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दर्द पलायन का - विकास पाण्डेय

बनारस आने के लिए बलिया स्टेशन पर बैठा हूँ !

हरिहरनाथ ढाई घंटे लेट है | पास में एक दम्पत्ति बैठे हैं अपने 2 बच्चों के साथ । चूंकि ट्रेन के आने अभी लेट है इसीलिए ये दम्पति भारतीय परंपरा के अनुसार प्लेटफार्म पर चद्दर डाल कर आराम से बैठ गए है । पूछने पर मालूम चला की इनका नाम बाबूलाल है ये अम्बाला में फैक्ट्री में काम कर अपना जीवन यापन करते है । पलायन का दर्द इनके चेहरे पर साफ झलक रहा है । रोड पर बाजेवालों को देख अचानक अपने पत्नी से बोल पड़े "ओह्हो, अरे देखो ना, मंगरु के लईका का बारात है शुक को, बचपने से कहता था की चाचा आप हमारे बाराती चलेंगे न?? आ अब बारात आयी तो हमारी छुट्टी ख़तम !

पत्नी ने भी उदासी से कहा " बताइये ना हमेशा टेम्पू पकड़ाने वही न आता है बेचारा साइकिल पर सब झोरा झक्कड़ बांध के, आ ओकरो बारात छोड़ना पड़ा ।

बाबूलाल बेचारे उदास होकर बोले ''ई पापी पेट, जवन न करादे! घर दुआर त छूटिये रहा है, अब रिश्ता नाता पर भी दरार आने लगा " ।

पत्नी ने समर्थन करते हुए हो कहा " ऊ छोड़िये ना,  घर पर माई कह रही थी की अब बाबुओ जी अकेले हाफ जा रहे हैं, मड़ई मनई के बिना अधूरी लगती है ,खेत खलिहान भी अब अकेले नहीं सम्भल रहा है!

पति ने भी पत्नी के दर्द को समझते हुए कहा " हा भाई हम जानते है, माई बाबू को अब सेवा की जरूरत है लेकिन का करे बिना पईसा के भी तो कुछ नहीं होगा ,आ खेती की स्थिति इस देश में क्या है देख ही रही हो??

इसी बीच उनका बेटा जो दोनों की बातों को बड़े गौर से सुन रहा था बोल पड़ा "ए पापा, ई आपकी फैक्टरिया गाँव ही रहती तो कितना मज़ा आता नू?? " गाँव के सब लोग पईसा भी कमाते और मज़े में एक साथ यही रहते ।यहाँ क्यों नहीं फैक्ट्री है पापा??

बाबूलाल निरुत्तर है और असल में उन्होंने कभी ऐसा सोचा ही नहीं इनकी तमाम उम्र तो बस यूं ही आने-जाने में गुजर गयी  ।

   बस अपने बेटे के संतुष्टि के लिए इतना ही कह पाए की "ओतना व्यवस्था यहाँ नहीं मिल सकता "।

लेकिन बच्चे के सवाल से हम कैसे निरुत्तर हो सकते है? हमारी सरकारें कैसे शांत रह सकती है ?आखिर गाँवों के और कितने लोग यूं ही अपना घर- बार, परिवार, समाज छोड़कर झुग्गी झोपड़ियों में जीते रहेंगे? हम अगर रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने में विफल रहे है, तो क्यों नहीं निजी और असंगठित क्षेत्र के कर्मियों के लिए ऐसे प्रावधान लाये जिनसे उन्हें दयनीय जिंदगी जीने पर मजबूर न होना पड़े ! ऐसे बहुत सारे फालतू विचार मेरे मन में घूमने लगे  ।

इसी बीच अनाउंसमेंट हुआ "एक पैंतालिस तेईस,  बरौनी से चलकर अम्बाला को जानेवाली हरिहरनाथ एक्सप्रेस प्लेटफार्म नंबर एक पर आ रही है "।

प्लेटफार्म पर एक हलचल मच गयी, सब लोग इधर से उधर भागने लगे, बाबूलाल भी चद्दर समेट कर बैग में डालते हुए बरहम बाबा से गोहरा रहे की खाली खड़ा होने भर का जगह मिल जाए जनरल बोगी में , बाकी रास्ता तो कट ही जाएगा ।

मैं भीड़ देख कर चिंतित हूँ वही इनकी हिम्मत देखकर आश्चर्यचकित!

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©विकास पाण्डेय

    (बलिया)

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