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पहचान (लघुकथा) -सुरेश सौरभ

कुत्ते कुत्ते कुत्ते ...यह बड़बड़ाते हुए वह सोते-सोते एकदम से उठ पड़ी। भरी सर्दी में पसीना-पसीना हो गई। अभी भी कुत्ते कुत्ते कहते हुए हांफ रही थी। कांप रही थी। मम्मी ने उसे झिंझोड़कर पूछा-क्या हुआ ? क्या हुआ बेटी ? फिर वह मां के गले लगकर रोने लगी ..फिर सुबकते हुए बोली-मां मैंने देखा कुछ लड़के मेरा पीछा कर रहे हैं। मैं तेजी आगे भागे जा रही हूं। फिर भागते-भागते उनसे अचानक घिर गई। फिर  वे सब लड़के आदमखोर कुत्तों के रुप बदल गये और मुझ पर टूट पड़े। और...फिर.... वह फिर सुबकने लगी।

   मां ने उसे समझाते हुए कहा-बेटी कुत्ते को तो पहचाना जा सकता है, पर आदमी में छिपे कुत्ते भेड़िए को नहीं पहचाना जा सकता। तेरा सपना तुझे आगाह कर रहा है कि इंसानों के अंदर छिपे हैवानों को पहचानना शुरू कर।


लेखक-सुरेश सौरभ

निर्मल नगर लखीमपुर खीरी

उत्तर प्रदेश  पिन-262701

कापीराइट-लेखक

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