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तरसती हैं आंखें - मोनिका शर्मा

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1-काबिलियत   सब्र रख कर कर न जाने कितने साल निकाल दिए राधा ने । कभी कहीं कहीं नौकरी की और कभी कहीं। ऐसा नहीं है कि उसके घर में किसी तरह की ...

1-काबिलियत

 

सब्र रख कर कर न जाने कितने साल निकाल दिए राधा ने ।

कभी कहीं कहीं नौकरी की और कभी कहीं। ऐसा नहीं है कि उसके घर में किसी तरह की कमी थी। मगर खुद की काबिलीयत सिद्ध करने की ठानी थी उसने ।राधा की शादी को 10 साल हो गए थे ।उसका पति मानव अच्छी मल्टीनेशनल कंपनी में नौकरी करता था ।उसने हमेशा राधा को आत्मनिर्भर बनने में मदद की ।

उसके ससुराल वाले हमेशा उसके साथ देते । राधा ने जब लक्ष्य को जन्म दिया तो सारा ध्यान उसके लालन-पालन में लगा दिया। खुद के लिए कभी समय ही नहीं निकाल पाई। राधा की नंद रेखा अपने आप को कम ना समझती थी ।

हमेशा राधा को नीचा दिखाने के अलावा उसके पास दूसरा कोई काम ही नहीं था ।राधा मन से अपने ससुराल वालों का ध्यान रखती उनकी सेवा करती।

राधा निम्न वर्ग के घर की लड़की थी जिसका विवाह उच्च वर्ग में हो गया था ।वहां के तौर तरीके सीखने में उसको समय लगा तथा उसने उन सब को अपनाया भी ।परंतु कभी इस बात पर घमंड नहीं किया अपितु अपनी वास्तविकता के धरातल को हमेशा याद रखा।

धीरे धीरे लक्ष्य बड़ा हुआ और स्कूल जाने लगा ।

मानव ने भी राधा को प्रोत्साहित किया कि तुम स्कूल में नौकरी क्यों नहीं करती, इस बहाने ही सही घर से बाहर भी निकलेगी, खुद की अपनी एक पहचान भी बनाओगी ।

राधा इसके लिए तैयार हो गई  और अपनी m.a. की किताबों को टटोलने लगी ।खुद को इंटरव्यू के लिए तैयार किया, मानव ने उसके साथ जाकर दिल्ली के कई स्कूलों में उसका सीवी डलवाया। तीन चार जगह तो उसका साथ साथ इंटरव्यू हो गया मगर नंबर कहीं नहीं आया ।कहीं उसकी कच्ची अंग्रेजी आड़े आ जाती, तो कहीं उसका बिल्कुल शुरुआत से कैरियर शुरू करना।

यहां तक कि उसने छोटे-छोटे क्रच में भी इंटरव्यू दिया ।कई दिनों बाद उसको एक स्कूल से फोन आता है,उसने मानव को  जब यह बात बताई कि मुझे आज ही इंटरव्यू के लिए जाना है, तो मानव खुश हुआ।

मानव ने उसे अपने शैक्षिक प्रमाण पत्र  अपने साथ ले जाने के लिए बोला ।राधा जल्दी से तैयार हो गई और मानव के साथ गौतम पब्लिक स्कूल पहुंची ।स्कूल में उसने खुद के नाम से उन लोगों को अवगत कराया। प्रधानाचार्य ने औपचारिक परिचय लेने के बाद उसको कक्षा में लेकर गई ।

राधा का यह पहला अनुभव था कि वह सीधे बच्चों के सामने खड़ी थी। राधा ने पहले ही लक्ष्य को कई कविताएं याद कराई  थी तो उसके दिमाग में अभी वही चल रही थी।

उसने प्रधानाचार्य के सामने बच्चों के साथ 2-4 गेम खेलें और वही कविताएं गुनगनाई।

प्रधानाचार्य को उसकी वह बात  बहुत पसंद आई ।

मगर पसंद नहीं आई तो उसकी कच्ची  अंग्रेजी, फिर भी प्रधानाचार्य  ने उसे प्राथमिक स्तर की शिक्षिका नियुक्त किया ।

मगर सैलरी बहुत कम थी। राधा इस बात से खुश  थी वह दौड़कर मानव  के पास गई और उसको सब बताया।  मानव ने उसे बधाई दी  घर में मिठाई का डब्बा लेकर पहुंचे ।

आज राधा बहुत खुश थी  ।

चलो कोई नहीं  पैसे  तो धीरे धीरे बढ़ ही जायेंगे। उसने  धीरे-धीरे स्कूल ,घर व बच्चा तीनों को संभाला ।लक्ष्य की भी देखभाल करती और घर  का काम भी करती पूरा ध्यान रखती।

एक दिन राधा की नंद रेखा बच्चों के साथ वहां आ गई ।

मैं ससुराल नहीं जाऊंगी कहने लगी।  मानव ने कहा घर तुम्हारा है  जब तक चाहे रहो।

राधा हमेशा अपने काम पर ध्यान देती, लेकिन एक दिन  का नजारा कुछ और था, रेखा के बच्चों ने अपनी मामी से  किसी महंगे  उपहार की मांग की।  रेखा ने  जवाब में बोला तुम्हारे मामा के आने पर  वह उपहार दिला देंगे  ।मगर  मेरे पास पैसे नहीं है । उस पर  रेखा बिलक कर बोली दो पैसै की नौकरी करने वाली, अपने पैसों का रोब जमाती हो ,मैं लाखों कमाती हूं ।

खुद को ज्यादा नौकरी  वाली समझ रही  हो।

दोनों के बीच में मानव आ गया, दोनों को समझाया। रेखा नौकरी दो पैसे की हो या हजार पैसों की नौकरी -नौकरी है। मगर आत्मसम्मान से बढ़ कुछ नहीं।।

हमारे समाज में न जाने क्यों शिक्षकों को जो भविष्य का निर्माण करते हैं कम सैलरी पर रखा जाता है यह उनकी काबिलीयत का गलत   मूल्यांकन है, जो कि शिक्षक संस्थाओं का गैर रवैया है।

शिक्षक जो समाज के लिए भविष्य का निर्माण करते हैं 2-2 पैसे 3-3 पैसे के लिए दर-दर   की ठोकरें खाते हैं । तुम इस बात को नहीं समझोगी क्योंकि तुमने वह दर्द नहीं समझा।

वह दर्द मैंने नजदीक से देखा है राधा में।

दिन रात काम में लगी रहती है अपना घर ,  अपना बच्चा,स्कूल ,स्कूल के बच्चे सब का भविष्य बनाने में ।

तुम इसे कम मत समझना । राधा मुझे तुम पर पूरा विश्वास है तुम बहुत बड़ी  शिक्षिका बनोगी और मेरी शुभकामनाएं तुम्हारे साथ है ।

मांजी पीछे खड़ी सब कुछ  देख रही थी उन्होंने रेखा को डांटा और राधा को बोला मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता कि तुम कितने पैसे कमाती हो, मगर  मुझे फर्क पड़ता है तो इससे कि मेरी बहू  आत्मनिर्भर है, मुझे तुम पर गर्व है।

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2- तरसती हैं आंखें


दिल को छू गई थी ,उस छोटी सी नन्ही परी की बातें   श्री के मन को।
स्कूल में आज अविका का पहला दिन था। अविका ने पहले  तो रोना-धोना मचाए रखा फिर धीरे -धीरे श्री के पास आकर बैठी। श्री बच्चों के साथ कभी छुक-छुक ट्रेन बनाती ,तो कभी पिकाबू खेलती ।
अविका को किसी भी खेलने में मजा नहीं आ रहा था ।
उसे चाहिए थी तो उसकी मां। उसने श्री से कुछ नहीं कहा ,मगर उससे बातें करने की इच्छा थी उसकी । श्री ने भी उसको पूरा -पूरा समय दिया, क्योंकि आज उसका स्कूल का पहला दिन था।

छुट्टी जल्दी हो गई थी,जब वैन अंकल आये अविका  का को ले जाने हैं तो  अविका ने जाते -जाते श्री के गाल पर एक चुंबन किया।

श्री इस अचानक आए प्यार से  हैरान थी, क्योंकि आज सुबह से अविका  सिर्फ उसको देखे जा रही थी, मगर बोलती कुछ ना थी।

अगले दिन जब स्कूल लगा श्री 5 मिनट लेट हो गईअविका ने पूरी क्लांस अपने सर पर उठा ली, लेकिन श्री के क्लास में घुसते ही चुप । श्री को कुछ कहती  न थी बस उसकी टेबल  के पास आकर खड़ी हो जाती और अंगूठा चूसने लग जाती

एक दिन श्री ने पूछा "अविका  क्या मेरी गोदी आना चाहोगी" अविका ने अपनी गर्दन हिला दी ।

श्री ओर बच्चों के साथ व्यस्त हो गई। तभी अविका की निगाहें जहां जहां श्री जाती उसके पीछे पीछे उसके पीछे श्री जाती उसके पीछे पीछे जहां श्री जाती उसके पीछे पीछे उसके पीछे निगाहें जहां जहां श्री जाती उसके पीछे पीछे  ही रहती ,फिर  जब सब बच्चे खाना खाने बैठे तो अविका ने  देखा मैम तो अपना काम कर रही है ,उन्होंने तो कुछ नहीं खाया उसने अपने टिफिन से रोटी का एक टुकड़ा बना कर श्री की तरफ बढ़ाया " मैम आप तालों श्री  को अविका की   प्यारी सी तोतली आवाज बहुत प्यारी लगी। श्री ने उस
के गाल पर प्यार किया और कहा "नहीं बेटा आप खाओ "।
अब तो जैसे अविका को पंख लग गए ,श्री से बोली आप मेरे घर चलोगी ,मेरे साथ खेलोगे। श्री ने कहा हां -हां क्यों नहीं मैं तुम्हारे साथ तुम्हारे घर चलूँगी लूंगी ।
अब तो अविका ने श्री को अपने घर की सारी बातें बताई ।
पापा कब ऑफिस जाते हैं मम्मी कैसे फोन में बिजी रहती है और गेम खेलती रहती है।
जब भी वह अपनी मां को उसके साथ खेलने के लिए कहती तो, वह कहती अभी  नहीं,या फिर आया के साथ खेल लो ,उसने अपनी छोटी सी डॉल की पिक्चर बनाकर सी डॉल की पिक्चर बनाकर भी दिखाई। आया के साथ खेल लो उसने अपनी छोटी सी डॉल की पिक्चर बनाकर  श्री को दिखाई।
मैम यह जो मेरी आया है ना यह सब खेलती है मैंने इसका नाम श्री मैम रख दिया  क्योंकि वह सब बच्चों के साथ खेलती है मम्मी की तरह फोन पर नहीं लगी रहती ।
तब अविका नेअपने मन का गुबार श्री के सामने रखा ।

श्री ने कहा मैं आज तुम्हारी मम्मा को यह बोल दूंगी कि वह अविका के साथ खेले अविका  डरते हुए कहा नहीं नहीं  आप उन्हें कुछ मत बोलना वरना मेरी मम्मा मुझे मारेगी ।
अविका ने कहा मैम मैं आपको मम्मी बोलूं । आप मेरी मम्मा बन जाओ ।श्री ने जैसी है सुना हंस हंस कर लोटपोट हो गई । बोली देखो क्लास में  मैं तुम्हारा ध्यान रखती हूं ना तो मैं यहां तुम्हारी मम्मा ,लेकिन घर पर तो तुम्हारी मम्मा है ना।

तब अविका ने अपने भोलेपन में बोला कोई बात नहीं उस मम्मा को कहीं बाहर  भेज देते हैं और श्री मामा को घर में रख ले आते हैं ।

श्री मन ही मन मुस्काई और उस प्यारी सी बच्ची के भोलेपन पर  उसको बहुत प्यार आया।
कैसे मां बाप है फोन में रहकर ,अपने बच्चों का बचपन खो रहे हैं ,उनको बढ़ते देखना ही नहीं चाहते ,जैसे फोन ही सब कुछ हो गया है उनके लिए।

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मोनिका शर्मा



ईमेल- monika.monika201583@gmail.com

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रचनाकार: तरसती हैं आंखें - मोनिका शर्मा
तरसती हैं आंखें - मोनिका शर्मा
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