्फ,
दुःख भी होता है जाहिर।
राजनीति और कूटनीति भी
भविष्य का संकेत या भूत का उपहास।

किसी अन्तरँग क्षणों की यादगार की
मुस्कुराहटों से
चेहरे पर शुद्ध रक्त होगा फैलता !
या राजनैतिक और कूटनैतिक होने से
डरा सहमा, खून का कतरा।

हँसा तो ‘गब्बर सिंह’ भी था
और ‘कालिया’ भी।
अब बताये कोई कि
एक ही हँसी के
दो अर्थ कैसे हुए।

तो कहना है कि
विवादास्पद मुस्कानों के बारे में
बात करते रहें हम।
और आईये मुस्कुराते रहें हम।
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15--हाईकू_ अँधेरा पक्ष


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अँधेरा पक्ष।
सनातन धर्म का।
हिन्दुत्व ही है।

विष्णु का दाढ़
बचा निकाल लायें।
गुण्डों से धरा।
उड़ी चिड़िया।
वृक्ष कहीं ना मिला।
गिरी चिड़िया।

हो गया छुद्र।
यूँ भारत महान।
बनाया शुद्र।

त्रेता सा युग।
कलि से बदतर।
खून से रँगा।

नारी का हंता।
पुरूषों में उत्तम।
क्षय श्रीराम।

तीसरी आँख।
खोल दे यदि शव।
जलेगा शिव।

हो गया छोटा।
अकबर महान।
बढ़ा के लक्ष्य।

इन्सानी युग।
संविधान में लिखा।
कहाँ खो गया?

नदी मचली।
आँसू से जब भरी।
सागर चली।
भींगा-कलम।
रौशनाई से नहीं।
आँसू से मेरे।

हाथ की रेखा।
कुदाल पर घिसी।
हो टेढ़ी-मेढ़ी।

आम आदमी।
सड़क सा पसरा।
बस हैरान।

अमीरी गर्व।
काश! गौरव होता।
सौरभ होता।

शिव खोलें तो।
विशाल अनाचार।
भस्म हो अब।

ये योग गुरु।
लगा बैठै दुकान।
सेहत कम।
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16--गाँव-बेटी


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जिसकी हर जिद
बेटे के फरमाईस के बाद
पूरी किए जाने का
आश्वासन जाता है दिया
वह गाँव की तरह
बेटी है-सपाट,सरल।
परम्परा तो यही है-
बाप निभाता है।
माँ कहती है अत:
बेटी भी मानती है
और तब्दील हो जाती है
गाँव में।
परम्परा तो यही है।
माँ! उठो,
बेटी को विद्रोह सिखाओ।
परम्परा के आड़ में हो रहे
इस सामाजिक व मानवीय असमता के विरूद्ध
बेटी की इच्छाओं और आकांक्षाओं को
विरोध का जूडो और कराटे सीखने को
उत्प्रेरित व उत्तेजित करो।
नहीं तो होता रहेगा
बेटी के सपने में आयेवाले
रथारूढ़ राजकुमार
बैलों को हाँकता हुआ
हल चलाता
अनगढ़ किसान सा
परम्पराओं को
ठेलता एक और
जिद्दी बाप।
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17--वस्त्र का होना विवस्त्र


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वह नहीं थे कभी।
वस्त्र जब पहन लिए
कुलीन हो गये मियाँ।
विवस्त्र, वस्त्र पर हुआ।
देह का छुअन उसे (वस्त्र को)
तेजाब की तरह लगा।
विवश सा चीखता हुआ
फटे में बेंच के फँसा।
            


18—गीत_ रात निगोड़ी


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रात निगोड़ी दिल दहलाये
चाँद आग बरसाये सखि री!
मैं विरहिन कुछ कह भी न पाऊँ।
गीत देह सुलगाये सखि री!
पलक हुए अपलक, आँख ये
पथ से प्रीत लगाये है।
हर आहट पर पुलकित होऊँ
मैं इतनी सम्मोहित सखी री!
जिस तारे से पूछूँ उनको
वे ही आँख चुराये सखी री!
हवा?हवा का ना कह देना
सोये जख्म जगाये सखी री!
चाँद अगन बरसाये सखी री!
गीत देह सुलगाये सखि री!
पूरा नभ ही बैरी लगता
विरह कहीँ न समाये सखि री!
फूल भी शूलोँ सा चुभता है
यादें मन तड़पाये सखि री!
चाँद अगन बरसाये सखी री!
गीत देह सुलगाये सखि री!
विरह कहीँ न समाये सखि री!
यादें मन तड़पाये सखि री!
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अरुण कुमार प्रसाद

शिक्षा--- ग्रेजुएट (मेकैनिकल इंजीनियरिंग)/स्नातक,यांत्रिक अभियांत्रिकी
सेवा- कोल इण्डिया लिमिटेड में प्राय: ३४ वर्षों तक विभिन्न पदों पर कार्यरत रहा हूँ.
वर्तमान-सेवा निवृत
साहित्यिक गतिविधि- लिखता हूँ जितना, प्रकाशित नहीं हूँ.१९६० से जब मैं सातवीं का छात्र था तब से लिखने की प्रक्रिया है. मेरे पास सैकड़ों रचनाएँ हैं. यदा कदा विभिन्न पत्र, पत्रिकाओं में प्रकाशित हुआ हूँ.
अरुण कुमार प्रसाद
Arun Kumar Prasad

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